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उनसे प्यार करने की हिम्मत है तुममें?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मेरा प्रश्न वृत्तियों के ऊपर है। गौतम बुद्ध कहते हैं कि वृत्तियों को बिना राग और द्वेष जगाए होशपूर्वक देखने मात्र से वृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। परंतु मैं कितना भी प्रयास कर लूँ तब भी राग और द्वेष से निर्लिप्त नहीं हो पाता। इसका कारण खोजता हूँ तो पता हूँ कि इनसे जो मज़ा मिलता है, प्लेज़र मिलता है उन्हीं के पीछे ज़्यादा खिंचाव रहता है। ऊपर-ऊपर से तो मैं गौतम बुद्ध से प्रेम की बात करता हूँ लेकिन गहराई में मैं प्लेज़र को ज़्यादा महत्व दे रहा हूँ। मैं ऐसा क्या करूँ कि बुद्ध के प्रति मेरा प्रेम गहरा हो जाए?

आचार्य प्रशांत: ज़बरदस्ती नहीं किया जाता प्रेम। प्रेम की शुरुआत हमेशा कष्ट और तड़प से होती है। वो नहीं है तो प्रेम हो ही नहीं सकता। अब तुम पूछो कि गौतम बुद्ध से प्रेम कैसे करूँ? क्यों करना है प्रेम? कोई नियम है? कोई अनिवार्यता है क्या कि गौतम बुद्ध से प्रेम करना ही करना है? मत करो भैया!

ये प्रश्न ही क्यों है कि गौतम बुद्ध से प्रेम करना है? कोई कारण बताओ न? कारण हमेशा एक ही होता है- अपनी परेशानी। मैं दुःख में हूँ और देखता हूँ किसी बुद्ध की तरफ तो आस बंधती है कि दुःख से मुक्ति संभव है।

तो वास्तव में आप जब किसी बुद्ध की ओर आकर्षित होते हैं तो आप अपनी मुक्ति की ओर, अपने दुःख से मुक्ति की ओर आकर्षित होते हैं। उस आकर्षण के लिए, उस प्रेम के लिए सर्वप्रथम क्या चाहिए? अपने दुःख का एहसास। अपनी तड़प के प्रति संवेदना। वो होगी तो खुद खिंचोगे बुद्ध की ओर।

आग तो वो ऐसी ही होती है न? जो लगाए न लगे और जो बुझाए न बुझे। अब तुम पूछ रहे हो कैसे लगाएँ? उसका कोई फॉर्मूला नहीं होता और लग गई हो तो बुझाने का नहीं होता। आ रही है बात समझ में?

किसी भी ज्ञानी, भक्त, संत, बुद्ध, मुक्त, शुद्ध जो बोलना है बोल लो, उसके लिए प्यार आपके मन में तभी उठेगा जब सर्वप्रथम आपके मन में अपने दुःख के प्रति इन्कार हो।

जिन्हें अपने दुःख से नहीं इन्कार, वो बुद्ध से कैसे करेंगे प्यार?

कैसे करेंगे?

दुनिया में ज़्यादातर लोगों को अपने दुःख से कोई इन्कार होता नहीं, आदत पड़ गयी होती है, झेलने की।

हम दिनभर और करते क्या हैं? ज़िंदगी को झेलते हैं, हम जीते थोड़े ही हैं। जीना एक चीज़ होती है और ज़िंदगी को झेलना... बिल्कुल दूसरी चीज़। मनुष्य एक दुःख झेलने वाला प्राणी है। किसी से भी पूछो- क्या कर रहे हो? तो सही जवाब एक ही होगा- झेल रहे हैं। जीना, झेल रहे हैं। और वो झेलना बड़ी गहरी आदत बन जाती है। ऐसा लगता है यही स्वभाव है। जब अभी तक झेल लिया तो आगे भी झेल लेंगे। जब झेलना स्वभाव बन जाता है, तो फिर आप बुद्ध की ओर आकर्षित क्यों होंगे? प्रेम उठेगा ही क्यों?

कृष्ण से, क्राइस्ट से, राम से, बुद्ध से प्रेम करना बड़ी विरल बात है। नहीं होता है। हम उनका नाम भी बस इसलिए ले लेते हैं क्योंकि भाई! नैतिकता का तकाज़ा है। स्कूल में बताया गया था, घर में सिखाया गया था कि "अच्छे बच्चे जय राम जी की बोलते हैं।"

नुन्नु बोलो, "जय राम जी की।"

