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ज़िन्दगी टिकटॉक है, बच्चे! || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: ‌ आचार्य जी, प्रणाम! मेरा सवाल मेरे बच्चों के बारे में था, आचार्य जी। मेरे नौ साल के और ग्यारह साल के दो बच्चे हैं लेकिन उनका लगाव आध्यात्मिक साहित्य में नहीं हो पा रहा है। वो लोग पंजाबी रैपिंग सॉन्ग सुनते हैं; बॉलीवुड के आइटम सॉन्ग सुनते हैंl उसमें ज़्यादा ध्यान देते हैं। तो मैं उनको कबीर साहब के भजन वग़ैरह कभी सुनाने की कोशिश भी करता हूँ तो उससे बोर लगता है उनको। तो उस पर थोड़ा मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: देर कर दी है न! आपको नौ या दस वर्ष किसी चीज़ का अभ्यास करा दिया जाए, सोचिए कितने ज़्यादा होते हैं नौ-दस वर्ष! तो उसके बाद फिर एक ढर्रा बँध जाता है भीतर; बदलेगा नहीं आसानी से।

ये सूचना प्रौद्योगिकी का युग है। इसमें सूचना पहुँचनी तय है चारों ओर से किसी के भी कान तक, आँख तक, मन तक। तो बहुत सावधान रहना होता है कि बच्चों तक क्या चीज़ पहुँच रही है।

हम सोच लेते हैं कि अभी दो साल का है, चार साल का है तो क्या फ़र्क पड़ता है! बच्चा ही तो है। हम उसको ले जाकर के शादियों में डीजे पर नचा देते हैं। या कि बच्चा घर में लेटा हुआ है, सोया है या खेल रहा है, हम पीछे से पंजाबी रैप बजा देते हैं, या कोई भी। पंजाबी भाषा में अकेले थोड़ी कोई ख़राबी हो गयी, अवधी रैप भी हो सकता है। आजकल बना भी रहे हैं लोग।

तब हमको लगता है कोई फ़र्क नहीं पड़ गया है। बल्कि क्यूट लगता है बच्चा उस पर अगर नाचना शुरू कर दे तो। बच्चे ने कहीं सुना होगा न पहले! तब तो उसकी रूचि जाग्रत हुई। या अचानक बैठे-बैठे एक दिन बोलता है कि इस तरह की चीज़ होती है। मुझे यही सुनना है, मेटल सुनना है, हिपहॉप सुनना है। ऐसे बोला उसने? ऐसे बोला? तो पहले उसने पूरी ख़ुराक ली है न?

वो ख़ुराक उसको जब मिल रही थी तब हम क्या कर रहे थे? और वो ख़ुराक उसको पसंद आएगी क्योंकि वो जो संगीत है वो रचा ही जाता है मन को उत्तेजित करने के लिए। वो मसालेदार है। जवान को मसाला पसंद आ जाता है। वो संगीत आपसे ध्यान नहीं माँगता बल्कि वो आपको नशा देता है। और हमारे भीतर कौन बैठा है — एक जानवर जिसको नशा बहुत पसंद है।

समझ रहे हैं?

अब जैसे नौ साल लगे हैं उनको एडिक्टेड (व्यसनी) होने में, वैसे ही कम-से-कम कुछ साल लगेंगे वो नशा छुड़ाने में। और नशे की लत लगने की प्रक्रिया बड़ी रपटीली होती है, किसी चिकनी सतह की तरह। उस पर जब आप फिसलते हैं तो आवाज़ नहीं आ रही होती लेकिन लत छुड़ाने की प्रक्रिया ऐसी होती है जैसे टिन की छत पर ओले बरस रहे हों। उसमें आवाज़ भी आती है, घर्षण भी होता है, टूट-फूट भी हो सकती है।

अभी भी समय है, आपको बहुत प्रयास करना पड़ेगा और जितनी विधियाँ हो सकती हैं सबका इस्तेमाल करना पड़ेगा। बात क्योंकि बहुत आगे तक चली जाएगी। अगर वो कह रहे हैं कि जो बोरिंग है वो मुझे नहीं सुनना, तो बोरिंग तो लगभग सभी ऊँची चीज़ें होती हैं, आप उनको कितना रोचक बना लोगे?

अगर उनको भजन बोरिंग लगते हैं और इस कारण नहीं सुनना है तो फिर गणित भी कैसे पढ़ेंगे? विज्ञान भी कैसे पढ़ेंगे? बोलो। अब ग्यारह वर्ष का है, आगे तो किशोर होगा फिर जवान हो जाएगा। एक किशोर के लिए तो आवारगी और मटरगश्ती विज्ञान की प्रयोगशाला से हमेशा ज़्यादा आकर्षक और रोचक होगी। आप विज्ञान को कितना भी मोहक बनाने की कोशिश कर लें वो आवारगी का मुक़ाबला नहीं कर सकता।

शिक्षकों पर ये अक्सर हम ज़िम्मेदारी डालते हैं कि आप अपने विषय को ज़रा आकर्षक बनाइए, मनभावन बनाइए; वो क्या कर लेंगे बेचारे? तुम न्यूटन्स लॉज़ (न्यूटन के सिद्धांतों) को कितना मनोरंजक बना सकते हो भाई! गणित के सूत्रों को या समीकरणों को तुम चुटकुला बनाकर प्रस्तुत कर पाओगे क्या? तो शिक्षक क्या कर लेंगे?

