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तीर्थस्थान का रहस्य, और तीर्थयात्रा का असली अर्थ || आचार्य प्रशांत, केदारनाथ यात्रा पर (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इस सत्संग के लिए केदारनाथ का मंदिर ही क्यों चुना गया? यह तो हमारे आश्रम में भी हो सकता था। कृपया मंदिरों और तीर्थ स्थानों की उपयोगिता पर प्रकाश डालें।

आचार्य प्रशांत: देखो, जब कहते हो कि तीर्थों की या किन्हीं मंदिरों इत्यादि की उपयोगिता क्या है, लाभ क्या है उससे, तो ये मत पूछो कि मंदिर से लाभ क्या है; ये पूछो कि ‘मैं किसके लिए लाभ की बात कर रहा हूँ?’ ये पूछना हम हमेशा भूल जाते हैं क्योंकि अहम् का अनिवार्य लक्षण होता है कि वो अपनी ओर नहीं देखता, जगत् की ओर देखता है। उसके लिए जगत् ही सत्य है। तो उसको फिर सामने मंदिर दिखाई दे रहा होगा तो वो तत्काल सवाल करेगा कि ‘इस मंदिर से फ़ायदा क्या है?’ वो ये नहीं पूछेगा कि ‘इस मंदिर से किसको क्या फ़ायदा है?’ तो फ़ायदा कितना है और किस दिशा में फ़ायदा है वो इसपर निर्भर करता है कि आप क्या हैं, आप क्या बन कर जा रहे हैं मंदिर या तीर्थ इत्यादि की ओर। समझ रहे हैं बात को?

चलिए मैं स्पष्ट कर देता हूँ। बहुत सारे घोड़े वाले, टट्टू वाले मिले, बहुत सारे ढाबे वाले मिले रास्ते में; आप यहाँ चढ़ाई चढ़ रहे थे, तो ये सबकुछ मिल रहा था कि नहीं? छोटी-मोटी अन्य तरह की दुकानें भी मिल रहीं थी। तो उनको केदारनाथ से फ़ायदा है या नहीं है? बिलकुल है, पर उनको वही फ़ायदा है जो वो हैं। फ़ायदा तो उन्हें हो ही रहा है, पर उन्हें क्या फ़ायदा हो रहा है?

तुम दुकानदार बनकर अगर केदारनाथ के निकट हो, तो तुम्हें फ़ायदा मिलेगा, क्या फ़ायदा मिलेगा? तुम्हारा ढाबा चल रहा है, तुम्हारे टट्टू चल रहे हैं। और उस व्यक्ति के लिए शायद लाभ की कोई दूसरी परिभाषा है भी नहीं। तो वो आपके आगे आएगा और कहेगा, ‘देखो भाई, भोले बाबा के आशीर्वाद से मुझे बहुत लाभ हो रहा है।‘ क्या बोलेगा? ‘भोले बाबा के आशीर्वाद से मुझे बहुत लाभ हो रहा है।‘ आप कहेंगे, ‘देखा! भोले बाबा के आशीर्वाद से लाभ तो होता ही है। एक और आदमी ने आकर गवाही दे दी कि भोले बाबा के आशीर्वाद से लाभ हो रहा है।‘

हम ये देखना भूल जाते हैं कि किसको लाभ हो रहा है और क्या लाभ हो रहा है। और नुक़सान भी हो सकता है। नुक़सान भी आपको क्या होता है और कितना होता है, वो निर्भर करता है कि आप क्या बने बैठे हैं। बात समझ रहे हो?

ये आपने यहाँ पर कुछ कला बनाई है (ज़मीन की ओर इशारा करते हुए), ठीक है? ज़रूर इसका शिव से कुछ सम्बन्ध है। गंगा के पत्थर होंगे, वही संदर्भ है इस जगह का, तो उसमें आपने इसको बनाया है। यहाँ पर एक छोटा-सा बच्चा आ जाए, वो इसको देखकर बिलकुल खुश हो जाएगा। उसको लाभ हो गया, क्या लाभ हो गया? उसे खिलौना मिल गया। तो लाभ तो हो गया न? वो भी यही कहेगा कि छोटे-छोटे शिवलिंग बड़े लाभ की चीज़ होते हैं। पर क्या लाभ हुआ उसको? खिलौना मिल गया।