तो तब से नुन्नु जय राम जी की बोल रहे हैं, अब चालीस साल के हो गए। उनके मन में राम के प्रति कोई प्रेम थोड़े ही है, वास्तव में। वो तो जब गोद में भी फिरते थे, चचा उन्हें गोद में लेकर फिर रहे हैं और सामने से कोई और आता दिख गया तो तुरंत बोलते थे नुन्नु से- "नुन्नु चलो, जय करो!" नुन्नु बोलते थे- "जय लाम जी की।" तो वही चल रहा है अभी तक। ये प्रेम से थोड़े ही हो रहा है। ये तो इसलिए हो रहा है क्योंकि एक बार नहीं बोले थे 'जय राम जी की' तो चाटा पा गए थे। तो तब से ये बात भीतर बैठ गई है कि जो मिले उसको बोलो, जय राम जी की।

राम से प्रेम करने के लिए बहुत बड़ा कलेजा चाहिए और बड़ा रक्तरंजित कलेजा चाहिए। जब दिल बिल्कुल खून-खून हो गया हो, चिथड़े हो गया हो, तब राम से प्रेम उठता है। नहीं तो तुम कितना भी बोलते रहो- "जय श्री राम!" तुम बस अपने अहंकार की उदघोषणा कर रहे हो।

कारण समझ लो, अच्छे से। कारण ये है कि राम से प्रेम करने का मतलब होता है- बस राम से प्रेम करना। राम से प्रेम करने का मतलब होता है कि अब और कोई चीज़ मुझे लुभाती नहीं, खींचती नहीं। आप ये नहीं कर सकते कि मुझे राम से भी प्रेम है और बिस्तर से भी प्रेम है और कद्दू की सब्जी से भी प्रेम है और पड़ोस की शीला से भी प्रेम है। इसीलिए रामों, कृष्णों को, बुद्धों को, महावीरों को प्रेम बहुत कम मिलता है। बहुत कम।

दो तरह का प्यार होता है। एक वो जो ताकत से किया जाता है और एक वो जो कमज़ोरी से किया जाता है। हम जब प्यार करते हैं तो हम प्यार करते ही दूसरे की कमज़ोरी से हैं। गौर से परखियेगा! आप जब किसी से प्यार करते हो न तो करते ही प्यार उसकी कमज़ोरियों से हो और बुद्ध के पास कोई कमज़ोरी तो है नहीं तो उनसे प्यार कैसे करोगे?

ताकत तो हमें डराती है, ताकत के प्रति तो हम में ईर्ष्या उठती है। आपका प्रेमी बहुत ताकतवर होने लगे तो आप का रिश्ता टूटने लगेगा। रिश्ता चल ही तब तक सकता है जब तक आपकी और उसकी कमज़ोरी बराबर की है। जब तक वह आपसे बहुत आगे नहीं निकल गया अगर वो आगे निकलने लगे तो आपको चिंता होने लग जाएगी कि ये तो रिश्ता टूटा। ये तो आगे निकल रहा है।

इसी को तो कहते हैं न- शादी ब्याह बराबर वालों में किया जाता है। इसका मतलब समझिए। इसका गहरा मतलब क्या है? जो आपसे आगे निकलने लग जाए आप उससे रिश्ता रख नहीं पाओगे। इसका मतलब है कि आपका प्रेमी भी अगर आपसे आगे निकलने लग जाए तो आप तत्काल उसको रोकोगे- "आगे मत निकलना।" हमें दूसरों में आमतौर पर उनकी कमज़ोरियाँ ही आकर्षित करती हैं।

और अब सावधान हो जाइए। सबसे बड़ी कमज़ोरी सुनने के लिए- मुझे तुझसे प्यार है क्योंकि तू मेरी ओर आकर्षित हुआ। इससे मुझे तेरी कमज़ोरी पता चल गई। क्या? तू मेरी ओर आकर्षित हो जाता है यही तो तेरी कमज़ोरी है। जैसे ही तू मेरी ओर खिंचा, मैं तुरंत समझ गया कि तू बहुत कमज़ोर आदमी है। तू कमज़ोर आदमी न होता तो मेरे जैसे की ओर खींचता? ये कितनी खौफनाक बात है। ये कितनी खौफनाक बात है। तेरी कमज़ोरी, तेरी गलती ही यही है कि तू मेरी ओर आकर्षित हुआ। जैसे ही तू मेरी ओर आकर्षित हुआ मैं धीरे-से मुस्कुरा दिया। मैंने कहा, "मैं तुझे समझ गया बच्चू तू कौन है? तू भी मेरे ही जैसा है। तू भी मेरे ही तल का वासी है।"

तू अगर कहीं आगे का होता, तुझमें ज़रा-भी ताकत होती, ज़रा भी ऊंचाई होती तो तुझे क़ायदे से मेरी उपेक्षा कर देनी चाहिए थी क्योंकि मैं इस लायक हूँ ही नहीं कि कोई मुझ पर ध्यान दे। हम प्यार ही दूसरे की कमज़ोरियों से करते हैं। कमज़ोरियाँ हट जाएँ, रिश्ता टूट जाएगा।

