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ऐसे नहीं प्रसन्न होती हैं देवी || आचार्य प्रशांत, दुर्गा सप्तशती पर
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। आजकल नवरात्रि के दिन चल रहे हैं। और मैं देख रहा हूँ कि बहुत समय से जितने विडियोज़ हैं, उनपर लोगों के नवरात्रि से जुड़े प्रश्न आ रहे हैं। उसमें से एक प्रश्न था जो मुझे लगा कि आपके सामने उसे रखना काफ़ी ज़रूरी है। यह एक युवक का प्रश्न था, उनका नाम सिद्धार्थ है, वो पश्चिम बंगाल के रहने वाले हैं।

तो देश में मेरे ख्याल से नवरात्री अगर सबसे धूमधाम से कहीं मनायी जाती है तो वो पश्चिम बंगाल ही है और उसी के विषय में कुछ बातें वो बता रहे थे। उनका कहना था कि हर साल यह जो दिवस है यह पूरी तैयारियों के साथ मनाया जाता है। दो-दो महीने पहले से ही लोग कपड़े ख़रीदना शुरू कर देते हैं। और जो बाज़ार है उसमें आप पाएँगे कि जो पीक सेल्स (भारी ख़रीद) का समय होता है, वो नवरात्रि के समय पर ही आता है।

पर साथ-ही-साथ देखते हैं कि इसमें कुछ विकृतियाँ भी हैं। जैसे कि उन्होंने एक ऐड (विज्ञापन) देखा था, जहाँ पर एक लड़का और एक लड़की नवरात्रि के एक पंडाल में खड़े हैं। जैसे कि माता के सामने फूल अर्पित किये जाते हैं; वो व्यक्ति माता की जगह एक युवति को वो फूल समर्पित कर रहा था। दूसरी जगह उन्होंने यह पढ़ा कि नवरात्रि के दिनों में, बंगाल में जो शराब होती है, जो नशा होता है उसकी बहुत ज़्यादा वृद्धि शुरू हो जाती है। और इसी तरह से उन्होंने दो-तीन एक्जांपल्स (उदाहरण ) और दिये थे।

तो वो यही कह रहे थे, क्योंकि शायद आज के समय में लोगों को नवरात्रि का जो असली महत्व है वो नहीं पता है, इसलिए उनके लिए त्योहार जो है वो पूरी तरह से मनोरंजन बन गया है और कुछ भी नहीं बचा है। तो वो चाहते थे कि आप एक बार इस विषय पर थोड़ी बात करें कि वास्तव में नवरात्रि का महत्व क्या है?

आचार्य प्रशान्त: जो देवी पूजन का सिद्धांत है, जो शाक्त पंथ का पूरा दर्शन ही है, उसको समझना होगा। देवी को समझ गए तो नौ देवियाँ या नवदुर्गा एकदम स्पष्ट हो जाएँगी अपनेआप। जो पूरी कथा है देवी की और साथ-ही-साथ देवी का सिद्धांत और दर्शन, यह आता है दुर्गा सप्तशती ग्रंथ से।

तो जो भी लोग देवी उपासक हैं, जिनकी भी शक्ति में आस्था है, अगर उन्होंने दुर्गा सप्तशती नहीं पढ़ा है, तो फिर प्राकृतिक सी बात है कि वो नवदुर्गा का दुरुपयोग करेंगे। वही मनोरंजन, खाना-पीना, खरीददारी, नाचना-कूदना, कई तरह की अभद्रताएँ भी।

न जाने कितने तरह के माल हैं, उत्पाद हैं बाज़ार में जिनकी सालाना बिक्री का एक-तिहाई और कई बार आधा भी होता है, सिर्फ़ नवदुर्गा के दिनों में या नवदुर्गा से लेकर के दिवाली तक का जो महीना होता है उसमें। तो नवदुर्गा भी फिर उपभोक्तावाद का त्योहार बन जाता है। क्यों बन जाता है? क्योंकि हम जानते ही नहीं है कि देवी महात्म्य है क्या? यह भी एक नाम है सप्तशती का — देवी महात्म्य।

तो देवी की महिमा क्या है हम यह नहीं जानते, तो इसलिए फिर हम उसका तरह-तरह से दुरुपयोग करते हैं। लड़के-लड़कियों की खिलवाड़ की चीज़ बन जाता है वो।

तो दुर्गा सप्तशती क्या है? अब वैसे तो सप्तशती है, तो प्रकट ही हो रहा होगा कि सात सौ उसमें श्लोक हैं। एक और ग्रंथ है जिसमें सात सौ श्लोक हैं, कौनसा?

प्र: भगवद्गीता।

आचार्य: तो कुछ बात है इस आँकड़े में — सात सौ! सप्तशती में भी सात सौ हैं और भगवद्गीता में भी सात सौ हैं।

तो क्या है दुर्गा सप्तशती? मार्कण्डेय पुराण है, उसका एक भाग है दुर्गा सप्तशती और मार्कण्डेय पुराण ऋषि मार्कण्डेय के नाम पर है। वेदों के पुराने ऋषियों में से हैं। वेदों की कई प्रमुख ऋचाएँ उनके नाम हैं। तो ऋषि मार्कण्डेय क्या कर रहे हैं? अपने आश्रम में ज्ञान दे रहे हैं। और उसी वार्तालाप में दुर्गा सप्तशती को वो उद्घाटित कर देते हैं।

ज्ञान जानते हो किसको दे रहे हैं वो? पक्षियों को। पक्षियों को ज्ञान दे रहे हैं, वो सांकेतिक बात है। जो ज्ञान देने वाला है वो पुरुष है; पुरुष माने चेतना। जो सुनने वाला है वो पक्षी हैं; पक्षी माने प्रकृति। और ज्ञान जब भी दिया जाएगा वो चेतना के द्वारा प्रकृति को दिया जाएगा, चेतन के द्वारा जड़ को दिया जाएगा। जो समझता है, जिसको हम चैतन्य पुरुष कहते हैं, उसके द्वारा उसको दिया जाएगा जो समझ सकता है; पर अभी नहीं समझता।

तो कहानी उसमें कैसे शुरू होती है?

कहानी ऐसे शुरू होती है कि एक राजा हैं और एक वैश्य है। राजा हैं सुरथ नाम के और न्याय प्रिय राजा हैं, दयालु राजा हैं, सीधे, भले आदमी हैं। और अपने लोगों का अच्छा ख़याल रखते थे। पर उनपर बाहर से एक सेना आक्रमण कर देती है। लड़ने जाते हैं, लेकिन हार जाते हैं। तो उनके राज्य का एक बड़ा हिस्सा वो जो आक्रमणकारी हैं वो छीन लेते हैं। तो राजा पर एक तो हार का दुख, दूसरे राज्य खोने का दुख, तीसरा यह कि मैं अच्छा आदमी हूँ फिर भी मुझे अपमान और हार क्यों झेलनी पड़ी, इस बात का दुख।

वापस आते हैं तो पता चलता है कि उनके ही मंत्रियों ने और अन्य लोगों ने सबने मिलकर उनके विरुद्ध षड्यंत्र कर रखा है। तो राजा का मन एकदम खिन्न हो जाता है — जिसे कहते हैं दिल का टूट जाना। क्षुब्ध हो जाते हैं जीवन से ही और उन्हें दिखता है कुछ रखा नहीं है। जो बाहर वाले हैं वो तो चोट देते ही हैं — आकर राज्य लूट ले गये — जो अपने लोग थे, जिनको अपना मानते थे, उन्होंने भी कोई कसर नहीं छोड़ी, उन्होंने भीतरी साज़िश करी। बाहर वालों ने बाहर से मारा, भीतर वालों ने भीतर से मारा।

तो यह सब देखकर बड़े क्षुब्ध मन के साथ, बड़े चिंतित और शोकाकुल होकर जंगल की ओर निकल जाते हैं। राजा सुरथ हैं — यह हम दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय की बात कर रहे हैं। ऐसे इसमें तेरह अध्याय आते हैं। तेरह अध्यायों को तीन चरित्रों में बाँटा गया है। तो यह पहला ही अध्याय है, पहला चरित्र — तो ये जंगल की ओर निकल जाते हैं।

