
आज लाओत्ज़ू सौंदर्य और कुरूपता की बात कर रहे हैं। बिना लाग लपेट के सीधे सीधे व कह रहें हैं कि आप अगर किसी भी विषय को सुन्दर बोल रहे हो तो एक ही आशय है — उससे आपका स्वार्थ पूरा हो रहा है, और कुछ भी नहीं। और जहाँ आपका स्वार्थ नहीं पूरा होगा वहाँ आप कह दोगे कि कुरूपता है या असौन्दर्य है।
इस बात को ध्यान से सोचिए और स्वयं की जिंदगी में देखिए और बताइए कि क्या यह सच नहीं है कि हम दुनिया की ओर देखते हैं, जगत, संसार, प्रकृति की ओर, हमेशा ‘मैं’ बनकर — कभी देखने के लिए नहीं, कभी जानने-समझने के लिए नहीं; हमेशा अपनेआप को बनाने, बचाने, बढ़ाने के लिए।
सामने सचमुच क्या है, इससे हमें प्रयोजन नहीं होता। हमें वास्ता बस इतने से होता है कि सामने जो कुछ भी है, उससे हमारी स्वार्थ सिद्धि होगी कि नहीं होगी। न हमें ये पता है कि सामने जो है वो क्या है, न हमें ये पता है कि सामने जो है उसका हमारे ऊपर सचमुच असर क्या हो रहा है। हमें बस ये भाव होना चाहिए कि जो कुछ भी था सामने विषय प्रकृति में, उसके सम्पर्क से, उसके भोग से हमें सुखद अनुभव हुआ है।
लाओत्ज़ू की बातें हो सकता है आपके अंदर कुछ तोड़ सा दें मगर उनका तोड़ना वैसे ही होगा जैसे एक शिल्पकार अपनी मूर्ति को आकर देने के लिए छेनी और हथौड़े को प्रयोग में लाता है। इस कोर्स के माध्यम से सुने और समझें स्वयं को।
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