साँस तो लगातार चलती है, ध्यान लगातार क्यों नहीं चलता? || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। हमारा जो ध्यान है लगातार नहीं चलता लंबे समय तक, जैसे हमारी साँस लगातार चलती है। सफलता भी मिल रही है काम में, पर फिर भी ध्यान लंबे समय तक साथ नहीं चलता।
आचार्य प्रशांत: क्या नाम है आपका?
प्रश्नकर्ता: जगमीत सिंह।
आचार्य: जगमीत ठीक? सब जगमीत का प्रश्न समझें। कह रहे हैं, 'साँस तो लगातार चलती है, ध्यान लगातार क्यों नहीं चलता?' क्योंकि ध्यान का लगातार चलना देह के लिए आवश्यक है ही नहीं। साँस लगातार किसके लिए चलती है? हृदय लगातार किसके लिए धड़कता है? किसके लिए? देह के लिए। तो वहाँ लगातार चलता रहेगा काम। देह को तो अपनी सुरक्षा चाहिए, देह को एक निरंतरता चाहिए, कॉन्टिन्युइटी।
इसीलिए दिल धड़कना ज़रा सा भी बंद नहीं करता। जितने बरस आप जी रहे हो दिल लगातार धड़कता है, साँस लगातार चलती है, मस्तिष्क लगातार क्रियाशील रहता है। रहता है न? ये सब कभी रुकते हैं? भोजन का पचना, दिल का धड़कना, पलकों का झपकना — सोने के अलावा — मस्तिष्क की गतिविधियाँ, पूरे शरीर में ही जो तमाम जैविक, रासायनिक क्रियाएँ-प्रतिक्रियाएँ चल रही हैं, वो कभी रुकती हैं क्या? वो नहीं रुकेंगी, क्योंकि शरीर लगातार आगे बढ़ना चाहता है।
शरीर माने प्रकृति। मैं आपको कई दफ़े समझा चुका हूँ, उसका एक ही उद्देश्य है — बने रहना, समय में अपनेआप को आगे खींचते रहना, जितना हो सके अपने लिए भविष्य का निर्माण करना। और भविष्य में जब ये शरीर रुक जाये, तो उसके बाद के समय, बाद के भविष्य के लिए सन्तानें छोड़ जाना। और उन सन्तानों में भी क्या मौजूद होगा? तुम्हारा ही शरीर, तुम्हारा ही