दूसरा आपकी और खिंचा आता है, आप दूसरे की ओर खींचे जाते हो ये आपकी ताकत है क्या वास्तव में? आमतौर पर ये खिंचाव वासना का ही होता है। ये कमज़ोरी ही तो है न? और इसी कमज़ोरी के आधार पर वो रिश्ता खड़ा हुआ है। अब बुद्ध से कैसे करोगे प्यार बोलो? वो तो खिंचने से रहे तुम्हारी ओर। तुम जाओ उन्हें जितना लुभाना हो लुभा लो वो नहीं खिंचेंगे। अब उनसे प्यार कैसे करोगे बोलो?

आमतौर पर यही प्यार होता है- जो जितना कमज़ोर है उसको उतना प्यार दो। चाहे फिर वो रोगी हो, वृद्ध हो, या छोटा बच्चा हो। जहाँ कमज़ोरी देखी वहीं स्नेह दिया। इसीलिए हमारा सबसे ज़्यादा स्नेह बरसता ही दूसरे पर तब है जब उसकी कमज़ोरी का क्षण होता है।

अपने आपको टटोलिए! देखिए कि भीतर ही भीतर हम भी अपने आसपास वालों को कमज़ोर ही देखना चाहते हैं। वो ताकतवर भी हो भी तो बस इतने हो कि उनकी ताकत से हमें लाभ हो जाए। बहुत ताकतवर हो गए तो दिक्कत हो जाएगी।

अब बोलो बुद्ध से कैसे करोगे प्यार? वहाँ तो कोई नहीं है कमज़ोरी। दुनिया में सबसे कम प्यार किनको मिला? जो सबसे ज़्यादा प्यार के अधिकारी थे। जिन्हें सबसे ज़्यादा प्यार मिलना चाहिए था उन्हें सबसे ज़्यादा नफरत मिलती है और जो सब गए-गुज़रे होते हैं उन्हें इसीलिए प्यार मिलता है क्योंकि वो गए-गुज़रे हैं।

"अले! लेलेले! मेरा शोमू कितना स्टूपिड है?" अरे! स्टूपिड है तो ये बोलने के लिए भी काहे को रुकी? कि शोमू स्टुपिड है! भाग! जान बचाकर भाग! पर शोमू क्यूट ही इसीलिए है क्योंकि वो स्टूपिड है।

ये तो अजीब बात है? तुमको पता है वो स्टूपिड है। तुम तब भी उसके साथ गठबंधन कर रहे हो? ये क्या माजरा है? और गौर से देखना कि तुम्हें स्टूपिडिटी जितनी पसंद है, इंटेलिजेंस से, बोध से तुम उतना ही घबराते हो।

तुम्हारा शोमू अगर समझदारी की, गहरी, बोधजनित, आध्यात्मिक बातें करने लग जाए तो तुम कहोगी "शोमू! आर यू ऑल राइट बेबी?" वो जब तक एकदम महाबेवकूफी बघार रहा है तबतक तो वो क्यूटी पाई है और जहाँ उसने दो-चार ढंग की बातें करी, तुम्हारे एंटीने खड़े हो जाएँगे। कहोगे, गया! निकला! क्योंकि समझदार हो गया तो मेरे पास काहे को रुकेगा? मेरे पास तो कोई बेवकूफ़ ही आ सकता है। ऐसा है हमारा प्यार। जो होता ही कमज़ोरियों के तल पर है।

इसीलिए जिन्होंने जाना उन्होंने प्यार के लिए दो नाम दिए- अपरा प्रेम और पराप्रेम। ये जो कमज़ोरियों से प्यार किया जाता है इसको कहते हैं- अपरा प्रेम। ये साधारण, सांसारिक, भौतिक प्रेम होता है, जो प्रेम है ही नहीं। ये एक तरह की दुश्मनी है। जिससे दुश्मनी निकालनी हो, उसको तुम कहने लग जाते हो मुझे इससे बहुत प्यार है।

और जो वास्तविक प्रेम होता है, फिर जानने वालों ने उसको नाम ही अलग दे दिया। उसको कहा परम प्रेम या पराप्रेम। कहा कि ये असली प्रेम है। लेकिन चूँकि प्रेम शब्द अब गंदा कर दिया है दुनिया वालों ने तो इसको हम नाम दूसरा देंगे, इसको हम कहेंगे परा प्रेम, परम प्रेम।

