पर ये स्थितियाँ आयें चाहे न आयें, दमन, पलायन कभी समाधान नहीं होते, कभी भी नहीं। इस बात को लेकिन कुसंग से जोड़ करके मत देख लेना। कुछ है जिससे डर उठता है या कोफ्त उठती है, मैं कह रहा हूँ उस डर को देखो। कुछ है जो कुत्सित लगता है, मैं कह रहा हूँ उसको देखो। मैं ये नहीं कह रहा हूँ उसकी संगति में पड़ जाओ।
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प्रश्नकर्ता: जैसे हम कहते हैं कि सम पीपल ब्रिंग आउट द बेस्ट इन मी, सम पीपल ब्रिंग आउट द वर्स्ट इन मी (कुछ लोग मुझमें से सर्वश्रेष्ठ को बाहर लाते हैं, कुछ लोग मेरे अंदर से सबसे बुरे को बाहर लाते हैं), इस तरह की स्टेट्मेंट्स (कथन) हम कहते रहते हैं और फिर हमारी कोशिश यही होती है कि वी ट्राई टू अवॉइड पीपल हू ब्रिंग आउट द वर्स्ट इन मी एंड आइ वुड लाइक टू बी इन द कम्पनी ऑफ पीपल हू आर गुड टू बी विद मी ( हम उन लोगों से बचने की कोशिश करते हैं जो हमारे अंदर की सबसे ख़राब अभिव्यक्ति को सामने लाते हैं और मैं उन लोगों के साथ रहना पसंद करूँगी जो मेरे लिये अच्छे हैं) और बात ये है भी कि जिस संगति में रहेंगे वैसे ही तो… अगर हर तरफ़ आइना ही है, अगर वो भी आइना ही है जो हमारे अंदर के शैतान को जगा रहे हैं, वो भी उतने ही ज़रूरी ही हैं। और उस, क्या, तो क्या ये अपने आप के उस शैतान को देखने के लिए उस आइने तक जाते रहना चाहिए क्योंकि मन तो नहीं करता, मन तो वहाँ से भागने को करता है, तो जाना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: जब तक देख पा रहे हैं तब तक ज़रूर जाना चाहिए।
प्रश्नकर्ता: जब तक देख पा रहे हैं?
आचार्य प्रशांत:




