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उठा लेंगे खतरे, नहीं चाहिए सहारे || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
21 min
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। बचपन में लगता था कि ख़ुद में कोई कमी नहीं है, कोई अपूर्णता नहीं है। फिर धीरे-धीरे समाज ने सिखा दिया कि हम अधूरे हैं, अपूर्ण हैं और अभी बहुत कुछ हासिल करना है। मैं जीवन भर अपने को अपूर्ण, अधूरा मानकर संघर्ष करता रहा। अब मैं फिर से वो बचपन जैसी पूर्णता दोबारा हासिल करना चाहता हूँ, मैं चाहता हूँ कि स्वयं में पूर्ण रहूँ और मुझे किसी पर आश्रित न रहना पड़े। धन्यवाद आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: जो बच्चे की पूर्णता है वो नकली होती है। ये कहना कि बच्चा अपूर्ण नहीं है, लगभग वैसा ही है जैसे कोई कहे कि छोटा बच्चा पैदा हुआ है, उसके दाँत नहीं हैं। एकदम अभी पैदा हुआ है, पन्द्रह दिन का है, उसके दाँत नहीं हैं, या पाँच साल का बच्चा है, उसमें कामवासना नहीं है।

छोटा भी बच्चा है, क्या उसके दाँत नहीं होते? होते हैं, छुपे होते हैं, मसूढ़ों के अन्दर होते हैं अभी। तो बच्चे में भी अपूर्णता होती है पर छुपी होती है। जो चीज़ है पर छुपी हुई है, उसको वृत्ति बोलते हैं; है तो, पर छुपी हुई है, आएगी सामने, क्योंकि प्रकट होने की उसमें टेंडेंसी (प्रवृत्ति) तो है ही। वैसे ही पाँच साल वाला है, क्या उसमें कामवासना नहीं है? है, छुपी हुई है, और अगर आप मनोवैज्ञानिकों के पास जाएँगे, तो कहेंगे, ‘इतनी छुपी हुई भी नहीं है।’ अगर आप उसके व्यवहार का बहुत बारीकी से आकलन करेंगे तो पता चलेगा कि है, उसके व्यवहार में भी है, प्रच्छन्न है।

तो बच्चे में भी अपूर्णता होती है, या कम-से-कम अपूर्ण हो जाने की वृत्ति होती है, और इसका प्रमाण ये है कि समाज उसे रज़ामंद कर पाता है ये मानने के लिए कि तू अपूर्ण है।

देखिए, पूर्ण को अपूर्ण नहीं बनाया जा सकता। बच्चा पूर्ण होता तो समाज, शिक्षा, परिवार, ये सब मिलकर भी, पूरी कोशिश करके भी उसको कभी नहीं जता पाते कि तू अपूर्ण है। तो बच्चे में अपूर्णता की वृत्ति तो जन्म से ही विद्यमान होती है, बस वो वृत्ति सामने नहीं आ रही होती है। फिर जितनी भी हमारी व्यवस्थाएँ हैं और हमारी पूरी प्रणालियाँ हैं, जो हमारे सब चक्कर हैं, वो उसकी उसी वृत्ति का इस्तेमाल करके उसे कुछ जता देते हैं। और उसे मानना पड़ेगा, उसे मानना पड़ता है।

फिर प्रश्न आता है, अब उसने मान लिया, ‘मैं अपूर्ण हूँ, अब मैं क्या करूँ?’ बहुत तरीक़े से हम उसको जताते हैं कि तू अपूर्ण है, माँ-बाप यहाँ तक बोल देते हैं कि बेटा, प्यार तुम्हें तभी करेंगे जब तुम्हारे इतने परसेंट (प्रतिशत) नम्बर (अंक) आएँगे। और छोटी सी बात — ‘तुमको मेडल तभी मिलेगा जब तुम पहले, दूसरे या तीसरे स्थान पर होगे।‘ ये तो हर जगह होता है न? तो आपने क्या करा है? आपने एक शर्त आरोपित कर दी है उसकी हस्ती पर।