यहाँ पर तो काम अभिभावकों का है कि बच्चों में ये मूल्य डालें कि कुछ बोरिंग, उबाऊ लगता भी हो तो कोई बात नहीं। मनोरंजन बड़ी बात नहीं है, मन का निर्माण बड़ी बात है। नहीं तो ये जो मूल्य है, वो बहुत दूर तक जाएगा और जीवन को नष्ट करेगा।

बच्चे अभी थोड़े और बड़े होंगे, उनकी बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड करने की उम्र आ जाएगी। तो तुरन्त उसको पकड़ लेंगे जो सबसे ज़्यादा मसालेदार होगा क्योंकि वही मूल्य-व्यवस्था तो वहाँ भी काम करेगी न। जैसे वो कह रहे हैं कि संगीत में मुझे वो संगीत चुनना है जो मुझे उत्तेजित करता हो, जिसमें बीट्स हों, तो वैसे ही जब वो दोस्त चुनेंगे या साथी चुनेंगे तो ऐसा ही कोई चुनेंगे जो उन्हें उत्तेजित करता हो, जिसमें बीट्स हों।

समझ में आ रही है बात?

ये तो श्रम करना पड़ेगा। देखना पड़ेगा घर का माहौल बहुत मसालेदार है क्या। कुछ बातों का बच्चों को घर में पता नहीं लगने देना चाहिए और आज के समय में चूँकि सूचना की बाढ़ आयी हुई है, ये जो मोबाइल फ़ोन है, ये एक बहुत बड़े गंदे नाले की तरह भी हो सकता है जो दुनियाभर की सारी गंदगी सीधे आपके घर में उड़ेले।

दिखने में बहुत छोटी सी चीज़ लगती है, आधुनिक तकनीक की, स्लीक , वाह! क्या चीज़ है! पर जिनके पास आँखें हैं वो देख पाएँगे — ये किसी बड़े-विशाल नाले के मुँह की तरह है जिसमें से दुनियाभर का मलमूत्र आपके घर में, घर में भी नहीं, सीधे आपके मन में उड़ेला जा रहा है। और अगर अभिभावक ये नहीं देख पाते और छोटे-छोटे बच्चे — छ: साल-आठ साल के — हाथ में मोबाइल लेकर घूम रहे हैं तो फिर अब क्या कहें ऐसे घरों को!

घर का माहौल समझना होगा — घर में मनोरंजन कैसे हो रहा है, घर में उत्सव कैसे मनाये जा रहे हैं; घर में दोस्त-यार, रिश्तेदार कैसे आ रहे हैं; आप किन जगहों पर बच्चों को घुमाने-फिराने ले जा रहे हैं।

हम बच्चे का आकार छोटा देखकर के न उसको महत्व भी छोटा ही देने लगते हैं। हमको लगता है इसको क्या समझ में आ रहा होगा! उसका आकार छोटा है, उसके मन की उत्सुकता बहुत बड़ी है। आपमें तो कोई उत्सुकता नहीं होती, बच्चे में प्रगाढ़ होती है उत्सुकता। आप तो छोटी-मोटी चीज़ों को देखकर के उपेक्षा भी कर देते हैं, बच्चा किसी चीज़ की नहीं उपेक्षा करता। वो हर चीज़ के भीतर घुस जाता है और ऐसे तरीक़ों से घुसता है कि आप उम्मीद भी नहीं करेंगे।

मैं क्यों बार-बार कहता हूँ कि इतना हम अन्याय करते हैं बच्चों के साथ, हमें पता ही नहीं होता है। हम अपने ही बारे में कुछ नहीं जानते, बच्चों के बारे में क्या पता होगा? अगर बच्चों को सुधारना है तो उसको आपको एक तपस्या की तरह ही सुधारना पड़ेगा और उसमें बच्चों का ही सुधार नहीं, माँ-बाप का, पूरे घर का, पूरे माहौल का सुधार निहित होगा। तब जाकर के बच्चे सुधरेंगे, नहीं तो बच्चे ठीक वैसे ही निकलेंगे जैसे आजकल की आम संतानें निकल रही हैं।

आप ये नहीं कह सकते कि मैं तो उन्हीं शादियों में जाकर के वैसे ही नाचूँगा जैसे नाचता हूँ लेकिन बच्चे मेरे बड़े शुद्ध संस्कारी निकल जाएँ। निकल ही नहीं सकते। आप ये नहीं कह सकते कि आप टीवी पर वही सब कार्यक्रम देखते रहेंगे जो देखते हैं और बच्चे साफ़-सुथरे रहें। न!

