भारत में इतनी सदियाँ, शताब्दियाँ बीती हैं, पुराना राष्ट्र है हमारा। ज्ञान-विज्ञान में निश्चित रूप से कुछ बड़ी उपलब्धियाँ हासिल करी हैं। उनके बारे में बताना एक बात है। आप आर्यभट्ट के बारे में बता रहे हैं, आप वराहमिहिर के बारे में बता रहे हैं, या कि आप महर्षि पाणिनी के बारे में बता रहे हैं, ये एक बात होती है। और आप भारत में क्या-क्या प्रथाएँ परंपराएँ रही हैं और भारतीयों ने क्या-क्या बातें मान्यता के तौर पर मानी हैं, अंधविश्वास के तौर पर मानी हैं, उनको आप बता रहे हैं छात्रों को; ये दो बहुत अलग-अलग बातें हैं।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते, सर। मेरा सवाल एक खबर पर है। अभी कुछ दिनों पहले तमिलनाडु के एक गवर्नमेंट स्कूल से एक न्यूज़ आई थी जहाँ पर जो विजुअली इम्पेयर्ड स्टूडेंट्स (दृष्टिहीन छात्र) थे, उनको रिबर्थ (पुनर्जन्म) के ऊपर लेक्चर दिया जा रहा था। तो पिछले कुछ समय से, इस तरह के जो विषय होते हैं रिबर्थ और भारत से काफ़ी खबरें आ रही हैं मतलब बहुत अलग-अलग तरीके की टाइप्स।
तो क्या इन विषयों का अपना कोई वजूद है? या फिर इससे छात्रों पर उसका क्या प्रभाव पड़ रहा होगा? कि जो हमारी एक तरह से नॉर्मल स्टैंडर्डाइज़्ड एजुकेशन (सामान्य मानकीकृत शिक्षा) है, उसमें इस तरह के जो विषय होते हैं।
आचार्य प्रशांत: छात्रों पर प्रभाव बस ये पड़ रहा है कि नॉलेज सिस्टम (ज्ञान तंत्र) के नाम पर उनको एक बिलीफ़ सिस्टम (मान्यता तंत्र) दिया जा रहा है। तमिलनाडु में तो फिर भी ये हो गया कि छठी के बच्चों को पुनर्जन्म और इस तरह की अंधविश्वास भरी बातें बताई जा रही थी, तो वहाँ पर मंत्रालय ने उस पर आपत्ति कर दी और मीडिया ने भी खूब विरोध करा। लेकिन अन्य राज्यों में यही चीज़ें चल रही हैं, तो इस पर कोई विरोध वगैरह थोड़े ही हो रहा है।




