तुम्हें मेरी बात से नहीं, तुम्हारे झूठ के टूटने से दर्द है

Acharya Prashant

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तुम्हें मेरी बात से नहीं, तुम्हारे झूठ के टूटने से दर्द है
दो तरह का शोषण चलता आया है धर्म के नाम पर, एक, महिलाओं का; और एक, तथाकथित निचली जातियों और वर्णों का। और लोकधर्म की लगभग बुनियाद है ये शोषण। अब लोकधर्म अगर जात-पात, छुआ-छूत और स्त्री-शोषण, इनके बिना चल ही नहीं सकता; तो जहाँ कहीं भी स्त्रियों को उठाने की बात आएगी और जाति को हटाने की बात आएगी, लोकधर्म उससे बहुत ख़ौफ़ खाएगा। ख़ौफ़ खाएगा और उस बात को कह देगा? ये लेफ्टिस्ट बात है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: क्या आचार्य प्रशांत छुपे हुए लेफ्टिस्ट हैं? उनके हर वीडियो में सनातन के ख़िलाफ़ हमला होता है। क्या इससे हमारी युवा पीढ़ी धर्म से दूर नहीं होगी?

आचार्य प्रशांत: देखो, यहाँ तीन केंद्रीय शब्द हैं: लेफ्टिस्ट, सनातन, धर्म, और जिन्होंने सवाल पूछा है; उनको यहाँ पकड़ के बैठाया जाए तो इन तीनों शब्दों में से किसी का भी अर्थ नहीं जानते होंगे।

तुम्हें क्या पता लेफ्टिस्ट माने क्या होता है? बताओ, क्या होता है? मैं भी पूछूँ तुमसे कि लिबरल, लेफ्टिस्ट, कम्युनिस्ट और मार्क्सिस्ट, इनका अंतर बता दो। तुम बता पाओगे? तुम्हें लेफ्टिस्ट माने क्या पता है? लेफ्टिस्ट कौन होता है? बताओ। मार्क्स की कैपिटल पढ़ी है? अच्छा! छुई भी है? अच्छा वो छोड़ो तुम। इतना-सा कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो है, वो भी पढ़ा है? तुम्हें क्या पता लेफ्टिस्ट माने क्या होता है?

मैं बताता हूँ, लेफ्टिस्ट बोल करके तुम अपने किस भय को शब्द दे रहे हो। समझना ध्यान से, ये जो मुझे लेफ्टिस्ट बोलते हैं, उनकी समस्या क्या है? उनकी समस्या ये है कि दो तरह का शोषण चलता आया है धर्म के नाम पर, एक, महिलाओं का; और एक, तथाकथित निचली जातियों और वर्णों का। और लोकधर्म की लगभग बुनियाद है ये शोषण। बहुत सारे जो समाज-सुधारक हुए, उन्होंने तो ये कह दिया कि हिन्दू धर्म कुछ है ही नहीं अगर उसमें से जाति निकाल दोगे। अंबेडकर ने हिन्दू धर्म को सुधारने के सारे प्रयास कर लिए, अंत में वो यही कहकर के बाहर निकले कि हिन्दू धर्म और जाति व्यवस्था, ये अविभाज्य हैं, ये अनन्य हैं। और बिल्कुल ये सही बात है कि लोकधर्म ऐसा ही है। समझ रहे हो?

अब लोकधर्म अगर जात-पात, छुआ-छूत और स्त्री-शोषण, इनके बिना चल ही नहीं सकता; तो जहाँ कहीं भी स्त्रियों को उठाने की बात आएगी और जाति को हटाने की बात आएगी, लोकधर्म उससे बहुत ख़ौफ़ खाएगा। ख़ौफ़ खाएगा और उस बात को कह देगा? ये लेफ्टिस्ट बात है। क्योंकि उन्हें और कुछ नहीं पता है वामपंथ के बारे में, इतना पता है कि वहाँ समानता की बात होती है। इतना जानते हैं बस, कि वहाँ समान माना जाता है। वहाँ किसी को विशेषाधिकार नहीं दिया जाता, इतना ही जानते हैं बस। हालाँकि उस बात में भी बहुत सारे पेंच हैं, बहुत तल हैं उस बात के, लेकिन नहीं जानते।

पर उनका मन समझो, उनका मनोविज्ञान समझो। वामपंथी-वामपंथी क्यों कहते हैं मुझे? क्योंकि जो लोकधर्म है उनका, वो दो-तीन चीज़ों के बिना नहीं चल सकता:

एक: जाति-भेद।

दूसरा: स्त्री-शोषण।

और तीसरा: दैवीय कहानियाँ और अंधविश्वास।

ये तीन चीज़ें समझ लो जैसे लोकधर्म के तीन स्तंभ हैं: जाति व्यवस्था, स्त्री-शोषण और दैवीय कहानियाँ और अंधविश्वास। इनके बिना लोकधर्म नहीं चल सकता। इन तीनों में से किसी एक के भी आप ख़िलाफ़ बात करोगे, तो वो आपको नास्तिक बोलना शुरू कर देंगे।

तो इसलिए तीन चीज़ों से लोकधर्मी बहुत घबराते हैं। आप जाति-भेद के ख़िलाफ़ अगर, एक चौथी चीज़ उसमें और जोड़ लो; क्या नाम दूँ कि आप समझ पाओ उसको? वो वर्ण के अंदर ही आ जाएगा, कि जो सारा पैसा है, वो एक वर्ण के पास इकट्ठा होना चाहिए, वो भी उसी में आ जाएगा। तो वर्ण व्यवस्था की फिर दो चीज़ें हो गईं जिनको आप स्तंभ मान सकते हो; पहला तो ये कि जो नीचे का है उससे नीचे वाले काम कराओ, और दूसरा कि एक ऐसा वर्ग होगा जिसको हक़ होगा सारा पैसा अपने पास इकट्ठा कर लेने का।