घरों में टीवी चलता है, आवाज़ तो हर कमरे में जाती होगी न? आप बच्चों को बंद भी कर देंगे कहीं पर, तो भी वो सुन तो रहे ही हैं। और हम भलीभाँति जानते हैं कि कौन से कार्यक्रमों की टीआरपी सबसे ज़्यादा होती है। वो टीआरपी कैसे ज़्यादा होती है? क्योंकि आप उनको देख रहे हैं। आप उनको देख रहे हैं माने कौन उनको देख रहा है — बच्चे देख रहे हैं।

और जो सबसे घटिया, वाहियात किस्म का फूहड़ कंटेंट (सामग्री) होता है, वही सबसे ज़्यादा चलता है। वो इसलिए थोड़े ही चल रहा है कि मंगल ग्रह पर बैठकर लोग उसको देख रहे हैं। उसको कौन देख रहा है? उसको कौन देख रहा है? उसको आप ही तो देख रहे हैं। आप देख रहे हैं माने कौन देख रहा है? आपके बच्चे देख रहे हैं। आपको यही लगता है कि मैंने देख लिया और बच्चा अपना ऐसे कनखियों से देख रहा है, देख रहा है; उसने सब सोख लिया।

देखिए, दोबारा समझाता हूँ। आज के समय जनसंख्या में चूँकि किशोरों की और युवाओं की ही तादाद सबसे ज़्यादा है इसीलिए हर घटिया चीज़ को बेचने के लिए इसी आयु वर्ग को निशाना बनाया जा रहा है। यही लोग हैं बाज़ार में तो यही तो खरीदेंगे न। इनकी उम्र कम है, इनकी समझ कम है, लेकिन पहले की अपेक्षा इनकी जेब में पैसा बहुत है। और ये माँ-बाप के लाड़ले हैं — पापा के पूत हैं या पापा की परी हैं।

अब दिमाग से आधा और जेब से पूरा ग्राहक किसी भी दुकानदार का हसीन सपना होता है — कोई तो ऐसा मिले जिसका खोपड़ा खाली और जेब भरी हो — और वो एक पूरी पीढ़ी उनको ऐसी मिल गयी है। तो फिर उसी किस्म का माल-मसाला तैयार हो रहा है। चाहे वो म्यूज़िक इंडस्ट्री हो, चाहे सीरियल्स टीआरपी हो, चाहे न्यूज़ ही क्यों न हो।

वास्तव में, देखिए, सबकुछ मनोरंजन बन चुका है। न्यूज़ भी अभी क्या है? मनोरंजन ही तो है न। मनोरंजन की आकांक्षा सबसे ज़्यादा इसी वर्ग को होती है।

आप जब बोलते हो छोटे बच्चे से, ‘खेलो’, वो क्या कर रहा है? मनोरंजन ही तो कर रहा है। और बच्चे को हर समय अपना मनोरंजन करना है। बच्चा है जिसे मनोरंजन चाहिए। इससे आप समझिए कि आज क्यों हर जगह आपको मनोरंजन ही परोसा जाता है। एक न्यूज़ वेबसाइट भी होती है तो वास्तव में उसकी प्रतिस्पर्धा टिकटॉक से है क्योंकि देखने वाले तो आप ही हैं न।

आपने मोबाइल पर अभी न्यूज़ वेबसाइट खोल रखी है और ज़रा सा पलट के आप टिकटॉक खोल लेंगे। और वो चाहते हैं कि वो आपका समय ले पाएँ। पर आप अपना समय किसी और को दे देंगे। तो इसीलिए न्यूज़ वालों को भी मनोरंजन ही करना पड़ता है। और मनोरंजन में कौन जीतेगा? जो सबसे सस्ता और घटिया मसाला परोसेगा, वो जीत जाएगा। क्योंकि इंसान की वृत्तियाँ तो नीचे ही फिसलने को ज़्यादा तैयार रहती हैं न।

किसी को नशा कराना ज़्यादा आसान है या नशा छुड़ाना? बस यही है। ये इंसान है। किसी को किसी भी बुराई में धकेलना ज़्यादा आसान है या बाहर खींचना?

ये मनोरंजन का युग है। और मनोरंजन के माध्यम से मन को जितना ख़राब किया जा सकता है करा जा रहा है। असल में मनोरंजन शब्द का अर्थ ही होता है — मन की ख़राबी। रंजन माने जानते हैं न क्या होता है — धब्बा लगा देना। दाग़-धब्बा लगा देना — उसको कहते हैं ‘रंजित हो जाना’। जब किसी चीज़ पर किसी चीज़ का धब्बा लग जाता है तो कहते हैं ये चीज़ अब रंजित हो गयी है।

तो मनोरंजन का मतलब ही यही है — मन पर दाग़-धब्बे-गंदगी छोड़ देना। इसको मनोरंजन कहते हैं। यही परिभाषा है। शाब्दिक परिभाषा भी यही है।

मनोरंजन हमें इसलिए चाहिए क्योंकि हम बहुत उद्देश्यहीन, अर्थहीन, गंदी ज़िन्दगियाँ जी रहे हैं। इसलिए हमें लगातार! गाड़ी में बैठे नहीं कि वहाँ लगाये जल्दी से धिनचिक धिनचिक — ‘तेज़ करो!'

एक क्षण का भी मौन उपलब्ध नहीं होना चाहिए, नहीं तो ज़िन्दगी की व्यर्थता बिलकुल भयावह तरीक़े से सामने प्रकट हो जाती है। तो इसलिए अपनेआप को मनोरंजन के नशे में डुबा कर रखो हर समय। जब बड़े ये कर रहे हैं तो वही चीज़ छोटों तक पहुँच जाती है।

अब मैं कैसे समाधान दे दूँ कि घर के बच्चेभर ठीक हो जाएँ और बड़े ठीक न हों या बड़े वैसे ही रहे आयें? बच्चों तक तो बड़ों से ही पहुँची न चीज़; और बड़ों तक समाज से पहुँची है। समाज तक समकालीन परिस्थितियों से पहुँची है। आज की जो सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था है, उसके सब बड़े शिकार हैं। और बड़े शिकार हैं तो बच्चे भी शिकार हो जाते हैं।

और व्यवस्था ऐसी क्यों है?

