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श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य (भाग 2) [Hardbound]
अध्याय ५-१८, प्रमुख श्लोकों पर आधारित भाष्य
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Book Details
Language
hindi
Print Length
362
Description
श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान कोई शाब्दिक चर्चा या सैद्धान्तिक ज्ञान नहीं बल्कि रणक्षेत्र में खड़े एक योद्धा के लिए कहे गए शब्द हैं। भगवद्गीता का जन्म किसी शान्त, मनोरम जंगल में नहीं, बल्कि कुरुक्षेत्र के मैदान में हुआ था। अर्जुन के सामने एक तरफ़ धर्म था तो दूसरी तरफ़ नात-रिश्तेदार और गुरुजनों का मोह। बड़ा कठिन था अर्जुन के लिए निर्णय लेना। अर्जुन कोई जीवन से विरक्त शिष्य नहीं था, जो संसार का मोह त्यागकर कृष्ण के पास आया हो। वह युद्ध के मैदान में खड़ा था। उसे निर्णय करना था कि युद्ध करे कि ना करे। अर्जुन ने धर्म नहीं बल्कि मोह और स्वार्थ चुना था। कृष्ण के समक्ष एक ऐसा हठी शिष्य था जो सुनने को राज़ी नहीं था क्योंकि अर्जुन का भी मन एक साधारण मन ही था, अपनों पर बाण चलाना उसके लिए आसान नहीं था। श्रीमद्भगवद्गीता के अठारह अध्याय कृष्ण द्वारा हठी अर्जुन को मनाने का प्रयास हैं।

हमारी भी स्थिति अर्जुन से अलग नहीं है। हमारे भी जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जहाँ निर्णय लेना आसान नहीं होता। यदि हमें कृष्ण का साथ नहीं मिला तो जीवन के कुरुक्षेत्र में हम हार ही जाएँगे क्योंकि कृष्ण के बिना जीत असम्भव है।

आचार्य प्रशांत की यह पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता' आपके लिए इसीलिए प्रकाशित की गई है ताकि आप अपने जीवन में श्रीकृष्ण का संग पा सकें। प्रस्तुत पुस्तक में श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम चार अध्याय के मुख्य श्लोकों की विस्तृत व्याख्या को संकलित किया गया है।
Index
1. ज्ञानयोग और कर्मयोग 2. ममत्वबुद्धिरहित माने क्या? 3. कृष्ण ने किन्हें बताया गीता सुनने का अधिकारी? ऐसा भेद क्यों? 4. मन को समभाव में स्थित कैसे करें? 5. संसार से विरक्त कैसे हों? 6. अर्जुन के समक्ष तो युद्ध था, हमारे लिए स्वधर्म क्या?
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