
उनका नाम आते ही शब्दों की एक लंबी श्रृंखला हमारे सामने आ जाती है — महात्मा, राष्ट्रपिता, अहिंसा के प्रतीक। गांधी जी को रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा ‘महात्मा’ की उपाधि मिली और सुभाषचंद्र बोस द्वारा ‘राष्ट्रपिता’ की। लेकिन इन विशेषणों के बीच, क्या हमने कभी उन्हें स्वयं से जानने या पढ़ने की कोशिश की?
गाँधी जी वही व्यक्ति थे जिन्होंने एक बेहद अस्थिर, भयग्रस्त और बँटे हुए भारत में लाखों लोगों को एक साझा उद्देश्य पर संगठित कर दिखाया। न उनके पास सत्ता थी, न साधन, और न ही आज के जैसे संचार के माध्यम। फिर भी उन्होंने ऐसा नेतृत्व दिखाया जो केवल खोखले नारे नहीं देता — वह लोगों के बीच जाकर, साथ चलकर रास्ता बनाता है।
सत्तर की आयु पार कर लेने के बाद भी वे पदयात्रा करते रहे — क्योंकि उनके लिए नेतृत्व केवल बोलने की कला नहीं, चलकर दिखाने का साहस था।
आज के समय में, जब या तो व्यक्ति गांधी जी की अंधभक्ति में उनके गुणगान करता पाया जाता है या फिर नफ़रत भरा विरोध करता हुआ, इस शृंखला में आचार्य प्रशांत गांधी जी को श्रद्धा या विरोध के चश्मे से नहीं, समझ की दृष्टि से देखने का आमंत्रण देते हैं।
चलिए, इस बार गाँधी जी को न विरासत की तरह पूजा जाए, न अफवाह की तरह ठुकराया जाए — बस थोड़ा ठीक से पढ़ा जाए।
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