प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं असम, गुवाहाटी से आया हूँ, मेरा प्रश्न कामवासना से लेकर है। सर, मैं कामवासना से इतना ग्रस्त हूँ कि सारा दिन मुझे यही सोच आते रहते हैं कि क्या है ये और क्यों है। कामवासना के कारण मुझसे कुछ साल पहले बहुत बड़ी ग़लती हो गयी थी, जिसके कारण मैं अपनी रिश्तेदारी का लिहाज़ करना भूल गया। तब से तो मैंने सीख नहीं ली, अभी भी वही चल रहा है मेरा। लेकिन वह चीज़ जब याद आता है तो मुझे ऐसे लगता है कि कुछ क्रिमिनल हूँ मैं मेरे हिसाब से। लेकिन बदल नहीं पा रहा हूँ मैं।
आचार्य प्रशांत: अभी यहाँ पर आग लग जाए, कामवासना याद रहेगी क्या?
प्र: नहीं सर।
आचार्य: नहीं रहेगी न। अभी बारिश हुई है बहुत, बाहर टहलने निकलो, वही देखो कि एक साँप निकल पड़ा है पीछे, कामवासना याद रहेगी क्या?
प्र: नहीं सर।
आचार्य: तो आग लगी हुई है और साँप सामने खड़ा हुआ है ज़हरीला, बस दिख नहीं रहा है। दिख नहीं रहा है इसलिए फिर अपनेआप को छूट दे देते हो, मौका दे देते हो कि अभी तो समय खाली है, कुछ करने को नहीं है, कोई समस्या नहीं है, कोई ख़तरा नहीं है, चलो मौज करते हैं। ये मौज वग़ैरा सब छू-मंतर हो जाए अगर तुमको आग दिख जाए, धुआँ दिख जाए, साँप दिख जाए, काल दिख जाए। हमारा दोस्त, भैंसे वाला, वह दिखायी नहीं पड़ता न। है वह लगातार, दिखायी नहीं पड़ता। आदमी मानता है कि अभी तो हम जवान हैं, जीने के लिए अभी बहुत साल बचे हुए हैं, कोई समस्या है नहीं, चलो मटरगश्ती करते हैं।




