जो नकली वाला ज्ञान होता है ना, जिसको समाज-ज्ञान बोलते हैं, उसको लोक-ज्ञान बोल दो। समाज जिसको ज्ञान मानता है, वो ज्ञान नहीं होता। ऐसे ज्ञान को तो सूत्र कहते हैं कि, "ये ज्ञान तो बंधन है तुम्हारा।" सबसे पहले तो ये फालतू का ज्ञान छोड़ो और समझदारी से जीना शुरू करो।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम सचिन है। मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के द्वितीय वर्ष का छात्र हूँ। आचार्य जी, काफ़ी चीज़ें मेरे जहन में आईं, कई प्रश्न उठे। ये है कि हम कितना भी ज्ञान अर्जित कर लें, कितने भी समझदार हो जाएँ, हमें पता होता है कि ये सत्य है, इस मार्ग पर चलेंगे तो समाज के लिए भी लाभकारी होगा, स्वयं के लिए भी लाभकारी होगा, और वो करना हमारा धर्म भी है।
परंतु पता नहीं क्या अंदर होता है, वो हमें उस सत्यता से मोड़कर एक अंधकारमय रास्ते पर ले जाता है। हमें पता होता है कि हम जिस तरीक़े से जो जीवन जिएँगे या फिर जो हम कार्य करने जा रहे हैं, उससे आगे वाले को हानि हो सकती है, और हमें तो हो ही रही है। और "मैं" अपने अंदर देखूँ, तो मुझे बेचैनी भी हो रही है, फिर भी मैं उस चीज़ को करे जा रहा हूँ, करे जा रहा हूँ, करे जा रहा हूँ। बोल रहा हूँ कि "ये अंतिम है, ये अंतिम है!" पर वो कभी अंतिम नहीं होता है और चीज़ें बदलती जाती हैं।
कभी मैं छोटी-छोटी चीज़ें कर रहा था, फिर वो बड़ा रूप ले लेती हैं। तो ऐसे में मैं चाहता हूँ कि वो जो अंदर से मेरे सत्यता को हावी कर रहा है, मेरी सत्यता के ऊपर छाया हुआ है, मैं उस अंधकार को कैसे मिटा पाऊँ?
ये मेरा प्रश्न है।




