उधार का ज्ञान, ज़िन्दगी बेजान

Acharya Prashant

19 min
583 reads
उधार का ज्ञान, ज़िन्दगी बेजान
जो नकली वाला ज्ञान होता है ना, जिसको समाज-ज्ञान बोलते हैं, उसको लोक-ज्ञान बोल दो। समाज जिसको ज्ञान मानता है, वो ज्ञान नहीं होता। ऐसे ज्ञान को तो सूत्र कहते हैं कि, "ये ज्ञान तो बंधन है तुम्हारा।" सबसे पहले तो ये फालतू का ज्ञान छोड़ो और समझदारी से जीना शुरू करो। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम सचिन है। मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के द्वितीय वर्ष का छात्र हूँ। आचार्य जी, काफ़ी चीज़ें मेरे जहन में आईं, कई प्रश्न उठे। ये है कि हम कितना भी ज्ञान अर्जित कर लें, कितने भी समझदार हो जाएँ, हमें पता होता है कि ये सत्य है, इस मार्ग पर चलेंगे तो समाज के लिए भी लाभकारी होगा, स्वयं के लिए भी लाभकारी होगा, और वो करना हमारा धर्म भी है।

परंतु पता नहीं क्या अंदर होता है, वो हमें उस सत्यता से मोड़कर एक अंधकारमय रास्ते पर ले जाता है। हमें पता होता है कि हम जिस तरीक़े से जो जीवन जिएँगे या फिर जो हम कार्य करने जा रहे हैं, उससे आगे वाले को हानि हो सकती है, और हमें तो हो ही रही है। और "मैं" अपने अंदर देखूँ, तो मुझे बेचैनी भी हो रही है, फिर भी मैं उस चीज़ को करे जा रहा हूँ, करे जा रहा हूँ, करे जा रहा हूँ। बोल रहा हूँ कि "ये अंतिम है, ये अंतिम है!" पर वो कभी अंतिम नहीं होता है और चीज़ें बदलती जाती हैं।

कभी मैं छोटी-छोटी चीज़ें कर रहा था, फिर वो बड़ा रूप ले लेती हैं। तो ऐसे में मैं चाहता हूँ कि वो जो अंदर से मेरे सत्यता को हावी कर रहा है, मेरी सत्यता के ऊपर छाया हुआ है, मैं उस अंधकार को कैसे मिटा पाऊँ?

ये मेरा प्रश्न है।

आचार्य प्रशांत: सवाल की शुरुआत में कहा, "ज्ञान हम कितना भी अर्जित कर लें" और फिर आगे लगातार पूरी बात यही करी कि “पता नहीं है भीतर कौन बैठा है।” और फिर — "पता नहीं है भीतर कौन बैठा है" इसी भाव को आगे विस्तार दिया, है ना? कि चले जाएँ तो भी नहीं बेचैनी दूर होती है, छटपटाहट हासिल करने पर भी नहीं जाती, ये सारी बातें। और “पता नहीं क्यों!”

विरोधाभास दिख रहा है?

पहली बात क्या बोली थी? "ज्ञान बहुत अर्जित कर लिया!" और दूसरी कह रहे हो, "पता कुछ नहीं है!" तो ज्ञान अर्जित हुआ ही नहीं है ना इसका मतलब।

प्रश्नकर्ता: जैसे भगवद्गीता में कृष्ण बोलते हैं, कि "अपना कर्म कीजिए, फल की इच्छा मत कीजिए।"

आचार्य प्रशांत: नहीं बोलते हैं ना। ज्ञान इतनी सस्ती चीज़ नहीं है कि शुरुआत में ही बोल रहे हो कि "ज्ञान तो हो गया लेकिन समाधान नहीं हुआ।" अरे! समाधान नहीं हुआ, माने ज्ञान ही नहीं है! ज्ञान माने क्या होता है? बाहरी सूचना वग़ैरह? भगवद्गीता का उल्लेख कर रहे हो, तो वहाँ ज्ञान का मतलब ही है — आत्मज्ञान। और कहा, "अपना काम करते रहिए।" कर्म का क्या मतलब होता है? बस यूँ ही कोई भी कर्म यादृच्छिक? भगवद्गीता की बात कर रहे हो तो कर्म का मतलब होता है — निष्काम कर्म।

अब बताओ, क्या ज्ञान है तुमको?

