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ये सब सच है क्या?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: हम मानते हैं कि गति करने के लिए अगर हमारे पास हाथ-पाँव हैं तो वो गति करने में सहायक हो रहे हैं, ठीक है न? यही है न सोच हमारी? हम कहते हैं, “हमें गति करनी है और हाथ-पाँव हैं, इन्हीं के बूते तो हम यहाँ से वहाँ कहीं पहुँच पाते हैं।” ये सामान्य सोच है। इस सामान्य सोच के केंद्र में अहं बैठा है। वो अहं कह रहा है, “मेरा शरीर से तादात्म्य है और मैंने बहुत बढ़िया निर्णय किया है शरीर से तादात्म्य करके, क्योंकि देखो शरीर से तादात्म्य किया है तो अब मैं कह पाता हूँ ‘मेरे हाथ', ‘मेरे पाँव'। और ये हाथ-पाँव उपयोगी हैं न; मुझे यहाँ से वहाँ पहुँचना होता है तब हाथ-पाँव मेरे काम आते हैं। तो मैं बिलकुल सही हूँ, मैं बिलकुल सच हूँ।” यही तो अहं की अभिलाषा रहती है, कि वो अपने-आपको बोल दे कि मैं ही सत्य हूँ।

ये जो हाथ-पाँव हैं इन्हीं के कारण तो आप एक स्थान पर बँधे हो न? हाथ-पाँव माने शरीर। आपको आवश्यकता ही क्यों पड़ रही है एक जगह से दूसरी जगह जाने की? एकदम ज़रा मूलभूत सवालों को देखो; क्यों ज़रूरत पड़ रही है आपको यहाँ से वहाँ जाने की? क्योंकि शरीर एक समय पर एक ही जगह पर हो सकता है, ठीक है न? तो तभी फिर आपको समय का इस्तेमाल करके और हाथ-पाँव का श्रम लगाकर के एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़ता है। अब आप इसी बात पर बड़े प्रसन्न हो रहे हो कि मेरे पास हाथ-पाँव हैं तो देखो मैं गति करके यहाँ से वहाँ पहुँच जाता हूँ; आप ये पूछ ही नहीं रहे कि गति करने की ज़रूरत क्यों पड़ी, ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि तुम किसी एक स्थान पर बंधक रहो ही नहीं?

हम बंधक ही तो हैं; आप किसी जगह पर हैं और वहाँ से हिल-डुल नहीं सकते, इसको बंधक होना ही कहते हैं न? एक तरह का कारागृह ही है न ये? शरीर और क्या करता है आपके साथ? कि तुम यहाँ पर हो तो तुम वहाँ नहीं हो सकते। बात समझ रहे हो? शरीर भी तो आपके ऊपर सीमा लगा रहा है न; और कारागृह भी आपके ऊपर सीमा लगाता है। हम लेकिन इसको ऐसे नहीं देखते हैं; हम सोचते हैं कि शरीर हमारी इच्छाएँ पूरी करने का माध्यम है, हम सोचते हैं कि हाथ-पाँव वो उपकरण हैं जिनका इस्तेमाल करके हम यहाँ से वहाँ पहुँच जाते हैं।

ऋषि कह रहे हैं, “ऐसे नहीं देखो। तुम ये देखो कि शरीर ही तुम्हारे लिए ये आवश्यक बना देता है कि तुम समय खर्च करो एक जगह से दूसरी जगह पहुँचने पर; और जब दूसरी जगह पहुँच गए तुम, तो पहली जगह पर शेष नहीं रह गए। तुम माध्यम का प्रयोग करके बहुत प्रसन्न हो रहे हो, लेकिन तुम भूल रहे हो कि वो माध्यम ही तुम्हारी राह का रोड़ा है।“ क्या है माध्यम? शरीर माध्यम है। तुम प्रसन्न हो रहे हो कि तुम्हें माध्यम मिल गया अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए। जहाँ से ऋषि देख रहे हैं वो कह रहे हैं, “ये माध्यम तुम्हें लक्ष्य तक ले नहीं जा रहा, ये माध्यम ही लक्ष्य को तुमसे दूर किए दे रहा है।”