इसी तरीके से ये प्रश्न पूछना बहुत उचित नहीं है कि तीर्थ इत्यादि कितना लाभ देते हैं, क्या लाभ देते हैं। ये पूछो कि तुम कौन हो और तुम्हारी लाभ की परिभाषा क्या है। तुम कौन हो और तुम्हारी लाभ की परिभाषा क्या है? तीर्थ जिनके लिए बनाए गए थे, जिनके द्वारा बनाए गए थे, वो लोग ज़रा दूसरे थे। उनकी लाभ की परिभाषा थी, लाभ की सामान्य परिभाषा से मुक्त हो जाना। क्या थी उनकी लाभ की परिभाषा? लाभ की जो सामान्य परिभाषा होती है, यूज़ुअल डेफ़िनिशन ऑफ़ प्रॉफ़िट , उससे मुक्त हो जाना।

तो ऐसों ने तीर्थों का निर्माण किया, खोज की, और ऐसों के लिए ही खोज की। इसीलिए एक मत पुराने लोगों में आज भी व्याप्त है। आप अगर पुराने धार्मिक लोगों के पास जाएँगे या बनारस इत्यादि के पुराने साधुओं से मिलेंगे, तो वो कहेंगे कि आम जनता जिन तीर्थों पर जाती है वो असली तीर्थ हैं ही नहीं। असली तीर्थ गुप्त रखे गए हैं क्योंकि वो एक खास किस्म के लोगों के लिए ही हैं। आम जनता वहाँ जाए, ये बात न लाभप्रद है, न शोभाप्रद है।

तो जो मौलिक तीर्थ होता है, असली तीर्थ होता है, उससे थोड़ा हटाकर आम जनता के लिए एक सार्वजनिक तीर्थ की स्थापना कर दी जाती है, कि आम लोग यहीं आ जाएँ। क्योंकि आम लोगों को असली तीर्थ चाहिए ही नहीं। असली तीर्थ का मतलब होता है वो जगह, वो माहौल, वो प्रभाव जो आपको केंद्रीय रूप से बदल दे। और आम-आदमी की तीर्थ की परिभाषा है वो जगह जो उसकी केंद्रीय माँगों को पूरा कर दे। ये तो बात ही बिलकुल उल्टी हो गई।

९०, ९५, ९९, शायद ९९.९% लोग तीर्थों पर मनोकामना पूरी करने के लिए जाते हैं। जबकि तीर्थ जिनके द्वारा रचे गए थे वो वो लोग थे जिन्होंने मन और कामना दोनों पर विजय पा ली थी। उन्होंने तीर्थ इसलिए थोड़े ही रचे थे कि आप तीर्थों में आएँगे और इच्छापूर्ति की प्रार्थना करेंगे, वरदान माँगेंगे। बात समझ रहे हैं?

तो किस भाव के साथ जा रहे हो तीर्थ के पास? उससे भी पहले और प्रश्न है कि तीर्थ की तुम्हारी परिभाषा क्या है? तीर्थ माने क्या? जब कोई कहे कि ‘मैं तीर्थाटन पर निकल रहा हूँ’ तो उससे पूछो कि ‘तीर्थ माने क्या? क्या करने जा रहे हो? क्या बनकर जा रहे हो? क्या चाहकर जा रहे हो? और वहाँ करोगे क्या? तुम ये जो प्रक्रिया करने जा रहे हो, इससे तुम्हारा आशय क्या है?’

लेकिन जितने तीर्थयात्री होते हैं, अगर उनको आप बैठाकर गहराई से ये सवाल पूछ लें कि ‘जा तो रहे हो लेकिन ये तो बताओ कि तीर्थ माने क्या?’ तो या तो वो जवाब देंगे नहीं, या कोई मिश्रित-सा, उलझा हुआ, अटपटा-सा जवाब देकर सवाल से पीछा छुड़ा लेंगे। बात समझ रहे हो?

तीर्थ माने क्या? क्यों नहीं हम ये पूछना चाहते कि तीर्थ माने क्या? बात बहुत सीधी है। तीर्थ किसी के लिए होता है न? आज की चर्चा की शुरुआत ही इसी से की थी कि ‘तीर्थ में कौन आया है?’ ये मत पूछो कि तीर्थ क्या है; ये पूछो कि तीर्थ में कौन आया है। तो ‘तीर्थ माने क्या?’ – इस सवाल का जवाब देने के लिए तुम्हें पूछना पड़ेगा, ‘मैं कौन हूँ?’ पर ये सवाल अहम् को बहुत डराता है। ‘मैं कौन हूँ? क्या बनकर घूम रहा हूँ? जो बनकर घूम रहा हूँ उसमें सच्चाई कितनी है?’ तो वो इस सवाल को छोड़कर बाकी सब सवालों को पूछने को तैयार रहता है। ये सवाल नहीं पूछेगा। और तुमने उससे कह दिया कि, ‘नहीं तुम पहले बैठकर विचारो कि तीर्थ माने क्या’ तो घबरा जाएगा।

इसी तरीके से लोग नारे लगा रहे हों – कुछ भी, चाहे कह रहे हों जय श्रीराम, चाहे कह रहे हों बम-बम भोले, चाहे कह रहे हों अल्लाहु अकबर – उनको कहो, ‘आओ, थोड़ा बैठो। तुमने बात शायद बड़ी अच्छी कही है, पर ये तो बता दो कि शिव माने क्या, और राम माने क्या?’ वो या तो कोई अर्धसत्य, कुछ मिथ्या, कुछ कहानी, कुछ धारणा तुम्हें सुना देंगे या फिर अचकचाकर भाग जाएँगे। कहेंगे, ‘ये कोई पूछने की बात है?’

आप आ रहे होंगे, तो आपको बहुत लोग मिले होंगे, ‘जय भोले बाबा!’ अच्छी बात है, जब आप कह रहे हैं, ‘जय भोले बाबा’। पर आपको पता भी है कि आप क्या कर रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसे आप जीवन में तमाम अन्य नारे लगाते हैं वैसे ही आपने एक नारा ये भी लगा दिया? समझ में आ रही बात?

तीर्थ मनोरंजन का स्थल नहीं होते। तीर्थ इसलिए नहीं होते कि जीवन में दो-चार बातें जुड़ जाएँ। तीर्थ मात्र उनके लिए होते हैं जो जीवन की परिधि को नहीं, जीवन के केंद्र को ही बदलने के लिए तैयार हो गए हों। हम परिधि पर चीज़ें बदलने को तैयार हो जाते हैं। परिधि पर चीज़ें बदलना माने जैसे कपड़ा बदलना, घड़ी बदलना। पहले तुम दाढ़ी रखते थे, उसके बाद तुमने उस्तरा चला लिया – ये परिधि बदल गई। तुमने कोई नया चश्मा लगा लिया, तुमने बालों का रंग बदल दिया, तुमने कोई नयी भाषा सीख ली, तुमने कोई डिग्री हासिल कर ली, ये सब क्या है? जीवन की परिधि को बदलना। इसके लिए हम तैयार रहते हैं। और हम और ज़्यादा तैयार हो जाते हैं अगर हमें बता दिया जाए कि इस परिधि को बदलने से आपका मूल्य संवर्धन हो जाएगा, आपमें कुछ वैल्यू एडिशन हो जाएगा।

वैल्यू एडिशन माने समाज अब आपको ज़्यादा कीमत देगा। अब आप एक डिग्री ले आए हो, तो पहले आप बीस हज़ार के आदमी थे, अब आप अस्सी हज़ार के आदमी हो। बात समझ रहे हो? आपने बहुत बड़ा घर कर लिया है, बहुत पैसे कर लिए हैं, गाड़ी इत्यादि कर ली है, तो पहले आप नमस्ते वाले आदमी थे, अब सलाम वाले आदमी हो। बाहर-बाहर इस तरह के परिवर्तनों के लिए हम लगातार तैयार रहते हैं। केंद्र ही बदल जाए, आदमी ही बदल जाए, इसके लिए हम तैयार नहीं होते।

बात ही मुश्किल है। मिटने जैसी बात है। तुम जो थे वही नहीं रहे, कोई और हो गए। तीर्थ उनके लिए है जो परिधि को नहीं, केंद्र को बदलने के लिए तैयार हो गए। तो तीर्थ सबके लिए हैं ही नहीं।

परसों मैं बोल रहा था न कि कबीर साहब गाते हैं:

‘माया महा ठगनी हम जानी भक्तन के मूरत बन बैठी तीरथ में भई पानी’

ये माया है। बात समझ में आ रही है?

एक होते हैं आदि शंकराचार्य, जो तीर्थों की ओर जाते ही नहीं, तीर्थों की स्थापना करते हैं। वो भी आए थे केदारनाथ, ठीक? और एक होते हैं नवविवाहित जोड़े, जो कहते हैं कि हमें बद्री-केदार, जम्मू, यमुनोत्री-गंगोत्री जाना है, या वैष्णो देवी जाना है। नियत में फ़र्क है न? फर्क है कि नहीं है?

मैं अभी किसी भी तरीके के अंधविश्वास का या व्यर्थ धारणा का समर्थन नहीं करता। पर २०१३ में उत्तरांचल में जब भीषड़ बाढ़ इत्यादि आयी, तो लोगों ने कहा कि ये दैवीय प्रकोप है क्योंकि हिमालय को शराब पीने का और हनीमून (मधुमास) का अड्डा बना लिया गया था। जिस हिमालय पर ऋषियों ने, मुनियों ने साधना की, जहाँ से उपनिषद् आविर्भूत हुए, उस जगह पर लोग आने लग गए थे बीयर की बोतलें और कामवासना लेकर। मैं नहीं कह रहा दैवीय प्रकोप है, पर बात किसी ओर इशारा तो करती है न?

तुम क्या बनकर हिमालय पर आ रहे हो? और हिमालय पर तुम दोनों ही केंद्रों से आ सकते हो – तुम्हें राम चाहिए, तो भी हिमालय बड़े काम की चीज़ है। यहाँ जैसा एकांत, यहाँ जैसी प्रकृति, विस्मित कर देने वाली शांति मुश्किल है कहीं और मिले। और अगर तुम भोगी हो, कामुक हो, व्यभिचार के लिए आना चाहते हो, तो भी हिमालय तुम्हारे बड़े काम की चीज़ है। तो अगर कोई कहे कि हिमालय बहुत बढ़िया जगह है, तो तुम्हें पूछना चाहिए, ‘किसके लिए?’

किसी अगस्त्य ऋषि के लिए, किसी शौनक के लिए, किसी याज्ञवल्क्य के लिए भी बहुत अच्छी जगह है, और एसयूवी में बीयर की क्रेट भरकर लाने वालों के लिए भी हिमालय बहुत अच्छी जगह है। क्या बनकर आए हो यहाँ पर? केंद्र को छोड़ने का कुछ इरादा है भी या नहीं है? या बस अपनी जीवनी में, अपने सीवी (शैक्षिक एवं कार्यानुभव सार) में एक बिंदु और जोड़ना चाहते हो, कि ‘हम तो तीर्थ भी कर आए, केदार हो आए, बनारस हो आए, और दस जगह हो आए’? तीर्थ की जो मूल और व्यापक परिभाषा है उसको समझो।

मन का आत्मा की ओर आकृष्ट होना तीर्थाटन है।

मन चला यात्रा पर, किसकी ओर? आत्मा की ओर। और मन को रास्ते में बड़ी उलझनें मिलीं – ये तीर्थाटन है। तो एकमात्र तीर्थ क्या है फिर? आत्मा।

आत्मा एकमात्र तीर्थ स्थल है।

मन तीर्थयात्री है और गुरु तीर्थंकर है। आत्मा तीर्थ है, मन तीर्थयात्री है, और गुरु तीर्थंकर है जो मन को रास्ता दिखाए – ये तीर्थाटन की वास्तविक बात हुई।

सूक्ष्म बात है, अंदरूनी बात है। यही अंदरूनी बात जब तुम्हारे बाहरी आचरण में दिखाई देती है, तो तुम कह सकते हो कि अब मैं बाहर-बाहर से भी तीर्थयात्री हूँ। मन भीतर है, मन चला आत्मा की ओर। जब मन आत्मा की ओर चला, तो ये हाथ, ये पाँव, ये शरीर भी तो किसी ओर चलेंगे न? अब शरीर भी उसकी ओर जाएगा जो उसको सत्य से मिला दे – ये तीर्थयात्रा हुई।

तीर्थयात्रा समझे? मन का आत्मा की ओर जाना तीर्थाटन है। ये सूक्ष्म बात हुई। और स्थूल रूप से जीव का, व्यक्ति का शांति की ओर बढ़ना, तीर्थयात्रा हुई। उस जगह पर जाना जहाँ पर वास्तव में तुम्हारा दुख-दरिद्र, क्लेश, भ्रम, माया मिटते हों, ये हुई तीर्थयात्रा। समझ में आयी बात?

अब प्रश्न उठता है कि फिर रचने वालों ने किन्हीं खास जगहों पर तीर्थों की स्थापना क्यों करी? उन्होंने इसलिए करी क्योंकि वो जगहें ही कुछ ऐसी थीं, और उन जगहों तक आने की यात्रा कुछ ऐसी थी कि मन को सबक मिलते थे, सीख मिलती थी। मन को उसके सामान्य परिवेश से बहुत अलग किसी चीज़ के दर्शन होते थे। तो उन्होंने कहा कि ये तीर्थ हैं।

और यही वजह है कि बहुत सारे तीर्थ अगम्य जगहों पर हैं – जहाँ आना बड़ा मुश्किल है। ठीक वैसे जैसे जीवन में मुक्ति के लिए संघर्ष करना पड़ता है, वैसे ही जीव जब तीर्थ पर आए तो आवश्यक है कि संघर्ष करके आए। अंदरूनी संघर्ष भी, और बाहरी भी। अंदरूनी संघर्ष क्या है? मन बार-बार कह रहा है, ‘ज़रूरत क्या है?’ और बाहरी संघर्ष क्या है? तन कह रहा है, ‘बहुत थक गए, छोड़ो न।‘

जब जीवन में मुक्ति नहीं मिलती बिना संघर्ष के, तो वो तीर्थ कैसा जहाँ तुम बिना संघर्ष के पहुँच गए? जैसे जीवन में मुक्ति के लिए संघर्ष चाहिए न – मुक्ति माने आत्मा, और मुक्ति का प्रार्थी कौन? मन। मन को आत्मा तक जाना है, तो उसे संघर्ष करना पड़ता है न, अपने ही खिलाफ़ अपनी बेड़ियाँ तोड़नी पड़ती हैं – वैसे ही तीर्थयात्री जब तीर्थ की ओर जाए, तो उसे संघर्ष करना होगा। वो संघर्ष ही वास्तविक तीर्थ यात्रा है। बात समझ में आयी?

उसी में मन का परिमार्जन है। वहीं पर मन को ये चुनाव करना पड़ता है कि मैं श्री केदार की इतनी कीमत देने को तैयार हूँ या नहीं हूँ। और ये चुनाव ही सबकुछ है। कदम-कदम पर जब शरीर में दर्द हो रहा हो, और मन भी कह रहा हो कि क्या लाभ है जाने का, और फ़ोन आ रहा हो और घर से कोई वापस बुला रहा हो, तो एक द्वंद पैदा होता है न? उसी द्वंद को मैं कह रहा हूँ चुनाव। वही सबकुछ है। उसी पर पूरा जीवन निर्भर करता है कि अब तुम किसको चुनोगे – शांति को चुनोगे, या सुविधा को चुनोगे?

और तीर्थ चूँकि थोड़ी-सी अगम्य जगह होता है, इसीलिए वो चुनाव एक बार नहीं करना पड़ेगा; हम कह रहे हैं वो चुनाव कदम-कदम पर करना पड़ेगा – ये वास्तविक लाभ है। बार-बार, बार-बार आपने चुनाव करा कि ‘नहीं, जगत् बुला रहा है, पर मुझे शिव के पास जाना है। जगत् बुला रहा है पर शिव के पास जाना है।‘ आपने अपने-आपको शिक्षित किया। एक अभ्यास है, एक ट्रेनिंग है ये। ‘पाँच-सौ दफ़े मेरे मन ने कहा कि सो जा या लौट जा, कोई और सुविधापूर्ण साधन ले ले, और पाँच-सौ दफ़े मैंने मन को ठुकराया और शिव का वरण किया‘ – ये असली बात है।

आत्मा इतनी अद्भुत वस्तु है – वही एकमात्र सद्-वस्तु है – कि उसकी ओर तो मन को भागकर पहुँच ही जाना चाहिए था न? शांति और बोध किसको न लुभाएँ? पर क्यों नहीं लोग आत्मा की ओर पहुँचते? क्योंकि आत्मा और मन के बीच खड़े होते हैं बहुत सारे अवरोध, पहाड़ जितने ऊँचे अवरोध। तो संतों ने, ऋषियों ने हमसे कहा कि इन पहाड़ों को लाँघो। इन पहाड़ों को लाँघो तो आत्मा मिलेगी।

तो ये जो पहाड़ हैं, ये क्या हैं? ये बैरियर्स के प्रतीक हैं, ये अवरोधों के सूचक हैं। बाहर-बाहर तुम जो कुछ भी देख रहे हो वो किसी आंतरिक घटना का प्रतीक है। पाँव थक रहे हैं; पाँव नहीं थक रहे हैं, वास्तव में क्या थक रहा है? मन। तो बाहर-बाहर तीर्थाटन में तुम्हारे साथ जो भी कुछ हो रहा है, वो एक अंदरूनी संघर्ष का सूचक है। वास्तव में पाँव कभी नहीं कहता कि मैं इतना थक गया हूँ कि अब आगे नहीं बढूँगा। मन कह देता है न कि ‘पाँव इतना थक गया है, लौट जाओ।‘ समझ में आ रही है बात?

तीर्थयात्रा वस्तुतः एक आंतरिक घटना है। पर चूँकि हम सूक्ष्म लोग हैं नहीं, भीतर हम रहते नहीं, तो बनाने वालों ने एक विधि दी कि जो चीज़ आंतरिक है उसको तुम बाहरी रूप में ही देख सको। बाहरी जो उसका रूप है, वो सिर्फ़ इसलिए है ताकि वो अंदरूनी घटना की ओर इशारा कर सके। बाहरी रूप की उपयोगिता, सार्थकता बस इसमें है कि वो तुम्हें बता सके कि अंदर भी यही चल रहा है। बाहर थकान है, भीतर भी है।

तो जो लोग बाहरी पर अटक गए और भीतरी से चूक गए, उन्होंने तीर्थयात्रा करी क्या? नहीं करी न? और इसीलिए ऐसे भी लोग हुए हैं जिन्होंने हँसकर कहा है कि हमें अब किसी बाहरी तीर्थयात्रा की ज़रूरत नहीं क्योंकि बाहरी तीर्थयात्रा जिस उद्देश्य के लिए होती थी वो उद्देश्य अंदर-ही-अंदर हममें पूरा हो गया है। बाहरी तीर्थयात्रा इसलिए होती है ताकि तुम्हारी अंदरूनी यात्रा आरंभ हो सके। और जिसकी अंदरूनी यात्रा आरंभ होकर पूरी भी हो गई, वो कहता है, ‘बाहरी तीर्थ से हमें क्या लेना देना?’

कबीर कहते हैं, ‘उठूँ-बैठूँ करूँ परिक्रमा।‘ कहते हैं कि अब मैं कहीं जाकर परिक्रमा इत्यादि नहीं करता। मेरा उठना-बैठना, खाना-पीना, चलना-फिरना – यही परिक्रमा है। मैं न गंगा जाता हूँ, न हिमालय जाता हूँ। पर ये बात कबीरों को शोभा देती है। मैंने बस उदाहरण के लिए बोल दी है। इसको अपने ऊपर मत उपयुक्त कर लीजिएगा।

तो जैसे अब आप बाहरी तौर पर यहाँ आ गए तीर्थस्थल पर, ये प्रश्न पूछना बहुत ज़रूरी है कि, ‘अंदर क्या हुआ?’ परसों रात एक बजे से आज रात तक जब आप वापस पहुँचेंगे, ये प्रश्न पूछना बहुत ज़रूरी है – ‘वास्तविक तीर्थ हुआ या नहीं हुआ?’