प्रश्नकर्ता: मतलब, मेरे अंदर जो बेचैनी थी कि, मुझे पता होता है कि सत्य क्या है भले ही वो हमें बाहर से पता हुआ हो।

आचार्य प्रशांत: नहीं, बाहर से सत्य नहीं पता होता।

प्रश्नकर्ता: नहीं, जो समाज का।

आचार्य प्रशांत: सत्य सामाजिक नहीं होता।

प्रश्नकर्ता: नहीं, जो हमारे जितने भी आदर्श रहे हैं, उन्होंने वो बातें कही हैं।

आचार्य प्रशांत: उन्होंने क्या बात कही है, वो हमें नहीं पता।

प्रश्नकर्ता: नहीं, फिर भी हम जब देखते हैं कि।

आचार्य प्रशांत: उनकी बात तो तुम बता रहे हो कि "कर्म करो, चिंता मत करो।" उनकी बातें भी कहाँ पता हैं, ध्यान से कहाँ पढ़ी हैं।

प्रश्नकर्ता: हाँ, तो वही तो दिक्कत आ रही है ना, कि जो प्रॉब्लम है, कि जो पता होने के बाद भी उनकी बातों को ध्यान से पढ़ने के बाद भी उन्हें लागू नहीं कर पाते हैं।

आचार्य प्रशांत: नहीं पता। पता होने के बाद समस्या नहीं शुरू हो रही है — पता ही नहीं है। तुम क्यों उड़ना चाहते हो कि "पता तो है, ज्ञानी तो हूँ!" नहीं हो। भाई ज्ञान दो-चार किताबें पढ़ने का या बीस-चालीस भी किताबें पढ़ने का नाम नहीं होता।

ज्ञान माने — आत्मज्ञान।

तो ज्ञान की शुरुआत तुम्हारे प्रश्न में ही निहित थी। तुम्हारे प्रश्न का सबसे अच्छा हिस्सा, ज्ञान की दृष्टि से सबसे शुद्ध हिस्सा वो था जब तुम कह रहे थे, "तुम्हें क्या-क्या नहीं पता।" माने कि तुम्हें पता है कि तुम्हें नहीं पता, ये ज्ञान की शुरुआत है। समझ रहे हो? ये होता है ज्ञान — "मैं नहीं जानता।” या फिर पूछना कि "जो बातें मुझे लगती हैं कि मैं जानता हूँ, मैं कैसे आश्वस्त हूँ कि मैं जानता हूँ?" (हाउ डू आइ नो दैट आइ नो?) ये ज्ञान होता है। और ये बैठकर के सवाल अपने आप से पूछोगे तो कोई उत्तर नहीं मिलने वाला।

"मैं जानता नहीं, फिर भी जीता रहता हूँ। उधार की सूचनाओं को अपना ज्ञान समझ लेता हूँ," ये बात पता चलती है अपने कामों को देखकर, अपनी कामनाओं को, विचारों को देखकर, अपने रिश्तों को देखकर, अपने लक्ष्यों को देखकर — ये आत्मज्ञान है। आत्मज्ञान माने आँख बंद करके भीतर की किसी चीज़ को देखना नहीं होता। आत्मज्ञान का मतलब होता है, "मैं क्या सोच रहा हूँ? ये विचार आया कहाँ से?" अभी तो मैं कुछ और सोच रहा था।

मैं कमरे में बैठा हूँ, शांति है, मैं कुछ सोच रहा हूँ, मैं खिड़की खोलता हूँ। कहीं शादी हो रही है, ढोल बज रहा है, वहाँ कुछ घटिया म्यूज़िक चल रहा है वो ऐसे तैरता हुआ कान में घुस गया, और मेरे पूरे विचार बदल गए। मेरे विचार बिल्कुल बदल गए। तो क्या ये मेरे विचार हैं? ये ज्ञान की शुरुआत है। लेकिन हम ज्ञान को ही एक विचार बना लेते हैं। नहीं!

