विद्रोही मन + आह! जवानी + क्रांति + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
तीन पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
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Description
सभी पाठकों के लिए तीन पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर! विद्रोही मन + आह! जवानी + क्रांति + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।
विद्रोही मन:
प्रकृति से ही अहम् का उद्गम है और प्रकृति से ही इसकी हस्ती है। मनुष्य के जीवन का यही यथार्थ है — उसकी प्रकृति है प्राकृतिक गुणों के पाश में ही बँधे रहना और स्वभाव है आकाशवत आत्मा में मुक्त उड़ान भरना। यही द्वन्द्व मनुष्य के निरन्तर दुख का कारण है और दुख से मुक्ति का सिर्फ एक ही उपाय है कि वह प्रकृति से तादात्म्य तोड़कर उसका साक्षी हो जाए और अपने निज स्वरूप में स्थित हो जाए। अधिकांश मनुष्य शरीर, समाज और संयोग के हाथों की कठपुतली होते हैं, जो प्रकृति के बहाव में ही बहते रहते हैं। इन्हें अपने बन्धनों से कोई शिकायत नहीं होती, बल्कि एक सामंजस्य का रिश्ता होता है। पर एक अहम् ऐसा भी होता है जिसे आत्मा से विलग होना मंजूर नहीं, उसके भीतर अपने बन्धनों के विरुद्ध ज्वाला दहक रही होती है और विरोध की उसी ज्वाला से उठता है एक विद्रोही मन। ये भीतर की अपनी वृत्तियों से और बाहर हर उस चीज़ से विद्रोह करता है जो इसे बन्धन में जकड़े।
ये विद्रोह विध्वंसात्मक नहीं होता, बल्कि व्यक्ति के लिए मुक्ति के रास्ते खोलता है और संसार का नवनिर्माण कर संसार को एक आनन्दपूर्ण जगह बनाता है। आचार्य प्रशांत की यह पुस्तक हमें इस सार्थक विद्रोह की ओर अग्रसर करने में सहायक सिद्ध होगी।
आह! जवानी:
युवावस्था एक स्वर्णिम अवसर है जीवन को ऊँचाई देने का। यही वह समय है जो हमारे जीवन की दिशा तय करता है। एक जवान व्यक्ति या तो अपनी चेतना को आसमान की ऊँचाई दे सकता है या फ़िर कामवासना और सांसारिकता के जाल में फँसकर पतित हो सकता है। यूँ तो एक जवान व्यक्ति के सामने चुनौतियों की कमी नहीं होती पर सोशल मीडिया के भोंडापन और बेहुदगियों ने इस समस्या को और विकराल बना दिया है। आज का एक भारतीय युवक जिस स्थिति में है वह अत्यंत गम्भीर और खतरनाक है।
ऐसे समय में एक उचित मार्गदर्शन और सशक्त पथप्रदर्शन की आवश्यकता और बढ़ जाती है। आचार्य प्रशांत की पुस्तक 'आह जवानी! आग है नसों में या है पानी' एक युवक के मानसिक और शरीरिक क्षमताओं को सही दिशा देने का एक प्रयास है।
क्रांति:
अधिकांशत: 'क्रांति' शब्द का अर्थ हम किसी बाहरी परिवर्तन से ही लगाते हैं। जीवन की सभी समस्या, उलझनों और दुःख का कारण हम हमेशा बाहर ही ढूँढते हैं, और फिर उसका समाधान भी।
हम अपने वास्तविक शत्रुओं से कभी परिचित हो ही नहीं पाते। हमारे भीतर ही कुछ ऐसा होता है जो सदा झुकने को, दबने को तैयार रहता। है। और इस भीतरी गुलामी को और प्रगाढ़ व मज़बूत बनाती है हमारी सामाजिक व्यवस्था। जीवन फिर हमारा निढाल और नीरस ही रह जाता है। न कोई धार होती है, न कोई आग।
आचार्य प्रशांत की यह 'क्रांति' पुस्तक आप तक इसीलिए लायी जा रही है कि आप अपने अंदरूनी दुश्मनों से रूबरू हो सकें और असली जवानी और आज़ादी का अनुभव ले सकें। गुलामी बड़ी सस्ती होती है लेकिन आज़ादी एक कीमत माँगती है। यदि आपको भी विवशता और लाचारी का जीवन रास न आता हो, तो यह पुस्तक आपके लिए ही है।