
‘माया’ सुनते ही आपके ज़ेहन में पहला ख्याल क्या आता है?
धन, स्त्री, या फिर पारिवारिक मोह-ममता?
प्रचलित धर्म में हमेशा से ऐसे ही कुछ चुनिंदा विषयों को माया बताकर उनसे दूरी बनाने की बात कही गई है।
इसी कारण आम मन सदैव कुछ छोड़ने और कुछ पकड़ने की दुविधा में फँसा रहता है।
प्रस्तुत वीडियो सीरीज़ में कबीर साहब इस भ्रांति को पूरी तरह खारिज करते हुए कहते हैं कि जो भी अज्ञान में जी रहा है, उसके लिए तो हर जगह माया ही माया है:
माया जल थल, माया अकासि,
माया व्याप रही चहुँ पासि।
भजन पर आधारित वीडियो सीरीज़ के पाँचवें भाग में आचार्य प्रशांत माया को लेकर हमें छोड़ने और पकड़ने की इसी दुविधा से बाहर निकालते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि बाहर की कुछ चुनिंदा चीज़ों को 'माया' कह देना, वास्तव में अहंकार का खुद को निर्दोष बताकर सुरक्षित रखने का एक तरीका है।
यह वीडियो सीरीज़ आपको माया की प्रचलित भ्रांतियों से बाहर निकालकर, खुद को ईमानदारी से देखने के लिए प्रेरित करती है। व्यक्ति या वस्तुओं के अंधे त्याग के बजाय, यह ऐसे विषयों को जीवन में लाना सिखाती है जो दर्पण बनकर हमारे झूठे ज्ञान को तोड़ सकें। इसी दर्पण में जब आप खुद को देख लेते हैं, तो सारी भीतरी उलझनें गिरने लगती हैं और जीवन बोझ की जगह खेल का मैदान बन जाता है।
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