वहीं जंगल में एक व्यापारी भी आये हुए हैं। व्यापारी कौन हैं? ये भी सज्जन व्यापारी थे। इन्होंने भी अपने घर-कुटुंब, नात-रिश्तेदार, भृत्यों, नौकर-चाकर सब की पूरी देखभाल करी थी। पर ये पाते हैं कि इनके लोग इनकी संपत्ति के लालच में, इनके ही विरुद्ध हो गये और इन्हें व्यापार में घाटा हो गया, तो घरवालों ने इनको बाहर निकाल दिया। जिन घरवालों को और दोस्त-यारों को इन्होंने स्नेह के साथ पाला-पोसा था, उन्होंने ही व्यापार में घाटा होने पर इनका अपमान करके इनको अलग कर दिया।

तो ये भी बड़े आहत होकर के जंगल में आये हुए हैं। इनका तो ऐसा था कि सोच रहे थे कि जंगल चले जाओ, वहाँ कोई जंगली जानवर मुझे खाकर ख़त्म ही कर दे! 'मैं जीना ही नहीं चाहता! ऐसा जीवन जी के क्या करूँगा, जिसमें पहली बात तो व्यापार में घाटा हुआ; लेकिन उससे भी बड़ी बात यह कि जिनको अपना माना था उन्होंने ही बड़ी चोट दे दी।'

तो यह राजा और यह वैश्य हैं। दोनों खिन्नमना, दोनों ही जगत से हार और चोट खाये हुए घूम रहे हैं। तो जाते हैं वहाँ एक ऋषि का आश्रम दिखायी देता है जंगल में। ऋषि का आश्रम नहीं दिखायी देता, अगर राजा राज्य में और वैश्य व्यापार में ही रहे आते। तो ऋषि का आश्रम अक्सर दिखायी ही तब देता है जब जगत से करारी चोट मिल चुकी होती है।

तो वहाँ जाते हैं, देखते हैं कुछ अद्भुत सा है। एक तो माहौल बड़ा शांतिपूर्ण है; दूसरे, वहाँ सब नन्हें जानवर बैठे हुए हैं। और ऋषि अपने शिष्यों से बात कर रहे हैं। और वो सब जानवर भी बैठे हुए हैं वो भी जैसे सुन रहे हों। और जानवर बैठे हैं छोटे, पक्षी वग़ैरा बैठे हैं। बड़ी बात यह है कि हिंसक पशु भी हैं वहाँ पर जो उन जानवरों को नुक़सान नहीं पहुँचा रहे हैं। जंगल में और कहीं कुछ करते होंगे, पर उस जगह पर ऋषि के आश्रम में बड़े हिंसक पशु भी छोटे जानवरों को नुक़सान नहीं दे रहे, तो आश्चर्य होता है — 'नहीं, यह कैसे हो गया? प्रकृति का यह रूप भी हो सकता है!'

मार्कण्डेय ऋषि की बात कर रहे थे कि वो पक्षियों से बात कर रहे थे — वहाँ भी प्रकृति का हमें एक रूप देखने को मिल रहा था — जो सुनने को तैयार हैं। प्रकृति ही है जो जड़ है और प्रकृति ही है जो चेतन होने को भी तैयार है, तो पक्षियों से बात कर रहे हैं। और यहाँ हम पा रहे हैं कि पशु-पक्षी ही हैं, जो वहाँ पर आपस में सौहार्द से और सहकार से बैठे हुए हैं।

यह पशुओं की बार-बार क्यों बात हो रही है? जहाँ पशुओं का उल्लेख है वहाँ वास्तव में इशारा हमारी पशुता की ओर है। कि ऋषि के सानिध्य में आकर के हमारी पशुता भी अपनी सीमाओं से आगे बढ़ने लगती है। पशु की अपनी सीमाएँ होती हैं, जो प्रकृति ने बाँध रखी होती हैं, वो उनका उल्लंघन करने को तैयार हो जाती है।

तो आशय यही है कि जब तुम ऋषि के पास आते हो — ऋषि माने कोई व्यक्ति नहीं, बोध का एक स्रोत — जब तुम ऋषि के पास होते हो तो तुम्हारी चेतना तुम्हारी पशुता के बंध से बाहर आने लगती है। जो तुम सामान्यतया व्यवहार करते थे उससे कुछ अलग, उससे ऊँचे दर्जे का व्यवहार तुम दर्शाने लगते हो।

तो ये दोनों ऋषि से पूछते हैं। कहते हैं, ‘यह ऋषि थोड़े हमें अद्भुत लग रहे हैं, इनसे कुछ पूछा जाए।’ तो दोनों ऋषि से पूछते हैं और दोनों की जिज्ञासा मूल में एक ही है। कहते हैं, ‘हम अच्छे लोग हैं। पहली बात तो यह हमने दुनिया से चोट खायी और दूसरी बात यह है कि दुनिया से चोट खाकर हमारा जो मन है वो कुछ बातें सैद्धांतिक रूप से जान गया है। क्या बातें जान गया है? कि यहाँ अपना कोई नहीं होता, मोह-ममता से बहुत फ़ायदा है नहीं। लेकिन उसके बाद भी हम यहाँ जंगल में हैं, तो हम पा क्या रहे हैं कि हमारा मन अभी भी अपने राज्य और व्यापार में ही लगा हुआ है।’

अब जैसे वो कहते हैं कि पीछे हम जब अपने काम में होते थे, तो अपने पशुओं का और अपने भृत्यों का, अपने दासों का भी पूरा ख़यालरखते थे। और हम यह भी देखते थे कि उनकी संगत अच्छी रहे, और उनकी हर तरह से भलाई होती रहे। अब वही लोग जिनकी हम भलाई चाहते थे उनसे हमें चोट पड़ी, हम जंगल आ गए हैं, लेकिन फिर भी हमारे मन में चिंता अभी उन्हीं की बनी हुई है।

हम यहाँ बैठकर भी विचार यही कर रहे हैं कि कहीं उनका कोई नुक़सान तो नहीं हो रहा। जिन्होंने हमें कहीं का नहीं छोड़ा, जिन्होंने हमें बड़े गहरे घाव दे दिये, हमारा मन उनसे भी अनासक्त नहीं हो पा रहा। ऐसा क्यों हैं ऋषि?

हम सब जान रहे हैं, हम सब समझ रहे हैं! घटनाचक्र ने संसार की असलियत बिलकुल उधेड़कर हमारे सामने रख दी है, लेकिन मन मान तब भी नहीं रहा है। मन ने जिसको जान लिया कि अपना नहीं है, उससे वो अभी भी मोहित और आसक्त है। तो यह क्या है ऋषि? हम क्यों दुख पा रहे हैं?

जो भ्रमित हो और दुख पाता हो, उसका तो समझ में आता है कि भ्रम है तो दुख है। हम तो भ्रमित भी नहीं हैं। हमें तो कालचक्र ने जगत की पूरी सच्चाई बिलकुल खोलकर दिखा दी है उसके पूरे विभत्स रूप में, लेकिन हम फिर भी पा रहे हैं कि मन हमारा, दिल हमारा अभी भी संसार में ही अटका हुआ है। प्रभु यह क्या है? हम जानते-बूझते भी मूर्ख क्यों बन रहे हैं? हम समझदार होकर भी लाचार क्यों हैं?