तो आप जहाँ कहीं भी इन लोगों को देखेंगे, ये दो-चार लक्षण आपको ज़रूर दिखाई देंगे। क्या लक्षण? उन्हें स्त्री-शोषण से कोई तकलीफ़ नहीं होगी; उन्हें सेठ-जी से कोई तकलीफ़ नहीं होगी, बल्कि वो सेठ-जी के बिल्कुल साथ चल रहे होंगे; उन्हें जाति-भेद में बड़ी रुचि होगी, और चौथा; दैवीय कहानियों और अंधविश्वास में उनका बड़ा रुझान होगा। तो इसलिए जैसे ही आप विज्ञान की बात करोगे, वो आपको गाली देंगे, क्योंकि विज्ञान की बात करते ही कौन-सा खंभा हिलता है? अंधविश्वास वाला। जैसे ही आप स्त्रियों के पक्ष में बात करोगे, फिर आपको गाली देंगे, क्योंकि कौन-सा खंभा हिला? स्त्री-शोषण का। तुरंत आपको बोलेंगे, कि ये फ़ेमिनिस्ट है, ये नारीवादी है। बात समझ में आ रही है?

आप जैसे ही फिर जो शोषित वर्ग रहे हैं, दमित, दलित, आप उनके पक्ष में बात करोगे तो तुरंत कहेंगे, ये वामपंथी है; या कि ये ज़्यादा उदारवादी बन रहा है, ज़्यादा लिबरल बन रहा है, लिब्राण्डू! और फिर आप अगर सेठ-जी की बात करोगे, कि सेठ-जी सारा पैसा क्यों लेके बैठे हैं? सारा का सारा पैसा कुछ ही लोगों के हाथों में जाता जा रहा है। तो भी उनको बहुत समस्या आएगी। कहेंगे, “अरे! सेठ-जी का तो हक़ है न कि उनके पास ज़्यादा पैसा इकट्ठा हो। सेठ-जी माई-बाप हैं जब उनके पास ज़्यादा पैसा इकट्ठा होगा, तो वो तुम्हें थोड़ी नौकरी दे देंगे, कुछ पैसा तुम्हें भी लुटा देंगे।” बात समझ में आ रही है?

जो मुझे वामपंथी बोल रहे हैं, उन्हें कुछ वामपंथ का पता थोड़ी ही है; और न मैं वामपंथी हूँ। जो सचमुच वामपंथी हैं, वो थोड़ी मुझे वामपंथी मानेंगे। जो सचमुच वामपंथी हैं, उन्होंने कभी नहीं कहा कि मैं वामपंथी हूँ, क्योंकि उनको पता है नहीं हूँ भाई। वामपंथी मुझे वो बोल रहे हैं, जिनको इन तीन-चार खंभों के हिलने का झटका महसूस हो रहा है। और यही उनकी मुझसे तकलीफ़ है, कि क्यों मैं महिलाओं के पक्ष में बोल रहा हूँ; क्यों मैं कह रहा हूँ कि तुम्हारे जन्म से तुम्हारी जाति-वाति ये सब नहीं निर्धारित होती, बेकार की बात है। क्यों बोल रहा हूँ मैं ये? क्योंकि उनके लोकधर्म के ये पिलर्स हैं, उनकी व्यवस्था की ये बुनियादें हैं। ये सब हट गईं, तो उनकी पूरी व्यवस्था गिर जाएगी।

मैं क्यों बार-बार बोल रहा हूँ कि क्लाइमेट चेंज, जो दुनिया के सबसे 1% अमीर लोग हैं, उनकी करतूत का नतीजा है? मैं क्यों बोल रहा हूँ ये सब? क्योंकि उनकी व्यवस्था ऐसी ही चलती है, 1% ऊपर माई-बाप बैठे हैं, बाक़ी सब नीचे भिखारी बैठे हैं, और ऊपर से माई-बाप कुछ ऊपर से टपका देंगे, तो आप उसके लिए कहेंगे, “वाह! वाह! वाह! क्या मिल गया! बहुत बढ़िया!”

और मैं क्यों कह रहा हूँ कि धर्म का संबंध कहानियों से, चमत्कारों से और अंधविश्वास से नहीं है? क्योंकि उनके जो लोकधर्म है, उसमें धर्म माने यही होता है। ये उनकी असली समस्या है। उनकी असली समस्या समझो, वामपंथी वग़ैरह क्या मतलब फ़िजूल की बात।

इनकी असली समस्या ये है कि उन्होंने जो नकली धर्म चला रखा है, उसके जो चारों नकली खंभे हैं, मैं उस पर प्रहार कर रहा हूँ। ये उनकी असली समस्या है।

वो कभी नहीं बताएँगे कि उनकी असली समस्या क्या है, क्योंकि असली समस्या बताएँगे तो उनकी पोल खुलेगी। तो वो कोई झूठ-मूठ का कारण लेकर के आ जाएँगे, कहेंगे, “देखो, इसमें ये कमी है।” अरे! तुम्हें मुझसे जो समस्या है, सचमुच वो सामने रखो न। तुम्हारी असली समस्या ये है कि मैं क्यों महिलाओं के पक्ष में बात कर रहा हूँ। तुम्हारी असली समस्या ये है कि मैं क्यों कह रहा हूँ कि ये शूद्र वग़ैरह नहीं चलेगा। तुम्हारी असली समस्या ये है। आओ, खुलकर बोलो कि ये तुम्हारी समस्या है, पर तुममें हिम्मत नहीं कि तुम बोलो कि ये तुम्हारी असली समस्या है। तो तुम इधर-उधर की बेकार की बातें करते हो।