ज्ञान विचार नहीं होता, ज्ञान दृष्टि होता है। वो दृष्टि जो सब विचारों को, भावनाओं को देखती है — उनके प्रवाह को, उनके स्रोत को, कहाँ से आ रहा है ये पूरा।

ये होता है ज्ञान।

तो ज्ञान कोई संकलित सूचनाओं का भंडार नहीं है। यहाँ से मिली बात, वहाँ से मिली बात, और खूब इकट्ठा कर ली, रट भी लिया, उसको कहीं जाकर उद्धृत भी कर दिया, ये ज्ञान नहीं होता है। ज्ञान हमेशा जीवित होता है, इसी पल का होता है, तात्कालिक होता है, इंस्टेंटेनियस होता है। उसके साथ शब्द चलते हैं — इंसाइट, एपिफ़नी, अभी, आधुना।

ज्ञान का कोई निष्कर्ष नहीं होता। कोई पूछे, "क्या ज्ञान हो गया?" ज्ञान कुछ नहीं हो गया! ज्ञान तो रोशनी की तरह होता है जो कुछ है सब पर रोशनी पड़ रही है, अंधेरे में कुछ नहीं है अब, ये ज्ञान है — "मैं देख पा रहा हूँ," (आइ कैन सी।) "मैंने देख लिया" नहीं "मैं देख पा रहा हूँ, मैं देखता जा रहा हूँ” — अभी, ये ज्ञान है। और जब रोशनी नहीं थी, तब अंधेरे में बहुत सारी फालतू चीज़ें पड़ी थीं, मैं उनसे टकरा के गिर भी जाता था, या किसी व्यर्थ चीज़ को उठाकर जेब में रख लेता था। यहाँ पे कुछ रखा है देख नहीं पा रहा था, रोशनी नहीं थी तो खा भी लेता था। अब रोशनी है, तो इस रोशनी के कारण मेरे जीवन के सारे निर्णय सही होते जा रहे हैं। मैं अब टकरा कर, लड़खड़ा कर, गिर नहीं रहा हूँ। मैं कोई फालतू चीज़ उठाकर स्वयं से जोड़ नहीं रहा हूँ, और ये लगातार प्रक्रिया है ना।

या ऐसा कहोगे कि, "नहीं साहब, ब्रेकफ़ास्ट के समय प्रकाश होना चाहिए, पर डिनर तो अंधेरे में होना चाहिए।" या कि, "खाना खा रहे हैं तो आधे समय प्रकाश हो, और फिर जब अंत में खीर वग़ैरह का नंबर आए तो रोशनी बंद कर दो।" या "आधे रास्ते हेडलाइट जलनी चाहिए गाड़ी की, और बाक़ी आधे रास्ते हेडलाइट्स बंद कर दो, अंधेरे में यात्रा कर लेंगे।" जैसे यात्रा में लगातार हेडलाइट्स चाहिए, वैसे ही ज़िंदगी में प्रतिपल वो दृष्टि चाहिए जो समझ रही है — ठीक अभी, आइ कैन सी। मैंने देखा क्या हुआ। और ये भी नहीं कि रुक गए सोचने के लिए, कन्क्लूड करने के लिए, निष्कर्ष निकालने के लिए रुक गए, ये ज्ञान नहीं होता। क्योंकि रुकोगे तो क्या होगा? जीवन आगे बढ़ जाएगा ना उतनी देर में!

आप गाड़ी चला रहे हो, पीछे एक गड्ढा था उसके बारे में सोचोगे तो क्या होगा? आगे गड्ढा आ जाएगा! बैरियर से, कहीं से, किसी चीज़ से भिड़ोगे। तो ज्ञान इसीलिए हमेशा डायनामिक होता है, वो एक रोलिंग ऑन होता है — सजीव, गतिशील होता है। ये सब बातें कि, "मैंने ये दो-चार बातें जान लीं, एक श्लोक पढ़ लिया, ये पढ़ लिया।" ये 'ज्ञान' शब्द का दुरुपयोग है। ऐसे ही ज्ञान के लिए फिर ज्ञानियों ने कहा है कि, "ज्ञान ही तुम्हारा बंधन है।"

जो नकली वाला ज्ञान होता है ना, जिसको समाज-ज्ञान बोलते हैं, उसको लोक-ज्ञान बोल दो। समाज जिसको ज्ञान मानता है, वो ज्ञान नहीं होता। ऐसे ज्ञान को तो सूत्र कहते हैं कि, "ये ज्ञान तो बंधन है तुम्हारा।" सबसे पहले तो ये फालतू का ज्ञान छोड़ो और समझदारी से जीना शुरू करो।

अच्छा, एक बात बताओ। अभी आप खड़े हो सामने, आपने दो-चार जो बातें पढ़ रखी हैं, सोच रखी हैं, अभी वो सोचे जा रहे हो या सुन रहे हो?

प्रश्नकर्ता: मैं सुन रहा हूँ अभी आपको।

आचार्य प्रशांत: सुन रहे हो। अगर वही बातें सोच रहे हो जो तुमने पढ़ रखी हैं, तो क्या सुन पाओगे?

प्रश्नकर्ता: नहीं।

आचार्य प्रशांत: हाँ। बात समझ में आ रही है, अगर उनमें उलझे रहोगे तो जो सामने है जिससे तुम्हारा वास्ता है, क्योंकि जीना तुम्हें उसी में है जो अभी सामने है, वो जो है वो निकल जाएगा। गाड़ी छूटेगी, चूक जाओगे।

प्रश्नकर्ता: जैसे अभी आपने बोला कि "जो वर्तमान में चल रहा है, वही है।" तो जैसे मैं अभी आपके पास चल के आ रहा हूँ, ये वर्तमान स्थिति है। एक तो ये है कि मैं बच के निकल जाऊँ, एक ये है कि "मुझे तो आचार्य जी के पास पहुँचना है, आगे वाले के ऊपर होकर निकल जाऊँ।" तो आगे वाले के ऊपर होकर नहीं निकलना है, मुझे साइड से निकलना है, ये वाला ज्ञान। मतलब इस चीज़ की मुझे चेतना या फिर कहें, मुझे जानकारी कहाँ से आएगी?

वो ज्ञान कहाँ से मिलेगा कि, "मुझे आगे वाले के ऊपर होके नहीं निकलना है, मेरा लक्ष्य आगे पहुँचना है मुझे साइड से निकलना है।" ये इस चीज़ के लिए मैं पूछ रहा था।

आचार्य प्रशांत: ये चीज़ तो जाओ, दुनिया से जानकारी हासिल कर लो, ये तो तुम मटेरियल सीढ़ी के बारे में पूछ रहे हो।

प्रश्नकर्ता: नहीं, मटेरियल सीढ़ी नहीं है।

आचार्य प्रशांत: तुम्हें मेरे पास आना है तो और कैसे आओगे?

प्रश्नकर्ता: ये तो मैंने सिर्फ़ एक उदाहरण दिया है, मैं वास्तविक जीवन की बात कर रहा हूँ।

आचार्य प्रशांत: तो वास्तविक जीवन में मटेरियल ही तो जीते हो और कैसे जीते हो। वास्तविक जीवन में तुम्हारे इम्मैटीरियल क्या है?

प्रश्नकर्ता: जी सर।

आचार्य प्रशांत: ये माइक क्या है? एब्स्ट्रैक्ट है या मटेरियल है?

प्रश्नकर्ता: मटेरियल है।

आचार्य प्रशांत: तो हो गया बस, माइक उठा के बात कर रहे हो।

प्रश्नकर्ता: एक्चुअल में क्या है कि मैं जिस बिंदु पर आना चाह रहा हूँ, अभी हम उस पर पहुँचे नहीं हैं।

आचार्य प्रशांत: पहुँचाओ। ज़िंदगी तुम्हारी है, बेचैनी तुम्हारी है तो पहुँचाओगे भी तुम ही। पहुँचाओ।

प्रश्नकर्ता: जैसे आपने बोला कि वर्तमान में रहना है।

आचार्य प्रशांत: वर्तमान में रहना है, पीछे हटो। मैं कह रहा हूँ, अतीत में नहीं रहना है। अतीत में तुम ये जो पाँच चीज़ें इकट्ठा करके बैठे हो, उसको ज्ञान नहीं कहते हैं।

