Combo books @99/book! 60+ combos available. FREE DELIVERY! 😎🔥
AP Books
क्रांति
बाहर भी, भीतर भी
book
Already have eBook?
Login
eBook
Available Instantly
Suggested Contribution
₹51
₹150
Paperback
In Stock
64% Off
₹159
₹450
Now you can read eBook on our mobile app for the best reading experience View App
Quantity:
1
In stock
Free Delivery
Book Details
Language
hindi
Print Length
158
Description
भगत सिंह ने पूरे देश की आज़ादी के लिए संघर्ष किया क्योंकि अकेले-अकेले आज़ादी तो वैसे भी नहीं मिलने की।

ये वास्तव में कोई सामाजिक या राजनैतिक पहल नहीं थी। ये किसी बर्बर, विदेशी शासन के प्रति आक्रोश या क्रांति मात्र नहीं था। मूलतः ये आध्यात्मिक मुक्ति का अभियान था। एक ऐसी मुक्ति जिसमें तुम कहते हो - "मेरे शरीर की बहुत क़ीमत नहीं है। बाईस-तेईस साल का हूँ, फाँसी चढ़ जाऊँ, क्या फ़र्क पड़ता है? शरीर के साथ मेरा तादात्म्य वैसे भी नहीं है। मैंने तो अब पहचान बना ली है बहुत बड़ी सत्ता के साथ।"

भगत सिंह के जीवन में वो बहुत बड़ी सत्ता थी - भारत देश।

इसलिए मिलती है जवानी। इसलिए नहीं कि शरीर को ही खुराक देते जाओ और शरीर की माँगों को मानते जाओ और कामनाओं को पोषण देते जाओ।

जवानी मिलती है ताकि उसका उत्सर्ग हो सके, ताकि वो न्योछावर हो सके। जिस उम्र में हम अपनेआप को, बहुत लोग, दुधमुँहा बच्चा ही समझते हैं, उस उम्र में वो चढ़ गए फाँसी पर।

और ये कोई किशोरावस्था का साधारण उद्वेग नहीं था। भगत सिंह का ज्ञान गहरा था।

दुनिया भर के तमाम साहित्य का अध्ययन किया था उन्होंने, ख़ासतौर पर समकालीन क्रांतिकारी साहित्य का। समाजवाद, साम्यवाद — इनकी तरफ़ झुकाव था उनका। खूब जानते थे, समझते थे। किसी बहके हुए युवा की नारेबाज़ी नहीं थी भगत सिंह की क्रांति में; बल्कि गहरा बोध था। और वो बोध, मैं कह रहा हूँ, मूलतः आध्यात्मिक ही था।
Index
1. क्रान्तिकारी भगत सिंह, और आज के युवा 2. मार्क्स, पेरियार, भगत सिंह की नास्तिकता 3. महापुरुषों जैसा होना है? 4. सब महापुरुष कभी तुम्हारी तरह साधारण ही थे 5. ग़ुलामी चुभ ही नहीं रही, तो आज़ादी लेकर क्या करोगे? 6. हमारे छः दुश्मन
View all chapters
Have you benefited from Acharya Prashant's teachings?
Only through your contribution will this mission move forward.
Donate to spread the light