व्यवस्था ऐसी इसलिए है क्योंकि हम ऐसे हैं।

हम ऐसे क्यों हैं?

क्योंकि हम जानवर हैं।

तो क्या ऐसे ही चलता रहेगा?

नहीं, उम्मीद है। उस उम्मीद का नाम अध्यात्म होता है।

आप जानवर न रहिए तो आप वैसी आर्थिक, सामाजिक या राजनीतिक व्यवस्था नहीं बनाएँगे जैसी आज है। आप ऐसी व्यवस्था नहीं बनाएँगे तो लोगों पर फिर उसका उतना बुरा असर नहीं पड़ेगा। लोगों पर नहीं पड़ेगा तो बच्चे भी बेचारे बचे रहेंगे। कुल मिला-जुलाकर के हर चीज़ तो घूमकर इसी पर आती है कि व्यक्ति आध्यात्मिक नहीं है। अध्यात्म की उपेक्षा है। बल्कि अनादर है।

जहाँ अध्यात्म नहीं होगा वहाँ आनंद नहीं होगा। जब आनंद नहीं होता तो फिर आप सस्ती खुशी खोजते हो। वो सस्ती खुशी आप खोजते हो सस्ते मसाले में। सस्ता मसाला यही सब होता है जिससे बाज़ार पटे पड़े हैं। वही है सस्ता मसाला।

जो थोड़ी पुरानी पीढ़ी है उन्होंने तो गलती करी है। पर जो वर्तमान पीढ़ी है उसके साथ तो अन्याय हो रहा है। पुरानी पीढ़ी के पास विकल्प तो थे कम-से-कम दोनों कि सही जीवन भी जी सकते हो और गलत जीवन भी जी सकते हो। उन्होंने गलती करी कि गलत को चुन लिया चकाचौंध में फँसकर। पर जो नयी है उसको तो सही जैसा कोई विकल्प ही उपलब्ध नहीं है। वो बेचारे जानते ही नहीं कि सही जीवन कुछ होता भी है क्या। उन्हें एक ही जीवन पता है। कौनसा? वही जो वो देखते हैं — सस्ता, उथला, दो कौड़ी का मनोरंजन।

ये मनोरंजन का ऐसा युग है कि जो आपको मनोरंजन दे रहा है वही बाप बन गया है, वही गुरु बन गया है, वही भगवान बन गया है। आप व्यर्थ ही अपनेआप को माँ-बाप मानते रह जाते हैं। उनके माँ-बाप अब कोई और बन चुके हैं। वो किसी और की औलादें हैं अब। हाँ, पैसा ज़रूर आपसे लेते हैं। लेकिन वो औलादें अब किसी और की हैं।

भई, बाप का क्या मतलब होता है? बेटा जिसके जैसा हो। बच्चा पैदा होता नहीं है कि आप तुरन्त देखने लगते हैं कि नाक किसके जैसी है, माथा किसके जैसा है, आँख किसके जैसी है। उनका तो अब सबकुछ यही मनोरंजन करने वाली सेलिब्रिटीज़ (प्रसिद्ध व्यक्ति) जैसा है। तो वो किसकी औलादें हुए?

भीतर-ही-भीतर वो ऊपर से लेकर नीचे तक, ये कॉमेडियन हैं या ये जो तथाकथित अभिनेता-अभिनेत्री हैं या ये यूट्यूब पर जो बाढ़ आयी हुई है इस समय कंटेंट क्रिएटर्स (सामग्री निर्माताओं) की, जिसमें हर तरह की नालायक़ी शामिल है, ये उनकी औलादें बन चुके हैं।

पशुता नैसर्गिक होती है, प्रकृति से, देह से ही मिल जाती है। पर चेतना को ऊपर उठाने के लिए शिक्षा की और आदर्शों की ज़रूरत पड़ती है। बच्चे को कोई दिखना चाहिए, कहे, ‘मैं ऐसा होना चाहता हूँ।’ अभी वो क्या बोलता है — मैं कैसा होना चाहता हूँ? अभी वो कहता है कि मैं फ़लाने यूट्यूबर जैसा होना चाहता हूँ। वही गॉड (भगवन) है मेरा। और वो बोलते भी हैं, जाकर पढ़िएगा, लिख देते हैं कि गॉड । ‘वही गॉड है मेरा।’

आदर्श कहाँ है? आपने किन आदर्शों से अपने बच्चों को परिचित कराया, बताइए न? और वो जिनको उन्होंने अब आदर्श बना लिया है बच्चों ने, आपको उनके नाम नहीं पता होंगे। ऐसे-ऐसे अजीब-अजीब नाम हैं, आपको बिलकुल नहीं पता होगा। बच्चों का अपना अलग अंतरिक्ष चल रहा है।