तो ऋषि मुस्कुराते हैं, ऋषि बोलते हैं, 'यह महामाया हैं, यह महामाया हैं! सामने होती है सच्चाई, यह फिर भी उसको छुपा देती हैं। और उसको छुपा करके तुम्हें वो दिखा देती हैं जो सत्य है ही नहीं, यह महामाया हैं! यह उनकी करनी है।' तो उन दोनों में उत्सुकता उठती है, कहते हैं, 'कौन है महामाया? बताइए इनके बारे में कुछ।'

तो यहाँ से देवी के विषय में उल्लेख शुरू होता है। तो ऋषि कहते हैं, 'बैठो, बताते हैं।' तो राजा और व्यापारी दोनों पूछते हैं कि कौन हैं यह महामाया, आप जिनकी बात कर रहे हैं ऋषिवर। तो ऋषि कहते हैं, 'यह वही हैं जिन्होंने स्वयं भगवान विष्णु को भी सुला दिया था।' दोनों की उत्सुकता और जगती है। कहते हैं, 'भगवान को सुला दिया! भगवान को सुला दिया, कैसे?' तो बोलते हैं, 'सुनो फिर कहानी।'

फिर जैसे पुराणों की विधि है। यह पौराणिक तरीक़ा है, लहजा है पुराणों का एक।

कहते हैं, ‘प्राचीन काल में एक बार ऐसा हुआ कि भगवान विष्णु सो रहे थे महामाया के प्रभाव में। वो सो रहे थे और उनके कानों की मैल से मधु-कैटभ नाम के दो राक्षस पैदा हो गये। दोनों राक्षस थे, ये पैदा हुए तो उन्होंने कहा भगवान तो सो रहे हैं तो उन्मत्त होकर दौड़े, कि ब्रह्मा को मार देंगे और हम ही परमेश्वर बन जाएँगे।

तो ब्रह्मा बड़े घबराये। बोलें ये तो लीले लेते हैं। वो विष्णु के पास पहुँचे कि बचाओ भाई! यह क्या आपके ही शरीर से उत्पन्न दो राक्षस मुझे मारने को तैयार हैं। विष्णु सो रहे हैं; उठने को तैयार नहीं। तो जिसने विष्णु को सुला दिया — सुलाने का मतलब समझते हो? जो ऊँचे-से-ऊँचा है उसको भी जो मदमत्त कर दे उसको माया कहते हैं। जो ऊँचे-से-ऊँचा है, उसको भी जो मद में डाल दे, नींद में डाल दे, बेहोशी में डाल दे, अचेत कर दे — उसको माया कहते हैं।

तो ब्रह्मा जी ने उन्हीं माया की स्तुति की। बोले, 'हे देवी, आपको मैं उपमा भी क्या दूँ? आपकी स्तुति क्या करूँ? और आपसे प्रार्थना क्या करूँ? आप तो स्वयं विष्णु को वश में करे हुए हैं!' तो कहते हैं देवी प्रसन्न हो गईं। देवी प्रसन्न हो गईं और विष्णु जी की आँखों से निकल कर प्रकट हो गईं। और विष्णु उठ बैठे। विष्णु उठ बैठे, तो ब्रह्मा जी ने कहा कि 'बचाइए महाराज!, वो मधु-कैटभ पीछे हैं।'

तो विष्णु में और उन राक्षसों में — फिर वही पौराणिक परंपरा — पाँच हज़ार साल तक युद्ध हुआ। पाँच हज़ार साल तक लड़ाई चली! वो दोनों राक्षस हारने को तैयार नहीं!

फिर माया का प्रभाव! माया ने उन दोनों राक्षसों को विष्णु पर प्रसन्न कर दिया। राक्षसों ने कहा — 'यह विष्णु जो है, यह बड़ा वीर है। हम दो हैं यह अकेला, पाँच हज़ार साल से हमारा मुक़ाबला कर रहा है, हार नहीं रहा है।' तो दोनों विष्णु पर प्रसन्न हो गए।

यह माया! आपको आपके ही विनाश तक ले जाती है। तो दोनों कहते हैं विष्णु से 'वीर, माँगो क्या वर माँगते हो, हम प्रसन्न हैं तुम पर?' विष्णु बोलें, 'एक ही वर चाहिए, तुम दोनों मरो और मेरे ही हाथ से मरो।' तो राक्षस दोनों बोलते हैं 'तथास्तु'। और फिर दोनों का वध कर दिया विष्णु ने राक्षसों के दिये हुए वर से ही। यही माया है! तो ऐसे करके जो पहला अध्याय है, जो पहला चरित्र भी है दुर्गा सप्तशती का, वो समाप्त होता है।

इसमें जो समझने वाली बात है वो जानना। जिस मद की, जिस निद्रा की बात हो रही है, जिसने स्वयं विष्णु को वशीभूत कर लिया था; वो हमें जन्म से मिली हुई है, इसीलिए उसे जन्मदात्री भी कहते हैं। इसीलिए उसे जगत जननी भी कहते हैं। हम अचेत ही पैदा होते हैं, हम निद्रा में ही पैदा होते हैं, हम बेहोश ही रहते हैं सदा; वो बेहोशी ही जन्म लेती है। वो बेहोशी जन्म ही नहीं लेती — कह सकते हो — वही बेहोशी जन्म देती है, इसीलिए उसको कहते हैं महामाँ भी, वो महामाता भी है।

लेकिन वही जो तुम्हें अपने चारों ओर दिखायी देता है अपनी बेहोशी में, अपने बंधनों के रूप में वही तुम्हारी मुक्ति का भी कारण बन सकता है, अगर तुम उसको जान लो, समझ लो।

और ब्रह्मा जी ने यही करा — संकेतों को समझना होगा, नहीं तो हम मूल अर्थ से वंचित रह जाएँगे। ब्रह्मा जी ने यही करा। उन्होंने कहा कि आप तो इतनी अज्ञेय हैं, आपकी तो स्तुति भी नहीं की जा सकती। और जिसने मान लिया कि यह जो रहस्य है यह बुद्धि से समझने का नहीं है, क्योंकि बुद्धि भी इसी रहस्य की गिरफ़्त में है; तो बुद्धि इसे समझ कैसे लेगी?

यह रहस्य तभी पता चलता है जब तुम इसका अवलोकन करो। जो बाहर चल रहा है जिसको रहस्य बोल रहे हो उसका भी, और वो जो बुद्धि भीतर बैठी है जो इस रहस्य को देख रही है उसका भी। दोनों को जब एक साथ देख लो, तो तुम इससे मुक्त हो जाते हो। इसके बारे में बहुत धारणाएँ बना कर काम नहीं चलेगा, क्योंकि धारणाएँ भी उसी नशे का हिस्सा ही हैं।

तो इसीलिए दुर्गा सप्तशती को मुक्तिदाता ग्रंथ कहते हैं। कोई पूछे कि इस ग्रंथ का उद्देश्य क्या है? हम कब मानेंगे की सफल हो गयी? जब तुम आओगे तीसरे चरित्र में, तो तुम पाओगे देवी वरदान देती हैं मुक्ति का, जो उनसे मुक्ति माँगे; जिसने मुक्ति नहीं माँगी उसको नहीं देतीं। जिसने मुक्ति का वरदान माँगा, देवी उसे मुक्ति का वरदान दे देती हैं और वहीं पर जाकर यह ग्रंथ समाप्त हो जाता है।

तो यह ग्रंथ मुक्तिदाता है। किससे मुक्तिदाता है? माया से मुक्ति दिला देता है। माया ही माँ हैं, माया ही देवी हैं, माया ही प्रकृति हैं। इन सब शब्दों को एक साथ मानना — माया ही माँ हैं, माया ही मृत्यु हैं, माया ही देवी हैं, माया ही शक्ति हैं, माया ही जननी हैं, और माया ही हरनी हैं — वही जन्म देंगी, वही मृत्यु देंगी। वही सबकुछ तुम्हें दे देती हैं; वही सबकुछ तुमसे वापस भी ले लेती हैं।

तुम उनको जान लो, तुम उनको समझ लो, तुम उनके समक्ष अपना अहंकार नमित कर दो, तो मुक्ति दे देंगी। और तुम उन्हें समझो नहीं, तुम लिप्त होने लग जाओ उनसे — जो कि अहंकार की बात है — उनका बड़ा अपमान है कि तुम उनके सामने आदर से झुकने की जगह उनसे लिप्त होने लग गये या उनके विरुद्ध होने लग गये या आसक्त होने लग गये, तो फिर तुमको बंधन में रहने की सज़ा मिल जाती है।

देवी कोई व्यक्ति नहीं हैं। देवी कोई ऐतिहासिक चरित्र नहीं हैं। देवी कोई साधारण किस्सा-कहानी नहीं हैं। देवी एक बहुत सशक्त प्रतीक हैं तुम्हारे भीतर के बंधनों का जिनसे तुम मुक्त होना चाहते हो। बंधनों का भी प्रतीक हैं देवी और मुक्तिदात्री भी देवी स्वयं ही हैं।

वास्तव में कहा यह जा रहा है कि ये सब कुछ जो है, तुम्हारे बाहर और तुम्हारे भीतर, इसको जानो इसको समझो। इसको भोगने के लिए नहीं आये हो तुम, इसको समझने के लिए आये हो तुम; उसी समझने को कहते हैं नमन करना भी। और जो समझ गया वो मुक्त हो जाएगा, जो नहीं समझेगा वो बहुत दुख झेलेगा। यह सिद्धांत है जिसको बड़े रोचक तरीक़े से एक बोध-कथा के रूप में दुर्गा सप्तशती हमारे सामने रख देती है।

तो पहला अध्याय स्पष्ट हो रहा है?