देहभाव में अहं क्यों लंबे समय तक स्थापित रह पाता है? इसलिए रह पाता है क्योंकि वो देह को अपने लिए बड़ा लाभप्रद समझता है। वो सोचता है, “देखो देह है तभी तो पचास तरीके के काम हो पा रहे हैं। ये हो पा रहा है, वो हो पा रहा है; देख पा रहा हूँ, अनुभव ले पा रहा हूँ, संबंध बना पा रहा हूँ।“ ऋषि कह रहे हैं कि बात बिलकुल उलट है: “देह के कारण तुम पहुँच नहीं पा रहे; देह के कारण ही पहुँचने की आवश्यकता खड़ी हुई है। देह नहीं होती तो ऐसा भी नहीं होता न कि तुम एक ही जगह पर सीमित हो, या कैद हो? तुम होते ही नहीं अगर, तो कौन-सी जगह होती जहाँ तुम नहीं होते?”

ऋषि की दृष्टि समझो, वो कह रहे हैं, “चूँकि तुम हो, इसीलिए एक जगह है जहाँ तुम हो और एक जगह है जहाँ तुम नहीं हो।” तो माने तुम्हारा होना ही, एक जगह पर, ये सुनिश्चित कर देता है कि तुम बाकी किसी भी दूसरी जगह पर नहीं हो सकते। बात समझो। तो दुनिया भर की जगहें, जहाँ तुम नहीं हो, वहाँ तुम इसीलिए नहीं हो क्योंकि तुम हो। कहाँ पर? जहाँ पर हो तुम। तो ऋषि पूछ रहे हैं, “अगर तुम होते ही नहीं, तो मुझे बताओ कोई जगह ऐसी होती जहाँ तुम नहीं होते?”

समझ में आ रही है बात?

इसी बात को थोड़ा और आगे बढ़ाओगे तो समझ में आएगा कि ऋषि कह रहे हैं, “अगर तुम होते ही नहीं, तो ये अलग-अलग जगहें होतीं भी क्या?” ये जो ‘स्थान’ या ‘जगह’ शब्द है, फिर तो यही निरर्थक हो जाता न? चूँकि तुम एक जगह पर हो इसीलिए तुम स्थान के पूरे विस्तार को अलग-अलग जगहों का नाम दे देते हो, है न?तुम कहते हो, “देखो मैं यहाँ बैठा हूँ, तुम मेरे दाएँ बैठे हो, और उधर तुम, तुम मेरे बाएँ बैठे हो।“ ये दाएँ और बाएँ का चक्कर आया कहाँ से? क्योंकि तुम दाएँ और बाएँ के केंद्र में बैठे हो। तुम अगर होते ही नहीं तो ये जितना विस्तार है स्थान का, अंतरिक्ष का, आकाश का, जगह का, ये पूरा अर्थहीन हो जाता; कोई मतलब नहीं रह जाता इसका।

मुझे ये बताओ, अगर दो चीज़ें न हों; कहीं भी, कोई भी दो चीज़ें न हों तो क्या स्थान, स्पेस भी बचेगा? हम सोचते हैं कि स्पेस खाली जगह का नाम है। नहीं, स्पेस खाली जगह का नाम नहीं है; स्पेस दो वस्तुओं के बीच की खाली जगह का नाम है। आप जब स्पेस की कल्पना भी करते हो तो आपकी कल्पना ऐसी होती है कि सब कुछ खाली है। नहीं, सब कुछ अगर खाली हो, अगर वस्तुएँ बिलकुल न हों, ऑब्जेक्ट्स बिलकुल न हों तो ऑब्जेक्ट्स के साथ-साथ स्पेस भी विलुप्त हो जाएगा।

समझ में आ रही है बात?

और पहला ऑब्जेक्ट् कौन है जो इतने सारे दूसरे ऑब्जेक्ट्स बना देता है? वो हम हैं, हमारी देह। तो तुम न हो अगर, तो दूसरी वस्तुएँ या दूसरे ऑब्जेक्ट्स भी नहीं हो सकते। और जब दूसरी वस्तु या दूसरे ऑब्जेक्ट्स नहीं हैं, तो स्पेस कहाँ बचा? सब गया न?