आप कह रहे हो, ‘तू प्रेम का अधिकारी तभी है जब तू इस शर्त को पूरा करेगा, तू सम्मान का अधिकारी तभी है जब तू इस शर्त को पूरा करेगा।’ वो इस बात को फिर आत्मसात् करता है, वो अपने अस्तित्व के ऊपर भी शर्त लगा देता है। वो कहता है, ‘कुछ शर्तें तो पूरी होनी ही चाहिए, नहीं तो ज़िन्दगी बेकार है।’ और ये सिखाया आपने है, और वृत्ति देह ने दी है। ये वृत्ति उसको देह ने दी है, सिखाया परिवार, समाज, शिक्षा, मीडिया, इन्होंने मिलकर के है — ‘कुछ शर्तें लगाओ नहीं तो ज़िन्दगी बेकार है, एकदम बेकार है, कुछ नहीं हो जाता।‘

अब प्रश्न ये है कि फिर ये शर्तें हटाएँ कैसे, कैसे कहें कि मैं बेशर्त आत्मा हूँ?

आत्मा माने क्या? वो जिसको किसी सुधार की ज़रूरत नहीं, वो जिसको किसी बैसाखी की ज़रूरत नहीं, सम्बल की ज़रूरत नहीं। न सुधार चाहिए, न सहारा, उसको बोलते हैं ‘आत्मा’। लेकिन ये बात ऐसी नहीं है कि रट ली, दोहरा दी तो हो जाएगा। ये बात जीवन में दिखायी देनी चाहिए, तब है। जीवन में दिखायी नहीं दे रही है और बस मौखिक है, और कह रहे हो, ‘अरे! मुझे सुधरना नहीं है,’ तो और ख़तरनाक हो जाएगी ये बात। जीवन ऐसा है कि आपको सचमुच सहारे की ज़रूरत है अभी, और आप कह रहे हो कि नहीं, सहारा नहीं चाहिए, तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी, लड़खड़ाकर गिरोगे।

तो ये कैसे हम करें कि जीवन के ऊपर जो हमने शर्तें लगा दी हैं वो हटें? देखिए, उन शर्तों को जायज़ ठहराने का हमारे पास एक तर्क होता है, तर्क ये होता है — ‘अगर वो शर्त पूरी नहीं हुई तो हाय राम मेरा क्या होगा?’ ये तर्क है हमारा। ‘अगर वो शर्त पूरी नहीं हुई तो बर्बाद हो जाऊँगा’ — यही तर्क है। ये तर्क एक कहानी है, तभी तो इसको मान्यता बोला जाता है न? अपूर्णता एक मान्यता है, तथ्य नहीं है। मान्यता माने जो आपने कहानी मान ली है, उसको मान्यता बोलते हैं। कहानी है, आपने स्थान उसको सत्य का दे दिया है, उसको मान्यता बोलते हैं।

कैसे अन्तर करें कहानी में और सत्य में? बहुत आसान है — जाँच लो, प्रयोग कर लो, ठोंको, बजाओ, परीक्षण कर लो। कहानी जो कुछ बोल रही है, देख लो न कि सच है कि नहीं, जीवन ही तो प्रयोगशाला है। आपने अपने ऊपर एक बात कह दी है कि अगर ऐसा हो गया तो हाय राम, मर जाऊँगा। मैं कहा करता हूँ — ‘वैसा हो ही जाने दो, देखते हैं।‘

‘अरे! क्या बोल रहे हैं आप? मैं कह रहा हूँ मैं मर जाऊँगा, आप कह रहे हैं हो जाने दो। मारना चाहते हैं?’

‘अच्छा ठीक, ठीक। समझ गये, आपकी बात समझ गये। ऐसा करिए, प्रयोग।‘

प्रयोग का क्या मतलब होता है? अरे एक क़दम तो बढ़ाकर देख लो!

‘पानी नहीं है, तेज़ाब है, बोल रहे हो कूद जाओ।’

सामने भरा हुआ है पानी, तरणताल है बढ़िया, मस्त, साफ़ भरवाया है। और मालिक हमारे क्या फ़रमा रहे हैं? ‘ये तो तेज़ाब है, एकदम इसी में घोलकर मार देना चाहते हो। बोल रहे हो कूद जाओ।’

मैं बोला, ‘ठीक, समझ में आयी बात। आप एक प्रयोग तो कर लो!’

‘क्या प्रयोग है?’