यह हैं देवी! अब बताओ इस पूरी चीज़ में उस उपद्रव का कहाँ स्थान है, जिसकी तुम बात कर रहे थे? जो अभी आया था न तुम्हें संदेश, उस उपद्रव के लिए इस पूरी कथा में कोई जगह है?

प्र: इसी पर एक प्रश्न मेरे मन में आ रहा था कि जैसे कहानी की शुरुआत में बात आती है न कि भगवान विष्णु के ऊपर महामाया का यह प्रभाव होता है कि वो निद्रा में चले जाते हैं, वो सो जाते हैं और मधु-कैटभ पर यह प्रभाव होता है कि वो प्रसन्न हो जाते हैं और उनको लगता है कि विष्णु तो बडे़ अच्छे हैं। और अहंकार में हम इसे कहते हैं ‘वरदान देंगे’। तो मैं यह देख रहा था कि हमारे ऊपर एक तरह से महामाया का जो प्रभाव हो रहा है, वो शायद यही वाला हो रहा है।

आचार्य: बहुत बढ़िया! कि प्रसन्न कर दिया, और उत्तेजित हो गए। जिन दिनों में आपको और बोधपूर्ण हो जाना चाहिए, आपको और गहन, गुरु गंभीर हो जाना चाहिए; उन दिनों में आप उत्तेजित हो जाते हो और ज़्यादा पशुओं वाली हरकतें शुरू कर देते हो।

एक आदमी शायद साल के अन्य दिनों में फिर भी थोड़ा संयमित रहता हो, उसकी दृष्टि में कुछ सफ़ाई रहती हो, उसकी समझ में कुछ गहराई रहती हो, लेकिन हम पाते हैं कि जब हमारे त्योहार-उत्सव आते हैं तो व्यक्ति एकदम ही मनचला हो जाता है। उसका अहंकार और ज़्यादा सिर चढ़कर बोलने लगता है। उसके भीतर जो गिरी-से-गिरी और बुरी-से-बुरी वृत्तियाँ हैं — अजीब यह माया है — वो उत्सवों के समय ज़्यादा प्रकट होने लग जाती हैं। नहीं तो ऐसा कैसे होता कि शराब की खपत नवदुर्गा में दोगुनी, चार-पाँच गुनी हो जाती है!

इतना ही नहीं, कई अन्य तरह की भी विलासिता की चीज़ें होती हैं, भोग की चीज़ें, जो नवदुर्गा में ज़्यादा बिकने लग जाती हैं। यह कैसे संभव हो पाता है! त्योहार तो आते हैं हमें होश देने के लिए, हमें शांति, शील, संयम देने के लिए और हम त्योहारों का उपयोग कर रहे हैं अपनी पशुता की आग में और घी डालने के लिए। माया ही है! माँ की करनी!

इसी त्योहार में, जो दुर्गा सप्तशती को सुनेगा, समझेगा, गह लेगा, जी लेगा; मुक्त हो जाएगा। और इसी त्योहार में न जाने कितने लाखों लोग होंगे, जो और बंधन में गिर जाएँगे और कीचड़ में धस जाएँगे, अपने लिए उम्र भर के बंधन तैयार कर लेंगे।

माँ कहती हैं, 'तुम मुझसे जो माँगोगे मिलेगा — तुम्हें मुक्ति चाहिए मैं मुक्ति दे दूँगी और तुमको उपद्रव और मनोरंजन और भोग यही चाहिए तो मैं तुम्हें यह दे दूँगी।' ऐसा कोई और भी कहता है, कौन कहता है? कौन कहता है? इतनी बार दोहराया न — भगवद्गीता चौथा अध्याय ग्यारहवाँ श्लोक "जो चाहिए मुझ से मिलेगा पार्थ! जो चाहिए मिलेगा। मैं तुम्हें ऊँचे-से-ऊँचा भी दे सकता हूँ। मैं तुम्हें नीचे-से-नीचा भी दे सकता हूँ। मैं तो अकर्ता हूँ। मेरे हाथ में कुछ नहीं है। मैं तो दर्पण जैसा हूँ!"

दर्पण के हाथ में कुछ होता है? दर्पण की अपनी कोई स्वेच्छा होती है? वो क्या करता है, बस, जो तुम हो प्रतिबिंबित कर देता है। "जो मुझे जिस प्रकार भजता है, मैं भी उसे उसी प्रकार भजता हूँ।" बिलकुल वही बात देवी यहाँ पर कह रही हैं। 'तुम नवदुर्गा का दुरुपयोग करना चाहते हो, वो तुम्हारे लिए मनोरंजन, खरीददारी, शराब, लिप्सा, वासना, इसका उत्सव है; तो ठीक है! मैं नहीं तुम्हें रोकने आने वाली। और अगर तुम्हें बोध चाहिए और मुक्ति चाहिए तो वो भी तुम्हें मैं सहर्ष दूँगी, तुम माँगो तो सही!' पर माँग कौन रहा है। माँगने वाला चाहिए, देवी दे देती हैं।

देवी से अर्थ समझ रहे हो न? देवी माने क्या? देवी माने ये सबकुछ जो प्रकृति के अंतर्गत आता है — पूरा संसार, तुम और तुम्हारा पूरा जीवन। तो देवी तुम्हें जो माँगोगे वो दे देंगी, इससे आशय क्या हुआ? तुम्हें जीवन मिला है, तुम जो माँगोगे जीवन तुम्हें दे देगा। तुम सही माँगना सीखो। जीवन अगर तुम्हें दुखी कर रहा है, जीवन अगर तुम्हें बंधन में रखे हुए है, जीवन अगर तुम्हें सब उल्टी-पुल्टी ही चीज़ें दे रहा है; जीवन को दोष देना है? इसका मतलब है तुमने यही माँगा है। यही माँगा है!

तुम जो माँगोगे जीवन तुम्हें वही देगा। तुम एक बार साफ़ मन से सही माँग रख कर तो देखो कि मिलता है कि नहीं मिलता है। यह सीख है, यह समस्त अध्यात्म की सीख है। चाहे वो वैष्णव मार्ग से आये, चाहे वो शाक्त मार्ग से आये। मार्ग कोई भी हो, बात तो एक ही होगी न? क्योंकि सत्य तो एक ही होता है।

तो यह हुआ पहला अध्याय।

प्र: इसमें मैं एक चीज़ और पूछ रहा था। अक्सर अध्यात्म में शमन-दमन की बहुत बात की जाती है। हम कहते हैं एक तरह से कि हमारे अन्दर जो प्रकृति है, उसका हम शमन या दमन करते हैं। उसकी दूसरी ओर मैं यहाँ देख रहा हूँ कि ऋषि यहाँ समझा रहे हैं कि उनके आगे नमित होना है, उनकी स्तुति करनी है। तो यह शायद एक थोड़ा अलग तरीक़ा है।

आचार्य: यह थोड़ा सा इसमें समझने की बात है। ज्ञान मार्ग तो सीधे ही कह देता है, 'जानो, समझो, दूरी बनाकर रखो’ है न! जो शब्द होता है वो होता है विरक्ति, वैराग्य, डिटेचमेंट। वहाँ एकदम स्पष्ट हो जाता है कि ज़रा सी दूरी रखनी है, साक्षी बनना है। जो देवी मार्ग है, उसमें कहते हैं, 'नमित हो जाना है'।

यह भेद जो समझ लेगा कि नमित हो जाना और साक्षी हो जाना एक ही बात है, वो बहुत दूर तक जाएगा। मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि ज्ञान और भक्ति अलग-अलग नहीं हैं। साक्षी होना और भक्त हो जाना वास्तव में अलग-अलग नहीं है। हाँ, ये ऊपरी तौर पर अलग प्रतीत हो सकते हैं। और अज्ञान में हमने इनको प्रदर्शित ऐसे कर दिया है, लोक परंपरा में इनको चित्रित और वर्णित ऐसे कर दिया है जैसे बहुत अलग-अलग हों; ये अलग-अलग हैं नहीं।

देखो, नमित होने का क्या मतलब होता है। नमित होने का मतलब होता है कि मैं अपने से किसी बहुत ऊँचे के सामने खड़ा हुआ हूँ, वो इतना ऊँचा है कि मैं उसे अपनी मुट्ठी में नहीं भींच सकता, अपनी जेब में नहीं रख सकता, मैं उसका भोग नहीं कर सकता, वो बहुत बड़ा है — यही तो साक्षित्व है न!