तुम कह रहे हो, “उनके हर वीडियो में सनातन के ख़िलाफ़ हमला होता है।”

सनातन माने तो कालातीत होता है। कालातीत पर कौन हमला करेगा? सनातन का तो अर्थ होता है, वो, जिसके ख़िलाफ़ हमला हो ही नहीं सकता। जिसका बाल भी बाँका नहीं किया जा सकता, उसको सनातन कहते हैं।

तो सनातन के ख़िलाफ़ कौन हमला कर सकता है? झूठ बोल रहे हो तुम कि मैं सनातन पर हमला कर रहा हूँ, हमला मैं तुम्हारे झूठ पर कर रहा हूँ। और तुममें सनातन के ख़िलाफ़ इतना अपमान भरा हुआ है, तुम सनातन का इतना अपमान करते हो कि तुमने अपने परंपरागत झूठों को नाम दिया है सनातन का। कितनी गन्दी बात है ये। अब मैं तुम्हारे झूठ पर हमला कर रहा हूँ, तो तुम बोल रहे हो कि “सनातन पर हमला कर रहा हूँ।” सनातन की तो मैं पूजा करता हूँ, और सनातन पर कौन हमला कर सकता है?

प्रश्नकर्ता: क्या इससे हमारी युवा पीढ़ी धर्म से दूर नहीं होगी?

युवा पीढ़ी को तो धर्म के पास मैं ला रहा हूँ। युवा पीढ़ी को तो तुमने अच्छे से धर्म से दूर कर रखा था। आचार्य प्रशांत के बारे में कहीं भी पढ़ोगे या ज़िक्र आएगा, तो एक बात तो मिल ही जाएगी, कि युवा आकर्षित होते हैं इनकी ओर। तो युवाओं को गीता तक तो मैं ला रहा हूँ। तुमने तो जो करतूतें कर रखी थीं, उनसे तो युवा पूरी तरीके से ख़ासकर जो पढ़ा-लिखा युवा है वो पूरे तरीके से धर्म से दूर हो गया था। धर्म के नाम पर तुम ये जो बद्तमीज़ियाँ करते हो, इन्हें कौन-सा पढ़ा-लिखा युवा बर्दाश्त करेगा?

लोगों ने धर्म को छोड़ दिया था ये कहकर कि “धर्म तो पिछड़े लोगों की चीज़ है, कि धर्म का मतलब ही है गंदगी, भीड़, अंधविश्वास, बुद्धिहीनता।” इन सब युवाओं को धर्म से तो मैं जोड़ रहा हूँ, इन्हें धर्म का असली मतलब बताकर के। तो मैं युवाओं को धर्म से दूर कर रहा हूँ या मैं युवाओं तक सनातन को लेकर जा रहा हूँ? मैं वो काम कर रहा हूँ जो तुम्हारे धर्म-गुरुओं को करना चाहिए था। जो तुम्हारे बाबा-जी लोगों को करना चाहिए था। पर तुम्हारे बाबा-जी ही वो हैं जिनकी शक्ल युवा देखना नहीं चाहता। हाँ, गाँव-वग़ैरह का युवा बाबा-जी के पास खड़ा हो जाएगा; पर जो थोड़ा भी पढ़ा-लिखा आदमी है, जो थोड़ी भी बुद्धि रखता है, वो तो सनातन-धर्म से ही इसीलिए दूर हो जाएगा, कि जिस धर्म में इस तरह के बाबा-जी बैठते हैं, मैं उस धर्म का हूँ ही नहीं। मुझे होना ही नहीं उस धर्म में।

तुम्हारे बाबा-जी और ये सब लोग न सनातन के लिए बहुत बड़ा अभिशाप हैं, और बहुत बुरा विज्ञापन हैं। आज का जो जवान युवा है वो धर्म से तो पूरी तरह छिटक चुका है। और क्यों छिटक चुका है? क्योंकि वो यही सब देखकर, कि धर्म के नाम पर तुम कितना शोषण करते हो, कि सारी मूर्खताओं को तुमने धर्म का नाम दे रखा है। इसीलिए तो धर्म से दूर हो गया न। उनको अब वापस उपनिषदों के पास और गीता के पास कौन ला रहा है? मैं ला रहा हूँ। तो मैं युवाओं को धर्म से दूर कर रहा हूँ? अरे, मुझे तो पुरस्कार-वग़ैरह दो भाई, कुछ “सनातन-हृदय-सम्राट” वग़ैरह बोलो कुछ। ऐसा होना चाहिए; सचमुच।

धर्म से छिटके हुए जितने लोगों को मैं धर्म के पास लेकर आया हूँ और अभी लाऊँगा अगर जीता रहा तो। मैं तो सनातन का सेवक हूँ और तुम कह रहे हो कि मैं युवाओं को धर्म से दूर कर रहा हूँ। ना-ना-ना।

अब जो कह रहे हैं, कभी उनसे भी तो पूछा करो, तुम कौन हो? उनके मंसूबे क्या हैं? ये नहीं जानना चाहोगे? तुम मेरे पास बस उनके आक्षेप लेकर आ जाते हो, कि “देखिए, आपके ऊपर न ऐसी बात बोल दी फलाने ने।” उन्होंने मेरे ऊपर बोल दिया तो तुमने तुरंत मेरी ओर बंदूक तान दी! अरे, जिसने बोला कभी उससे भी तो नाम-पता पूछ लिया करो।

कोई कह रहा है “आचार्य-जी ऐसे हैं, वैसे हैं, पैसे हैं, तैंसे हैं, लैंसे हैं।” आचार्य-जी जैसे भी हैं, तू जो इतना कुछ बोल रहा है, तू कौन है? तू भी तो बता, तेरे मंसूबे क्या हैं? तू कह रहा है कि आचार्य-जी सनातन का ये कर रहे हैं। तू बता, तूने सनातन के लिए क्या किया? तू कितना बड़ा सनातनी है? सनातन का अर्थ ही बता दे। तू कौन है?