प्रश्नकर्ता: नहीं नहीं, ज्ञान तो नहीं है। अंधकार में हूँ, इसलिए आपके समक्ष खड़ा हूँ। समाज में जो चल रहा है, उसे छोड़ के मैं बाहर भी नहीं जा सकता, जंगल में भी नहीं जा सकता, रहना समाज के अंदर ही है। मैं चाहता हूँ, समाज में रहते हुए मैं अपने आत्मिक विकास, समाज का भी विकास, और साथ-साथ में जो समकालीन जो चीज़ें घटित हो रही हैं, उनके साथ भी मैं सत्यता के साथ अपना योगदान दे सकूँ। मैं उस चीज़ पर आना चाह रहा हूँ।

आचार्य प्रशांत: "योगदान" माने क्या? "समाज" माने क्या? "विकास" माने क्या?

प्रश्नकर्ता: जैसे मैं विद्यार्थी हूँ।

आचार्य प्रशांत: नहीं नहीं "जैसे" नहीं, समझो बात को। विकास के नाम पर अंधाधुंध विनाश होता है। देखा है? तो इतना तो स्पष्ट हो रहा है ना कि "विकास" की बहुत ग़लत परिभाषाएँ भी हो सकती हैं। क्या आपने गौर करा है कि आप जिस शब्द को इस्तेमाल कर रहे हो बहुत हल्के तरीक़े से, वो बहुत गहरा शब्द है? "समाज" माने क्या? आपने शुरुआत में ही कहा, "रहना तो मुझे समाज में ही है।"

ये ज्ञान कहाँ से आया?

क्या ये आपकी आत्मा से उद्भूत है कि, "रहना तो समाज में ही है?" ये सारी बातें, जो सिर्फ़ उधार की हैं उनको अपना ज्ञान बनाकर बैठे हो। प्रश्न नहीं हैं तुम्हारे पास, तुम्हारे पास मान्यताएँ हैं और उन मान्यताओं के कारण परेशानी है। अब तुम परेशानी का समाधान चाहते हो, बिना मान्यता छोड़े। वो कैसे हो जाएगा? अभी भी जो प्रश्न पूछा, तुमने प्रश्न नहीं पूछा, तुमने पाँच मान्यताएँ मेरी ओर फेंक दीं — "समाज की वृद्धि," "समाज का विकास," "समाधान," "लोकहित," "ये योगदान।"

"योगदान" माने क्या होता है? क्या पता क्या होता है "योगदान" माने?

एक आदमी पड़ा हुआ था, उसका रोड एक्सीडेंट हुआ था। ये बिल्कुल सच्ची घटना है। एक शराबी उसके पास जाता है बिल्कुल ऐसे ही, वो ख़ुद भी गिरा जा रहा है। वहाँ एक आदमी गिरा, उसके सिर से खून बह रहा है, वो पड़ा हुआ है। वो बोलता है कि, "मैंने कहीं पर कंपाउंडर का काम करा है। इसके सिर से खून बह रहा है, मैं इसकी ब्रेन सर्जरी करूँगा। अभी मुझे इसकी मदद करनी है।" उसने रोड पर उसकी ब्रेन सर्जरी कर दी। "योगदान" दे रहा था भाई!

तुम्हें कैसे पता, "योगदान" माने क्या? शब्दों की सतह पर तैर रहे हो, गहराई में नहीं जा रहे। और सबसे ज़्यादा अंधेरे में, भुलावे में आप उन्हीं शब्दों को लेकर रहते हो जिनका आप बहुत बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करते हो। बहुत जल्दी-जल्दी इस्तेमाल करते हो, बहुत बचपन से इस्तेमाल कर रहे हो। उन शब्दों के बारे में तुम कुछ भी नहीं जानते, सबसे ज़्यादा वही अंधेरे में हो। प्रेम, बचपन से ही, "डस मम्मा, लव यू?" बताओ प्रेम माने क्या? "मैं" माने क्या? जीवन माने क्या? बताओ न, शिक्षा माने क्या? इन सब शब्दों का इस्तेमाल रोज़ करते हो।