और यही तो तुम चाहते हो कि कोई जगह ऐसी न बचे जहाँ तुम नहीं हो; और यही तो तुमको अफ़सोस है कि बहुत जगहें हैं जहाँ तुम नहीं हो।

ज़िंदगी-भर आदमी क्या करता है? दौड़ता है, भागता है, उसको यहाँ पहुँचना है, उसको वहाँ पहुँचना है। यही करते हो न? तुमको यहाँ-वहाँ पहुँचना ही इसीलिए है क्योंकि तुम अभी इस जगह बैठे हो। चूँकि तुम अभी यहाँ हो इसीलिए कल तुम्हें ज़रूरत पड़ेगी कहीं और होने की, फिर कहीं और होने की, फिर कहीं और होने की। और जहाँ भी जाते हो वहाँ होकर के इच्छा तो पूरी होती नहीं; तो फिर अगले दिन कहीं और जाना पड़ता है।

ले-देकर के तुम्हारी इच्छा ये है कि जितना भी विस्तार है स्थान का, स्पेस का, तुम वो पूरा ही छान मारो।

देखते नहीं हो, बहुत सारे पर्यटक होते हैं उनको ये बताने में बड़ा अद्भुत आनंद रहता है कि अब तक हम एक सौ दो देशों की यात्रा कर चुके हैं? वो बड़े मज़े में दिखाते हैं अपना पासपोर्ट, कि, “देखो इसपर कितने ठप्पे हैं, गिनो।“ ये हम क्या कर रहे हैं? ये हम अपने कष्ट का प्रदर्शन कर रहे हैं, कि, “देखो मैं होना तो सर्वव्यापक चाहता हूँ, मैं वो हो जाना चाहता हूँ जो हर जगह है, पर मैं बँधा हुआ हूँ एक जगह से। इसीलिए मैं लगातार कोशिश करता रहता हूँ कभी इधर उड़ने की, कभी उधर उड़ने की, कभी यहाँ जाने की, कभी वहाँ जाने की। और जब मैं स्थूल शरीर से नहीं जा पाता; वीज़ा नहीं मिला, फ़्लाइट नहीं मिली, कोई बात हो गई; तो फिर मैं कैसे जाता हूँ? सूक्ष्म शरीर से। क्या करता हूँ मैं फिर? आँख बंद करके कल्पना करता हूँ।“

ये जो मन इतनी कल्पना करता है कभी यहाँ होने की, कभी वहाँ होने की, वो वास्तव में यही कह रहा है कि, “मुझे हर जगह होना है; क्योंकि मैं जहाँ भी नहीं हूँ मुझे वहीं की याद आती है, मैं जहाँ ही नहीं हूँ मुझे वहीं की कमी अखरती है।“ तो मन की फिर इच्छा क्या है? मन की इच्छा है हर जगह होने की। हर जगह होने का मतलब है- कहीं भी न होना। अगर कोई ऐसा है जो हर जगह है, तो वो वास्तव में क्या कहीं भी है?

प्रश्नकर्ता: नहीं।

आचार्य: लेकिन तुम्हें कहीं होना पड़ता है, क्योंकि तुममें देह-भाव है।

ऋषि कह रहे हैं, “सत्य वो जिसकी कोई छोटी, सीमित, संकुचित, परिभाषित देह नहीं। फिर वो बिना हाथ-पाँव के चलता है, और बड़ी द्रुत गति से चलता है फिर वो।“

वास्तव में काव्य है यहाँ पर, जब कहा जा रहा है कि द्रुत गति से चलता है। वो द्रुत गति से नहीं चलता, फिर वो अनंत गति से चलता है, क्योंकि अब उसे चलने की ज़रूरत ही नहीं। क्यों चलने की ज़रूरत ही नहीं? क्योंकि वो मौजूद ही है हर जगह। हर जगह कैसे मौजूद है? क्योंकि अब कोई जगह नहीं बची। बहुत सारी जगहें होतीं, तो बहुत जगहों पर अलग-अलग होना पड़ता। बहुत जगहें हैं ही नहीं; जब तुम नहीं तो बहुत सारी जगहें भी नहीं।