सिर झुकाने का मतलब है — मेरे सामने जो है, वो मुझसे बिलकुल अलग आयाम का है। तुमसे अलग आयाम का है, क्या तुम उससे सम्बन्धित हो सकते हो? क्या तुम उससे आम प्रकार का कोई रिश्ता बना सकते हो? क्या तुम उसपर अपने गंदे हाथ रख सकते हो? यही साक्षित्व है! मैं दूर हूँ, मैं छूऊँगा नहीं। बस जो साक्षी है वो कह देता है कि जो सामने घट रहा है वो प्रकृति है, मैं पुरुष हूँ। और नमित होने में तुम कह देते हो कि जो सामने है वो भगवान है, मैं भक्त हूँ।

लेकिन दोनों ही कथनों में एक बात साझी है — हम दोनों में आयामगत अंतर है। मैं कहूँ कि मैं पुरुष हूँ, सामने प्रकृति है, तो भी मैं एक बात मान रहा हूँ, क्या? हम दोनों अलग-अलग हैं। जब अलग-अलग हैं तो लिप्तता नहीं चलेगी। और मैं कहूँ कि मैं भक्त हूँ, सामने भगवान है या मैं भक्त हूँ और सामने देवी हैं, तो भी मैं मान रहा हूँ कि दोनों अलग-अलग हैं; तो लिप्त नहीं हो सकते। वही साक्षित्व है, वही भक्ति है — दोनों एक ही बात हैं।

तो इनको अलग नहीं मानना चाहिए। और भक्ति के नाम पर अज्ञान से भरी हरकतें नहीं करनी चाहिए। और ज्ञान के नाम पर ऐसा न हो कि तुम नमन करने से बच रहे हो। ज्ञानी अगर नमित नहीं है, ज्ञानी अगर ऐसा है कि ज्ञान ही उसका ताज बन गया है और वो कह रहा है कि सिर झुकाऊँगा तो मुकुट गिर जाएगा; तो यह कोई ज्ञानी नहीं है। ज्ञानी वो जिसके ज्ञान ने उसका सिर झुका दिया हो। "हल्के-हल्के तर गये, बूड़े जिन सिर भार" कौन हैं? कबीर साहब।

सिर हल्का होगा तो, तर जाओगे। और कौन डूबता है? जिनका सिर भारी होता है। तो ज्ञानी असली वही है, जिसके ज्ञान ने उसका सिर भारी नहीं कर दिया, हल्का कर दिया है। जिसके ज्ञान ने उसके सिर को झुकने की स्वतंत्रता दे दी है, वो ज्ञानी है। तो ज्ञानी को भक्त होना पड़ेगा, ज्ञानी को नमित होना पड़ेगा।

और भक्त वो है, जो जान गया है कि मुझमें और उसमें एक आयामगत अंतर है, इसलिए मैं भोग नहीं कर सकता। भक्त में वैराग्य न आ गया हो, भक्त में साक्षित्व न आ गया हो, भक्त में जगत के प्रति उदासीनता न आ गयी हो, भक्त पुरुष-प्रकृति भेद न समझ गया हो, तो भक्त कैसा! फिर वो भक्ति कहाँ कर रहा है! फिर तो उसने भगवान को अपने ही तल पर गिरा दिया है। यह वो भगवान का मान नहीं रख रहा है; भगवान का तो वो घोर अपमान कर रहा है, भगवान को बिलकुल अपने जैसा बना रहा है, भगवान के बारे में किस्से-कहानियाँ गढ़ रहा है।

भक्त वो है जो जाने कि भगवान मुझसे बहुत-बहुत दूर हैं; हाँ, उनके निकट आने की सम्भावना पूरी है। लेकिन मैं तभी कहूँगा कि निकट आ गया, जब वास्तव में निकट आ जाऊँगा। मैं यह नहीं करूँगा कि हूँ तो मैं वही पुराना "मो सम कौन कुटिल, खल, कामी” कुटिल भी हूँ, खल भी हूँ, कामी हूँ, लेकिन साथ-ही-साथ कहूँ कि मैं अपने भगवान से अनन्य हूँ; यह नहीं चलेगा, ऐसी भक्ति झूठी है। ऐसी भक्ति झूठी है!

प्र: एक तरह से मैं अपनेआप को उस लायक़ बनाऊँगा कि मैं भगवान से जुड़ा रह सकूँ।

आचार्य: मैं इस लायक़ बनाऊँगा कि अपने भगवान से युक्त हो पाऊँ। योग हो जाए तो हमारा वियोग मिटे। लेकिन जब इस लायक़, इस क़ाबिल, ऐसा सुपात्र बन पाऊँगा कि भगवान के तल पर आ गया, अपना तल त्यागकर के; सिर्फ़ तब दावा करूँगा योग का। यह नहीं करूँगा कि जो मेरी ज़िंदगी चल रही है, चल रही है, साथ में मैं भगवान की एक छोटी सी मूर्ति लेकर चल रहा हूँ, कह रहा हूँ, ‘मैं तो अपने भगवान से बहुत प्रेम करता हूँ, मैं अपने भगवान से अभिन्न हूँ।’ जैसा कि ज़्यादातर लोग करते हैं। अपनी ही रोज़मर्रा की गंदी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं बना सकता भगवान को। यह महापाप हो जाएगा न?

उनको अगर अपने जीवन का हिस्सा बनाना है, तो मुझे पहले अपने जीवन को साफ़ करना पड़ेगा। मुझे अगर ईश्वर को अपने जीवन में उतारना है तो पहले उनके लायक़ एक आसन तैयार करना पड़ेगा, उसको साफ़ रखना पड़ेगा, तब। माने मुझे ख़ुद को बदलना पड़ेगा। और हम इन उत्सवों पर क्या पा रहे हैं? हम स्वयं को बदल नहीं रहे हैं। हम दैवीय सत्ता को भी अपने ही पुराने, अंधे, बेहोश और गंदे जीवन का हिस्सा बना ले रहे हैं।

हमें चाट-पकौड़ी खाने का शौक है, तो त्योहार आ गये नवदुर्गा, दशहरा, दिवाली हम क्या करेंगे? चाट-पकौड़ी खाएँगे! त्योहार ने तुम्हें बदला है क्या या तुम्हें तुम्हारी वृत्तियों में और लिप्त करने का मौका दे दिया? यह तुमने बदला है क्या स्वयं को? त्योहार इसलिए हैं, ताकि तुम साल भर जैसे रहते हो उससे कुछ अलग होने की झलक पा पाओ। ये तुम्हें अलग कोई झलक मिल रही है या जो तुम्हारे व्यक्तित्व का और जीवन का सबसे निचला हिस्सा है उसे ही और विस्तार मिल रहा है।

प्र: मतलब एक तरह से अपनेआप को माँ का भक्त बोलना एक तरह की उपलब्धि है।

आचार्य: माँ का भक्त अपनेआप को बोलने के लिए बहुत बड़ा आदमी चाहिए। बड़ी मेहनत करी हो, बड़ी पात्रता दिखायी हो, बड़ा मूल्य चुकाया हो, सिर्फ़ उसको अधिकार है कि कह पाये कि मैं भक्त हूँ — माँ का भक्त, कृष्ण का भक्त। जैसे स्वयं को ज्ञानी कहना आसान बात नहीं होनी चाहिए; वैसे ही स्वयं को भक्त कहना हल्की बात नहीं होनी चाहिए।

