भारत में हर 15 मिनट में एक रेप हो रहा है। ये बस रजिस्टर्ड आँकड़े हैं, अनरजिस्टर्ड आँकड़ों का तो कोई हिसाब ही नहीं है। ये चीज़ तब तक नहीं हो सकती, जब तक इसको एक वाइडर सोशल सैंक्शन न मिला हो। हमारा कल्चर कहीं न कहीं रेप की तरफ़ परमिसिव है। इसकी जड़ बॉडी आइडेंटिफिकेशन में है। जब तक हमारा कल्चर कॉन्शियसनेस-सेंट्रिक नहीं होगा, तब तक बलात्कार होते रहेंगे। बात रेप की नहीं है, बात इस पूरी संस्कृति को ही बदलने की है।
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आचार्य प्रशांत: एक-दो इंसानों को सलाखों के पीछे डालने से क्या होगा? निर्भया, हाथरस, कठुआ, हैदराबाद, कोलकाता। एक के बाद एक जघन्य हत्याकांड होते रहते हैं, रेप मर्डर केसेज़। हर साल ही होते हैं लगभग कुछ न कुछ, और फिर हम कहते हैं, "अरे भारत की आत्मा हिल गई।" इतना ज़बरदस्त कुछ हुआ। तुम बोल लेते हो दो-चार दिन के लिए, उसके अगले साल फिर कुछ इतना बड़ा मामला सामने आ जाता है।
और सामने आए ना आए, भारत में हर 15 मिनट में एक रेप हो रहा है (एनसीआरबी डाटा, 2018), ये हम जानते ही हैं। और ये जो 15 मिनट में रेप का आँकड़ा है, ये बस रजिस्टर्ड आँकड़े हैं। जो अनरजिस्टर्ड आँकड़े हैं, जो पर्दों के पीछे हो रहे हैं, जो सम्माननीय जगहों में और संस्थानों में हो रहे हैं, घरों में हो रहे हैं उनका तो कोई हिसाब ही नहीं है।
तो इस बार जो बंगाल में भूचाल आया है, वो वास्तव में कह रहा है कि, "हमें ये कल्चर ही नहीं चाहिए। नहीं चाहिए ये संस्कृति, जिसमें रेप नॉर्मलाइज़्ड है। जिसमें रेप एक नॉर्मल बात है कि हर साल हो जाता है, ठीक है, ज़िंदगी आगे बढ़ जाती है। फिर कोई मर गया आगे बढ़ जाओ।" आप बात समझ रहे हो, और जब तक ये




