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साथी कुछ समझना ही न चाहे तो? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, पाँच साल का रिश्ता था, शादी होने वाली थी। कुछ वजहों से कि उसका रुझान अध्यात्म में नहीं है, झूठ बोलती है चीज़ों को लेकर ताकि हमारा रिश्ता बना रहे; इन चीज़ों ने बहुत ज़्यादा मुझे ठेस पहुँचाई। अब मैं उस बिन्दु पर खड़ा हूँ कि इसको ख़त्म कर दूँ या चलाए रखूँ।

अध्यात्म के बारे में जाना है तो लगता है ख़त्म कर दूँ। फिर अन्दर से आवाज़ आ रही है कि क्या इस रिश्ते को उस प्यार से किया जा सकता है जो प्यार अध्यात्म में बताया जाता है जो सभी के लिए है? मैं इसके लिए भी करूँ या फिर मेरा ही अहम् मुझे पागल बना रहा है?

डिप्रेशन ये है कि साथ छूट गया, अब कभी साथ नहीं मिलेगा किसी का, सुख कभी नहीं आएगा। एक चीज़ खींच रही है अन्दर से कि ये सुख कभी नहीं मिलने वाला, कभी कुछ नहीं होगा तो स्वीकार करके चीज़ों को और आगे बढ़। वो डर और डिप्रेशन इतना बढ़ गया था कि मैं सो नहीं पा रहा हूँ, खा नहीं पा रहा हूँ। तो आचार्य जी, मैं थोड़ा मार्गदर्शन चाहूँगा।

आचार्य प्रशान्त: जो पहले वाली चीज़ है उसका वैसे तो मुझे कोई मार्ग पता है नहीं, पर आपने पूछा है तो कुछ बोलेंगे थोड़ा-बहुत जो जानते हैं। देखो, अगर मुझे ये पता होता कि किसी ऐसे व्यक्ति में अध्यात्म के लिए रुचि कैसे पैदा करें जो उधर को देखना ही नहीं चाहता तो ये जादू मैंने कब का कर डाला होता न? (श्रोतागण हँसते हैं)

सार्वजनिक रूप से भी और अपने व्यक्तिगत जीवन में भी। पर न तो मैं सार्वजनिक रूप से बहुत कुछ कर पाया हूँ। और व्यक्तिगत सम्बन्धों में भी कोई बहुत सफलता नहीं मिली है इस दृष्टि से। तो मैं तो यही कह सकता हूँ कि ये बात आप पर आँधी से भी कम आश्रित है। इसका ज़्यादा सम्बन्ध तो दूसरे व्यक्ति के अपने चुनाव से ही है।

आप कोशिश पूरी कर सकते हो तरह-तरह की विधियाँ लगा सकते हो। उन विधियों से आपको फ़ायदा हो जाएगा। उसको होगा या नहीं, कुछ निश्चित नहीं। जब आप किसी दूसरे की बेहतरी के लिए बिलकुल साफ़ मन से काम करते हो, जितना भी साफ़ कर सको, पूरा तो किसी का साफ़ होता नहीं। अधिकतम जितना भी साफ़ रख सकते हो उसके साथ जब तुम किसी की भलाई के लिए कुछ करते हो तो अक्सर ये पाया गया है कि दूसरे व्यक्ति को कम फ़ायदा होता है तुम्हें ही ज़्यादा हो जाता है। क्योंकि दूसरे को समझाना है उसको समझाने के लिए आप समझदार हो जाते हो। नहीं तो समझाओगे कैसे? तो कोशिश पूरी करके देख लो, पर होता नहीं है। (श्रोतागण हँसते हैं)

बड़ी जान लगती है और एकदम हालत ख़राब हो जाती है, लेकिन वही संभावना दस में एक की रहती है कि कुछ परिवर्तन आएगा और अगर सफलता मिलती भी है तो उसका श्रेय आपको मैंने कहा आधे से भी कम है, उसका श्रेय ज़्यादा उस दूसरे व्यक्ति को ही जाता है। वो व्यक्ति अगर स्वयं तैयार होगा तो ही हो पाएगा तो ही हो पाएगा।

शिविर की बात लाख लोगों से ऊपर तक पहुँची होगी कम से कम हो सकता है दस-बारह लाख या बीस लाख, पर इतने ही आये हैं। और ये पुरानी कहावत है कि जब सच्चाई बुलाती है तो हज़ारों को बुलवाने पर कोई एक आता है। और जो आते हैं उनमें से कोई एक बात को समझ पाता है। हज़ारों में एक आया। फिर जो आये उनमें हज़ारों में कोई एक बात को समझ पाया। और फिर जितने बात को समझ पाए उनमें हज़ारों में कोई एक बात को अपने जीवन में दूर तक ले जा पाया। ये आज का नहीं, ये बहुत पुराना नियम है।

एक तरीक़े से मैं उस नियम को तोड़ने की कोशिश कर रहा हूँ। नहीं तो शास्त्र और उपनिषद तो बहुत साफ़-साफ़ बता देते हैं, वो आपका मन रखने के लिए झूठ नहीं बोलते। वो साफ़ कह देते हैं कि देखो हमारी बातें तो सिर्फ़ उनके लिए हैं, जिनमें ज़रा योग्यता हो। आम आदमी के लिए ये बातें है ही नहीं।

इस बात से मेरा मन नहीं मानता। मैं वास्तव में इस बिन्दु पर उपनिषदों के विरुद्ध चला जाता हूँ। उन्होंने तो कह रखा है कि कोई ज़रूरत नहीं है सरेआम ढिंढोरा पीटने की, कोई ज़रूरत नहीं है हमें सार्वजनिक करने की।

“तृषावंत जे होएँगे, अइहैं झख मारी।“ ‘जो प्यासे होंगे जो तृषावंत होंगे वो ख़ुद ही आएँगे झख मारकर। तुम क्या जगह-जगह ढिंढोरा पीटते फिरते हो! उसकी कोई ज़रूरत नहीं है।’ तो पुरानी बात तो ये है पर इस बात में मुझे थोड़ी कठोरता लगती है। तो कोशिश कर रहा हूँ अपनी ओर से सब तक बात ले जाने की। ऐसों तक भी बात ले जाने की जो न सिर्फ़ ऐसी बातों से कोई रिश्ता नहीं रखते बल्कि ऐसी बातों के बिलकुल ख़िलाफ़ है।

इसमें मेरा अनुभव तो यही है कि जो इन बातों के खिलाफ़ हो, कोई चमत्कार ही होता है कि वो फिर बात को समझना शुरू कर दें। वैसे चमत्कार मैंने होते देखे भी हैं। ऐसी बात नहीं है। जैसे अभी आप यहाँ बैठे हुए हो तीन-सवा तीन सौ लोग वैसे ही दस-पन्द्रह साल पहले कॉलेज वगैरह में ‘संवाद’ नाम के सत्र होते थे। तो ऐसे ही बैठे होते थे वो। बस इतना अन्तर है कि आप सब अपनी स्वेच्छा से आये हो, अपने घरों से समय निकालकर के आये हो, अनुदान करके आये हो, यहाँ रह रहे हो होटलों में, उसमें भी खर्चा कर रहे हो आप लोग। वहाँ वो जो स्टूडेंट होते थे उनको ज़बरदस्ती पकड़कर — ‘कम ऑन, येस दिस वे सीएस, दैट वे ईसी, देयर एमई, या सिविल देयर, बायोटेक हेयर, केमिकल इन फ्रन्ट।’ (आ जाइए। हाँ, इधर से सीएस आयें, उधर से ईसी वाले, वहाँ एमई। हाँ, सिविल वाले वहाँ, बायोटेक यहाँ और केमिकल सामने (बैठे)। (श्रोतागण हँसते हैं)

तो उनको ऐसे बैठा दिया जाता था। और ऐसे ही तीन-चार घंटे भी बात हो जाती थी कई बार। और वो अपना कूद रहे होते थे, चिल्ला रहे होते थे, ‘हमें जाने दो, हम मर जाएँगे। हमारे कान से खून आ चुका है। हम ये बर्दाश्त नहीं कर सकते। क्या बोल रहे हो, क्यों बोल रहे हो? हमारे तो खेलने खाने के दिन हैं।’ (श्रोतागण हँसते हैं)

तो ये सब चल रहा होता था लेकिन चमत्कार हुए। उन्हीं में से एक-दो-चार, तीन-सौ में से एक दो फिर निकलकर के आये वो मेरे सहायक भी बने। उनमें से कुछ लोगों से आप परिचित भी है पर अनुपात यही समझ लीजिए कि तीन-सौ बैठे हैं तो एक या दो। तो आपकी भी मान लीजिए अगर तीन-सौ अफेयर होंगे तो उसमें से एक या दो बार आप.. (श्रोतागण हँसते हैं)

लेकिन उन तीन-सौ अफसानों से गुज़रकर आप चमक जाएँगे। आपका मोक्ष तय है। प्रेमिकाओं को कुछ मिले-न-मिले आप बैरागी हो जाएँगे। (श्रोतागण हँसते हैं)

नहीं समझती प्रेमिकाएँ, पक्का बता रहा हूँ। अब दिल आपका वैसे ही डूबा हुआ है मैंने और बोल दिया कहेंगे, ’डिप्रेशन पर डिप्रेशन।‘ (श्रोतागण हँसते हैं) दूसरी बात क्या थी?

प्र: आचार्य जी, दूसरी बात ये थी कि ट्रिगर तो हो गए यहाँ से डिप्रेशन अब लेकिन डिप्रेशन सिर्फ़ छोड़ने का नहीं, ख़त्म होने का नहीं, डिप्रेशन इस बात का आ रहा है कि अब जो ये सुख के तरीक़े मैं ढूँढ रहा था ये सब नक़ली था जब समझ आ रहा है सुनकर। उसमें डिप्रेशन ये है कि ये आख़िरी बिन्दु था। अब वरुण (स्वयं को सम्बोधित करते हुए) इसके बाद ख़त्म कर दे क्योंकि ये चीज़ सच नहीं है।

आचार्य: ठीक है, याद आ गया पूरा सवाल बैठिए, थैंक यू। आप इतना याद रख रहे हैं कि मैंने कहा कि सुख दुख की छाया मात्र है। उस बात को आपने पकड़ लिया और जो मैंने आनन्द कहाँ वो? देखिए, ये चाल होती है अंहकार की। वो नेति-नेति को याद रख लेता है, सच्चिदानन्द को भूल जाता है कि अरे! बड़ी कड़ी बात है, बहुत कठिनाई होगी, नेति-नेति करनी है। और नेति-नेति का जो प्रसाद है — सच्चिदानन्द, उसको भूल गए? वो दोनों साथ साथ ही चलते हैं न? त्याग में जो आनन्द है। और त्याग में जो परम प्राप्ति है। उसको जान-बूझकर भूलना चाहते हो क्या, ताकि त्याग न करना पड़े?

बस ये याद रखना चाहते हो त्याग माने छोड़ना। और उस छोड़ने से जो मिल जाती है चीज़ उसका कोई उल्लेख नहीं। मैंने कहा, ‘नींद छोड़ दो’। बस यही कहोगे, ‘अरे नींद तुड़वा दी, नींद तुड़वा दी!’ और जो मिला उसकी बात नहीं करनी। क्या मिला? जागरण मिला। उस जागरण का कोई मूल्य ही नहीं ? कहिए। सपना टूट गया। सपना का बड़ा मूल्य था, जागृति मिली, जागृति का कोई मूल्य ही नहीं। बात ही नहीं कर रहे। कह रहे हैं, ‘ डिप्रेशन में चले गए!’ आनन्द में कोई डिप्रेशन होता है?

आप इस रास्ते पर निकलिएगा, रामझूला की तरफ़ जाइएगा ज़रा। अभी भी यहाँ पर साधु हैं। और अब ऋषिकेश में काफ़ी समय बिताता हूँ तो देखता हूँ उनको, मुझे नहीं लगता मुझे धोखा हो रहा है। आप शाम को उनके छोटे-छोटे कमरे हैं वहाँ से निकलिए, देखिए; एक-एक कमरे में दो-तीन रहते हैं। न सूर, न लय, न ताल; वो वहाँ बैठे अपना गा रहे हैं। मैं उसको कहता हूँ बॉयज़ोन। बाक़ी तो हम जो सामाजिक गृहस्थ प्राणी होते हैं ये तो पन्द्रह की उम्र से ही अधेड़ हो जाते हैं। असली छोरे, ये हैं। आप उनकी मौज देखिए। उन्हें कोई मतलब नहीं कि वो क्या गा रहे हैं, क्यों गा रहे हैं। वो कुछ भी गा रहे हैं, कोई सुनने वाला नहीं। समझ रहे हैं?