मैं युवाओं को सनातन से दूर नहीं कर रहा, और जो इल्ज़ाम लगा रहे हैं वो इल्ज़ाम इसलिए लगा रहे हैं, क्योंकि उनकी दुकानें बंद हो रही हैं। वो हैं जो सनातन के नाम पर शोषण कर रहे हैं हर तरीके से, और शताब्दियों से। और ये दुकानें बंद कराने वाला भी मैं पहला नहीं हूँ; जो पूरा भक्तिमय संत-मार्ग ही था, वो समाज-सुधार का ही कार्यक्रम था। वो लोकधर्म की दुकानें बंद कराने वाला ही कार्यक्रम था।

देखा करो अच्छे से, जब भी कोई आकर मुझ पर इल्ज़ाम लगाए, देखा करो कि ये कौन है। इसका बैकग्राउंड क्या है, जो इल्ज़ाम लगा रहा है। और तुम्हें कुछ बातें बड़ी कॉमन मिलेंगी, ये सब वो हैं जिन्होंने जाति-व्यवस्था का लाभ उठाया है। ज़्यादातर उनको ही पाओगे। देखा करो कभी, जो मुझ पर आक्रमण करने आ रहा है, समझो तो कहाँ से आ रहा है वो। और अगर कोई वो है जो वर्ण-व्यवस्था में नीचे था वो आक्रमण करने आ रहा है, तो वो मालूम है वो क्यों आ रहा है? उसको लग रहा है कि मैं जाति से ब्राह्मण हूँ, तो इसलिए उसे मुझ पर आक्रमण करना ही चाहिए। वो इसलिए आ रहा है। उसने भी मुझे समझा नहीं है; वो बस मेरा सरनेम देखकर आ गया गाली देने।

दो ही सबसे बड़े शिकार थे: एक औरत और एक दलित, और तीसरा आम-आदमी का पैसा; झूठ-फ़रेब, पाखंड, कर्मकाण्ड बता-बता के पैसा कमाना। तो जो मेरे ऊपर ये इल्ज़ाम लगाते हैं, ठीक है उनकी बात सुनो, फिर उनसे उनका परिचय भी पूछो। कोई ट्विटर-हैंडल है, वो मुझे गाली दे रहा है, ये भी तो देखो वो क्या है। वहाँ तुम्हें आमतौर पर कुछ बहुत सेट-पैटर्न दिखाई दे जाएँगे। वहाँ तुमको एक मिनट नहीं लगेगा देखने में कि लोकधर्म की मुहर लगी हुई है। वही हैं सब। तो वो जो भी मुझे बोल रहे हैं, वो उनकी असली समस्या है ही नहीं, जो उनकी असली समस्या है वो सामने लाते नहीं। असली समस्या ये है कि उन बेचारों का शिकार छिन गया है।

ये नहीं कि वो मुझसे दुखी नहीं हैं, वो मुझसे दुखी हैं, पर जिस कारण से दुखी हैं, वो कारण वो तुमको बताते नहीं; असली कारण ये है। इंसानों को घर में जानवर बनाकर बाँध रखा था, उन जानवरों को मैंने ज़बान दे दी। ये है असली समस्या उनकी।

थोड़ा अपनी रिसर्च भी किया करो; कौन कहाँ से आ रहा है, क्या है। यही नहीं देखना होता न कि प्रश्न क्या है, ये भी देखना होता है कि किस केंद्र से आ रहा है। तो आक्षेप तो ठीक है, ये भी देखो कि वो आक्षेप लगाने वाला कौन है। ये जो लगाने वाले हैं, वो सब तुमको एकदम दिखाई देगा बिल्कुल, तुम “आश्चर्य है” बोलोगे। ये सब तो बिल्कुल वहीं से आ रहे हैं! सब के सब वहीं से आ रहे हैं, बिना अपवाद के सब एक ही जगह से आ रहे हैं। आ रही बात समझ में?

दिक़्क़त बस ये है कि जिनका छिन रहा है, उनको दिख रहा है उनका छिन रहा है। जिनको मिल रहा है, उनको चूँकि कभी पाने की आदत नहीं रही, तो वो मान ही नहीं रहे कि उनको मिल रहा है। जिनका छिन रहा है, उनके पास तो सदा से थी चीज़, हाथ में थी, मुफ़्त में उन्होंने उसके मज़े लिए थे। उनको बुरा लग रहा है उनका छिन रहा है। पर जिनको मिल रहा है, वो तो वो लोग हैं जिनको कभी मिला ही नहीं था, तो वो मान ही नहीं रहे कि उनको मिल रहा है।