‘अरे एक तिनका डालकर देख लो, थोड़ा साहस बढ़ेगा। और तिनके के बाद थोड़ा उसमें नाखून डालकर देख लो, गलेगा भी तो नाखून गलेगा, नाखून आ जाता है दोबारा। नाखून के बाद छोटी उँगली डालकर देख लो। छोटी उँगली के बाद थोड़ा हाथ आगे बढ़ा लो, पाँव डाल लो। और जब लगे कि ठीक है, तो..।‘ पर शर्त को जाँचो तो, मान्यता को चुनौती तो दो! तुम तो बिना जाँचे-परखे, प्रयोग, परीक्षण करे कह देते हो, ‘तेज़ाब भरा हुआ है, घोलकर मारना चाहते हैं। हड्डी भी नहीं बचेगी, सब गल जाएगा।’

आपने अपनी हस्ती के ऊपर जो शर्तें लगायी हुई हैं, प्रयोग करा करिए न भाई! और उन प्रयोगों का तरीक़ा है — अपनेआप को अपने सुरक्षित अनुभवों से आगे, अलग, इतर अनुभव देना — सिर्फ़ जाँचने के लिए, जस्ट फ़ॉर द सेक ऑफ़ इट (बस इसके लिए)। देखो न करके!

कोई बात है, मानकर बैठ गये हो — ‘ये न, वो सड़क के उस तरफ़ जो लोग रहते हैं वो लोग ही बड़े बेकार हैं, उधर जाना नहीं।’ और उधर नहीं जाना है तो इसके लिए सड़क पर ही डंडा गाड़ दिया है, बैरियर (अवरोध) लगा दिया, बोल रहे हैं, ‘अब उधर जाना ही नहीं है।’ मैं कह रहा हूँ — ‘एक बार को वो जो तुमने अवरोध खड़ा करा है उसको हटाओ, थोड़ा टहलकर के आओ, देखकर के तो आओ कि जिनको तुमने ऐसा घोषित कर दिया है वो सचमुच कैसे हैं, मान्यता को सत्य मत बनाओ!’

चार किलोमीटर दूर है अपना दुकान, कारोबार, जो भी है, कार्यालय। बढ़िया गाड़ी आती है, उसमें ड्राइवर रहता है, उसी से जाते हैं, और शर्त रख दी है कि ऐसा होगा तो ही जाएँगे। एकाध-दो दिन के लिए गाड़ी छोड़ दो और ड्राइवर को छुट्टी दे दो। देखो कि क्या ऐसा है कि पैदल चल ही नहीं सकते। देखो कि क्या सचमुच ऐसा है कि पैदल चले आओगे तो कोई रास्ते में मार ही देगा, या थकान से ही गिर जाओगे, चूर, चार किलोमीटर में। प्रयोग तो करो!

ईमानदार प्रयोग होना चाहिए। प्रयोग में एक हम बेईमानी ये कर देते हैं कि प्रयोग करते ही इस तरीक़े से हैं कि प्रयोग असफल हो जाए। अब मैं चार किलोमीटर का बोल रहा हूँ, इन्होंने चालीस किलोमीटर का कर दिया, और गिर गये उसमें, और फिर क्या बोले? ‘मैं तो पहले ही कहता था हो नहीं सकता।’ आप कह नहीं रहे थे, आप चाह रहे थे कि न हो सके, नहीं तो आप चालीस किलोमीटर से शुरुआत नहीं करते न! आप कई बार जब चाहते हो कि प्रयोग असफल हो, तो असफल हो भी जाता है।

कोई आकर आपको बोल रहा है कि देखो, दाल में नमक कम है, थोड़ा डालो और। आप दाल पका रहे हैं, कोई आकर कह रहा है, ‘दाल में नमक कम है, थोड़ा और डालो,‘ और आपकी मान्यता है कि दाल में नमक ठीक है। अब सच्चाई ये है कि दाल में सचमुच थोड़ा सा नमक अभी कम है, और वो व्यक्ति बार-बार आपसे आग्रह करे ही जा रहा है कि दाल में नमक कम है, अरे डालो। तो आप कहते हैं, ‘अच्छा, कम है तो ले!’ (हाथ से ज़ोर-ज़ोर से नमक डालने का इशारा करते हुए)। और फिर कहते हैं, ‘ले, देख अब कैसा है!’

