प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, आपको लगभग एक साल से सुन रहा हूँ। आपकी अनेक बातों में जो मूल एक सिद्धांत मुझे दिखता है वो ये है कि जीवन को वैज्ञानिक रूप से जियें, तथ्यों को देखें, और तथ्य ही सत्य का द्वार है।
अभी हाल-फ़िलहाल में हिन्दूओं और मुस्लिमों के बीच में दिल्ली शहर में दंगे हुए। ये बात मुझे बड़ी आहत कर गई और जितना आज-कल मीडिया में पढ़ने को मिल रहा है मुझे और जो मेरी छोटी समझ है, उससे ये दिखता है कि जो भारत का संविधान है, जो इतनी मेहनत, मशक्कत और स्ट्रगल के बाद हमें मिला, वो आज के समय सबसे ज़्यादा वैज्ञानिक ग्रंथ, वैज्ञानिक किताब है जो हमारे पास मौजूद है।
मेरा प्रश्न आपसे ये है कि जो धर्मग्रन्थ इतने पुराने हो चुके हैं और अक्सर कम्युनल लाइन को पार भी कर जातें हैं, उनके पक्ष में कुछ भी कहा-सुना क्यों जाए जब हमारे पास संविधान जैसा वैज्ञानिक एक ग्रंथ मौजूद ही है?
आचार्य प्रशांत: भारत का संविधान निस्संदेह मानव मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता हुआ एक सुंदर ग्रंथ भी है। उसको विधि-कानून भर की दृष्टि से ही ना देखा जाए; उसको ये समझने के लिए भी देख लिया जाए कि किन मूल्यों और आदर्शों पर चलकर एक राष्ट्र के लोग—और एक व्यक्ति भी—जीवन बिता सकते हैं, तो वो निस्संदेह मददगार है। मौलिक अधिकार संविधान में वर्णित हैं। मौलिक कर्तव्य भी संविधान में वर्णित हैं। सद्भावना, सहस्तित्व के मूल्य भी संविधान में उल्लिखित हैं। जीवन के प्रति वैज्ञानिक नज़रिया होना चाहिए, ये बात भी संविधान कहता है। यहाँ तक कि पशुओं की, विशेषकर गौवंश की रक्षा होनी चाहिए, ये बात तक संविधान हमारा कहता है।
मुक्ति, आज़ादी, फ़्रीडम, ये शब्द संविधान में ना जाने कितनी बार आता है। आपको अपने अनुसार अपना धार्मिक आचरण करने की आज़ादी है। आपको अपने अनुसार कहीं भी उठने-बैठने, बसने की आज़ादी है, आने-जाने की आज़ादी है। तो ये सब बातें संविधान में वर्णित हैं। लेकिन जिन्हें आगे जाना हो, जिन्हें आदमी के मन को ही समझना हो, उन्हें फिर ऐसा ग्रंथ चाहिए होगा जिसका उद्देश्य देश में नियम-कायदा चलाना ही भर ना हो, बल्कि जिसका उद्देश्य ही ये हो कि आदमी अपने मन को, जीवन को जाने, और मन पर जितने तरीक़े के अंधेरे होते हैं और बंदिशें होती हैं उनसे मुक्त हो सके।




