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वो पहला प्यार, जो कभी हुआ ही नहीं || आचार्य प्रशांत (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, आचार्य जी कई बार ऐसा होता है कि हमें अपने दोषों के बारे में पता होता है, हमें अपने दोष मालूम होते हैं, लेकिन साथी जो होता है अपना, उसमें कोई परेशानी हो, उसके दोष हमें नज़र आ रहे हैं, तो कई बार ऐसा होता है कि हमें बार-बार उसे याद दिलाना होता है। तो वहाँ क्या किया जाए? वो सही है या ग़लत है?

आचार्य प्रशांत: इरादा दूसरे की बेहतरी का होना चाहिए, दूसरे को दोष याद दिलाने में अगर उसकी बेहतरी नहीं हो रही है, बल्कि उसकी ओर से विरोध आ रहा है, चिढ़ आ रही है, तो इसका मतलब तरीक़ा बदलना पड़ेगा।

क्योंकि हम क्यों जा रहे हैं दूसरे को बताने कि 'भाई फलानी जगह आप ग़लती कर रहे हो'? इसलिए जा रहे हैं न कि वो बेहतर हो पाए, सुधर पाए। अगर उसको कोई तकलीफ़ है तो वो तकलीफ़ कम हो पाए।

लेकिन आप जाएँ उसको उसकी तकलीफ़ बताने, और उसकी ओर से विरोध आ रहा है, तो फिर आपका उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा। तो वहाँ अपना तरीक़ा बदलना पड़ेगा।

तरीक़ा बदलने के बाद भी—आप अपना भरसक प्रयास कर लें, उसके बाद भी—वो व्यक्ति अगर सुनने-समझने को राज़ी नहीं है तो फिर तो आपको अपनेआप से पूछना पड़ेगा कि उस व्यक्ति को आप ज़्यादा प्यारे हैं या अपने दोष ज़्यादा प्यारे हैं?

आप उससे कुछ कह रहे हैं, वो इंसान विरोध कर रहा है, सुन नहीं रहा या जो भी है। उसके वजह से रिश्ते में भी खिंचाव आ सकता है। वो रिश्ते में तनाव लाने के लिए तैयार है लेकिन अपने दोष छोड़ने को तैयार नहीं है, तो फिर उस व्यक्ति को प्यार किससे ज़्यादा है, रिश्ते से या अपने दोषों से?

लेकिन वो बात बिलकुल आख़िर की है। सबसे पहले तो हमें कोशिश पूरी करनी चाहिए कि जो भी लोग हमारे साथ के हैं, सम्बन्ध में हैं, दोस्त, यार, उनमें अगर कुछ दिख रहा है तो उसको स्नेहपूर्वक उनको बताएँ, ताकि वो बेहतर हो पाएँ।

दो बातें होती हैं रिश्ते में — एक ख़ुद को बचाना और दूसरा रिश्ता निभाना। और दोनों साथ-साथ चलती नहीं हैं अक्सर। अब अगर जिसके साथ आप चल रहे हैं, जिसके साथ आपको रिश्ता निभाना है, वो आपको आपकी खोट बता रहा है तो आपको चुनाव करना होता है कि 'मुझे अपनी खोट से ज़्यादा प्यार है या उस बंदे से ज़्यादा प्यार है?'

अगर आपको अपनी खोट से ज़्यादा प्यार है तो आपका जो कोई दोष बताएगा, आप उसका मुँह नोच लेंगे। फिर तो सवाल यही उठता है न कि ये रिश्ता ही कितना गहरा है?

वो इंसान कह रहा है या आप कह रही हैं कि तू मेरे लिए कम महत्व रखता है, मेरा जो अहंकार है, मेरे जो दोष हैं, मेरी पूरी जो आंतरिक व्यवस्था है वो मेरे लिए ज़्यादा महत्व रखती हैं। मैं अपने भीतर का पूरा जो तंत्र है उसको नहीं बदलने दूँगी, भले ही उससे रिश्ते में तनाव आ जाए, दरार आ जाए। तो फिर ऐसे व्यक्ति को तो रिश्ते की ही क़द्र नहीं है।

प्र: हमारी तरफ़ से ऐसा नहीं होना चाहिए न?

आचार्य: हाँ, नहीं होना चाहिए। आप अपनी ओर से जो अधिकतम कर सकती हैं, करिए।

प्र: लेकिन ये हो जाता है तो?