तो बोलेगा, ‘ज़्यादा हो गया।’

‘यही तो मैं तब से कह रहा था कि नमक ठीक है, और डालेंगे तो ज़्यादा हो जाएगा।’

ये प्रयोग नहीं है, ये धाँधली है। और ज़्यादातर हमारे प्रयोग ऐसे ही होते हैं, वो प्रयोग करा ही इसीलिए जाता है ताकि आपकी मान्यता न टूटे। ईमानदार प्रयोग करिए, किसी भी आग्रह से मुक्त होकर प्रयोग करिए। जो कुछ भी आपने अपनेआप को बता रखा है, न ये कहिए कि सही है, न ये कहिए कि ग़लत है, परखिए तो! नहीं तो कैसे पता चलेगा फ़ैक्ट (तथ्य) और फ़िक्शन (कल्पना) का! बहुत सारी बातें सिर्फ़ इसलिए सच हो जाती हैं क्योंकि कभी परखी ही नहीं गयीं।

भाव भीतर लगातार यही होना चाहिए — ‘मैं ठीक हूँ, पर मेरे अलावा किसी चीज़ के ठीक होने की कोई आश्वस्ति नहीं है।‘ ‘आत्मा सत्य है’, इतना ही कहना पर्याप्त नहीं होता। मात्र आत्मा ही सत्य है भाई, बाक़ी प्रकृति है, उसमें कुछ भी ऊपर-नीचे चलता रहता है, उसका काम है बदलना। तो मैं सत्य हूँ, मान्यता थोड़े ही सत्य है! और ये बिलकुल हो सकता है कि मैं सत्य हूँ लेकिन मेरी मान्यता एकदम उल्टी-पुल्टी हो, तो मान्यताओं को तो परखूँगा न? जीवन में लगातार ये विनम्रता होनी चाहिए।

वेदान्ती ऐसा नहीं है कि वो अक्खड़ हो जाता है और कहता है, ‘जी हाँ, हम तो पूर्ण हैं, बहादुर हैं, और हमारा कुछ हो नहीं सकता।’ वो कहता है, ‘देखो, मेरा जो कुछ है वो ग़लत हो सकता है। मैंने आपको जो जवाब दिया वो ग़लत हो सकता है। मैंने कोई काम कर दिया वो ग़लत हो सकता है। हर चीज़ में मैं मानने को तैयार हूँ कि ऊँच-नीच हो सकती है, हर चीज़ में मानने को तैयार हूँ। बस एक चीज़ है जिसमें हम किसी तरह का दाग-धब्बा नहीं लगने देते — हमारा केन्द्र, हमारी हस्ती।‘

‘आप बोलोगे कि मैंने काम बेवकूफ़ी का करा, मैं मान लूँगा। आप बोलोगे कि मैं बेवकूफ़ हूँ — ये नहीं मानता।‘ बड़ी विनम्रता है। आप बोलोगे, ‘तूने सौ काम बेवकूफ़ी के करे हैं।‘ मैं कहूँगा, ‘ज़रूर किये होंगे। आप सौ कह रहे हो, मुझे तो लगता है मैंने दो सौ ऐसे काम करे हैं जो बड़ी मूर्खता के थे, मैं पूरी विनम्रता के साथ कह रहा हूँ। लेकिन मैं अपने कर्मों की बेवकूफ़ी को अपनी हस्ती की बेवकूफ़ी नहीं बनने दूँगा।‘ ये एक चीज़ है जो वेदान्ती स्वीकार नहीं करता, उसमें विनम्रता और अक्खड़ता एकसाथ होते हैं, उसमें समर्पण और विद्रोह एकसाथ होते हैं।

समझ में आ रही है बात?

तो मान्यता तो ग़लत हो ही सकती है न? तो मेरा नज़रिया हमेशा खोजी का रहेगा, मैं तो देख रहा हूँ कहाँ पर गड़बड़ हो गयी है। और गड़बड़ कहीं भी हो सकती है, सिर्फ़ एक जगह है जहाँ गड़बड़ नहीं हो सकती, बाक़ी हर जगह मैं मानकर चलूँगा कि गड़बड़ सम्भावित है। क्योंकि अगर मैं कह दूँ, ‘आत्मा में भी गड़बड़ नहीं होती और मान्यता में भी गड़बड़ नहीं होती और फ़लानी जगह में भी गड़बड़ नहीं होती,’ तो ये तो आत्मा का अपमान हो गया न।