समाज माने क्या? कभी सोचा भी है इन शब्दों का अर्थ? पैसा माने क्या? सरलता माने क्या? बार-बार बोलते हो न, "भाई, सुंदर है।" बताओ, ब्यूटी माने क्या? बताओ तो। खुशी माने क्या? सेल्फ माने क्या? और इनके किताबी जवाब ठीक होते हैं, पूरे नहीं होते। पढ़ लो किताबें, जिनमें इनके बारे में लिखा हुआ है। पर ये सचमुच क्या है, ये तो लगातार इसी वक़्त जीवन को देखकर ही पता चलता है कि, जीवन माने क्या? "मैं भी क्या हूँ?" ये तुम्हें तुम्हारी गतिविधियों से ही पता चलेगा। नहीं तो अपने बारे में बस कल्पना बनाओगे, "मैं बहुत होशियार हूँ" या "मैं बहुत निर्भीक हूँ, मुझे डर तो लगता नहीं।" पर ज़िंदगी में देखो कि एक कुत्ता भी पीछे पड़ गया तो पसीने छूट गए, तो पता चलता है न कि मैं सचमुच कौन हूँ।

अगर ज़िंदगी कैसी चल रही है, इस पर ग़ौर नहीं करोगे तो कुछ नहीं जान पाओगे। यही सोचते रहोगे कि "मैं तो बिल्कुल निडर हूँ," जैसे थोड़ी देर पहले सोच रहे थे, "मैं बिल्कुल ज्ञानी हूँ।" तो वो पता तभी चलता है जब ज़िंदगी पर ग़ौर करते हो।

मान्यताएँ एक बात है, बाहर से ली सूचना एक बात है, और जो सचमुच सामने यथार्थ तथ्य है, वो बिल्कुल अलग बात होती है, उसी से संपर्क बनाने को ज्ञान कहते हैं। वो है ज्ञान। और उससे संपर्क बनाओ तो आगे के जितने ये सवाल हैं, ये अपने आप ख़त्म हो जाते हैं। सवाल ही नहीं बचता।

इस टेंडेंसी से सब बचिएगा, ये जो टेंडेंसी होती है न कि "गीता में कृष्ण ने कहा है कि अपने कर्म करो और फल की चिंता मत करो।" तुम्हें कैसे पता गीता में कृष्ण ने? तुम्हें कैसे पता? और जिस तरह से, जिस आधार पर तुमने अभी-अभी ये घोषणा कर दी कि, "गीता में कृष्ण ने कहा है कि अपना कर्म करो, फल की चिंता मत करो" उसी आधार पर तुम अपनी पूरी ज़िंदगी जी जाते हो। बताओ वो ज़िंदगी कैसी होगी फिर?

सुनी-सुनाई बात, जिसमें मैंने जान नहीं लगाई, मैंने दिल नहीं लगाया, मैंने कोई मौलिक जिज्ञासा नहीं करी। कहीं से मैंने कुछ सुन लिया और मैं सोच रहा हूँ कि, ईधर सुन लिया, उधर — आलस है, आत्मसा है ये। आलस है न कि, "सुन तो लिया।" ये भगवद्गीता क्या है, उसकी दुनिया में सिर्फ़ दो कॉपियाँ हैं, जिनमें से एक ग्रीनलैंड में है और एक अलास्का में है, ऐसा है क्या? ये आपको जाँचने में कितना समय लगता है कि भगवद्गीता में सचमुच क्या लिखा हुआ है? कितना समय लगता?

और यही नहीं है, आप तो एक विश्वविद्यालय में हो, जहाँ पर अच्छे-खासे संस्कृत विभाग हैं। अनुवाद पर भी निर्भर नहीं रहना है, तो चले जाओ किसी संस्कृत के विद्यार्थी के पास या प्रोफ़ेसर के पास, उससे सीधे ही पूछ लो कि "ये क्या है?" और वो पूछने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती है। हिंदी अगर आती है तो अन्वय लिखा होता है, अन्वय से पता चल जाता है मोटे तौर पर कि क्या बात कही गई है। पर हम उतना भी नहीं जाँचते।

