हम कहते हैं न कि ये पाँच इन्द्रियाँ तो झूठ दिखाती हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ सब झूठ हैं। ‘सच देखना है तो दो आँखों से नहीं, तीसरी आँख चाहिए होगी।’ कहते हैं न ये सब? और हम कहते हैं, ‘कानों से सच सुनाई नहीं देता, सच तो मौन में है, शब्द में नहीं।’ कहते हैं? वास्तव में वो बातें भी अतिश्योक्ति जैसी हैं। इन्हीं दो आँखों से सच दिखाई देता है, इन्हीं दो कानों से सच सुनाई भी देता है। अनहद इन्हीं दो कानों से सुनोगे, नीयत होनी चाहिए।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: एक व्यक्तिगत प्रश्न है कि जैसे-जैसे बात समझ में आती है तो लगता है कि अगर आपको एक सही जीवन जीने की आवश्यकता है तो दुनिया की समझ होना बहुत ज़रूरी है।
तो विज्ञान में रुचि लगती है कि होनी चाहिए, आपको पता होना चाहिए कि दुनिया काम कैसे करती है, सामान्य भौतिकी क्षेत्र का ज्ञान। तो जैसे आपने बोला कि आपका किसी भी तरीके की सूचनाओं या आँकड़ों से ऐसे उठ जाता है। तो क्या ये जो मेरी रुचि है, ये यही दर्शाती है कि अभी ज्ञान उतरा नहीं, अभी भी मुझे दुनिया में ही रुचि है?
आचार्य प्रशांत: जिस भी चीज़ की तुम्हें रुचि है, अगर उसका उद्देश्य अपने भीतर के भ्रम को काटना है, तो ठीक है। जो कुछ भी तुम्हारी हस्ती को गलाए, जो भी कुछ तुम्हारी पुरानी धारणाओं को हटाए-मिटाए, वो अच्छा है तुम्हारे लिए।
ज्ञान का उद्देश्य इस दुनिया में बढ़िया जीविकोपार्जन वगैरह नहीं होता — हालाँकि हमने ज्ञान को ऐसा ही बना रखा है। कोई कहेगा, ‘मेरे ज्ञान का उद्देश्य है कि मुझे डिग्री मिल जाए’, कोई कहेगा, ‘पैसा मिल जाए।’




