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महाभारत
व्याख्यानों का संकलन
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Book Details
Language
hindi
Print Length
206
Description
जो कुछ महाभारत में है, वही सर्वत्र है। मनुष्य के मन में ऐसा कुछ भी नहीं जो महाभारत में मौजूद न हो। चेतना के सभी तल महाभारत में उभरकर सामने आते हैं – मूर्खताएँ भी, कपट भी, और गीता का प्रकाश भी।

हम जो कुछ हैं, वो सब महाभारत में मौजूद है। हमारी सारी मलिनताएँ भी, और उन मालिनताओं के केन्द्र में बैठी मलिनताओं से अस्पर्शित आत्मा भी। ठीक उसी तरीक़े से महाभारत में काम, क्रोध, छल, कपट, सब पाते हैं आप, और गीता को भी पाते हैं। मलिन मन को भी पाते हैं और गीतारूपी आत्मा को भी पाते हैं।

यह पुस्तक आचार्य प्रशांत जी की 'महाभारत' महाकाव्य पर दिये गए व्याख्यानों का संकलन है। आचार्य जी बातों को जस-का-तस रखते हैं तो वो पात्रों की चारित्रिक दुर्बलताओं का खुलकर मखौल भी उड़ाते हैं और जहाँ जो पूजनीय है उसका दिल खोलकर वन्दन भी करते हैं।

निवेदन है कि आप भारत के इस श्रेष्ठतम महाकाव्य को सही अर्थों में समझें, और इसके प्रचलित कथानकों के पीछे छिपे रहस्य और सीख से परिचित होने का प्रयास करें।
Index
1. वृत्ति नहीं, विवेक 2. परिवार से मोह 3. जब शारीरिक दुर्बलताएँ परेशान करें 4. वेदव्यास - महाभारत के रचयिता 5. भीष्म ने प्रतिज्ञा क्यों की? 6. एकलव्य नहीं, द्रोण हैं दया के पात्र
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