Acharya Prashant (AP) Books | डर | Dar [Hardbound]
डर | Dar [Hardbound]
समझें और बढ़ें निडरता की ओर
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Paperback Details
HindiLanguage
192Print Length
Description
जीवन दो ही तरीकों से जिया जाता है: या तो डर में या प्रेम में। हमने प्रेम कभी जाना नहीं है और डर से हमारा बड़ा गहरा नाता है।
डर का जन्म होता है अपूर्णता के विचार से, यह विचार कि हम में कुछ अस्तित्वगत कमी है। इसी विचार को सत्य मानकर हम संसार द्वारा प्रदत्त वस्तुओं पर आश्रित हो जाते हैं, चाहे वो हमारे रिश्ते-नाते हों, चाहे रुपये-पैसे अथवा पद-प्रतिष्ठा।
यदि हम अपने केवल शारीरिक ज़रूरतों के लिए ही संसार पर निर्भर होते तो कोई समस्या नहीं थी पर हम अपने अस्तित्व को ही, अपने होने के भाव को ही संसार पर टिका देते हैं। इसी कारण बाहर की कोई छोटी-सी घटना भी हमें भीतर तक हिला देती है। और चूँकि संसार निरन्तर परिवर्तनशील है अतः हमारा सम्पूर्ण जीवन ही भय और दुःख के साये में व्यतीत होता है।
आचार्य प्रशांत जी इन संवादों के माध्यम से इस अपूर्णता के विचार को ही नकार देते हैं। आचार्य जी हमें हमारे उस 'मैं' से परिचित कराते हैं जो असली है और जो अमृतस्वरूप है।
कृपया इस पुस्तक का भरपूर लाभ लें और अपने जीवन के केंद्र से डर को विस्थापित कर प्रेम को लाएँ ।
डर यानी अज्ञान ▪️
बहुत डरती थी।
फिर आचार्य जी 🙏 ने समझाया कि डर के क्या कर लोगे?
तुम्हारे पास तो जी भरकर डरने का समय भी नहीं है।
बस तब से प्रयास चल रहा है, खुलकर ज़ीने का।
धन्यवाद PAF टीम🙏
LILIMA BINDHANI
1y
शास्त्र लिखे ही क्यों गए ??
प्रश्न :- शास्त्र लिखे ही क्यों गए ??
छोटा-सा उत्तर :- तुम्हें डर से मुक्त करने के लिए।
RISHABH
1y
डर प्राकृतिक नहीं होता, डर प्रतिभासिक होता है 📝
काल्पनिक है डर किस अर्थ में काल्पनिक है झूठे ज्ञान से माने मान्यता से उठता है डर जँहा मान्यता है वहाँ डर होगा ही होगा।घबराना चाहिए राम को खोने से। हम घबराते है काम को खोने से। काम को खोने में नुकसान क्या है ? यदि राम यथावत है।
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हर किसी के जीवन में दो - तीन मुल डर होते हैं -
🍂 आगे क्या होगा करियर का ।
🍂 लोग क्या सोचेंगे मैरे बारे में ?
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फिर पता चला की डर क्या ...