कुछ अच्छा भी गाते हैं ये नहीं कह रहा मैं कि सब बेसुरे हैं। लेकिन मैं कह रहा हूँ सुर से उनको बहुत मतलब नहीं है। सुर अच्छा लग गया तो लग गया। कहीं बैठे हुए हैं अपना इधर उधर देख रहे हैं, मज़े में आनन्दित हैं। सब-के-सब नहीं, पर कुछ हैं अभी भी।

और आप कह रहे हैं डिप्रेशन। अध्यात्म तो डिप्रेशन की दवा ही है। अध्यात्म में डिप्रेशन कहाँ से हो जाएगा? बड़ी मौज आ जाती है। कुछ घंटे ही उनके साथ बिताकर के देखिए बड़ा मज़ा आएगा।

ये जो घूम रहे हैं ये, ये निकला यहाँ से (संस्था के स्वयंसेवी की और इशारा करते हुए) ये उनके साथ दो-चार दिन रहकर के आया। वो देखिए दाढ़ी वाले जो घूमते रहते हैं रोहित (संस्था के स्वयंसेवी) उनका तो रोज़ का काम है दिनभर वो मेहनत करते हैं अपना दिन भर घूम रहे हैं इधर-उधर, रात को इनके मन्दिर में चले जाते हैं और वहाँ पर चलता है अटूट भजन। अखंड गायन, वो रुकता नहीं है। एक टोली आती है, फिर दूसरी आती है, तीसरी आती है तो जाकर उनके साथ बैठ जाते हैं। बारह बजे दो बजे-तीन बजे तक वहीं अपना बैठे हुए हैं, अपना करे जा रहे हैं, करे जा रहे हैं।

शायद उसी रुख का नतीजा ये निकला है कि आज आप इस तरह का शिविर देख पा रहे हैं। हमने ऐसा पहले कभी नहीं आयोजित किया था। इसको आयोजित करने के लिए भी एक मस्त-मलंग चेतना चाहिए। वो साधुओं के साथ ही मिलती है। काम में तनाव ही नहीं होता, ज़बरदस्त मस्ती होती है, नहीं तो आप काम कर ही नहीं पाएँगे। ख़ासतौर पर आध्यात्मिक काम इतनी ज़्यादा पीड़ा देता है, इतने घर्षण से गुज़ारता है, इतने विरोध का सामना करना पड़ता है उसमें कि अगर आपके पास एक मौज नहीं है, आन्तरिक बेफ़िक्री! तो आप उस काम में चलेंगें ही नहीं, थोड़ी देर बाद आप ढहना शुरू हो जाते हैं कि अरे, ये क्या हो गया, वो क्या हो गया!

आप सोचिए तो सही, अब ये हैं शुभांकर (संस्था के स्वयंसेवी) ये रात में यहाँ पर ही रहते हैं, इसके बाद मुझे वापस लेकर के जाता है। मेरे साथ बैठेगा, काम होगा आप लोगों की अगले दिन की जो न्यूज है, मॉर्निंग ऐक्टिविटी की उनका निर्णय होगा, उसके बाद बैठकर के ये दिनभर के रुपए-पैसे का हिसाब करेंगे। कहाँ खर्च हो गया, कहाँ पर क्या हुआ, क्या नहीं; कल किसको कितना देना है ये सब करेंगे। ये सोते हैं दो बजे तीन बजे। और सुबह आपकी गतिविधि कितने बजे शुरू हो जाती है? साढ़े छः। साढ़े छः आपके पास पहुँच जाते हैं।

आप में से कौन अपनी जॉब में ये कर सकता है? आपकी जॉब ही ऐसी नहीं है कि आप ये कर पाओ। और इसने कल ऐसी नालायक़ी की हरकत की। मैं सो रहा था, मैं था बाक़ी सब थे नहीं; बाक़ी क्यों नहीं थे? क्योंकि कोई यहाँ पर पड़कर सो रहा है, कोई यहाँ सो रहा है, कोई वहाँ सो रहा है (भवन की और इशारा करते हुए जहाँ सत्र चल रहा है) तो हम जहाँ पर थे वो जगह खाली पड़ी हुई थी। तो ये सोया तीन-साढ़े-तीन बजे, मैं भी तीन-साढ़े-तीन बजे सोया। उसके बाद ये वहाँ से निकलने लगे आपके पास पहुँचने के लिए मॉर्निंग ऐक्टिविटी के लिए। तो उन्हें लगा कि ये दरवाज़ा खुला रह जाएगा ये चले जाएँगे तो, तो उन्होंने आकर मुझे जगा दिया, ‘उठिए’! और मैं कुल तीन घंटे सोया और उठा दिया। उसके बाद मुझे नींद ही नहीं आयी। तो कल मैं भी पूरे तीन घंटे सोकर, पूरे दिन अपना चलता रहा। चार घंटे आपके साथ सत्र लिया।

ये आप किसी साधारण काम में थोड़े ही कर सकते हैं। ये इसलिए हो पाता है क्योंकि सच की मौज होती है। उस मौज में तनाव, डिप्रेशन ये सब पीछे रह जाते हैं। मैंने नहीं कहा कि तनाव डिप्रेशन होते नहीं है। मैंने कहा, ‘पीछे रह जाते हैं’। अन्तर समझ लीजिएगा। तनाव तो देखिए हम भी बहुत भारी झेलते हैं। लेकिन वही है कि पता रहता है कि तनाव है तो है, काम करो। कुछ और है चीज़ ज़्यादा महत्वपूर्ण है, काम करो।

बीच-बीच में ऐसा लगेगा कि कहीं मैं बेवकूफ़ तो नहीं बन रहा; सबको लगता है। ठीक है? सबको। उन पलों को गुज़र जाने दीजिएगा। शान्त रहकर गुज़र जाने दीजिए, कोई निर्णय मत ले लीजिएगा उस समय। ये आप जो भी लोग उत्साहित हो गए हो कि अब हम कुछ अच्छा जीवन जिएँगे, आध्यात्मिक निर्णय लेंगे। आपको सबको मैं अग्रिम चेतावनी दे रहा हूँ। बीच-बीच में लगेगा कहीं मेरा... (कुछ सोच रहे है ऐसा दिखाते हुए) (श्रोतागण हँसते हैं) और बहुत ज़ोर से जवाब आएगा — ‘हाँ’। उस समय कुछ मत करना, बस उस समय उस फेज़ को गुज़र जाने देना, कोई निर्णय मत ले लेना।

देखिए, कुछ दबाना-छुपाना होता तो मैं बहुत सारे और काम थे वो कर सकता था। आपके साथ वो करना मेरा उद्देश्य नहीं है। पता नहीं सुनने में कैसा लगेगा, लेकिन बता देता हूँ। ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि किसी भी सत्र में आने के लिए मैं बहुत उत्साहित रहा हूँ। मेरे लिए झंझट होता है क्योंकि मैं उससे पहले काम कर रहा होता हूँ। और मुझे ये सब पहनना अच्छा नहीं लगता। मैं आमतौर पर बॉक्सर शॉर्ट्स में रहता हूँ, ऊपर बनियान या टी-शर्ट में और अपना मज़े से कहीं बैठ के लेटकर कुछ कर रहा होता हूँ। यहाँ आने के लिए ये पहनो फिर बाल कंघी करो। फिर ढूँढो मोज़े कहाँ रखे हैं, ये करो वो करो, गाड़ी में बैठो यहाँ आओ, तमाम तरीक़े का दिखावा ये सब। और वो जो मैं काम कर रहा हूँ महत्वपूर्ण होता है।

ऐसा नहीं है कि आनन्द की बहार आयी हुई है हर समय और आप कह रहे हो, ‘चलो-चलो! भगवान जी का काम है तो करना ही है, चलो बुलावा आया है।’ हाँ, यहाँ एक बार बैठ जाता हूँ, तो ये सबसे महत्वपूर्ण काम है। इसमें मन लग जाता है फिर पाँच घंटे बात करें तो पाँच घंटे कर सकते हैं। फिर मैं यहाँ से बाहर निकलूँगा और याद आएगा कि कितनी सारी चीज़ें पड़ी हैं; चलो, जल्दी वो निपटानी है।’ तो बहुत समय तक और बहुत दूर तक भी जा करके ये एहसास तो बना ही रहेगा कि तनाव है, झंझट है। लेकिन साथ ही साथ कुछ ऐसा मिला रहेगा जो उस तनाव और झंझट से ज़्यादा मूल्यवान है। तो आप अपना काम करते रहेंगे। समझ रहे हैं बात को?

बीच-बीच में ऐसा होता था कि सुबह सत्र आयोजित हो जाते थे। वो मेरे लिए बड़ा दुखदायी होता था। क्योंकि वही मेरे सोने का समय होता है। तो उठकर के मैं कैसा अनुभव करता था वो मैं ही जानता हूँ। बैठा रहता था बहुत देर तक। ‘मैं ये क्यों कर रहा हूँ?’ बस यही सवाल मैं क्यों कर रहा हूँ अपने साथ? आप दो-ढ़ाई घंटे सोए हैं और नींद बस अब गहरी हो रही थी और आपको जगा दिया गया। जिसने जगाया उसकी भी शामत है, उसको ऐसे जलती हुई आँखों से घूरा जा रहा है। और वो न उठाए तो भी उसकी शामत है क्योंकि ख़ुद ही बोला है — उठा देना।

तो ये सब रहेगा, शरीर तो विरोध करता ही है, स्थितियाँ भी विरोध करती हैं, आपको चलते रहना है। क्या कहा था कल? पिटते रहो, उठते रहो। और अन्त तक पिटोगे। कम-से-कम मैं तो अभी तक पिट रहा हूँ, आगे न पिटूँ तो पता नहीं।

प्र२: प्रणाम आचार्य जी, प्रश्न थोड़ा व्यक्तिगत है इसलिए थोड़ा संक्षेप में बताऊँगा कि अभी जीवन में मेरे आगे दो रास्ते दिखते हैं मुझे, एक तरफ़ सिक्योरिटी दिखती है और समाज में प्रतिष्ठा दिखती है और कामवासना की पूर्ति दिखती है शादी की तरफ़ और दूसरी तरफ़ लगता है कि जैसे आपने कहा था गिरोगे और उठोगे तो थोड़ा हिम्मत की कमी होने लगती है। दूसरा मन में ये भाव बहुत बार आता है कि जैसे जिनके साथ रिश्ता था मेरा तो मैं उनको अपने साथ ले लूँ तो कहीं न कहीं मैं उनको भी ऊपर उठा पाऊँगा तो आसक्ति एक वो मेरी उनके साथ जुड़ी हुई है।

अभी मैं कोशिश करता हूँ कि उनको जहाँ तक मैं ऊपर उठा पाऊँ लेकिन आपके बारे में कुछ बताता हूँ तो वो रीज़िस्ट करती है। मुझे उस तरफ़ नहीं जाना तो ये थोड़ा द्वंद भाव रहता है कि मैं उनको साथ लूँ या हिम्मत करके मैं अपना अलग उस रास्ते पर चलूँ।

आचार्य: देखो, दो बातें होती हैं दूसरों के साथ चलने में। प्यार बहुत है, इसलिए दूसरों को साथ लेना चाहते हो या अकेले चलने से डर लगता है इसलिए भीड़ में दूसरों के साथ चलना चाहते हो।

दो वजहों से आदमी चार लोगों को साथ लेकर चलता है। हाँ या ना? एक वजह ये होती है — ‘इन चार से मुझे बहुत प्रेम है तो इनको चार को साथ लेकर चलूँगा’, और दूसरा ये होता है — ‘अकेले चलने में डर लगता है। इन चार लोगों से भी डर लगता है कि अकेले चल दिया तो पीछे से घसीटकर मारेंगे। तो कह रहा हूँ चलो चलो सब चलो न।’

जैसे नए नवेले दंपति होते हैं संयुक्त परिवार में। उनको जाना है बाहर डिनर करने। अब जाना तो अकेले ही चाहते हैं। पर घर की परम्परा है कि जहाँ जाता है पूरा खानदान जाता है। अट्ठाईस जाते हैं। वहाँ पर टेबल नहीं रिज़र्व होता। पूरा रेस्टोरेंट रिज़र्व किया जाता है। तो जाना तो अकेले ही चाहते हैं पर फिर सब से बोलेंगे, ‘चलो न! चलो न! तुम भी चलो न! चलो, चलो, तुम भी चलो, तुम भी चलो।’ बोल ये इसीलिए रहे हैं कि चलो खाना पूर्ति कर दें लेकिन पाँच-सात ऐसे भी होते हैं जो कह ही देते हैं, ‘हाँ, चलते हैं न!’ और फिर एक-दूसरे की ओर दोनों देख रहे हैं कि ये तो चल दिए। (श्रोतागण हँसते हैं)

क्यों लेना चाहते हो दूसरों को साथ? कहीं ऐसा तो नहीं कि उनको छोड़ोगे तो बहुत मारेंगे। मैं पूछ रहा हूँ, मुझे क्या पता! मुद्दा आपका है। दूसरों की बेहतरी के लिए दूसरों को साथ लेना चाहते हो या अपनी बेहतरी के लिए दूसरों को साथ लेना चाहते हो? बोलो। उत्तर सिर्फ़ आप दे सकते हैं। अब सुनो एक सूत्र। आप उनको जिस राह ले जाना चाहते हो वो उस राह पर अपनेआप उस दिन आपके पीछे-पीछे आएँगे जिस दिन उन्हें दिख जाएगा कि उस राह पर आप उनके बगैर अकेले भी चल सकते हो।

बात थोड़ी विरोधाभासी है; जिस दिन तक उन्हें पता है कि सच की राह पर आप अकेले चल ही नहीं पाओगे क्योंकि आप बड़े दुर्बल हो। वो आपके साथ आएँगे नहीं। और बिलकुल ठीक बात है क्योंकि अगर आप दुर्बल हो तो सच की राह पर कर क्या रहे हो? वो कहेंगे ‘ये मसखरा ये हमको अध्यात्म बताएगा? बैठ यहाँ!’ और आप बैठ भी गए। तो क्यों आपके साथ आएँ, क्योंकि आप तो ही दुर्बल?

आप उनके पीछे पड़े रहो, उनकी मन्नतें करते रहो। आप उनके चरण धो-धोकर पीते रहो, वो आपके साथ नहीं आएँगे, आप कितना भी मनाओ, नहीं आएँगे। जिस दिन उन्हें दिखेगा कि सच्चाई ने ही आपको इतनी ताक़त दे दी है कि वो आये या न आये आप चलोगे सच के रास्ते पर ही वो ख़ुद ही आपके पीछे-पीछे आएँगे।

अभी आप उनको बुला नहीं रहे हो, अभी तो आप उनसे भीख माँग रहे हो कि मैं इस रास्ते पर चलना चाहता हूँ, तुम आ जाओ ताकि मैं चल सकूँ क्योंकि तुम्हारे बगैर मैं चल ही नहीं पाऊँगा। ‘मुझमें इतना दम ही नहीं है कि अकेले चल पाऊँ।‘

वो कह रहे हैं, ‘जब तुममें दम ही नहीं अकेले चल पाने का तो तुम्हारे रास्ते में फिर कितना दम है? उस रास्ते में आये क्यों जो रास्ता तुम्हें इतना दम भी नहीं दे पाया कि तुम अकेले चल पाओ उस रास्ते पर? हम उस रास्ते पर क्यों आएँ? पहले प्रमाणित करो न उस रास्ते में जान कितनी है अकेले चलो। और परवाह मत करो के पीछे कोई आ रहा है कि नहीं आ रहा है। फिर पीछे से आवाज़ें सुनाई देंगी, अरे धीरे चलना ज़रा हमारे बूढ़े घुटने धीरे-धीरे चल पाते है।’ थोड़ा सहारा दिया करो फिर आ जाएँगे पीछे-पीछे। दम तो दिखाओ।

ये संसार शक्ति पर चलता है। अशक्त के लिए यहाँ कोई जगह नहीं।

तो मजबूत लोग चाहिए और मजबूती सच से आती है। सच की राह पर, दुर्बलता का कोई काम नहीं। कमज़ोर आदमी को तो संसार में भी कुछ नहीं मिलता। उसको संसार के पार क्या मिलेगा? वो तो इसी स्थूल दुनिया में भी कुछ नहीं पाता, आत्मा क्या पाएगा!

कमज़ोर आदमी दो किलो वज़न नहीं उठा पाता, आत्मा में तो गुरुता की पराकाष्ठा है, उसका भार बहुत ज़्यादा है, कैसे उठाएगा? और ये नहीं कर सकते कि पहले मजबूत हो जाऊँगा फिर सच की ओर जाऊँगा।

मज़बूती आएगी भी सच से ही। तो बल को याद रखा करो। बल के बिना कोई अध्यात्म नहीं। और दुर्बल के लिए, कमज़ोर आदमी के लिए कहीं बिलकुल कोई जगह नहीं। ये तो कहिएगा ही नहीं कि मैं कमज़ोर हूँ दुनिया में। मुझे कोई जगह नहीं मिलती। इसलिए मन्दिर में जाकर बैठ गया हूँ।

अगर मन्दिर सच्चा होगा तो कमज़ोर आदमी को मन्दिर भी आश्रय नहीं देगा। मन्दिर दुर्बलता को आश्रय देने के लिए नहीं, दुर्बलता को मिटाने के लिए होता है। आप मन्दिर जाकर के बोलो, ‘दुर्बल हूँ, दुर्बल रहूँगा नहीं’ तो मन्दिर आपके लिए है पर आप कहो, ‘मेरी दुर्बलता को छाँव दो, पनाह दो’, तो मन्दिर आपके लिए नहीं है। आ रही है बात समझ में?

देखो, ये सब जो है न, ‘अपने तो अपने होते हैं’, ‘अपनों को साथ लेकर चलना ही होता है’; ये बड़े अच्छे वक्तव्य होते हैं अगर ये प्रेम से आ रहे होते। पर ये प्रेम से नहीं आ रहे होते। ये डर से आ रहे हैं। परायों से कहाँ इतना डरते हैं? सबसे ज़्यादा डर किससे लगता है?

आप कह रहे थे न, ‘हममें से कई लोग तो घर पर बता के भी नहीं आये है कि यहाँ आ रहे हैं।‘ सुनिए मज़ेदार बात। संस्था के कुछ लोग यहाँ सालों से होते हुए भी घर पर बता नहीं पाए हैं कि संस्था में काम कर रहे हैं। ये अपने हैं! ये अपने हैं जिन्होंने इतना खौफ़ छेद रखा है दिल में। ये अपने है कि तुम उनको ये नहीं बता सकते कि तुम संस्था में काम कर रहे हो, ये अपने हैं। दुश्मन चाहिए कोई बाहरी? ये अपने हैं।

“अपने तो अपने होते हैं” (गीत गुनगुनाते हुए)।

अपनेपन का अर्थ अध्यात्म ही बताता है। अध्यात्म नहीं है आपके जीवन में तो प्रेम नहीं होगा। प्रेम की बड़ी ललक हो जिन्हें वो वेदान्त की ओर आएँ। जिसने ये समझ लिया सिर्फ़ उसी के जीवन में प्रेम उतर सकता है। और अगर आप इसको देखना सुनना समझना नहीं चाहते तो बहुत झूठे क़िस्म का प्रेम पाले बैठे हैं आप और झूठे प्रेम को बचाने के लिए आप उपनिषदों से दूर भागते हैं।

वो कौन-सा प्यार है जो सच बर्दाश्त नहीं कर सकता? प्यार अगर सच के साथ नहीं है तो कैसा है? “झूठा प्यार, झूठा प्यार।” (गाते हुए) फिर अभी दिक्कत क्या हुई है सौ से ऊपर चैनल उग आये हैं यूट्यूब पर जो हमारे चैनल की सामग्री लेते हैं। और उसमें से कुछ निकाल करके वहाँ डाल देते हैं और वही सब कुछ निकालते हैं जो नहीं निकाला जाना चाहिए। वैसे एक-दो तो यहाँ भी होंगे। कौन है, भाई! हाथ खड़ा करो मैं देखना चाहता हूँ। मेरे साथ कौन वो सब करता है?

आज नहीं आए, शिविर तक में आये नोट करने की कौन-कौनसा माल निकाला जाएगा इससे। अभी मैं ये गा दूँ (बॉलीवुड गाना), तीन दिन के अन्दर वो बस इतना-सा निकालकर डाल देंगे। क्या कहेंगे वो? ‘हमने तो देखिए अध्यात्म की सेवा करी है। आचार्य जी की बात जन-जन तक पहुँचाई है’!

इसलिए ऋषियों ने कहा है कर्म पर मत जाना। उसके पीछे की नियत देखना। ये आचार्य जी की बात जन-जन तक पहुँचाई जा रही है या मज़ाक बनाया जा रहा है? अब देखिएगा वो थंब नेल वगैरह कैसे लगाते हैं। और ऐसे एक दर्जन, दो दर्जन नहीं हैं, ये सौ से ऊपर हैं।

श्रोतागण: कुछ अच्छे भी होते हैं।

आचार्य: अच्छी बात है। अब इससे क्या समझे आप? इससे ये समझो कि अच्छाई कितनी ज़रूरी है बुराई के लिए। बुराई अगर पूरी बुरी हो गयी तो मिट जाएगी। दूध वाला पूरा ही पानी दे दे तो मिट जाएगा। समझ में आई बात?

अच्छाई बहुत ज़रूरी है बुराई को क़ायम रखने के लिए। दूधवाले ने पूरा ही पानी दे दिया तो मिट जाएगा। थोड़ी अच्छाई, थोड़ी बुराई — ये दूर तक जाती है। बुराई को बचाना है तो उसे आटे में नमक की तरह मिला दो। बहुत दूर तक जाएगी अब! ऐसी नज़र होनी चाहिए जो तुरन्त पकड़ ले। यहाँ तक ठीक, इसके आगे ठीक नहीं। ये नहीं कि ये तो आदमी अच्छा है तो जो करेगा अच्छा ही करेगा। ‘ये तो आदमी बुरा है जो करेगा बुरा ही करेगा।’ न।

हर जगह विवेक निरन्तर, लगातार सतर्कता; और उसका अभ्यास किससे शुरू करना है? अपने से।

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