तो जिनका छिन रहा है वो तो ज़ोर से चिल्ला रहे हैं। जिनको मिल रहा है वो बोल ही नहीं रहे। उसकी ही परिणति है कि जिनको मिल रहा है, उनसे भी मुझे बस ये सवाल मिल रहे हैं। पर जिनको मिल रहा है, उनकी आँखें बंद हैं। वो ऐसे झूमे जा रहे हैं, झूमे जा रहे हैं, क्योंकि मेरी छाँव तले उनको मुफ़्त में मिल रहा है, बिना श्रम किए मिल रहा है। तो उनको पता ही नहीं है कि जो तुम्हें सदियों से नहीं मिला है, जो तुम्हारा हक़ था पर जिससे तुम्हें वंचित रखा गया, वो मैं तुमको दे रहा हूँ। पर आसानी से मिल जा रहा है, बैठे हुए हैं मैं दे रहा हूँ, तो अपना (सो रहे हैं)। और न मुँह में ज़बान है कि जाकर के बोलें, घोषणा करें दुनिया में, कि हाँ, कुछ मिला है। हाँ, जिनका छिना है, वो खूब चिल्ला रहे हैं। वो दुनिया भर में बदनामी फैला रहे हैं। जिनको मिला है, वो जाकर नहीं बोलते।

आप एक छोटा-सा प्रयोग करके देखिएगा, आप किसी भी जो एआई, एलएलएम है, जिसको आप एआई इंजन बोलोगे, आप उससे जाकर के पूछिएगा कि “महिलाओं के लिए वर्तमान में किस आध्यात्मिक गुरु ने या धर्म गुरु ने या स्पिरिचुअल टीचर ने सबसे ज़्यादा काम किया है?” आचार्य प्रशांत का नाम आएगा नहीं, वो दो-चार नाम देगा। तो आप कहिएगा, “पाँच नाम और बताओ।” उसमें भी नहीं आएगा। फिर आप कहिएगा, “दस नाम और बताओ।” उसमें भी नहीं आएगा।

क्यों? क्योंकि ये महिलाएँ जिनकी मैंने मदद करी है, ये इतनी बेज़ुबान हैं कि ये कहीं जाकर न कह पातीं, न बोल पातीं, न लिख पातीं। और जिनके नाम आ रहे हैं, कि “ये लोग हैं जो महिलाओं के पक्ष में बहुत काम कर रहे हैं” आप भौंचक्के रह जाएँगे! वो वो लोग हैं जो स्त्री-उत्पीड़न में आगे हैं सचमुच। जो स्त्रियों को लेकर जो पुरानी पारंपरिक लोक-धार्मिक मान्यताएँ हैं उन्हें आगे बढ़ा रहे हैं। उनके नाम आ रहे हैं कि ये लोग हैं जो वीमेन-एम्पावरमेंट में काम कर रहे हैं।

और ये कोई छोटी बात नहीं है, ये कोई छोटी बात नहीं है। अंत में आम जनता के लिए रह तो वही जाता है जो लिखा हुआ है। महाभारत क्या है? जो पांडवों के वंशजों ने आपको दे दी है।

जो हार गए, जिनको अपनी बात कहने का मौका नहीं मिला, उनकी बात इतिहास में खो जानी है। और जिन्होंने अपनी बात कह ली, उन्हीं की बात सच की तरह स्थापित हो जानी है।

मैं कुछ भी कर रहा हूँ, जब उसको आप जाकर न बोलते, न लिखते; तो मेरी बात पूरी तरह खो जानी है। हाँ, जिनको मुझसे चोट लग रही है, वो अपनी बात खुलकर बोलते हैं तो उनकी बात फिर सत्य की तरह स्थापित हो जाएगी।

सोचो, दुर्योधन जीता होता, तो महाभारत में क्या वही सब लिखा होता जो आज लिखा हुआ है? सोचना, कभी ऐसा सोचा नहीं होगा। पाण्डवों के वंशजों ने लिखी है, तो सूर्योधन दुर्योधन हो गया। सोचो, जिसका नाम ही बदल दिया, उसकी ज़िंदगी की घटनाएँ कितनी बदल दी होंगी। सोचो, कोई अपने बेटे का नाम दुःशासन रखता है? सोचो, कि चिढ़ ऐसी कि नाम तक बदल दिए, इतनी जैसे मेरा नाम बदल देते हैं चिढ़ के मारे। अंतर बस ये है कि वहाँ वो कृष्ण के ख़िलाफ़ खड़ा था और मैं कृष्ण के साथ खड़ा हूँ, तब भी क्योंकि आप गूँगे हो, आपके ज़बान नहीं है।

उससे क्या मुझे कोई समस्या होगी? मेरी जितनी भी अभी ज़िंदगी है, दस-बीस-पच्चीस साल की मैं तो मर जाऊँगा; पर मैंने जो कुछ कहा अगर वो इतिहास में पहुँच गया एक नेगेटिव तरीके से, तो आगे कोई भी ये बात कहते हुए हिचकेगा। आप ये कर रहे हो। जो मैं बोल रहा हूँ, ये आसानी से कोई वैसे भी नहीं बोलता। कई दशकों में, कई बार, कई शताब्दियों में कोई बोलने आता है, और जब मैं बोल रहा हूँ तो।

सोचो, दुर्योधन के वंशजों ने अगर महाभारत लिखी होती, तो क्या उसमें गीता होती? होती भी तो किस तरह होती? तो मैं जो कुछ आपको दे रहा हूँ, ये सब मिट जाना है। और आने वाली पीढ़ियों को इससे कोई लाभ नहीं मिल पाएगा आपके गूँगेपन के कारण।