फ़िल्मों में, टीवी में, समाज में, गली-नुक्कड़, चौराहे में जो चल रही है औसत दर्जे की बातचीत, हमारे लिए वही ज्ञान है। वही ज्ञान है। ताऊ जी ने कुछ बोल दिया, टीवी सीरियल पर किसी ने कुछ बोल दिया, हमारे लिए वही ज्ञान है। मैं कह रहा हूँ, इस ज्ञान को चुनौती दो, और चुनौती उसे तभी दे पाओगे, जब सबसे पहले मानोगे कि — "तुम्हारा ज्ञान झूठा है।" और

अपने ज्ञान को झूठा मानना माने, असली ज्ञान की शुरुआत।

देखो, बातचीत अभी भी वहाँ नहीं पहुँच पा रही है जहाँ तुम चाहते हो, लेकिन मैं उसे वहाँ पहुँचने दूँगा भी नहीं। मैं बातचीत को तुम तक लेकर आना चाहता हूँ, यहाँ तक (अपनी ओर इंगित करते हुए)। और तुम उसे छितरा कर रखना चाह रहे हो। **ग़ौर करना, कोई भी बात ऐसी मत कहो कि "ऐसा तो होता ही है ना, समाज में तो रहना ही होता है ना।" अरे भाई, तुम्हारी एक ही ज़िंदगी है इसके बारे में तुमने इतनी जल्दी, इतना सस्ता फ़ैसला कैसे कर लिया? "नहीं, पर ये तो कॉमन सेंस है न। ऑब्वियसली ऐसा तो होता है न।" ये क्या "कॉमन सेंस" और ये सब बोल रहे हो? ज़िंदगी इतनी सस्ती चीज़ होती है? "पर ऐसा तो करना ही होता है न।" तुम्हें कैसे पता? फ़िल्में बहुत देखी हैं? "करना ही होता है।" तुम्हें कैसे पता, "ये करना ही होता है?"

ये ज्ञान नहीं होता, ये बस ऐसे ही है कुछ कथा-पचीसी, "रहना तो मुझे समाज में ही है।" 100 तरह के समाज होते हैं और समाज अभी बदल जाएगा। इस मंच पर मैं खड़ा हूँ तो यही लोग, यही सभागार एक समाज है। यहाँ पर कोई दूसरा आ जाएगा, ये समाज बदल जाएगा। समाज कितनी सूक्ष्म, और कितनी महीन, और कितनी मल्टी-लेयर्ड चीज़ होती है, तुमने कभी ग़ौर किया? "समाज में तो रहना ही होता है।" समाज माने क्या? कभी विचार ही नहीं किया? एक समाज होता है क्या? तुम्हारा एक समाज है?

आप में से कई लोग होंगे जो कई व्हाट्सएप ग्रुप्स में होंगे। क्या वो सारे व्हाट्सएप ग्रुप्स एक में मिलाए जा सकते हैं? तो समाज कोई एक होता है क्या? आप कई समाजों के हिस्से हो, माने चुनाव उपलब्ध है न कि, "मुझे इस समाज का हिस्सा होना है कि नहीं होना है।" तो "मुझे तो समाज में रहना ही है ना।" जैसे मजबूरी हो। मैं कह रहा हूँ, चुनाव है। तुम कह रहे हो, मजबूरी है। मैं समाज में रहूँगा नहीं, मैं अपना समाज बनाऊँगा। क्या समस्या हो गई? बोलो।

पर इतनी-सी उम्र में ही जैसे गुलामी छा गई है, “ऐसा तो है ही, कृष्ण ने ये बोला है, ऐसा होता है।” क्यों? ताक़त होनी चाहिए न जवानी में। हाँ, ठीक है हम अनादर नहीं कर रहे आपका, पर हम जाँचेंगे। हम आपकी बात को काट नहीं रहे, पर हम जाँचेंगे तो ज़रूर। आपने बता दिया, अच्छी बात है। हमें विचार भी करने दीजिए, हमें सवाल भी पूछने दीजिए।

इतनी सस्ती उड़ती हुई अफ़वाहें, व्हाट्सऐप युनिवर्सिटी वाली गीता। ऐसे होता है क्या? ज़िंदगी ऐसे चलेगी?

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories