तीर्थ यात्रा के लिए हेलीकॉप्टर हैं और पूरे रोपवे बना दिए गए हैं, खच्चर-घोड़े पर अत्याचार करके वहाँ तक जाते हैं — ये पशुपति के प्रेम का प्रतीक है? तीर्थ वहाँ स्थापित किया गया था कि जा सकते हो अगर, तो पैरों पर चलकर जाओ। यह रेगुलेट होना चाहिए, चार-चार महीने की वेटिंग लगनी चाहिए ताकि जो सचमुच गंभीर हो, वही लोग जाएँ। पहाड़ के लोगों को सब्सिडीज़ दो, उनकी ज़िंदगी आर्थिक रूप से भी बेहतर हो जाएगी लेकिन पहाड़ क्यों बर्बाद कर रहे हो?
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आचार्य प्रशांत: उत्तराखंड को बर्बाद करके उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल बच लेंगे क्या? क्यों नहीं बचेंगे? एक छोटा सा नाम है, गंगा। आपने गंगोत्री का जो हाल कर दिया है, उसके बाद ये आवश्यक नहीं है कि बाढ़ ही आए। जब ग्लेशियर नहीं रहेगा, तो गंगा जी कहाँ से रहेंगी? और वो बन गया पर्यटन स्थल, और पर्यटन का मतलब ही होता है "भोगना।"
वहाँ जा किसलिए रहा हूँ पैसा वसूलने के लिए। काहे कि जाना महँगा होता है भाई, तो वहाँ जाएँगे तो पूरा वसूल के आएँगे। और वसूलने का मतलब ही होता है कि पर्वत का बलात्कार करके आएँगे पूरा, गँवार किस्म का टूरिज़्म — चिप्स के पैकेट, बिसलेरी की बोतलें। कितने ही झरने हैं, वहाँ तो हर 200 मीटर पर कोई झरना होता है। ख़ास तौर पर बरसाती झरना, वैसे सूख जाता है, बरसात में बहता है।
आप देखिएगा ग़ौर से वो कितने ही झरने हैं जो सिर्फ़ प्लास्टिक के कारण अवरुद्ध हो गए हैं, वो बह ही नहीं सकते अब, प्लास्टिक ने उनको रोक लिया है। और रुकता जाता है पानी, रुकता जाता है — ऊपर से तो आ ही रहा है, बर्फ़ पिघल रही है। रुकेगा, रुकेगा, फिर क्या करेगा? फिर तोड़फोड़ मचाएगा या फिर जहाँ रुक रहा है वहाँ की चट्टान को वो घोल देगा। जब घोल देगा तो क्या होगा? सब कुछ नीचे आ जाएगा।