यह नाच-गाकर, कूद-फाँद मचाकर के, चाट-पकौड़ी खाकर के, रात-रात भर वासना में लिप्त रहकर — नवदुर्गा में — और नशा करके तुम अपनेआप को किस अधिकार से भक्त बता रहे हो भाई? यह नौ दिन तो बल्कि तुमने देवी के अपमान के दिन बना दिये। इस प्रकार के लोग जैसे नवदुर्गा मनाते हैं, इससे भला तो था कि ये न मनाते, ताकि नव दुर्गा का निर्मल-निश्छल रूप कम-से-कम कुछ मुट्ठी भर चंद लोगों में साफ़ बचा तो रहता। अभी तो इन्होंने आम संस्कृति में ही पूरे पर्व को दूषित कर दिया।

जिन लोगों को न धर्म से सरोकार, न अध्यात्म से मतलब, न देवी से कोई लेना-देना, वो भी पहुँच जा रहे हैं 'डांडिया'! डंडियाँ बजाने से बोध थोड़ी जाग्रत हो जाएगा? पहले मन और नीयत तो साफ़ होनी चाहिए न? इरादा ही ग़लत है, उद्देश्य ही दूषित है, तो यह नाच-गाकर के क्या मिलेगा? वो तो फिर रंगरेलियाँ हो गईं, वो तो फिर व्यभिचार हो गया एक तरह का।

मैं नाचने-गाने के विरुद्ध नहीं हूँ। मैं कह रहा हूँ, 'देवी के नाम पर उत्सव करने से पहले थोड़ी योग्यता, थोड़ी पात्रता अर्जित करो। साल भर जीवन ऐसा जियो कि नवदुर्गा में देवी के सामने मुँह दिखाने लायक़ रहो।' देवी पूछती हैं, 'तुम किस अधिकार से नाच-गा रहे हो? साल भर तुमने ऐसा क्या किया जो आज नाच-गा रहे हो?'

परीक्षा में प्रसन्न होने का अधिकार किसको होता है? जिसने साल भर पढ़ाई करी हो। साल भर पढ़ाई करी नहीं, परीक्षा में तुम इतने प्रसन्न दिख रहे हो, किस अधिकार से? कुछ नहीं है, कोई अधिकार नहीं है, बस एक उद्देश्य है, सस्ता मनोरंजन।

प्र: आचार्य जी, एक प्रश्न मेरे पास और था। कि सबसे पहली बात तो मुझे यह सुनकर कि हमारा एक धार्मिक ग्रंथ है जो बिलकुल इस त्योहार के केंद्र में है और उसकी जो जिज्ञासा, जहाँ से वो शुरू होता है, वो इतनी साधारण है, वो ऐसी सी बात है जो मेरे ख्याल से कोई भी व्यक्ति आज से हज़ार साल पहले भी उससे मेल खा सकता था।

और आज मुझे भी दिखता है कि मेरी ज़िंदगी में यह दिक्क़त है। मुझे देखने में लगता है कि मुझे बहुत सारी चीज़ें समझ में आ गयी हैं, पर उसके बाद मैं देखता हूँ कि मेरा उनके साथ एक लगाव एक मोह है जो अभी भी बना हुआ है और मैं इस पूरी जो मझधार है इससे बाहर निकल नहीं पाता, यह समझ नहीं पाता। तो मुझे एक यह बात भी समझनी है कि ऐसा क्या हुआ कि ग्रंथ जब इतनी साधारण और सीधी बात कर रहा था, उसके बाद भी साल-दर-साल लोग उससे दूर होते गये, लोग इसके महत्व को अपने जीवन में समझ नहीं पाए ?

आचार्य: माया है! और कुछ नहीं, माया है! जो पहला अध्याय है, उसके केंद्र में बिलकुल यही प्रश्न है। सिर्फ़ यही प्रश्न है जो पहले अध्याय को परिभाषित कर देता है।

'हम सब समझ रहे हैं, मुनिवर हम मूर्ख लोग नहीं हैं।' एक सफल राजा रहा है, एक सफल व्यापारी रहा है; दोनों के अभी बुरे दिन आ गये हैं। वो अलग बात है। पर दोनों लंबे समय तक अपने-अपने कार्यक्षेत्र में सफल रहे हैं और दुनिया को जानते हैं।

'मैंने राज्य का संचालन करा है। मैंने व्यापार बनाया और बढ़ाया है। और हम अब यह भी देख रहे हैं कि हमें अपनों से ही धोखा मिल रहा है। जिस जगत में हमने अपना सुख खोजा था, जिस जगत में हमने अपनी तरफ़ से अच्छे और ऊँचे काम करे थे, उसी जगत से हमें धोखा मिल रहा है। यह भी देख रहे हैं कि धोखा मिल रहा है। जगत वो चीज़ नहीं है जो हम सोच-समझ रहे थे, मोह नहीं जा रहा तब भी' — यही प्रश्न है।

'जानते-बूझते मूर्ख क्यों बन रहे हैं, ऋषिवर, यह बताइए हमको। यह बात क्या है? ऋषिवर, आप हमें ऐसी कोई बात नहीं बता पाएँगे जो हमें पहले से पता नहीं है। जो आपको पता है वो हमें भी पता है। आप कहेंगे जगत मिथ्या है, हम जानते हैं। आप कहेंगे अकेले आये हो अकेले जाओगे, वो भी हम जानते हैं। आप कहोगे मनुष्य स्वार्थ का पुतला है, हम वो भी जानते हैं। आप कहोगे सब सम्बन्धों का आधार मोह, ममता, आसक्ति होती है, हम वो भी जानते हैं। आप कहोगे कि मनुष्य की मूल वृत्ति पाशविक होती है, हम वो भी जानते हैं। आप कहोगे कि रिश्ते तभी तक चलते हैं जब तक उसमें परस्पर लाभ और लेन-देन हो रहा हो, वो भी हम जानते हैं। आप हमें कुछ नया नहीं बता पाएँगे ऋषिवर! हम यह सब जानते हुए भी दुखी इतने क्यों हैं?'

वो कह रहे हैं, 'मेरे वहाँ नौकर-चाकर हैं, और पशु भी हैं। मैं भटक यहाँ जंगल में रहा हूँ, मैं चाह रहा हूँ यहाँ के जानवर मुझे खा जाए, मैं मर जाऊँ, मैं इतना संतप्त हूँ भीतर से। लेकिन मैं अभी भी सोच रहा हूँ कि अरे! मेरे पशुओं ने खाना खाया होगा कि नहीं। मेरे परिवार में कुछ छोटे थे मेरे स्वजन और मैं उनको कुसंगति से बहुत बचा कर रखता था। मैंने उनको पाला है, पोसा है, बड़ा किया है। फिर उन्होंने मेरी ही पीठ में छुरा घोंपा है। लेकिन मैं जंगल में भटक कर भी यही सोच रहा हूँ कि अरे! कहीं उनका कुछ बुरा तो नहीं हो जाएगा!'

'माया तू न गयी मेरे मन से।' यह मोह के धागे क्यों इतने उलझे हुए हैं? मैं सब जानते-बूझते भी मुक्त क्यों नहीं हो पा रहा?

यह प्रश्न, मैं समझता हूँ हर उस व्यक्ति का है जो थोड़ा भी जगत को जान पाया है, जिसका नशा थोड़ा भी टूट रहा है, नींद थोड़ी भी खुल रही है — उसको यही सवाल आता है।

'कुछ भी ऐसा है क्या जो मुझे पता नहीं है? उसके बाद भी मेरी ऐसी दुर्दशा क्यों है?' यह पहले अध्याय का केंद्रीय प्रश्न है।

जो व्यक्ति नहीं जानता कि यह प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का केंद्रीय प्रश्न है, मैं थर्रा जाता हूँ उसकी दुर्दशा की कल्पना करके! मैं अभी प्रश्न के उत्तर, समाधान की बात नहीं कर रहा। मैं कह रहा हूँ 'जो लोग हैं, जिन्हें अभी यह प्रश्न उपस्थित भी नहीं हुआ है, जो अभी इस प्रश्न से जूझ भी नहीं रहे, वो कैसी ज़िंदगियाँ जी रहे होंगे? यह सोच लेना मन को कँपा देने वाली बात है!

