इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः।।
देवता यज्ञ से सेवित होकर और उन्नति को प्राप्त होकर तुम्हें अभीष्ट भोग्य वस्तु देंगे। जो देवताओं को दिया जाना चाहिए, वो देवताओं को न देकर जो ख़ुद ही उसका भोग कर लेता है, वह निश्चित रूप से चोर ही है, अर्जुन।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, श्लोक १२
आचार्य प्रशांत: 'देवता यज्ञ से सेवित होकर और उन्नति को प्राप्त होकर तुम्हें अभीष्ट भोग्य वस्तु देंगे।‘ देवता को जब तुम पोषित करोगे, महत्व दोगे, तो वो तुमको वो सबकुछ दे देगा जो जीवन में वास्तव में पाने लायक है; उसी को आनंद कहते हैं, उसी को रस कहते हैं, उसी को मुक्ति कहते हैं।
‘जो देवताओं को दिया जाना चाहिए, वो देवताओं को न देकर जो ख़ुद ही उसका भोग कर लेता है, वह निश्चित रूप से चोर ही है अर्जुन।‘ ‘जो वस्तु यज्ञ में अर्पित कर देनी चाहिए थी, उसको तुमने देवता को नहीं दिया, ख़ुद ही उसको खा गए, तो अर्जुन, ऐसा व्यक्ति चोर ही है।‘
ख़ुद ही खा गए माने किसको खिला दिया? भीतर के दानव को खिला दिया। आप जो भी भोग करते हो अपने लिए, आप कहते हो, ‘ये मेरे अपने लिए कन्ज़म्पशन है', वो वास्तव में आप थोड़े ही खा रहे हो, वो आपके भीतर का दानव खा रहा है। जो कुछ वास्तव में देवता का अधिकार था, मिलना चाहिए था देवता को, लेकिन देवता को देने की जगह उसको आपने ही खा-पीकर उड़ा दिया, वो आपने दानव को खिला दिया। और जो ऐसा कर रहा है, कृष्ण सीधे उसको कह रहे हैं कि वह चोर ही है – ‘स्तेन', चोर।




