शान से बोलो: न गुनहगार हूँ, न कर्ज़दार हूँ, न खरीददार हूँ || आचार्य प्रशांत (2023)

आचार्य प्रशान्त: समझदार वो है, बोध उसे है, विज़डम इसी में है—इस बात को सूत्र की तरह पकड़ लिया जाये कि दुनिया की चीजें, जो कुछ भी जगत में मौज़ूद है, त्रिगुणात्मक (सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण) प्रकृति में मौज़ूद है, उससे वो तो नहीं मिलने वाला जिसके लिए कलप रहे हो। शरीर को अन्न मिल जाएगा, अच्छी बात है। देह को कपड़ा मिल जाएगा, अच्छी बात है पर तुम जिस चीज़ के लिए आकुल हो, वो तुमको नहीं मिलेगा।
तो और-और की रट लगाने से लाभ है नहीं। और-और की रट लगाने से कोई लाभ नहीं है। आग उठी थी मिट्टी के तेल से, उसमें और-और मिट्टी का तेल डालने से आग बुझ नहीं जाएगी। जिसके कारण तुम्हें समस्या है, उसी कारण की वृद्धि करने से समस्या मिट नहीं जाएगी। तुम्हारा झूठा अस्तित्व ही तुम्हारी समस्या है और उसी झूठे अस्तित्व में और परतें चढ़ाने से तुम्हारी समस्या मिट नहीं जाएगी।
अपनी गरिमा बहुत आवश्यक है। संसार और अपने बीच में सही सम्बन्ध बहुत ज़रूरी है। मुँह खोले, हाथ पसारे भिखारी की तरह मत जिया करो। पशुओं का काम है ये। कुत्ते-बिल्ली होते हैं, इनको कुछ दिखा दो, रोटी कहीं को, पीछे-पीछे चले आ रहे हैं, चले आ रहे हैं, चले आ रहे हैं।
मैंने देखा है, एक जगह थी, वहाँ पर वो हाथियों को कुछ खिला दिया करते थे। बस के लोग जाते थे, जंगल से बस गुजरती थी, रास्ता था, वहाँ पर हाथियों को कुछ फेंक दिया करते थे, हाथी आकर ले जाते थे। हाथियों ने वहाँ पर खड़ा होना ही शुरू कर दिया, उस जगह पर। उन्होंने बस रोक दी। बस की खिड़की से हाथी सूंड़ अन्दर डाल रहा है, ‘दो।’ मैंने वीडियो देखा।
ये जानवरों का काम है कि जी ही रहे हो इसलिए कि दुनिया से कुछ पा लें। इसमें क्या गरिमा है? और गरिमा के बिना कुछ नहीं हो सकता। अगर जिसे आप आत्मा बोलते हो, वो दुनिया की सबसे ऊँची चीज़ है तो फिर आत्मसम्मान से बड़ा क्या है? आत्मसम्मान, सेल्फवर्थ (आत्ममूल्य) इससे ऊँचा तो कुछ हो नहीं सकता न, अगर सेल्फ (स्व) का मतलब आत्मा है तो। लेकिन अगर