जो आदमी ज़रा सा भी समझने लगेगा, उसको पहली चीज़ यही दृष्टिगोचर होगी। 'कुछ छुपा नहीं है, सब देख रहा हूँ, बीता जीवन, रीता जीवन, रिक्त जीवन, तिक्त जीवन; फिर भी उलझा हुआ हूँ? कौनसा ग्रंथ है जो मुझे नयी बात बताएगा? कौनसा गुरु है और वो मुझे क्या समझाएगा? होशमंद हूँ, फिर भी कितने बंधन?'

और जो उत्तर दिया गया है, वो कितनी दूर तक जाता है! उत्तर दिया गया है कि बंधन कहीं बाहर से नहीं आता है। जन्म-दात्री ही बंध-दात्री है। इन दोनों को अगर मिला दो तो क्या बना? जन्म ही बंधन है! तो यह मत पूछो बंधन कहाँ से आया। तुम स्वयं बंधन हो — पाश्चात्य और भारतीय दर्शन में मूल अंतर!

पश्चिम ने खोजना चाहा कि बंधन बाहर कहाँ-कहाँ से आ रहे हैं और जहाँ-जहाँ से आ रहे हैं, काटेंगे! तो कहा, अर्थव्यवस्था से आते हैं बंधन, तो उन्होंने कहा अर्थव्यवस्था में बदलाव होने चाहिए। समाज से आते हैं बंधन; सामाजिक संरचना बदल देंगे — साम्यवाद, यह मार्क्स का विचार है। अन्यों ने कहा, मैन इज़ बॉर्न फ्री, बट एवरीवेयर ही इज़ इन चेन्स (मनुष्य आज़ाद पैदा हुआ है, लेकिन हर जगह वह ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ है)।

भारत ने यह नहीं कहा, ' मैन इज़ बॉर्न फ्री।' अगर तुम कहोगे कि बॉर्न फ्री बट एवरीवेयर ही इज़ इन चेन्स, तो तुमने उत्तरदायी किसको बना दिया है? संसार को, समाज को और संयोग को। न संसार, न समाज, न संयोग; माँ ही बंधन है! और माँ ही बंधन है, तो और हम किसके सामने हाथ जोड़ कर कहें कि मुक्ति दो? माँ से ही कहेंगे, 'तू ही बंधन है, तू ही मुक्ति दे! तूने ही जन्म दिया है, तू ही मुक्ति देगी!'

अंतर क्या आता है, जब तुम जानने लग जाते हो कि बंधन तुम्हारे बाहर नहीं है, भीतर ही है?

अंतर यह आता है कि तुम अपना पक्ष लेना छोड़ देते हो। जब तक यह कहोगे बंधन बाहर हैं, तो उँगली कहीं बाहर को इशारा करेगी, आँख कहीं बाहर ही ढूँढेगी दोषी को। और जैसे ही जान जाते हो कि एक-एक कोशिका में तुम्हारा दोषी निवास कर रहा है — दोष कहाँ है? प्रत्येक कोश में दोष है — तो फिर तुम किसी और को जवाबदेह मानना बंद कर देते हो।

फिर दृष्टि भीतर को मुड़ती है, यही समस्त अध्यात्म का लक्ष्य है। तुम जान जाते हो कि तुम्हारे ही जो भाव हैं, तुम्हारे ही जो सब विचार हैं, तुम्हारे ही जितने उद्देश्य हैं, उन्हीं में तुम्हारा बंधन छुपा है। उन्हीं का पुनरावलोकन करो, अपनेआप को ही जाँचो-परखो, वहीं से मुक्ति मिलेगी। दुनिया को दोष देना भी छोड़ो और दुनिया में मुक्ति को तलाशना भी छोड़ो; दुनिया में नहीं मिलनी है।

दुनिया न अच्छी है न बुरी है; दुनिया तो तुम्हारा ही प्रतिबिंब है। दुनिया अगर तुम्हें दुख दे रही है तो इसलिए क्योंकि तुम भीतर अपने दुख को समेटे, संभाले हुए हो — यह पहले अध्याय का मर्म है। इस बात को नहीं समझा और बस कहानी रट कर रह गये, तो भी चूक जाओगे।

प्र: यह मैंने अपने घर पर भी होते देखा और मैंने बहुत जगहों पर देखा कि इस तरह की जो पौराणिक कहानियाँ होती हैं, लोगों को यह पता होती हैं। और लोग उनको हर साल दोहराते रहते हैं, दोहराते रहते हैं, दोहराते रहते हैं। और वो ख़ुद पढ़े हुए भी रहते हैं। जैसे आपने शुरुआत में इस बात को कहा भी कि मार्कण्डेय ऋषि हैं, वो अपने आश्रम में पक्षियों को शिक्षा दे रहे हैं। और उनको सिखाते-सिखाते वो एक और कहानी सुनाते हैं, जिसमें मेधा मुनि हैं और वो वहाँ पर सारे जंगल के जानवर हैं उनसे बात कर रहे हैं। और जो हिंसक जानवर भी हैं, वो भी वहाँ पर बड़ी सभ्यता से बैठे हैं, सुन रहे हैं बात को।

अब अक्सर हमारे मन में एक बात सी बन गयी है कि पौराणिक कहानियाँ तो ऐसी ही होती हैं। हम उनको परी-कथा जैसे समझने लग जाते हैं। हम उनके केंद्र में जो बात है उसको नहीं समझते।

आचार्य: समझना पड़ेगा। देखो, पुराण क्या हैं? मैं बहुत दफ़े जब बोलता हूँ, तो ऐसा लगता भी है कि मैं पुराणों के बिलकुल विरुद्ध बोल रहा हूँ। पुराण क्या हैं, यह समझना पड़ेगा। उनका पक्ष लेने या विरोध लेने की बात बाद में होगी। पुराण रचे गए हैं वेदों के हज़ार साल से ज़्यादा बाद में। ठीक है! बड़ा लम्बा अंतराल है वेदों और पुराणों के बीच में। कोई कारण तो होगा न? कारण बताये देता हूँ।

जो पूरा वैदिक साहित्य था, वह समाज के छोटे तबके तक सिमटकर रह गया था। आम जनता खेतिहर थी, कृषक थी और उनका जैसा जीवन था, उसमें ऊँची, आध्यात्मिक बात को ले जाना बहुत सरल नहीं था। इसके अलावा, वैदिक-काल के उत्तरार्ध तक आते-आते जाति-प्रथा बड़ी सख़्त हो चली थी। वर्ण व्यवस्था न्याय संगत नहीं रही थी, अपनी लोच खो चुकी थी। जाति-प्रथा बन गयी थी जन्म पर आधारित। तुम किस घर में, किस कुल में, जन्म ले रहे हो उसी से तुम्हारी जाति जीवनभर के लिए निर्धारित हो जाएगी। और उससे फिर तुम्हारे जीने, काम करने का, समाज में स्थान का दायरा वो सब सदा के लिए बंद हो जाएगा, सील हो जाएगा।

और ये सब ज़बरदस्त कुरीतियाँ थीं, जिनके कारण आम जनता का शैक्षणिक स्तर और बोध स्तर दोनों गिरता गया, गिरता गया। लेकिन फिर भी आवश्यकता तो थी ही कि आम लोगों तक वेदांत के सूत्र पहुँचाएँ जाएँ। अब वेदांत के सूक्ष्म सूत्रों को एक ऐसी बहुत बड़ी जनसँख्या तक कैसे पहुँचाएँ जो एक स्थूल जीवन जी रही है और उसका मन ही और बुद्धि ही स्थूल हो गए हैं, कैसे पहुँचाओगे? तो उसके लिए फिर कथाओं का सहारा लिया गया।

रमण महर्षि से भी जब पूछा गया कि जो बहुत साधारण और औसत बुद्धि के लोग होते हैं, उन्हें कैसे समझाया जाए, तो उन्होंने भी यही कह दिया, बोले, 'कथाओं से।' बात तब की नहीं है, रमण महर्षि अभी के हैं, सौ साल पहले के। वो भी बोले कथाओं से समझाओ। सिद्धांत समझना दुष्कर होता है, कथा से आसान हो जाता है। तो पुराणों की रचना इसलिए की गयी कि उन कथाओं को संकेतों की तरह, प्रतीकों की तरह, कोड की तरह प्रयोग करके आगे कोई गहरी बात बता दी जाएगी।

अब जैसे पंचतंत्र है, जानते हो पंचतंत्र की रचना ही क्यों हुई थी? पंचतंत्र पुराण नहीं है, मैं उदाहरण के तौर पर कुछ बोलना चाहता हूँ। पंचतंत्र की रचना क्यों हुई थी? क्योंकि राजा के तीन बेटे थे और राजा ने पूरी कोशिश कर ली उन्हें कुछ समझ में नहीं आता था, वो बिलकुल निरे मूरख। तो राजा उनको लेकर गये, इन पंडित जी के पास। बोले, 'इनको राज्य संभालना है, पर इनकी तो कुछ बुद्धि ही नहीं चल रही है। न इनमें शास्त्र बुद्धि है, न व्यवहार बुद्धि है। क्या करें?'