मैं मस्त हूँ, मेरा कुछ नहीं जा रहा। मेरे तो कोई औलादें हैं नहीं, पीढ़ी की सीढ़ी तो आपने लगाई है, तो आपकी ही पीढ़ियाँ वंचित रह जाएँगी जो मैंने दिया है उससे। और मेरी कही हुई बात फिर कभी कोई कहने का साहस नहीं कर पाएगा, क्योंकि आप गूँगे हो। आ रही बात समझ में? और ये भी नहीं कि आप गूँगे हो, आपके पास शब्द हैं पर आपके मुँह में शब्द भी उन्होंने ही भरे हैं, जिनसे मैं आपको बचाकर ला रहा हूँ। आप अभी भी उन्हीं की ज़बान बोल रहे हो, आप में हिम्मत ही नहीं पड़ रही है पूरे तरीके से आज़ाद हो जाने की।

आप समझो तो सही कि जो आप ये आपत्तियाँ लेकर के आते हो, किसी को सचमुच ये आपत्तियाँ मुझसे हैं ही नहीं। उनकी मूल आपत्ति दूसरी है। उनकी मूल आपत्ति ये है कि सदियों से जो उनकी मौज चल रही थी, अन्याय कर-कर के जो मौज थी वो मौज अब ख़तरे में है। बस ये है उनकी, ये है समस्या असली।

जो कोई आए बोले, ये करते हैं, वो करते हैं, आचार्य में ये बुराई, वो बुराई; पहले तो ये समझना सीखो कि जो वो मेरी शिकायत कर रहा है वो असली शिकायत है ही नहीं उसकी। उसके मन में जो असली शिकायत है, वो दूसरी है। और जो असली शिकायत है वो इतनी गंदी है कि वो उसको ज़बान पर नहीं ला पाएगा। किस तरीके की असली शिकायत? बता देता हूँ।

“पहले मैं सफलतापूर्वक अपनी बीवी का उपयोग कर पाता था, बीस साल से कर रहा था। अठारह की थी तब आई थी, अभी अड़तीस की है, बीस साल से जब चाहता था मिल जाती थी। अब बीवी की चेतना आ गई है, हाँ बिल्कुल। लेकिन अब ये समस्या वो आगे बताएगा थोड़ी, कि आचार्य जी ने मुझे तो बिल्कुल मूलाधार में लात मारी है। ये वो थोड़ी बता पाएगा, शर्म आएगी बताने में। तो क्या बोलेगा? “नहीं ये न वो गीता का अर्थ विकृत कर रहे हैं।” उसको ये समस्या ही नहीं है कि गीता का अर्थ विकृत कर रहे हैं, क्योंकि गीता से इतना प्यार उसे कभी था ही नहीं कि गीता का अर्थ विकृत हो तो वो परेशान हो जाए। उसके लिए असली समस्या जो है, वो दूसरी है। वो बताएगा नहीं असली समस्या।

कोई अपने बेटे को लगा हुआ था कि दुकान पर बैठा देंगे, और फिर बढ़िया है अब पैदा किया है, फसल बड़ी करी है तो फसल काटेंगे भी। और बेटे ने कह दिया, “ये जो तुम बिज़नेस करते हो, ये बिज़नेस ही मुझे पसंद नहीं है। ठीक नहीं है तुम्हारा बिज़नेस दुनिया को ख़राब करने वाला, धुआँ छोड़ने वाला और बहुत तरीके की गड़बड़ करने वाला बिज़नेस है। मैं नहीं बैठता तुम्हारे धंधे में, मैं देखता हूँ कुछ और।” ये उसकी असली समस्या है, पर वो ये बताएगा नहीं। वो कहेगा, “नहीं मेरी समस्या ये है कि ये सनातन को ख़राब कर रहे हैं।”

अरे तुम कहाँ के सनातन-प्रेमी हो कि तुम्हें ये समस्या आ गई कि सनातन को ख़राब कर रहे हैं। तुम्हारी असली समस्या ये है कि बेटे से अब वसूलने का टाइम आया था। अब वो वसूली हो नहीं पा रही है, ये है तुम्हारी समस्या। असली बात बताया करो यार।

इतनी आसानी से मान मत लिया करो कि कोई तुम्हारे सामने आ रहा है और बोल रहा है, “आचार्य में ये बुराई है,” तो उसको वही बुराई दिख रही है। नहीं उसको बुराई दिख तो रही है, पर वो नहीं जो वो बता रहा है। जो असली उसकी समस्या है, वो दूसरी है। जहाँ उसको सचमुच चोट पड़ी है, वो दूसरी जगह है। वो बताएगा नहीं।

और मुझे इन्होंने इतना सुना ही नहीं होता है कि वो मेरे दर्शन में ख़ोट निकाल पाएँ। दर्शन में ख़ोट निकाली जा सकती है पर उसके लिए पहले आपको अध्ययन करना पड़ेगा। इन्होंने क्या मेरा इतना अध्ययन किया है कि ख़ोट निकाल लेंगे? तो ये स्ट्रॉ-मैनिंग करते हैं। किसी को बिना जाने, बिना समझे, बिना पढ़े ख़ोट निकालनी है, तो क्या करोगे? कह दोगे, उसने ऐसा बोला और ये गलत है। और मैंने वो बोला ही नहीं। नहीं समझे?

मैं बोल दूँ कि मैं तुझे मार दूँगा आज, मार ही दूँगा, क्योंकि तूने मुझे दोपहर में बावला बोला था। और मैं बहुत ज़ोर-ज़ोर से इसको मार रहा हूँ। कह रहा हूँ, “बोलेगा बावला दोबारा! बोलेगा बावला दोबारा! अब ये बात ठीक लगती है कि “देखो, इसने बावला बोला इसलिए मार रहा है।” पर इस पूरी बात के आधार में ये है कि बावला बोला था? पर बावला तो बोला ही नहीं था। हाँ, ये है कि मुझे इसको मारना था, तो मैंने कह दिया कि इसने बावला बोला था। ये स्ट्रॉ-मैनिंग कहलाती है। कोई ऐसी बात कह दो जो मैंने कभी बोली ही नहीं और फिर कह दो “देखा, ये गलत बात बोल रहा है।” पर वो बात तो मैंने बोली ही नहीं, तो गलत कैसे होगी? ये सही कैसे होगी? कुछ भी नहीं है। वो मेरी बात ही नहीं है।

जो मेरी बात है, वो तुम समझे ही नहीं क्योंकि मेरी बात का तुमने कभी अध्ययन ही नहीं किया है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य प्रशांत क्या शास्त्रों की सेलेक्टिव कोटिंग नहीं करते? शास्त्रों के जो हिस्से उनके एजेंडा से मेल नहीं खाते उन्हें छुपा देते हैं।

आचार्य प्रशांत: भाई, मैं मान रहा हूँ कि शायद किसी हिन्दू ने सवाल पूछा है। सबसे बड़ा जो तुम्हारा शास्त्र है, वो तो भगवद्गीता ही है। सबसे बड़ा उसको नहीं भी मानते, तो सबसे बड़ों की श्रेणी में तो है ही वो कम से कम। मैं तो एक-एक श्लोक पर दो-दो घंटे बोल रहा हूँ, उसमें छुपा के आ रहा हूँ? या ऐसा कर रहा हूँ कि पहले श्लोक के बाद पाँचवाँ, फिर आठवाँ, फिर पन्द्रहवाँ, फिर सत्रहवाँ, ऐसे चल रहा हूँ? तो सेलेक्टिव कोटिंग क्या कर रहा हूँ? बल्कि जितने विस्तार से मैं बोल रहा हूँ एक-एक श्लोक पर, इतने विस्तार से तो आज तक किसी ने बोला ही नहीं; तो सेलेक्टिव कोटिंग कहाँ कर रहा हूँ? और कोई शब्द है किसी श्लोक का जो मैं छुपा जाता हूँ, कि खा जाता हूँ?

हाँ, ये ज़रूर है कि उन शब्दों के जो अर्थ तुमने मान रखे थे, मैं उन अर्थों को दर्शन की स्पष्टता दे देता हूँ। तो सेलेक्टिव कोटिंग क्या है? कहाँ है वो सेलेक्शन? दिखाओ तो।

मैंने किसी उपनिषद् पर अगर बोला, तो पूरा उपनिषद् ही ले ले के बोल देता हूँ। या भजन ले लेता हूँ, तो ऐसा करता हूँ कि भजन में दो पंक्तियाँ उठा लीं, बाक़ी छोड़ दीं? ऐसा करता हूँ? यहाँ हम ऐसा करते हैं कि एक भजन ही तीन महीने तक हमारा चलता है। आज तक ये किसने किया है कि एक भजन की एक पंक्ति पर पूरा एक सत्र हो जाए? तो ये सेलेक्टिव कोटिंग क्या है? ये कह रहे हैं कि आप कुछ हिस्से उठाते हो, बस उतने ही बता देते हो। मैंने कौन-से हिस्से उठा के बता दिए? बताओ तो।

अष्टावक्र-गीता चल रही है; कठोपनिषद् चल रहा है; एक के बाद एक श्लोक आ रहे हैं। न तो मैं कभी क्रम तोड़ता, और न कभी किसी श्लोक को लाँघ कर आगे बढ़ता हूँ। तो मैंने सेलेक्टिव कोटिंग कहाँ कर दी? कैसे? बताओ तो।

जब कोई आकर बोले, तो उसको बैठा लो। फिर कह रहा हूँ, पूछो, बताओ, अच्छा, कौन-से ग्रंथ की सेलेक्टिव कोटिंग करी है? बताओ तो। कौन-से ग्रंथ की करी है? ताओ ते चिंग की करी है? भजनों की करी है? उपनिषदों की करी है? किसकी करी है, बताओ तो?

“जो हिस्से उनके एजेंडा से मेल नहीं खाते, उन्हें छुपा देते हैं।” जो शास्त्र में है वही मेरा एजेंडा है। और अगर शास्त्र में कुछ ऐसा है कि मुझे छुपाना पड़े, तो फिर मैं उसको शास्त्री नहीं मानूँगा।

एजेंडा है मेरा, सच्चाई। और जो किताब ऐसी हो कि उसमें कुछ बातें छुपानी पड़ जाएँ, उसको मैं शास्त्र मानता ही नहीं।

मैं ये नहीं करूँगा कि किताब के वो हिस्से छुपा दूँगा, मैं वो पूरी किताब ही हटा दूँगा। अगर उसमें कुछ बातें ऐसी हैं जो गड़बड़ हैं, तो मैं वो किताब उठाऊँगा ही नहीं। हटा दो। क्यों उठाएँ? हाँ, रचनाकार के प्रति सम्मान और संवेदना ज़रूर रखता हूँ, क्योंकि मैं कृतित्व की प्रक्रिया से परिचित हूँ। मैं जानता हूँ कि बात कालातीत होती है, पर बहती एक काल-सापेक्ष मनुष्य के माध्यम से है। तो फिर जो उसकी अभिव्यक्ति होती है, उसमें कुछ काल-सापेक्ष तत्त्व आ जाते हैं। उतनी मैं संवेदना रखता हूँ रचनाकार के प्रति।