अगर आत्मा सचमुच असंग है और अतुल्य है, तो इसका मतलब जो आत्मा में है वो बात कहीं और नहीं मिल सकती। तो अगर पूर्णता आत्मा में है तो पूर्णता को कहीं और नहीं होना चाहिए। तो बाक़ी हर जगह तो गड़बड़ हो सकती है, क्यों नहीं मानूँगा? बिलकुल हो सकती है, एकदम मानता हूँ। और हर चीज़ को लेकर परखूँगा, और वो चीज़ अगर उल्टी-पुल्टी निकलेगी तो मुझे न लाज है, न शर्म है, न डर है, मैं तो मान लूँगा — ‘हाँ, ये तो चीज़ ग़लत निकल गयी। हाँ भाई, ये बात तो ग़लत निकल गयी।’

आप ग़लत को ग़लत तब नहीं मानते हो जब ग़लत को ग़लत करने से आप ग़लत साबित हो रहे होते हो, नहीं तो ग़लत को ग़लत मानने में कोई काहे को डरेगा! आपने कुछ ग़लत कर दिया, अगर जो ग़लत कर दिया सिर्फ़ वही ग़लत साबित हो रहा हो तो आप मान लोगे। लेकिन हमारी कहीं ग़लती पकड़ी जाती है तो देखा है चेहरा कैसे लाल हो जाता है? क्यों? क्योंकि हमने ये तुक बैठा रखा होता है कि अगर काम ग़लत निकल गया तो हमारी हस्ती ही ग़लत हो जाएगी।

नहीं, काम ग़लत निकला है, मैं तो जल्दी से मानूँगा, काम ग़लत निकला है, मैं तो धन्यवाद दूँगा कि आपने मेरी ग़लती ढूँढकर निकाल दी। ‘निंदक नियरे राखिए..।’ मैं तो — ‘हाँ, बताइए, और बताइए, और ग़लतियाँ बताइए।‘

समझ में आ रही है बात?

प्रयोग, प्रयोग, प्रयोग। परखिए, परखिए। जो भी आप मानकर चल रहे हो, वो सत्य तो नहीं है। हाँ, कुछ हो सकता है जो सत्य की दिशा में है, कुछ हो सकता है जो सत्य से एकदम ही उल्टा है, लेकिन सत्य तो नहीं है। तो हर चीज़ में सुधार की सदा सम्भावना रहेगी न? तो जो भी बात है उसको और विचार से देखना, उसको और ज़्यादा विरक्ति से देखना, ताकि पूर्वाग्रह-मुक्त होकर के उसकी सच्चाई सामने आये। यही है।

बार-बार सन्त बोलते थे न, वही कि छाती में बाँधकर मरोगे क्या, या ‘वो धन संचिए, जो आगे को होय।’ उनका आशय क्या था? वो कहते थे कि तुम्हारी हस्ती में जान इतनी होनी चाहिए कि तुम्हारे पास जो कुछ है सब छिन जाए, तुम सड़क पर नंगे खड़े हो जाओ, तब भी तुम्हारा आत्मगौरव, आत्मसम्मान एकदम भी कम न हो, ये तुम्हारी हस्ती की जान है।

और अगर तुम आदमी ऐसे हो कि तुम्हारा पैसा छिन गया, तुम्हारी इज़्ज़त छिन गयी तो तुम कहीं के नहीं बचे, तो तुम तो कुछ थे ही नहीं फिर, जो कुछ था वो पैसा था और इज़्ज़त थी। तुम कौन हो? तुम तो इतनी छोटी चीज़ हो गये कि पैसा ही तुमसे बड़ा हो गया, तुम तो इतनी छोटी चीज़ हो गये कि इज़्ज़त तुमसे बड़ी हो गयी। और इज़्ज़त और पैसा आये हैं बाहर से, तो माने तुम बाहर की दुनिया के सामने एकदम छोटी चीज़ हो गये।

आदमी वो चाहिए जिसका सबकुछ लुट गया हो तो भी उसके गौरव पर ज़रा भी दाग न आये। हाथ में अब कुछ नहीं है, पहले हाथ में हो सकता है बहुत कुछ रहा हो — ये है, वो है, पचास चीज़ें होती हैं दुनिया की, हाथ में आ जाती हैं — अब कुछ भी नहीं है, एकदम कुछ नहीं है, तो भी हम हैं न, हम? हमारा कुछ नहीं है, तो भी हम हैं न?

ये जो ‘हम’ होने की बात है, ये बहुत आवश्यक है। ऐसा ‘हम’— ‘हम’ माने ‘अहम्’— ऐसा ‘हम’ जो बिना किसी सहारे के चल सके, उसको ही तो कहते हैं आत्मा। और ऐसा ‘हम’ जो ‘हमारा, हमारा’ बार-बार बोले, वही कहलाता है साधारण अहंकार। साधारण अहंकार क्या है? जिसको सदा कोई विषय चाहिए। इससे चिपके — ‘हमारा, हमारा, हमारा, ये हमारा, ये हमारा, ये हमारा’ — तब तो हमारी हस्ती ठीक है। और हमारा नहीं है अगर कुछ, तो हम क्या करेंगे? ‘हाय-हाय! बर्बाद हो गये, कुछ नहीं बचा।‘

हमारा कुछ नहीं है, तो भी हम हैं न? और जब आप ऐसे हो जाते हो, तो हमने जो आज बात करी स्वस्थ सम्बन्ध की, कि भीतर से जो पूर्ण होता है, जगत में उसके स्वस्थ सम्बन्ध बनते हैं। स्वस्थ सम्बन्ध ऐसे ही दो लोगों में बन सकते हैं जो ‘हम’ को देखें, ‘हमारे’ को नहीं देखें। आपके भी जीवन में जो कुछ भी है — चाहे जड़ पदार्थ और चाहे चैतन्य मनुष्य — देखिए कि वो आपके ‘हम’ को देखता है या ‘हमारे’ को देखता है, वो ये देखता है कि आप कौन हैं या ये देखता है कि आपके पास क्या है। और आपको भी यही देखना है, और वो हो जाता है स्वतः।

देखिए, जब आप पूर्ण होते हैं तो आपको कोई ज़रूरत नहीं बचती न कि किसी दूसरे व्यक्ति के पास क्या है इस पर नज़र रखें। ‘मुझे क्या करना है कि तेरे पास क्या है, जो कुछ भी होना चाहिए वो तो मेरे पास पहले से ही है! तो अब मुझे इस बात की कोई फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है कि तेरे पास क्या है, अब तो मैं बस इस बात को देखता हूँ कि तू क्या है।‘

और बहुत, बहुत ग़रीब है वो आदमी जिसके पास जो कुछ है अगर वो हटा दो तो वो आदमी खाली हो जाए। आदमी ऐसा चाहिए जिसके पास जो कुछ है सब हटा दो, सब छीन लो, तो भी वो आदमी शेष रहे — ‘हम तो पूरे-के-पूरे ही हैं।‘

सहारों के बिना चलने का जहाँ भी मौक़ा मिले, वहाँ आप प्रयोग करिए, वहाँ अभ्यास करिए। मान लीजिए आप कहीं पर जाते हैं और वहाँ पर आप पहले से ही जो आपकी प्रसिद्धि है वो लेकर जाते हैं। आप किन्हीं लोगों से बात करने गये और वहाँ पहले ही आपने सूचित कर दिया कि जितेन्द्र जी आ रहे हैं और वो बहुत बड़े आदमी हैं, बड़े ज्ञानी हैं और ऐसे हैं। तो अब वो आपको नहीं सुन रहे, वो आपकी प्रसिद्धि को सुन रहे हैं न?

तो बीच-बीच में प्रयोग करिए, कहिए कि मैं वहाँ पर जाऊँगा अनाम होकर के, एनोनिमस (गुमनाम रूप से), फिर देखते हैं मेरी हस्ती में कितना दम है। अब वो नहीं जानते कि मेरा नाम क्या है, अब वो जानेंगे कि मैं कौन हूँ। अब प्रयोग हो जाएगा न कि आपमें कितना दम है? नहीं तो पहले आप थोड़े ही बोलते थे, आपकी यश, आपकी प्रसिद्धि, कीर्ति, ये सब आपका बोलते थे।

बीच-बीच में अपने जो कुछ भी सहारे बन गये हैं सांयोगिक, उनको ज़बरदस्ती भी हटा देना चाहिए, ज़बरदस्ती — ‘नहीं, हटाओ।‘ छोटी-छोटी, एकदम ही बहुत, बहुत मामूली बात। आदत लग गयी है कि हम तो अफसर हैं तो गाड़ी तो ड्राइवर ही चलाएगा, हटाइए आज — ‘ड्राइवर तुम हटो, मैं जाऊँगा।‘