तो ये जो हमने अपने लिए इतना बड़ा विस्तार खड़ा कर रखा है, वो विस्तार ही हमारा कष्ट है। और उस विस्तार से निपटने के लिए हम जिन चीज़ों को अपना सहायक समझते हैं, वो चीज़ें हमारी सहायक नहीं हैं, उन्हीं चीज़ों के कारण तो वो विस्तार खड़ा है। हम सोचते हैं, “ये देह हमारी हितैषी है। इस देह का ही तो इस्तेमाल करके मैं यहाँ से वहाँ पहुँचूँगा।” नहीं, ये देह हितैषी नहीं है। इस देह का इस्तेमाल करके तुम यहाँ से वहाँ नहीं पहुँचोगे, इसी देह के कारण सर्वप्रथम तुमने वहाँ से दूरी बनाई है।

हम सोचते हैं, “मन हमारा उपकरण है। मन वो माध्यम है जिसका इस्तेमाल करके मैं सच तक पहुँचूँगा।“ नहीं, मन उपकरण नहीं है, माध्यम नहीं है; मन पुल नहीं है, मन ही अड़चन है, मन के कारण ही दूरी है। जिसके कारण दूरी है, तुम उसको अगर पुल बोलो या सहायक बोलो या माध्यम बोलो तो ये बहुत सही बात तो नहीं हुई न? या हुई? कहीं खाली जगह हो, वहाँ बीच में दीवार खड़ी कर दी जाए; बिलकुल खाली जगह थी, बीच में बड़ी भारी दीवार खड़ी कर दी गई। और फिर तुमसे कहा जाए, “देखो ये जो दीवार है ये तुम्हारी मदद के लिए है, इस पर चढ़ोगे तो उस पार पहुँच जाओगे; देखो कितनी मददगार दीवार है। अगर तुम इस दीवार पर चढ़ गए तो तुम्हें बहुत बढ़िया फल मिलेगा, ये दीवार तो तुम्हारी मदद के लिए है;” मन वही दीवार है।

खाली आकाश है, रिक्त, शून्य, जहाँ कोई बाधा, कोई व्यवधान नहीं; वहाँ बीच में व्यर्थ ही मन की दीवार खड़ी है। और तुर्रा ये कि हम खुद को बताते रहते हैं कि, “ये दीवार नहीं है, पुल है, चढ़ जाओ, सब लोग चढ़ो! न होती दीवार तो उस पार कैसे पहुँचते बताओ?” क्या तर्क दिया है!

समझ में आ रही है बात?

इसी तरीके से ये बात, कि, “आँखों के बिना सत्य देखता है और कानों के बिना सुनता है।“ हम सोचते हैं कि आँखें हमें दिखा रही हैं। ऋषि जहाँ से देख रहे हैं वो कह रहे हैं, “आँखें दिखा नहीं रहीं, छुपा रही हैं।” हम बड़े प्रसन्न रहते हैं कि, “आँखें तो हमारी सहायक हैं, उनके माध्यम से हम जगत को देख पाते हैं।“ ऋषि कह रहे हैं, “आँखें सहायक नहीं है, आँखें तो सत्य को छुपा रही हैं और संसार को दिखा रही हैं। तो सहायक कैसे हो गईं? आँखें स्वयं भी सीमित हैं, और तुमको बस वही दिखाती हैं जो सीमित चीज़ें हैं; तो तुम सीमित में ही फँसकर रह जाते हो। असीम छुप गया न? बताओ आँखें दिखा रही हैं कि छुपा रही हैं?”

