
नहीं माने मन मूढ़ गँवार
कबीर साहब बहुत अनूठे हैं और उतने ही अनूठे उनके भजन और दोहे हैं; बिल्कुल सरल व्याकरण, जमीनी भाषा और सीख से ओतप्रोत। आप गहराई से अगर उन्हें पढ़ें तो बुद्ध की छाँव और वेदांत की धूप दोनों आते जाते दिखाई देगी।
बनारस शहर के घाट के पास ही उनका घर था। ठीक उनके घर के सामने कसाईखाना था और यह देख के वह बहुत दुखी होते थे। मांसाहार और अंधविश्वास का विरोध कबीर साहब के हर दूसरे दोहे में देखने को आपको मिल जाएगा। संसार के क्रूर व्यवहार से भी उनका सर किसी के नहीं झुका, बल्कि जगत के प्रति करुणा, सहनशीलता और प्रेम हमें उनकी लिखाई में देखने को मिलता है।
इस भजन की पहली पंक्ति में कबीर साहब कहते हैं, “नहीं माने मूढ़ गँवार” आमतौर पर हम गँवार उन्हें बोलते हैं जो गाँव से बाहर न आ पाएं हो या जिनका सामाजिक शिक्षा से भी सरोकार कम रहा हो लेकिन कबीर साहब गँवार उस मन को कह रहे हैं जो भीतर के जंगल से बाहर नहीं आ पाया हो। जैसे कोई पशु से भी ज्यादा हिंसक आदमी अपने पशु जैसे विचार और हरकत अपने मन से उतार ही न पा रहा हो। जिसके मन में अविद्या घुस कर बैठ गई हो की प्रकृति को भोग कर चैन मिल जाएगा।
कौन है वह व्यक्ति जिसे गँवार कह रहे हैं? वह हम सब हैं जो बाहर से स्वच्छ मगर भीतर से, मन से बहुत मलिन हैं। क्योंकि हम इतने गँवार हैं इसलिए संतों ने भजन ही लिख दिए ताकि इनको गाकर, याद करके हम यह बार बार समझें कि हमारी पशुता और प्रकृति का भोग; हमें भीतर से शांत नहीं कर सकता है। यही अविद्या संत हमें त्यागने को कह रहे हैं। जिसके मन में अविद्या का पाश है, वह मूढ़ और गँवार है।
चलिए, सीखते हैं कबीर साहब के भजन का पूरा अर्थ और जानते हैं कि वह हमारी भेंट किस चीज से कराना चाहते हैं।
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