अगर आप ऐसे हैं कि आप गाड़ी पार्किंग में अब ख़ुद नहीं लगा पाते, तो कौनसी आत्मा हैं आप! कहता है, ‘मालिक इसी में हिल गये कि आज गाड़ी ख़ुद पार्किंग में लगानी पड़ी, एकदम दहल गये भीतर से।‘ अब ये क्या जिएँगे! ये गाड़ी पार्किंग में लाने में दहल गये क्योंकि अब पन्द्रह साल हो गये थे, ड्राइवर ही ये काम करा करता था। और ये बहुत मामूली बात है, एकदम छोटी बात।

और बड़े प्रयोग फिर वो होते हैं जो वाल्मीकि ने करे थे, कि बड़ी मान्यता है कि पत्नी तो मेरी मेरे साथ ही चलेगी, तो जाकर के उससे पूछ लिया — ‘तेरी ख़ातिर सब चोरी-चकारी, पाप करता हूँ, अब नर्क जा रहा हूँ, चलेगी?’ एकदम लाल-लाल ऑंख करके पूछा होगा, नहीं तो झूठ तो वो ज़रूर बोलती, न जाने कैसे उसके मुँह से सच टपक गया। बोली, ‘ये तो जगह ऐसी है कि परमेश्वर, अकेले ही जाना आप। बाक़ी सब जो भी माल-वाल है लूट का वो यहाँ छोड़ दो हमारे लिए।’

समझ में आ रही है बात ये?

वैसे ही बृहदारण्यक उपनिषद् है, उसमें याज्ञवल्क्य हैं, उनकी दो पत्नियाँ हैं — मैत्रेयी और कात्यायनी। तो कात्यायनी छोटी है और उसका बड़ा मन इसी में लगा रहता है — दुनिया भर की चीजें हैं, ये, वो, पचास, यहाँ ये मिल जाए, वहाँ वो। और मैत्रेयी है, वो याज्ञवल्क्य के पास आकर के, ‘बताओ ज्ञान क्या है तुम्हारा,’ ये सब करती रहती है।

तो याज्ञवल्क्य का ये सब चलता है। वो दो पत्नियाँ हैं, जब दो हो जाएँ पत्नियाँ तो वैराग्य पक्का है। वो बोलते हैं, ‘मैं सब छोड़-छाड़कर जा रहा हूँ, मेरा तुम लोगों से कोई लेना-देना नहीं है, अब मैं जा रहा हूँ। लेकिन हाँ, अब मैं जा रहा हूँ तो बताओ तुम्हारे लिए क्या प्रबन्ध करके जाऊँ?’ तो वो खट से बोलती है छुटकी, सबसे पहले — असल में मैत्रेयी बोलती हैं, वो बोलती हैं कि छोटी का हक़ पहले आता है, वो छोटी है न, तो तू माँग ले, तुझे क्या चाहिए।

वो बोलती है, ‘तुम्हारे पास जितनी गायें हैं, ये हज़ार गायें दे दो, और जो भी तुम्हारा इकट्ठा करे हो आश्रम में, सब हमारे लिए देकर जाओ।‘ तो अब उसने माँग लिया तो दे देते हैं, तो उन्हें चिन्ता भी होती है कि ये बड़ी वाली क्या करेगी। तो बड़ी वाली बोलती है, ‘कुछ तो तुम्हारे पास ऐसा है जिसके लिए तुम वो सब छोड़ रहे हो जो अभी तुम्हारे पास है। मुझे वो देकर जाओ।’ बोली, ‘ये सब छोड़ रहे हो, इसका मतलब कुछ और है तुम्हारे पास, कुछ और न होता तो तुम ये सब न छोड़ पाते। वो जो है तुम्हारे पास, तुम मुझे वो देकर जाओ।’

अब ये फँस गये, बोले, ‘ये तूने क्या माँग लिया?’ फिर उसी पर उपनिषद् आगे बढ़ता है पूरा।

प्रयोग करने चाहिए — ‘बता तुझे क्या चाहिए, मैं जा रहा हूँ।’ देखो क्या माँगती है, कात्यायनी है वो या मैत्रेयी है। मतलब दोस्तों के साथ, कहीं भी, हर जगह ये सब बातें करनी चाहिए। और मैं आपको अभी से बताए देता हूँ — परिणाम अपेक्षित नहीं आएँगे, क्योंकि मान्यता तो होती ही झूठ है न। मान्यता तो चीज़ ही झूठी है, तो वो कभी आपको अपेक्षित परिणाम नहीं देगी।

करिए प्रयोग!

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