आप यहाँ बैठकर बात करते रहिए वेदान्त की! आप उसके पास जाएँगे, आपको पता चलेगा उसके भगवान का नाम है ‘क्रोकोकिटाई’। क्रोकोकिटाई कौन है? क्रोकोकिटाई कोई है जो फटे कपड़े पहन करके और ‘यो-यो-यो’ करता रहता है। और वो उसका भगवान बन चुका है, क्रोकोकिटाई।

आप अपनी दुनिया में मशगूल हैं, आपको पता ही नहीं है वहाँ कर क्या रहा है। वहाँ कोने में बैठकर उसने मोबाइल पकड़ रखा है, आपको लगता है मेरे घर के अंदर ही तो है। वहाँ कोने में बैठा है मोबाइल से कुछ कर रहा है। वो आपके घर के अंदर बस शरीर से है, मन से वो क्रोकोकिटाई की दुनिया में है और वो वहीं वास करता है। उसका वहीं का पासपोर्ट है, नागरिक हो गया। आपको भ्रम है कि वो आपके घर का बच्चा है। आपके घर का वो बचा ही नहीं है अब।

फिर एक दिन आपको पता चलता है कि ये ड्रग एडिक्ट (नशे का व्यसनी) हो गया, या टीनेज प्रेग्नेंसी (किशोरावस्था गर्भाधान) हो गयी या कहीं जाकर के किसी का सिर फोड़ आया या अपना फुड़वा आया या स्कूल से निकाला जा रहा है या कोई और कांड हो रहा है। तो आपको फिर झटका लग जाता है। आप कहते हैं, ‘अरे! अचानक ये कैसे हो गया? ये कैसे हो गया?’

अचानक नहीं हो गया, पिछले पंद्रह साल से हो रहा था; आप बेख़बर थे। ये सब चल रहा था, लगातार चल रहा था।

और हम कितना सिर चढ़ाकर रखते हैं बच्चों को! आपमें कितने आधुनिक, उदारवादी मूल्य आ गये हैं। मैं तो नहीं कल्पना कर सकता कि मैं दस-ग्यारह साल का हूँ और मैं अपने अभिभावकों से या अपने टीचर्स को बोल दूँ कि मुझे ये किताब नहीं पढ़नी है, मुझे अभी मस्ती मारनी है। लाल कर दिया जाता। (श्रोतागण हँसते हैं) और किया गया था।

मैं सातवीं-आठवीं में था। तब अमिताभ बच्चन की पिक्चर आयी थी — 'हम'। उसमें गाना था — ‘जुम्मा चुम्मा दे दे’। और उसी समय पर दो और आयी थीं, एक का नाम था 'दिल', एक का 'आशिक़ी'। तो टीचर्स डे हुआ पाँच सितम्बर को, उसमें स्टूडेंट्स आये, उसमें हुआ कि भाई, नाच-गाना होता, उन्होंने उसके गाने-वाने गा दिये और बड़ी धूम मची। मैंने भी सुने। मैंने कहा, 'बढ़िया है!' तो तालियाँ बज रही हैं, तारीफ़ें हो रही हैं। 'जुम्मा चुम्मा दे दे'!

तो हज़रतगंज घूमने जाया करते थे। तो मैं भी जब गया अगली बार घर वालों के साथ ही — दोस्तों के साथ नहीं जाता था — तो मैंने भी जाकर के इनके कैसेट खरीद लिए। 'जुम्मा चुम्मा' और 'बस एक सनम चाहिए आशिक़ी के लिए'। (श्रोतागण हँसते हैं)

दिल में एक गाना था, 'हमने घर छोड़ा है, रस्मों को तोड़ा है; दूर कहीं जाएँगे, नयी दुनिया।’ सब गा रहे, अच्छी बात है। और चेहरे पर नये-नये बाल आ रहे थे; सातवीं-आठवीं के दिन। घर ले आये उसको, बजा दिया। और फिर जो बजायी हुई, हफ़्ते-भर तक बजता रहा। गाना वो बुरा नहीं था 'जुम्मा चुम्मा दे दे'। लेकिन बजा बड़ा ज़बरदस्त!

आपके घर में किस तरह का माहौल है कि कुछ भी चल रहा है! या आपको भी यूट्यूबर्स ने बता दिया है कि नहीं-नहीं, बच्चों को डाँटना नहीं चाहिए, उन्हें सदमा लग जाता है। वो कुछ भी कर लें, उनको प्यार से समझाओ।

अब प्यार क्या होता है — ये किसको समझाओ और कैसे?

'आचार्य जी, ये मेरी चिंटी है। ये बड़ी नटखट है।'

क्या करती है?

'इसे अपने दादी को थप्पड़ मारना बहुत पसंद है।'

ये वाक़ई! और ये कितनी क्यूट बात है! दादी बैठी रहती है, अस्सी साल की है, वो चिंटी आती है, पटाक एक थप्पड़ मार के आती है दादी को और सब ताली बजाते हैं। 'चिंटी! चिंटी! नो चिंटी। ऐसा नहीं करते, चिंटी!’ और चिंटी ऐसे चारों ओर, ऐसे विजेता की तरह देखती है घूम-घूम के। कहती है, ‘देखा, सबने कैसे मुझे ध्यान दिया?’ अब दादी बैठी देख रही है कि डेंचर (नकली दाँत) तो नहीं बाहर आ गया।

तुम्हारी ही करतूत है, दादी। बहुत आतुर हो रही थी, ‘छौना चाहिए!’