हम असल में अगर किसी को सबसे कम सम्मान देते हैं तो वो उनको देते हैं जो हमसे तथाकथित प्रेम करते हैं। इस बात का मनोविज्ञान समझते हैं आप? हो सकता है किसी को आप बहुत सम्मान देते हो लेकिन वो जिस दिन आपके प्रति अपने प्रेम की अभिव्यक्ति कर दे वो आपकी नज़रों में गिर जाता है। तुरंत आप 'आप' से 'तुम' पर आ जाते हो। वो कल तक आप था जिस दिन वो तुम्हारा प्रेमी हो गया उसे बोलते हो तुम। और और ज़्यादा प्रेमी हो जाए, शारीरिक निकटता भी बन जाए तो कहने लग जाते हो 'तू'। ये हुआ कैसे? आप और तुम और तू कैसे हुआ? ये मत कहिएगा ये तो प्यार की बात है, हमने औपचारिकता, फॉर्मेलिटी छोड़ दी है। ना! ना! ना! ना! ये मामला दूसरा है।

वो मामला ये है कि जिसने भी हमारी तरफ कदम बढ़ाया वो हमारी नज़रों से गिर जाता है क्योंकि हम अपने प्रति बड़ी हीनभावना से भरे रहते हैं। वो व्यक्ति जो हमारी ओर बढ़ रहा है उसका अपराध ही यही है कि वो हमारी ओर बढ़ रहा है। अब हम उसके प्रति अवमानना रखेंगे, कंटेम्प्ट रखेंगे। इसीलिए प्रेमीजन एक दूसरे के प्रति बड़ी अवमानना रखते हैं, बड़ा कंटेम्प्ट रखते हैं। वो एक दूसरे से जुड़े तो हो सकते हैं, मोह रख सकते हैं, अटैचमेंट रख सकते हैं पर सम्मान नहीं रख पाते, रिस्पेक्ट नहीं रख पाते। आप कहना ही मुश्किल हो जाता है।

हो सकता है सम्बंध से पहले आप चलता हो संबंध के बाद आप चल ही नहीं सकता। इसलिए नहीं कि तुम्हारी नज़रों में वो गिरा हुआ आदमी है, दूसरा। इसलिए क्योंकि तुम अपनी नज़रों में खुद गिरे हुए आदमी हो। तुम कहते हो मुझ जैसे छोटे आदमी की तरफ जो आकर्षित हुआ वो बड़ा आदमी कैसे हो सकता है? तो पहले मैं तुझे बड़ा आदमी समझता था पर अब चूँकि तू मेरी तरफ आया इसलिए मैं तुझे गिरा हुआ और छोटा आदमी समझूँगा। अब तू 'आप' नहीं है अब तू 'तूम' है। तू 'तूम' है तो बात ही क्या, तू 'तू' है।

आ रही है बात समझ में?

बताओ मुझे, बुद्ध से कैसे करोगे प्यार? बात समझ में आ रही है थोड़ी?

अपने प्रियजनों की छवि अपने मन में लाइए थोड़ा! लाइये! ले आली? अब कल्पना करिए कि आप घर जाएँ और आपके जो प्रियजन हैं वो बिल्कुल अष्टावक्र सरीखी बातें कर रहे हों। एकदम गीता के ज्ञान के तल पर चढ़कर बैठ गए हों, वास्तव में। नाटक नहीं कर रहे हैं, अभिनय नहीं कर रहे हैं, वो वास्तव में कृष्ण ही हो गए हैं।

आप घर गए और आप पाते हैं कि आपका बेटा या पति या पत्नी या भाई बिल्कुल अब छोटी-घटिया बातों को त्याग चुका है। वो बात ही अब बस कृष्ण के तल की कर रहा है। घबरा नहीं जाएँगे? कहिये? आनंद तो नहीं उठने वाला। भयानक डर उठेगा और ये जो ऊँची बात कर रहा है, विशेषतया अगर ये आपकी पत्नी हो तब तो बहुत डर उठेगा। आप कहेंगे, अब मुर्गी हाथ में नहीं आने वाली। अब नहीं बना पाऊँगा इसका कढ़ाई-चिकन आज रात। इसने तो बड़ी ऊँची बातें कर दी वैराग्य की, और भक्ति की, और सत्य की, और अनासक्ति की, अब ये नहीं पकड़ में आने वाली। तुरंत कहेंगे, "केबीसी लगाऊँ? कपिल शर्मा देखेगी?" तुरंत आप कोशिश करेंगे उसको नीचे लाने की, उसका तल गिरा देने की, उसका मन गंदा कर देने की। वो आपसे बात कर रही होगी 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग'। आप कहेंगे "वो रिमोट दिखाना- भाभी जी घर पर हैं!" सुहाएगा ही नहीं, मुर्गी छिटकी।

बुद्ध से कैसे करोगे प्रेम? पत्नी ही थोड़ी ज्ञानवान हो जाए तो उससे प्रेम नहीं कर पाओगे, बुद्ध से कैसे करोगे प्रेम?

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