ऐसे प्रकटते हैं कृष्ण + श्रीकृष्ण + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
दो पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
Description
सभी पाठकों के लिए दो पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर! ऐसे प्रकटते हैं कृष्ण + श्रीकृष्ण + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।
ऐसे प्रकटते हैं कृष्ण:
यदा यदा हि धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
भगवद्गीता के चौथे अध्याय के प्रसिद्ध श्लोकों में से हैं श्लोक क्रमांक 7 से 11। इन श्लोकों ने आमजन के बीच जितनी प्रसिद्धि पाई है, उतना ही इनके अर्थ को विकृत भी किया गया है।
प्रचलित अर्थ कहता है कि जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म सिर चढ़कर नाचता है, तब-तब कृष्ण प्रकट होते हैं। जिसका अर्थ हमने ये कर लिया है कि कोई हमसे ऊँचा, हमसे अधिक सामर्थ्यवान कहीं बाहर से आएगा हमारे जीवन से अधर्म को मिटाने के लिए। ऐसा मानकर हमने स्वयं को अपने जीवन के प्रति ज़िम्मेदारी से मुक्त कर दिया है।
वेदांत कहता है — कोई नहीं है बाहर; तुम्हारा जीवन, तुम्हारी ज़िम्मेदारी, तुम्हारा चुनाव। तुम चाहो तो कृष्ण प्रकट होंगे, लेकिन बाहर से नहीं, तुम्हारे ही भीतर से। किसी बाहरवाले की प्रतीक्षा करने का एक ही कारण है — बाहरी और आंतरिक, दोनों रूप से सही ज्ञान का अभाव।
अधर्म तो चारों तरफ़ पसरा हुआ है, मूल बात है — क्या हमें दिखाई देता है?
हमारे भीतर ये आत्मज्ञान का अभाव है या कहें कि अज्ञान का अंधकार है कि सामने इतना अधर्म होते हुए भी हमें कुछ दिखाई नहीं देता। वेदांत ‘मैं’ की बात करता है, हमारे भीतर के इसी अज्ञान के अंधकार को मिटाने के लिए हमें इन श्लोकों के वेदांत सम्मत अर्थ को समझना बहुत आवश्यक है। प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत इन श्लोकों के सही व उपयोगी अर्थ को वेदांत के प्रकाश में समझा रहे हैं जो कि हम सबको समझना बहुत आवश्यक है।
श्रीकृष्ण:
श्रीकृष्ण गीता में आपसे एक बात कह रहे हैं, वो बात तब भी उपयोगी थी, आज भी उपयोगी है, सदा उपयोगी रहेगी, समयातीत बात है।
लेकिन हमें लगने लग जाता है कि उस समय का जो कुछ था, वो भी समयातीत ही होगा। तो उस समय की जो परिस्थितियाँ थीं, हम उन्हें भी दोहरा देना चाहते हैं। अब श्रीकृष्ण तो रथ पर चलते थे, आप रथ पर चलने लग जाओगे सड़क पर? और मुकुट पहनोगे? और धनुष-बाण लेकर चलोगे?
जब अर्जुन उस अर्जुन जैसा नहीं रहा, तो क्या कृष्ण वैसे ही होंगे जैसे उस समय थे?
गीता नहीं बदलेगी। अर्जुन भी बदलेंगे, कृष्ण भी बदलेंगे; कृष्णत्व नहीं बदलेगा।