इन कुछ बातों पर ग़ौर करें — आपकी गाड़ी में क्या बज रहा है, आपके फ़ोन में क्या बज रहा है, कॉलरट्यून-रिंगटोन ये सब, आपके टीवी पर क्या चल रहा है। यहाँ तक ध्यान देना होता है कि आप किसी रेस्तराँ में खाना खाने गये हैं तो वहाँ भी क्या बज रहा है।

माँ-बाप होना बच्चों का खेल नहीं। आप किसी रेस्तराँ में घुसे हैं और वहाँ कुछ अभद्र, अनुचित बज रहा है, आपने ऑर्डर दे भी दिया है, उठकर वापस आ जाइए। वो जो आप सुन रहे हैं, आपके लिए सामान्य है बच्चे के लिए ज़हर है। पर हम खोये रहते हैं आपस में। माँ-बाप अपने ही तकरारों में खोये हुए हैं। कुछ बातचीत चल रही है, ये-वो, उनको पता ही नहीं कि जो बज रहा है, वो उसको सोख रहा है छोटू।

ये इस दुनिया के साथ बहुत भयानक चीज़ हो रही है। जो नयी पीढ़ी निकल के आ रही है बिलकुल अभी की, ताज़ी, इनके चेहरों पर जो एक मूलभूत मानवता होती है, जैसे उसकी ही कमी है। जिसे आप उनकी एसेंशियल ह्यूमेनिटी कहोगे न। मैं इस उम्र के बच्चों को देखता हूँ चार साल-सात साल के, कई बार ऐसा लगता है जैसे किसी ’हैरी पॉटर’ मूवी के किसी चरित्र को देख रहा हूँ। और उनका मुँह बिलकुल वैसा ही हो गया है, कार्टून जैसा हो गया है।

कार्टून जैसा मुँह हो गया है, वही गोल-गोल चश्मा लगा लेते हैं, और एक असंवेदनशीलता, लैक ऑफ ह्यूमेनिटी, लैक ऑफ एम्पेथी (मानवता की कमी, सहानुभूति की कमी) उनके चेहरे पर लिखी होती है। जैसे कोई मशीन हो। साफ़-सुथरी, गोल-गोल, गोरी-गोरी मशीन! जो पहले की पीढ़ी की अपेक्षा ज़्यादा अच्छी खायी-पी हुई है। उसका वज़न बेहतर है, उसकी खाल की स्थिति बेहतर है, उसके बाल ज़्यादा घने-घुँघराले और काले हैं, उसने कपड़े बेहतर पहन रखे हैं, लेकिन उसके चेहरे पर कहीं-न-कहीं इंसानियत की ही जैसे कमी है।

जिसको मैं इंसानियत कह रहा हूँ उसको आप चेतना सुनिए। चेतना की ही कमी है। लेकिन वो दिखने में बड़े अच्छे लगते हैं।

बीस-तीस साल पहले तो बच्चे ऐसे भी घूम रहे होते थे कि अब वो घूम रहा है, उसके बाल ऐसे ही उड़े हुए हैं, मिट्टी-विट्टी लगी है, नाक बह रही है। अभी ऐसे नहीं होते। अभी वो बच्चे भी बिलकुल पेडिक्योर्ड-मैनिक्योर्ड होते हैं। ऐसा लगता है ताज़ा-ताज़ा फैक्ट्री से निकाला है। लेकिन कुछ बहुत ख़ौफ़नाक होता है उनके चेहरों पर। जैसे वो इंसान हों ही नहीं; जैसे वो टीवी से ही निकलकर बाहर आये हैं।

ये जो आप उनको कार्टून वग़ैरह देखने देते हैं; कभी आपने ख़ुद देखे हैं कार्टून ? देखिएगा कि उनमें कितने घातक संदेश छुपे होते हैं। हो सकता है वो जो कार्टून कैरेक्टर हैं, वो सब जानवरों जैसे बनाये गये हों। कि कोई शेर है, कोई हाथी है, कोई भालू है। लेकिन देखिएगा कि उन जानवरों के माध्यम से भी कितनी भयानक उनको शिक्षा दी जा रही है बच्चों को; और वो सोख रहे हैं।

अभी एक कार्टून था जो कृष्ण के ऊपर ही था। उसका नाम या तो ‘ बेबी कृष्णा’ या ‘ लिटिल कृष्णा’, कुछ ऐसे करके। और उसमें भी कुल यही दिखाया है कि कृष्ण क्या कर रहे हैं, छोटे हैं तो मस्ती मार रहे हैं। दौड़ते हुए जाते हैं, पानी में कूद जाते हैं; किसी बछड़े की पूँछ पकड़कर खींच रहे हैं।

तो कृष्ण से भी जो उनका कुल परिचय कराया जा रहा है वो ये है कि मस्ती मारो और मस्ती मारने में बछड़े की पूँछ खींच मारो और बछड़े की खींच ही नहीं रहे पूँछ, बछड़े की पूँछ पकड़कर उसको खींचते हुए ले जाते हैं और कहीं पर कुछ कर देते हैं। पेड़ उखाड़ देते हैं। लेकिन क्यूट बहुत दिखाये गये हैं और ही-ही करके हँस रहे हैं लगातार। और हँसे ही जा रहे हैं। और हँसी ऐसी कि आप कहेंगे, 'आ हा हा! कितना प्यारा बेबी है।'

हमने कृष्ण को भी मनोरंजन की भेंट चढ़ा दिया। कृष्ण भी अब बच्चों के लिए किसलिए हैं — ताकि वो बच्चों को मनोरंजन का संदेश दे सकें। और आप सोचते हो, 'नहीं-नहीं, मेरा घर तो अलग है। मेरे यहाँ तो कृष्ण वाला कार्टून चल रहा है।’ देख तो लो उसमें छुपी हुई क्या सीख दी जा रही है।

अब आप उसको कार्टून भी दे रहे हो तो यूट्यूब पर ही तो दे रहे होगे देखने को। उस पर हर समय तो अब मांस के ही संदेश आते रहते हैं। लगातार यही रहता है कि ये लो, ये मांस है, इसे तुम्हारे घर पहुँचा देंगे। ये मांस, नया तरह का मांस, ख़रगोश का मांस; और वो आप स्क्रीन खोलो और उसपर मांस उड़ रहा होता है लगातार। ऊपर से मांस ही मांस गिर रहा है और उसको बताया जा रहा है, ‘कितना ज़ायकेदार है!’

ये सब बच्चा नहीं देख रहा है क्या? फिर आपको झटका लग जाता है कि अरे! इसने दारू और मीट कैसे शुरू कर दिया। और शुरू कर नहीं दिया, सब चल रहा है। आपको ग़ाफ़िल बैठे रहना है, आप बैठे रहिए। नयी पीढ़ी में शाकाहार का प्रतिशत पहले से और कम हो गया है। हाँ, अभी एक सर्वेक्षण कर लें आप लोगों पर, पूछें कि आपमें से कितनों के बच्चे मांस खाते हैं तो शायद दो-तिहाई बोलेंगे, ‘हमारे तो नहीं खाते, हमारे तो नहीं खाते।’

ज़्यादातर अभिभावक यही बोल रहे हैं कि हम शाकाहारी हैं यदि तो हमारे बच्चे भी हैं। लेकिन जब खुले सर्वे किये जा रहे हैं तो उसमें पता चल रहा है नयी पीढ़ी पिच्चासी प्रतिशत मांसभक्षी है। तो फिर ये किनके घरों के बच्चे खा रहे हैं? अगर हर माँ-बाप यही बोल रहे हैं, ‘हमारा तो नहीं खाता’, तो फिर खा किसका रहा है? क्योंकि सच्चाई तो यही है कि दस में से नौ खा रहे हैं। वो आप ही के घर का है और खा ही नहीं रहा है, वो पी भी रहा है।

अच्छा, आपने यूँही सड़क चलते-फिरते अपने समाज में या अपने ऑफिस में या अपने मोहल्ले में कोकीन या हेरोइन के एडिट्स देखे हैं क्या? देखे हैं? दिखायी पड़ते हैं? तो अगर हमसे पूछा जाए कि क्या कोकीन या हेरोइन वग़ैरह या बाक़ी ड्रग्स हैं समाज में, तो हम क्या बोलेंगे? 'नहीं हैं। हमने तो कहीं देखे नहीं।’ पर करोड़ों हैं। तो कहाँ हैं? वो कहाँ है? वो हमारे ही घरों में हैं। हमें दिख नहीं रहे।

आप फिर सोचिए न! हैं तो हैं ही। एक सौ चालीस करोड़ की आबादी में लगभग दस करोड़ ऐसे हैं जो किसी-न-किसी तरह का नशा करे जा रहे हैं। और मैं नयी पीढ़ी की बात कर रहा हूँ। उसी अनुपात में नयी पीढ़ी में लगा लीजिए; बल्कि ज़्यादा। और हर व्यक्ति को ये लगता है कि भई, मेरे सर्किल (मंडली) में तो ऐसा कोई नहीं है। अगर किसी के सर्किल में नहीं है तो ये दस करोड़ कहाँ से आ गये? ये हैं; और सर्किल में नहीं, घरों के अंदर हैं हमारे। और ये सब आपस में जुड़े हुए हैं।

उस तरह का संगीत जिसकी आपने बात करी, नशा, जीवन का पतन, ज़बरदस्त तरीक़े का कंज़्यूमरिज़्म (उपभोगतावाद), ये सब आपस में जुड़ी हुई बातें हैं। पंजाब में इतना ज़बरदस्त ड्रग कल्चर और पंजाबी गानों में नशे की बातें, क्या ये दो अलग-अलग चीज़ें हैं? बोलिए।

तो अगर आपका बच्चा वो गाना सुन रहा है जिसमें नशे की लगातार बात है तो क्या वो ड्रग से भी दूर रह लेगा? अभी आपने कहा ये दो अलग-अलग बातें नहीं हैं। तो ड्रग से भी कितनी दूर रह लेगा?

कोई बड़ी बात नहीं है कि जो ड्रग्स इंडस्ट्री (नशा उद्योग) है, जो माफिया है, वही ऐसे गानों को स्पांसर (प्रायोजित) करता हो। क्योंकि ये गाने जितने फैलेंगे इनको सुनकर के आपके भीतर नशा करने की ललक, हवस उतनी उठेगी। वो गाना बना ही ऐसा है, उसकी धुन ऐसी है और उसमें जो बातें कही जा रही बिलकुल ऐसी हैं कि आपको नशा करना पड़ेगा। उसमें नशे को ग्लोरिफ़ाई (गौरवान्वित) किया जा रहा है। लिरिक्स (गाने के बोल) भी वही हैं।

तो वो आप सुनो और सुनते जाओ एक साल और उसके बाद आप नशा न करो, ये हो ही नहीं सकता। आप बताइए कितना बड़ा अलार्म बजना चाहिए अगर घर में बच्चा कह रहा है कि मुझे रैप सुनना है और दूसरी चीज़ें मुझे बोरिंग लगती हैं?

लेकिन वही सब बज रहा हो, उसकी उसमें जो धुन बनायी जाती है वो आपको चूँकि बेहोशी की ओर धकेलती है इसलिए कर्णप्रिय लगती है। तो आपका मन ही नहीं करता कि इसको रोक दें, तत्काल सजग हो जाएँ और कहें — *स्टॉप*। वो बजता रहता है। और कई बार पूरी प्लेलिस्ट (गानों की सूची) होती है, वो बजती रहेगी। और एक के बाद एक उसी तरह के गाने हैं, बजे जा रहे हैं, बजे जा रहे हैं, बजे जा रहे हैं।

ऐसा मन चाहिए, ऐसी जागरूकता चाहिए जो अचानक बीच में बोले — स्टॉप । देखा कि नशा आ रहा है और छाता जा रहा है, अचानक बीच में उसको रोक के बोला — स्टॉप । क्योंकि जितनी देर आप लगा रहे हो ‘स्टॉप’ बोलने में उतनी देर आप और नशे में धँसते जा रहे हो और आगे ‘स्टॉप’ बोलना और मुश्किल हो जाएगा फिर।

अभी बोल दो। अभी रोक सकते हो, आगे नहीं रोक पाओगे।

प्र२: प्रणाम आचार्य जी! मेरे पिताजी का एक स्कूल है। उस स्कूल को अभी मैं मैनेज (प्रबंधित) कर रहा हूँ। कल आपने बताया था कि अगर हमें अपने देश में जल्द-से-जल्द सकारात्मक परिवर्तन लाना है तो कुछ चीज़ों पर हमें ध्यान देना पड़ेगा जिसमें आपने एक चीज़ बतायी थी कि शिक्षा व्यवस्था में हमें अध्यात्म को लाना चाहिए।

तो मैं जानना चाहता हूँ कौनसी ऐसी चीज़ों का ध्यान रखूँ कि मैं जो पाँच से छ: सौ बच्चे हैं उनमें एक सकारात्मक परिवर्तन ला सकूँ।

आचार्य: इस बारे में पहले काफ़ी बात हो चुकी है। और कुछ स्कूलों में ऐसा कार्यक्रम फ़िलहाल भी चल रहा है। पहले भी चला हुआ है। तो ये एक अपनेआप में पेचीदा और टेक्निकल (तकनीकी) मुद्दा है। ठीक है? जिसका विस्तृत उत्तर पहले ही उपलब्ध है, डॉक्यूमेंटेड (प्रलेखित) है कि स्कूल में किस तरह की एक्टिविटीज़ (गतिविधियाँ) होनी चाहिए।

उसके लिए आप संस्था में जिनसे भी संपर्क में हों उनसे बात करिए। इस चीज़ में आपको सुनने की नहीं, पढ़ने की ज़्यादा ज़रूरत पड़ेगी। क्योंकि वो पूरे-पूरे डॉक्यूमेंट्स (दस्तावेज़) हैं, पूरी सिस्टेमिक एक्टिविटीज़ (व्यवस्थित गतिविधियाँ) हैं, प्लान (योजना) होता है पूरा, वो आपको पहले स्टडी (अध्ययन) करना पड़ेगा।

प्र२: एक और प्रश्न था मेरा। जिस तरीक़े से कुछ कंपनियाँ हैं जिन्होंने सामान्य सी चीज़ों को पूरे देश के स्तर पर फैलाया है, क्या हम ऐसा कर सकते हैं कि अगर एक स्कूल में हम पहले इस चीज़ के लिए प्रयास करें, लागू करें और फिर हर जिले में ऐसे कुछ स्कूल हों?

आचार्य: एकदम हो सकता है, बिलकुल। अद्वैत लाइफ़ एजुकेशन आज से लगभग दस साल पहले एक साथ, पचास से ज़्यादा स्कूलों, कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज़ में ये कोर्स चला रही थी। और ये आज से नहीं, आज से दस-पंद्रह साल पहले हम कर रहे थे। जब इतना टेक सपोर्ट (तकनीकी सहायता) भी उपलब्ध नहीं था।

तो न सिर्फ़ ये हो सकता है बल्कि ये हो चुका है और टेक सपोर्ट के अभाव में भी हो चुका है। अब जब टेक्नोलॉजी उपलब्ध है तो अब तो बहुत ज़्यादा और स्केल - विस्तार के साथ हो सकता है। बिलकुल हो सकता है।

प्र२: धन्यवाद!

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