आचार्य: हो जाता है तो दोबारा कोशिश करिए। और कोई तरीक़ा नहीं है। क्योंकि भीतर का जो तंत्र है, वो अपनेआप को राजा मानता है। वो किसी भी दूसरी चीज़ के लिए ख़ुद को बदलने को तैयार होता नहीं है—न अपनी बेहतरी के लिए न दूसरे की बेहतरी के लिए।

तो वो तो बहुत प्रबल होता है, वो जितनी बार जीत जाए, आपको दोबारा कोशिश करनी पड़ेगी। ख़ुद से लड़ना ही सबसे ज़रूरी और मुश्किल काम है।

प्र: कई बार उसकी वजह से ग्लानि भी उठती है कि ये सब क्या है।

आचार्य: हाँ, वो सब तो इंसान होने का कर्मफल है। हम ज़िंदगी और फिर कहते किसको है? आप ज़िंदा हैं, यही सब झेलना है आपको, इसी को ज़िंदगी कहते हैं।

जो चीज़ जैसी सोची होती है, वैसी कभी चलती कहाँ है। जो चीज़ आप जानते भी हैं कि सही है, वो होती कहाँ है। दूसरे के साथ छोड़ दीजिए, अपने साथ भी कहाँ होती है।

हमें जितना दिखाई देता है, उससे बहुत ज़्यादा छुपा रहता है। जो छुपा रहता है, फिर उसका जब एक छोटा हिस्सा भी सामने आता है, तो फिर तनाव होता है, झटका लगता है, बहुत चीज़ें होती हैं।

प्र: इसमें कई बार ऐसा लगता है कि शायद हमें प्रेम नहीं है असल में उनसे।

आचार्य: नहीं होगा (हँसते हुए)।

प्र: मतलब इतना ग़लत बर्ताव हो जाता है अपनी तरफ़ से।

आचार्य: आप इतने दिनों से सब पढ़ रही हैं, सुन रही हैं, आप तो जानती हैं। प्रेम कहाँ होता है! तो इसमें चौंकने की क्या बात है कि अगर आपको दिख रहा है कि प्रेम नहीं है।

वो जो पहला प्रेम है न, हमारे पास वो नहीं होता इसलिए दूसरे, तीसरे, चौथे नहीं होते। अध्यात्म उसी पहले प्रेम को जागृत करने का नाम है। वो पहला प्रेम जग जाए तो फिर और बहुत सारी जगहों पर, लोगों से, शायद पूरी दुनिया से ही प्रेम हो जाता है।

लेकिन अगर पहला नहीं है तो एक इंसान से भी प्रेम नहीं कर सकते आप। कहने को दुनिया में सब प्रेमी हैं। जिसको देखो वही कह रहा है इसको उससे प्यार है, उसको इससे प्यार है, ये है, वो है, दोस्त हैं, यार हैं, जोड़े हैं। वो सब नाम ले रहे हैं प्रेम का। प्रेम है वहाँ थोड़े ही?

प्रेम तो बहुत विरल, रेयर (दुर्लभ) चीज़ है। होनी नहीं चाहिए, पर है रेयर । "पहला प्रेम, पहला नशा, पहला खुमार।"

जो नक़ली वाला होता है वो आता है उम्र के पहले पच्चीस सालों में, जो असली वाला है वो अगर उम्र के आख़िरी पच्चीस सालों में भी मिल जाए तो बड़ी बात है। और जिनको मिलता है आम तौर पर आख़िर में जाकर ही मिलता है, क्योंकि शुरू में तो वो नक़ली वाला धूम मचाए रहता है।

आप दूसरे, तीसरे, चौथे की परवाह छोड़िए, वो अपनेआप ठीक हो जाएँगे। वो पेड़ के पत्तों जैसे हैं। आप पहले की परवाह करिए। किसी पौधे को आप अच्छा खाद-पानी दे रहे हैं तो आपको पत्तों की परवाह करनी पड़ती है क्या? तो ये जो प्रेम होता है न, बेटे से प्रेम, माँ से प्रेम, बाप से प्रेम, पत्नी से, पति से, दोस्तों से, यारों से — ये सब पत्तियाँ हैं। इनकी जड़ है 'वो पहला प्यार,' उसको सींचिए। वो आ गया तो बाक़ी सब पत्तियाँ हरी हो जाएँगी।

हमारा पहले वाला ठीक होता नहीं है। अब पहला ठीक नहीं है और पत्तियों पर स्प्रे (फुहार) मार रहे हैं, कुछ होगा उससे? थोड़ा-बहुत कुछ हो भी सकता है—बस थोड़ा बहुत। मज़ा नहीं आएगा।

“एक साधे सब सधे”, वो एक है, उसको साध लो, बाक़ी जितने प्रेम हैं आपके सब सध जाएँगे। और बाकियों पर ध्यान दोगे, "सब साधे सब जाए।" बाकियों पर ध्यान दोगे उस एक को छोड़ करके तो कुछ नहीं पाओगे।

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