दो तरह का शोषण चलता आया है धर्म के नाम पर, एक, महिलाओं का; और एक, तथाकथित निचली जातियों और वर्णों का। और लोकधर्म की लगभग बुनियाद है ये शोषण। अब लोकधर्म अगर जात-पात, छुआ-छूत और स्त्री-शोषण, इनके बिना चल ही नहीं सकता; तो जहाँ कहीं भी स्त्रियों को उठाने की बात आएगी और जाति को हटाने की बात आएगी, लोकधर्म उससे बहुत ख़ौफ़ खाएगा। ख़ौफ़ खाएगा और उस बात को कह देगा? ये लेफ्टिस्ट बात है।
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प्रश्नकर्ता: क्या आचार्य प्रशांत छुपे हुए लेफ्टिस्ट हैं? उनके हर वीडियो में सनातन के ख़िलाफ़ हमला होता है। क्या इससे हमारी युवा पीढ़ी धर्म से दूर नहीं होगी?
आचार्य प्रशांत: देखो, यहाँ तीन केंद्रीय शब्द हैं: लेफ्टिस्ट, सनातन, धर्म, और जिन्होंने सवाल पूछा है; उनको यहाँ पकड़ के बैठाया जाए तो इन तीनों शब्दों में से किसी का भी अर्थ नहीं जानते होंगे।
तुम्हें क्या पता लेफ्टिस्ट माने क्या होता है? बताओ, क्या होता है? मैं भी पूछूँ तुमसे कि लिबरल, लेफ्टिस्ट, कम्युनिस्ट और मार्क्सिस्ट, इनका अंतर बता दो। तुम बता पाओगे? तुम्हें लेफ्टिस्ट माने क्या पता है? लेफ्टिस्ट कौन होता है? बताओ। मार्क्स की कैपिटल पढ़ी है? अच्छा! छुई भी है? अच्छा वो छोड़ो तुम। इतना-सा कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो है, वो भी पढ़ा है? तुम्हें क्या पता लेफ्टिस्ट माने क्या होता है?