तो इसलिए फिर वो यहाँ पर कहते हैं कि, “सत्य या ब्रह्म वो है जो बिना आँखों के देखता है।“ वो वास्तव में हमें चुनौती देकर कह रहे हैं कि, “बेटा, शिष्य! तुम समझो कि तुम्हारा जो विश्वास है तुम्हारी देह पर, तुम्हारी इंद्रियों पर, वो झूठा है।”

उदाहरण के लिए, तुमसे कोई पूछता है, “तुम्हें कैसे पता कि ये बात सच है?” तुम आए मुझे कोई खबर सुनाने, और मैं तुमसे पूछूँ, “तुम्हें कैसे पता कि ये बात सच है?” तुम तुरंत पलटकर बोलते हो, “अरे सच है! मैंने अपनी आँखों से देखा है।” देखो तुमने क्या किया है? तुम कहते हो न, “अरे सच तो है ही, मैंने अपनी आँखों से देखा है, कानों से सुना है“? तुमने आँख और कान को सच का प्रमाण बना लिया।

ऋषि कह रहे हैं, “बचो।” तुम्हारे भीतर ये जो कूट-कूटकर आत्मविश्वास भरा हुआ है अपनी देह के प्रति, ऋषि उसको चुनौती दे रहे हैं। कह रहे हैं, “आँख दिखा नहीं रही है। तुम इतने भरोसे के साथ क्या बोलते हो कि मैंने अपनी आँखों से देखा है तो सच ही होगा। आँख क्या दिखाएगी! कान क्या सुनाएँगे! जो आँखों से देखता हो वो तो देहाभिमानी है; जो कानों से सुनता हो वो अपने-आपको शरीर के अतिरिक्त कुछ जानता ही नहीं।“

बहुत ध्यान से सुनना पड़ेगा, बहुत साथ-साथ चलना पड़ेगा। कुतर्क करना चाहोगे तो कुतर्क असंख्य हैं। तुम तुरंत कह सकते हो, “आँख से नहीं देखेंगे तो कहाँ से देखेंगे, नाक से देखेंगे क्या? और कान से नहीं सुनेंगे तो क्या करेंगे?” तो इस तरह के कुतर्क करने हों तो उपनिषद् तुम्हारे लिए नहीं हैं। ऋषि जो बात कह रहे हैं वो बहुत बारीक है, उनके लिए नहीं है जो भद्दे तर्कों की कुश्ती खेलना चाहते हों।

समझ रहे हो?

तो कान तुम तक कुछ सूचना पहुँचाते हैं, और जो सूचना तुम तक पहुँचती है तुम तत्काल उसको क्या मान लेते हो? सच। अगर सूचना को सूचना ही माना होता तो कोई दिक्कत नहीं थी, पर कान हमारे लिए बाधा और अवरोध तब बन जाते हैं जब हम उस सूचना को सच मान लेते हैं। समझना होगा हमें, कि इंद्रियगत हमें जो भी अनुभव हो रहे हैं, वो ‘हैं’; उनको अधिक-से-अधिक तुम कह सकते हो, “तथ्य हैं।“ वो सच नहीं हैं; सच कुछ और है। इंद्रियगत तो तुम्हें जो अनुभव हो रहे हैं वो द्वैत का खेल हैं एक, डुअलिस्टिक फिनॉमिना है। सच्चाई बिलकुल दूसरी चीज़ है; एकदम अलग।

समझ रहे हो?

ऋषि हमारे देहाभिमान पर चोट कर रहे हैं। जैसा कि मैंने पहले भी अन्य कई श्लोकों के प्रसंग में कहा है, कि ये न समझ लेना कि उपनिषदों की विषय-वस्तु ‘सत्य’ है; उपनिषदों की वास्तविक विषय-वस्तु ‘अहं’ है। अहं को चुनौती देना ही उपनिषदों का काम है।

और ये करतूत तो कर ही मत डालना कि तुम कल्पना करने लग जाओ किसी ऐसे ब्रह्म की, जिसके आँख नहीं है, कान नहीं है, हाथ नहीं है, पाँव नहीं है, और वो बड़ी तेज़ी से इधर-उधर जाता है, और सब देख लेता है, सब सुन लेता है। हमारी कल्पना का जवाब नहीं! कोई चित्रकार, कोई कवि, किसी भी तरह का कोई कलाकार आकर के ऐसी कहानी लिख सकता है, या चित्र बना सकता है, या गीत बना सकता है जिसमें एक किरदार ऐसा हो। और वो कह सकता है कि, “देखो श्वेताश्वतर उपनिषद् में यही कहा गया है न, कि ये रहा ब्रह्म, और बिलकुल गोल-गोल पिंड जैसा है ब्रह्म; उसके हाथ नहीं, पाँव नहीं, कोई इंद्रियाँ नहीं। और सन्न से भागता है एकदम, खट्ट से यहाँ से वहाँ पहुँच जाता है।” और तुमसे कहा जा रहा है, “देखो श्लोक में ये लिखा था: बिना हाथ-पाँव के वो तीव्र वेग से गति करता है। तो ये देखो, ये रहा मेरा ब्रह्म!” ये न समझ लेना। यहाँ विषयवस्तु ब्रह्म है ही नहीं, तो व्यर्थ में समय मत खराब करो ब्रह्म के बारे में कल्पना करके; वो उद्देश्य ही नहीं है।

