
आज के समय में ‘सेल्फ-हेल्प’ के साहित्य और विभिन्न विधियों का बाज़ार बड़ा गर्म है। इंटरनेट से लेकर किताबों तक, हर जगह अलग-अलग उपाय परोसे जा रहे हैं।
हर नई विधि अपने साथ एक पक्के समाधान का वादा लिए जीवन में आती है। लेकिन कुछ ही दिनों बाद, एक विधि से हार कर दूसरी विधि को आज़माने का मन क्यों करने लगता है?
क्योंकि जिन कमज़ोरियों पर काम करने के लिए हम ये विधियाँ अपनाते हैं, उनके मूल कारण को जानने से हम मुँह चुराते हैं। हमारी इसी चालाकी को उजागर करते हुए संतों ने खूब गाया है:
माया जप-तप माया जोग,
माया बाँधे सब ही लोग।
कबीर साहब के भजन पर आधारित चौथी वीडियो सीरीज़ में, आचार्य प्रशांत न सिर्फ़ इन विधियों के पीछे का असली खेल समझाते हैं, बल्कि हमारी 'कमज़ोरी' की मूल मान्यता पर गहरी चोट भी करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि अस्तित्वगत ज़िम्मेदारियों से बचने के लिए अहंकार ख़ुद को लाचार घोषित कर देता है। अपनी इसी बेबसी को सही ठहराने और ख़ुद को सुरक्षित रखने के लिए वह सहारों और विधियों का जो जाल बुनता है, वही माया है।
प्रस्तुत वीडियो श्रृंखला आपको अपनी ही बनाई हुई इन सुविधाजनक बैसाखियों को पहचानने का अवसर देती है। संत कबीर के प्रसिद्ध भजन पर आधारित इस वीडियो सीरीज़ में स्वयं को देखें और पाएँ कि कैसे इन झूठे सहारों के गिरते ही, भीतर का वास्तविक बल प्रकट होता है।
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माया तजूं तजि नहिं जाइ,
फिर फिर माया मोहि लपटाइ।
माया आदर माया मान,
माया नहिं तंह ब्रह्म ज्ञान।
माया रस, माया कर जान,
माया कारनि तजे परान।
माया जप तप माया जोग
माया बाँधे सबहि लोग।
माया जल थलि माया अकासि,
माया व्यापी रही चहुं पासि।
माया पिता माया माता,
अतिमाया अस्तरी सुता।
माया मारि करै ब्योहार,
कबीर मेरे राम आधार।
~ संत कबीर