वास्तविक तीर्थ क्या है? मन की आत्मा तक यात्रा। और ऐसी यात्रा कि जिसमें यात्री कुछ और ही हो जाता है, बिलकुल बदल जाता है। बदलना भी छोटा शब्द है, नया हो जाता है; नया हो जाना भी छोटा शब्द है, ना जाने क्या हो जाता है।

लगातार अपने-आपसे ये सवाल पूछते रहिए, ‘अंदर क्या हो रहा है?’ यहाँ आप केदार की भूमि पर बैठे हैं। बाहर तो शिव-ही-शिव हैं, भीतर कौन है? भीतर शिवत्व उतरा कि नहीं? भीतर कोई है जिसे शिव से प्रेम उठा या नहीं? और शिव अनंत हैं। शिव से प्रेम उठा या नहीं भीतर, उसकी एक छोटी-सी पहचान बताए देता हूँ। अगर तीर्थभूमि पर भी आपको छोटी-छोटी बातें याद हैं और बड़े महत्व की लग रहीं हैं, तो समझ लीजिए कि तीर्थयात्रा बाहर-बाहर ही हुई, भीतर कोई यात्रा नहीं हुई।

हाँ, भीतर हमारे एक वो भी बैठा है जो कोई भीतरी यात्रा नहीं करना चाहता और बाहरी यात्रा में बड़ी रुचि रखता है। उसका नाम है पर्यटक। वो तीर्थयात्री नहीं, पर्यटक कहलाता है। वो बड़ा खुश होगा। उसने अब तक फ़ोटो इत्यादि खींच ली होंगी, वीडियो बना लिए होंगे। उसे बदलने से कोई प्रयोजन नहीं है। उसे क्या करना है? उसे इकट्ठा करना है। उसे अपना संवर्धन करना है।

तो कौन है भीतर जो तीर्थ की तरफ़ आया? कौन है जो लाभान्वित हो रहा है? वो जिसने सेल्फ़ी (स्वयं की फ़ोटो) जमा कर लीं या वो जो मुक्ति का प्रार्थी था और मुक्ति का वरण कर रहा है? भीतर कुछ हुआ कि नहीं हुआ? शिव से ज़्यादा प्यारा कोई नहीं; प्रेम में पड़े कि नहीं पड़े? पता नहीं, आप जानिए। प्यार-मोहब्बत बड़े निजी मसले होते हैं। इसमें कोई भी बाहर वाला हो, चाहे वो फिर शिक्षक या गुरु ही क्यों न हो, वो बस इशारा कर सकता है, ज़बरदस्ती नहीं कर सकता। तो मैं तो बस बता सकता हूँ कि जो प्रेम के रसिक हों, वो जान लें कि शिव से ज़्यादा प्रेम का पात्र कोई दूसरा नहीं है। ऐसे भी कह लीजिए – एकमात्र वो जो प्रेम का पात्र है और जो प्रेम का लक्ष्य है, उसको नाम दिया गया है 'शिव'।

मन लगातार जिसकी खोज में है, मन लगातार जिसके आकर्षण से खिंचा चला जा रहा है, उसी को नाम दिया गया है ‘शिव’।

और नाम भी दिए गए हैं। पर भारत ने बड़ा सुंदर नाम दिया – ‘शिव’।

तो अब बताओ, ये पूछना है कि बाहर क्या चल रहा है या ये देखना है कि अंदर क्या बदला? कौन बदला? कौन आया था और कौन लौट रहा है? कबीर साहब एक जगह कहते हैं कि तीरथ पर जाना है – वो तीरथ का नाम नहीं लेते, पर बात वही है – कि तीरथ पर जाना वैसे ही है जैसे गौना करा कर, विदाई करा कर स्त्री पहली बार पति के घर जाए, कुछ रोज़, कुछ महीने वहाँ रहे, और फिर वो अपने मायके जाए। अब जब वो मायके पहुँचती है, तो सब जान जाते हैं कि अब ये वही नहीं है जो मायके से गई थी।

कुछ बदला कि नहीं बदला? या जैसे आए थे कुँवारे-कुँवारे, वैसे लौट भी जाओगे? वही खच्चर-टट्टू की बातें, आते हुए भी और जाते हुए भी। यहाँ आना माने जो परम पिता है और जो परम पति है, उसके यहाँ आना। अब यहाँ से वैसे ही नहीं लौट सकते जैसे आए थे। और वैसे ही लौट रहे हो जैसे आए थे, तो फिर तो कोई गठबंधन हुआ ही नहीं, फिर तो बस बाहर-बाहर यात्रा करी है, फालतू पाँव थकाए हैं, पैसे खर्च करे हैं, समय लगाया है; पाया कुछ नहीं है।

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