तो क्या करा फिर विष्णु शर्मा ने, उन्होंने कहा, 'मैं इनको जानवरों की कहानियों के माध्यम से, राज-काज में दीक्षित कर दूँगा, इनमें व्यवहार बुद्धि मैं जागृत कर दूँगा, इनको नीति का उपदेश दे दूँगा मैं, पशुओं को माध्यम बनाकर के।' तो फिर उसमें एक के बाद एक कहानियाँ आती हैं जो एक के भीतर से एक निकल रही हैं, जैसे नेस्टेड लूप्स (अंतर प्रविष्ट पाश) होते हैं। और उनमें सारे जो चरित्र हैं, वो कौन हैं? पशु मात्र ही।

तो इस तरीक़े से पुराण भी हैं। उनमें कहानियाँ हैं, उनको कहानी मात्र नहीं मान लेना है, उन्हें कथा मानना है। कहानी किसलिए होती है? मनोरंजन के लिए। कथा किसलिए होती है? शिक्षण के लिए। वो कथाएँ हैं, उनसे सीखना पड़ेगा कि यह कथा इशारा किधर को कर रही है। क्योंकि उनमें जो कुछ लिखा हुआ है वो इतिहास तो है नहीं, वो तथ्य तो है नहीं, वो वैसा तो कुछ है नहीं जो सचमुच कभी इस पृथ्वी पर घटित हुआ हो। या उसमें यदि थोड़ा-बहुत एक तथ्यात्मक भाग है भी तो उसको बस नींव की तरह इस्तेमाल किया गया है, आगे और बड़ी कथा बनाने और बताने के लिए, ताकि सीख दी जा सके। कि जो घटना घटी हो वास्तव में वो एक छोटी सी घटना थी, लेकिन उसमें तमाम तरह की बातें और जोड़ी गईं। उसके कुछ अंशों को बहुत विस्तार दिया गया और कुछ अंश उसमें और अतिरिक्त भी जोड़े गये, ताकि उससे लोगों को सीख दी जा सके।

जब तक आप सीख पर ध्यान नहीं देंगे और यही मानते रहेंगे कि उसमें जो कुछ लिखा हुआ है वो तो कभी घटने वाली घटना थी, तो फिर आप एकदम चूक जाएँगे पुराणों से। वो घटना ऐसी नहीं है जो कभी घटी थी। देखो न नाम ही क्या है? पुराण! पुराण माने क्या होता है? पुराना। तो उसमें पुरानी घटना नहीं बतायी गयी है, उसमें वो घटना बतायी गयी है जो कभी पुरानी नहीं होती। माने वो घटना लगातार घट रही है। तो तुम ऐसे कैसे कह सकते हो कि वो इतिहास में कभी घटी थी।

प्राचीन समय में एक बार ऐसा हुआ कि वायु मार्ग से यात्रा करते हुए फ़लाने देवता ने फ़लाने ऋषि को देखा। यह घटना पौराणिक है, माने बहुत पुरानी है, पुरानी है माने प्राकृतिक है, माने हमारी देह में बसी हुई है, माने आज भी घटित हो रही है। पौराणिक घटना वो है जो तब नहीं घटी; आज घट रही है। और जो यह नहीं देख पाये कि वो जो पुराण में कथा है वो आज आपके जीवन में कैसे घटित हो रही है, वो पुराणों से बिलकुल चूक जाएगा।

इसीलिए भारत पुराणों से न सिर्फ़ चूका है बल्कि पुराणों से उसने बहुत चोट खायी है। ज़्यादातर लोगों के काम नहीं आ रहे पुराण। ज़्यादातर लोगों का तो नुक़सान हुआ है पुराणों से, क्योंकि वो उन कहानियों को धर्म समझ बैठे हैं। उन्होंने कथाओं से मर्म नहीं निकाला; उन्होंने कहानी को धर्म बना लिया। यह कितनी दो अलग-अलग बातें हैं।

समझ रहे हो?

कथा से मर्म छान लेना एक बात है और कहानी को ही धर्म बना लेना बिलकुल दूसरी बात हो गयी न! भारत ने यही करा है। भारत ने मर्म नहीं पकड़ा, उसने कहानी को धर्म बना लिया।

तो संतों ने कहा कि ज़्यादातर लोग जो होते हैं न, वो छलनी की तरह होते हैं। छलनी जानते हो न छलनी। कह रहे हैं उसमें आटा डालो और आटे में कुछ हल्के-फुल्के, छोटे-मोटे कंकड़-पत्थर हैं, तो जो कंकड़-पत्थर होते हैं वो उसको ही पकड़ लेते हैं। जैसे छलनी किसको पकड़ लेती है? आटा उसमें से पूरा छन जाएगा, अब छलनी पकड़ के रखेगी कंकड़ को।

बोले, ज़्यादातर लोगों के मन ऐसे ही होते हैं। उन्हें तुम ऊँची-से-ऊँची चीज़ भी दे दो, उस ऊँची चीज़ में जो असार है, जिसका कोई मूल्य नहीं है, वो उसको पकड़ लेते हैं। और जो असली बात है, उसको वो गँवा देते हैं। वो तो निकल गयी उनसे, उसको वो नहीं पकड़ पाये। आटा निकल गया, उन्होंने वो पथरी पकड़ ली। ऐसे होते हैं ज़्यादातर लोग। हमने पुराणों के साथ यही किया है।

प्र: मतलब मुझे वैसे शायद यह बात कहनी नहीं चाहिए, पर मुझे भी याद आ रही है कि शायद दूसरे चरित्र में एक जगह है जिसमें इस चीज़ का भी वृतांत है कि देवी ने मदिरापान किया और फिर असुरों का संहार किया। तो लोगों ने मदिरापान तो पकड़ लिया।

आचार्य: ठीक, ठीक! मदिरापान क्या है? मदिरापान क्या है, यह हम जब दूसरे अध्याय पर बात करेंगे तो समझेंगे। उसमें मदिरापान, वो मदिरा नहीं है जो दुकानों पर बिकती है। देवी जिस मदिरा की बात कर रही हैं, साफ़-साफ़ श्लोक है जो बता रहा है कि वो कौनसी मदिरा है। और श्लोक यह भी बता रहा है कि देवी जिस माँस को खा रही हैं, वो कौनसा माँस है। यह बात हम अगले अध्याय में करेंगे।

जो दुराचारी है उसका रक्त मदिरा है, जो दुराचारी है उसका माँस भक्ष्य है। तो साधारण शराब नशा कर देती है, उसको नहीं पी रही हैं देवी। और न ही वो नन्हें, कमज़ोर, बेज़ुबान जानवरों को मारकर माँस खा रही हैं। जो नालायक सब दैत्य, राक्षस, अधर्मी घूम रहे हैं, उनको वो लीले ले रही हैं, उनका भक्षण कर रही हैं। तो उस मदिरा और उस माँस की बात हो रही है।

ये सब बातें हम आगे करेंगे जब दूसरे अध्याय पर आएँगे। अभी, आज इतना पर्याप्त है।

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