उदाहरण के लिए, हो सकता है मैं आपसे कोई बहुत ऊँची बात कर रहा हूँ, पर आप यहाँ बैठे हुए हो, दो लोग सोना शुरू कर दें, तो मैं बीच में उनको डाँट दूँगा। अब आप कहें कि ये जो सत्र हुआ है, चलो इसी को लिपिबद्ध करके इसकी हम किताब निकाल देते हैं, तो किताब में ये भी आ जाएगा कि “उठो, यहाँ पर आके बैठो, इसके मुँह में पानी डाल दो, उसको थप्पड़ मार दो, इसके ऊपर तौलिया फेंक दो, ये सब कर दो।” तो फिर मैं रचनाकार के प्रति इतनी संवेदना रखूँगा, कि भाई, ये जो बात है, ये काल-सापेक्ष है। कालातीत तत्त्व था पर माहौल तो कालातीत नहीं था न।

उस कालातीत तत्त्व को एक विशेष माहौल में अभिव्यक्ति मिली, और उस अभिव्यक्ति में कुछ हिस्से विशुद्ध पानी हो, पर उसको जिस पात्र में रखोगे उस पात्र का कुछ हिस्सा उस पानी में मिल जाएगा न। पानी एकदम निर्मल-शुद्ध हो सकता है, पर पात्र के गुण थोड़े-से पानी में आ जाते हैं। इतनी मैं सहानुभूति रखता हूँ रचनाकार के साथ, बस इतनी-ही लेकिन।

प्रश्नकर्ता: आचार्य प्रशांत से पहले इतने विद्वान हुए हैं, हम आचार्य प्रशांत की क्यों सुनें?

आचार्य प्रशांत: अरे! झुन्नू, दो-चार विद्वानों के तुम नाम ही बता दो। बैठा लो उसको, बोलो अच्छा बताओ, कौन-से विद्वान? बताओ, कौन-से विद्वान हैं जिनको तुम जानते हो? और तुम सचमुच किसी विद्वान को जानते होते, तो आचार्य प्रशांत के साथ खड़े हो जाते तुम। तुम किसी विद्वान को नहीं जानते, ये बात हैरत की है, लेकिन सच है। आम आदमी किसको जानता है? हींग, तौलिया, कच्छा, आम आदमी ये जानता है। मैं कहूँ, तुम प्लेटो को जानते हो? तो क्या बोलेगा? “हाँ-हाँ, प्लेटों को, रसोई में हैं प्लेटें, प्लेटों को तो मैं जानता ही हूँ।”

मैं कहूँगा, प्लेटो की किताब? तो किताब पर प्लेट रख के आ जाएगा। तू कौन-से विद्वान को जानता है? बता तो सही। तूने किस विद्वान को पढ़ा है आज तक? और जिन्होंने सचमुच विद्वानों को पढ़ा होता है, जाना होता है, वो वैसी बातें नहीं करते जैसी तू कर रहा है। तूने बस थोड़ी-बहुत शिक्षा ले ली है कि तेरा घर और पेट चलता रहे, वरना तू अनपढ़ है। तुझे क्या पता है? बस यूँ-ही जुमला उछाल दिया, “आचार्य प्रशांत से पहले कई विद्वान हुए हैं।”

जो विद्वान हुए हैं आचार्य प्रशांत से पहले, आचार्य जी तो उनके पाँव पूजते हैं। उन्हीं सबको तो तुम्हारे पास लेकर के आ रहे हैं, कि उनके विरोध में खड़े हैं? इतिहास में जहाँ कहीं भी, पूरे विश्व में, जो भी विद्वान हुआ है उसे तो मैं आपके सामने ले आता हूँ, परोसता हूँ, सेतु बनता हूँ। वो विद्वान तो मेरे साथ हैं और मैं उनके साथ हूँ। तुम बताओ, तुम किन विद्वानों की बात कर रहे हो? तुम्हारे विद्वान कौन हैं मैं बताता हूँ, नुक्कड़ वाले टंडन जी, दूसरी मंज़िल वाला सन्नी भैया, ये तुम्हारे विद्वान हैं।

किसी को हिट एंड रन मत करने दिया करो, कि आया, उसने कुछ बोला और भाग गया। जैसे-ही बोले, बैठाओ “बैठो-बैठो, तो आज विद्वानों पर चर्चा करेंगे।” और टाइमर लगा दो कि दो घंटे से पहले नहीं उठेंगे। बोलें, “हाँ, बताइए, कौन-कौन-से विद्वान हैं, और उनकी कौन-सी बात को आचार्य जी नकारते हैं? बताइए, किन विद्वानों की आप बात करना चाहते हैं? बताइए।”

और जब वो ये सब बता रहा हो, तो उतनी देर में उसका बैकग्राउंड चेक कर लेना। वही मिलेगा जो मैंने बताया। उसकी समस्या ये है ही नहीं कि विद्वानों की बात क्या है। उसकी समस्या क्या है? पुरानी धारणाएँ, पुराने ढर्रे, पुराने स्वार्थ, चोट पड़ रही है। और कोई समस्या नहीं है। विद्वान वग़ैरह; अरे, ये ऊँचे लोगों की बातें हैं। तुम्हारी ज़िंदगी में कहाँ ये विद्वानों वग़ैरह के लिए जगह है? तुम क्यों इस तल पर आकर आक्षेप भी लगा रहे हो? तुम्हारी ज़िंदगी यही है, “मेरी मुर्गी चुरा ली, भैंस दूध नहीं देती;” ये सब तुम्हारे तल के कार्यक्रम हैं, इनमें विद्वान कहाँ आ गए? तुम्हें विद्वानों से इतनी मोहब्बत? ग़ज़ब!

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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