ब्रह्म के बारे में नहीं कल्पना करनी है; अपने यथार्थ को देखना है। दो अंतर समझो: ब्रह्म नहीं अहं, और, कल्पना नहीं यथार्थ।

ब्रह्म विषय ही नहीं है, तुम क्या सोच रहे हो ब्रह्म के बारे में! विषय क्या है? अहं। और कल्पना माध्यम नहीं है, तुम ये क्या मन को दौड़ा रहे हो घोड़े की तरह! हमें चाहिए यथार्थ। मन के यथार्थ को जो देखेगा वो मन के झूठ को पकड़ लेगा, मन के यथार्थ को जो देखेगा वो मन के झूठ की जड़ तक पहुँच जाएगा; मन के झूठ की जड़ तक पहुँचने को ही मुक्ति कहते हैं, वही सत्य है।

समझ में आ रही है बात?

तो बहुत सावधानी चाहिए इन सुंदर और मूल्यवान श्लोकों को समझने में, नहीं तो बहुत गड़बड़ हो सकती है। अकारण ही नहीं है कि उपनिषद् शताब्दियों से उपलब्ध रहे हैं, उपस्थित रहे हैं, और उसके बाद भी लगभग पूरी जनसंख्या एक आंतरिक अंधेरे में डूबी रही, कुछ अपवादों को छोड़कर के। वो अपवाद मुट्ठी-भर हैं; शून्य दशमलव शून्य शून्य एक प्रतिशत। तो ऐसा तो नहीं था कि लोगों के मन में उपनिषदों के लिए सम्मान नहीं था, ऐसा भी नहीं था कि लोग पढ़ नहीं रहे थे। जो पढ़ नहीं रहे थे उनको किसी दूसरे तरीके से सुनाया जा रहा था, उनको संस्कृत में नहीं बताया जा सकता था तो उनको किसी और तरीके से बताया जा रहा था; कभी कहानी के माध्यम से, कभी जन-भाषा में दोहों इत्यादि के माध्यम से।

तो उपनिषदों का जो सार था वो तो लोगों तक पहुँचाया ही जा रहा था न? फिर भी फ़ायदा क्यों नहीं हुआ लोगों को? फ़ायदा इसीलिए नहीं हुआ क्योंकि मन सामने आने वाले हर विषय को विषय की तरह ही ले लेता है। विषय माने, “मैं हूँ, और वो सामने मेरे अनुभव का, मेरे भोग का विषय है, तो मैं उसकी ओर देख रहा हूँ। मैं तो हूँ ही, मैं उसकी ओर देख रहा हूँ। ये अभी उपनिषद् आए हैं, ब्रह्म की बात कर रहे हैं तो मैं ब्रह्म की ओर देख रहा हूँ।“

तो उपनिषद् मिले हमें, हमने किसके बारे में अनुमान लगाना, कल्पना करना, स्पैकुलेट करना शुरू कर दिया? ब्रह्म के बारे में। उद्देश्य सारा क्या था? स्वयं को देखो। और बैठ गए विद्वान, और चर्चा कर रहे हैं कि, “अच्छा बताओ, ब्रह्म का वाकई अगर अंगुष्ठ-बराबर आकार है तो वो शरीर में कहाँ पर होता होगा?” क्योंकि उपनिषद् ने कहा है: अंगुष्ठ-मात्र आकार है उसका। तो बैठी हुई है विद्वानों की टोली, और चल रही है गरमा-गरम चर्चा। कोई कह रहा है, “नहीं, यहाँ होता है,” कोई, “यहाँ होता है, यहाँ होता है।” (हाथ से शरीर के विभिन्न अंगों की ओर इशारा करते हुए)। यूँ ही उड़ाना ही है तो कुछ भी उड़ाओ, कुछ प्रमाणित तो किया नहीं जा सकता।

इस तरह की चर्चाओं के साथ एक बहुत बड़ी विडंबना ये होती है कि इसमें किसी भी चीज़ को प्रमाणित, प्रदर्शित नहीं किया जा सकता, कि झूठी है, थोथी है, खोखली है। फाल्सिफिकेशन (असत्यकरण) का विकल्प ही उपलब्ध नहीं होता, तो कोई कुछ भी बोल सकता है। और सदा ऐसी चर्चा से बचना जहाँ पर जो कहा जा रहा है उसको झूठा प्रमाणित न किया जा सके; क्योंकि अगर कोई ऐसा वक्तव्य दे दिया गया है जिसको गलत या सही जाँचने का कोई तरीका ही नहीं है, जिसके पीछे कोई प्रमाण ही नहीं है, तो या तो वो पूर्ण सत्य होगा, या वो पूरे तरीके से खोखली, झूठी और काल्पनिक बात होगी। अगर वो पूर्ण सत्य होता तो उसको कहना बड़ा मुश्किल होता; पूर्ण सत्य तो मुखरित हो उससे पहले मन मौन हो जाता है। तो निःसंदेह फिर कोई बहुत झूठी ही बात होगी जिसके पक्ष में या विपक्ष में कोई प्रमाण हो ही नहीं सकता।

तो ऐसी चर्चाएँ खूब चल रही हैं। और उन सारी चर्चाओं में क्या चीज़ बिलकुल अनुपस्थित है? ऐसी दृष्टि जो खुद को देखती हो। इसलिए उपनिषद् भी हम पर विफल हो गए। ऋषियों ने हमें ये अमूल्य उपहार दिए थे, हमने उनको भी अपने ऊपर विफल कर दिया। हम ब्रह्म के बारे में या सत्य या आत्मा के बारे में अनुमान न लगाने लगें, कल्पना की पतंगें न उड़ाने लगें इसके लिए कितनी मेहनत करी ऋषियों ने; कम-से-कम दो-दर्जन चार-दर्जन तरीके हैं जिसके द्वारा उन्होंने तुम्हें ये बताया, कि, “बेटा, यहाँ बुद्धि मत लगाना।“ जितने तरीकों से तुम्हें समझाया जा सकता था, कि, “तुमसे न हो पाएगा,” सब किया गया; “तुम्हारी पहुँच से, तुम्हारे पकड़ से बाहर की बात है।“

कह दिया गया, “आँखें उस तक जा नहीं सकतीं, मन उसको सोच नहीं सकता,” ठीक? “कान उसको सुन नहीं सकते; शब्दों में वो समा नहीं सकता; स्पर्श उसको किया नहीं जा सकता; टुकड़े उसके हो नहीं सकते; न वो सत् है, न वो असत् है। घर उसका होता नहीं; नाम उसका होता नहीं; उपमा उसकी होती नहीं; उपाधि उसकी होती नहीं; तुलना उसकी होती नहीं। संगी उसका नहीं, साथी उसके नहीं; पिता उसका नहीं, पुत्र उसका नहीं। न वो कल था, न वो आज है; न वो काला है, न वो गोरा है; न वो स्त्री है, न वो पुरुष है; न उसको बुलाया जा सकता है, न हटाया जा सकता है; न वो भरा हुआ है, न वो खाली है।“

इतने तरीकों से तुम्हें क्यों बोला गया ब्रह्म के बारे में? ताकि तुम ब्रह्म के बारे में कोई कल्पना न कर पाओ; ये पचासों तरीके से ये सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही थी कि तुम ये अनर्थ न कर डालो कहीं, कि, “मैंने तो ब्रह्म को सोच लिया।“ तो सोच जितने रास्तों से ब्रह्म की ओर बढ़ने की धृष्टता कर सकती थी, उन सब रास्तों पर ऋषियों ने अवरोध खड़े करे।

“उसका कोई रंग नहीं होता, और वो बेरंग भी नहीं होता। निर्गुण है वो, सब गुण उसी से हैं। क्या वो यहाँ है? है भी और नहीं भी। क्या वो है? है भी और नहीं भी।“ ये क्या पहेलियाँ बुझाई जा रही हैं? नहीं, ये बड़े प्रयत्न से और बड़े प्रेम से तुम्हारी कल्पना को अनुशासन में रखने की कोशिश की जा रही है। बात समझ रहे हो? ये बार-बार तुमको जताया जा रहा है कि, “अहं बहुत छोटा है; हालाँकि छोटा बने रहना उसकी नियति नहीं है, पर है वो बहुत छोटा। उसकी ये जो क्षुद्रता है, यही उसका कष्ट है। तो कृपा करके इस क्षुद्रता को इतनी अहमियत मत दो, कि क्षुद्रता के माध्यम से तुम अनंत तक पहुँचने का प्रयास करने लगे।“

क्षुद्र के माध्यम से तुमने कह दिया कि मैं अनंत तक पहुँच जाऊँगा, तो तुमने क्षुद्र को ही क्या बना दिया? अनंत के समतुल्य। तुमने कह दिया, “मन के माध्यम से ही मैं सत्य को सोच लूँगा,” तो तुमने मन को ही क्या बना दिया? सत्य के समतुल्य। अब मन में तो तुम्हारे ही विचार वगैरह भरे हुए हैं, अगर मन सत्य के समतुल्य हो गया, तो तुम्हारे विचार ही सत्य हो गए। अब सत्य तक पहुँचकर करोगे क्या? और सामान्यतया हम ऐसे ही तो जीते हैं; “मुझे सच पता है भाई! मुझे सच पता है।” आत्मज्ञान इसीलिए तो नहीं होने पाता न।

आत्म-ज्ञान से पहले आत्म-शंका, आत्म-जिज्ञासा चाहिए; आत्म-ज्ञान तो आखिरी चीज़ है।

सबसे पहले उठती है आत्म-शंका, फिर आत्म-जिज्ञासा, और फिर आता है आत्म-ज्ञान। और आत्म-ज्ञान के बाद क्या होता है? आत्म-समर्पण; जिसको तुम आत्म बोलते हो, वो फिर समर्पित कर दिया जाता है। तो आत्म-शंका से आत्म-समर्पण तक की यात्रा होती है। लेकिन आत्म-विश्वास अगर बहुत है तो आत्म-शंका आने ही नहीं पाएगी न भाई! आत्म-समर्पण तक की यात्रा शुरू किससे होती है? आत्म-शंका से: कुछ गड़बड़ पता तो चले जीवन में। लेकिन अगर आत्म-विश्वास से भरे हुए हो, तो आत्म-शंका ही उदित नहीं होगी।

तुममें आत्म-शंका आ सके, इसलिए ऋषि इस भाषा में बात कर रहे हैं कि बिना हाथ-पाँव के चलता है वो। अब ये पढ़कर हम ज़रा चौंके, थोड़ा काँपे, थोड़ा क्रोध भी आया, कि, “ऐसा कैसे हो सकता है?” पर भीतर-ही-भीतर हम थोड़ा डर भी गए, “कहीं ऐसा होता ही हो तो?”

बहुत आश्वस्ति तो हमें कभी अपने बारे में रहती नहीं। जब ये बात हमारे सामने आई, तो भीतर सवालिया निशान भी खड़ा हो गया, “ये क्या बात है? बिना आँख के देखता है! बिना पाँव के चलता है! बिना मन के जानता है! ये क्या बात हुई?”

वो यही चाहते थे, तुम्हारे भीतर थोड़ी कंपन उठे,मामला ज़रा हिले-डुले; तुमने धारणाओं की पूरी इमारत खड़ी कर रखी है मन के धरातल पर, ऋषि उसमें भूचाल ले आते हैं, इमारत तुम्हारी हिलने लगती है; यही वो चाहते हैं। इस इमारत को गिराना ज़रूरी है, इसमें कोई शांति नहीं।

आ रही है बात समझ में?

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