साथी कुछ समझना ही न चाहे तो? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, पाँच साल का रिश्ता था, शादी होने वाली थी। कुछ वजहों से कि उसका रुझान अध्यात्म में नहीं है, झूठ बोलती है चीज़ों को लेकर ताकि हमारा रिश्ता बना रहे; इन चीज़ों ने बहुत ज़्यादा मुझे ठेस पहुँचाई। अब मैं उस बिन्दु पर खड़ा हूँ कि इसको ख़त्म कर दूँ या चलाए रखूँ।
अध्यात्म के बारे में जाना है तो लगता है ख़त्म कर दूँ। फिर अन्दर से आवाज़ आ रही है कि क्या इस रिश्ते को उस प्यार से किया जा सकता है जो प्यार अध्यात्म में बताया जाता है जो सभी के लिए है? मैं इसके लिए भी करूँ या फिर मेरा ही अहम् मुझे पागल बना रहा है?
डिप्रेशन ये है कि साथ छूट गया, अब कभी साथ नहीं मिलेगा किसी का, सुख कभी नहीं आएगा। एक चीज़ खींच रही है अन्दर से कि ये सुख कभी नहीं मिलने वाला, कभी कुछ नहीं होगा तो स्वीकार करके चीज़ों को और आगे बढ़। वो डर और डिप्रेशन इतना बढ़ गया था कि मैं सो नहीं पा रहा हूँ, खा नहीं पा रहा हूँ। तो आचार्य जी, मैं थोड़ा मार्गदर्शन चाहूँगा।
आचार्य प्रशान्त: जो पहले वाली चीज़ है उसका वैसे तो मुझे कोई मार्ग पता है नहीं, पर आपने पूछा है तो कुछ बोलेंगे थोड़ा-बहुत जो जानते हैं। देखो, अगर मुझे ये पता होता कि किसी ऐसे व्यक्ति में अध्यात्म के लिए रुचि कैसे पैदा करें जो उधर को देखना ही नहीं चाहता तो ये जादू मैंने कब का कर डाला होता न? (श्रोतागण हँसते हैं)
सार्वजनिक रूप से भी और अपने व्यक्तिगत जीवन में भी। पर न तो मैं सार्वजनिक रूप से बहुत कुछ कर पाया हूँ। और व्यक्तिगत सम्बन्धों में भी कोई बहुत सफलता नहीं मिली है इस दृष्टि से। तो मैं तो यही कह सकता हूँ कि ये बात आप पर आँधी से भी कम आश्रित है। इसका ज़्यादा सम्बन्ध तो दूसरे व्यक्ति के अपने चुनाव से ही है।



