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साँस तो लगातार चलती है, ध्यान लगातार क्यों नहीं चलता? || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। हमारा जो ध्यान है लगातार नहीं चलता लंबे समय तक, जैसे हमारी साँस लगातार चलती है। सफलता भी मिल रही है काम में, पर फिर भी ध्यान लंबे समय तक साथ नहीं चलता।

आचार्य प्रशांत: क्या नाम है आपका?

प्रश्नकर्ता: जगमीत सिंह।

आचार्य: जगमीत ठीक? सब जगमीत का प्रश्न समझें। कह रहे हैं, 'साँस तो लगातार चलती है, ध्यान लगातार क्यों नहीं चलता?' क्योंकि ध्यान का लगातार चलना देह के लिए आवश्यक है ही नहीं। साँस लगातार किसके लिए चलती है? हृदय लगातार किसके लिए धड़कता है? किसके लिए? देह के लिए। तो वहाँ लगातार चलता रहेगा काम। देह को तो अपनी सुरक्षा चाहिए, देह को एक निरंतरता चाहिए, कॉन्टिन्युइटी।

इसीलिए दिल धड़कना ज़रा सा भी बंद नहीं करता। जितने बरस आप जी रहे हो दिल लगातार धड़कता है, साँस लगातार चलती है, मस्तिष्क लगातार क्रियाशील रहता है। रहता है न? ये सब कभी रुकते हैं? भोजन का पचना, दिल का धड़कना, पलकों का झपकना — सोने के अलावा — मस्तिष्क की गतिविधियाँ, पूरे शरीर में ही जो तमाम जैविक, रासायनिक क्रियाएँ-प्रतिक्रियाएँ चल रही हैं, वो कभी रुकती हैं क्या? वो नहीं रुकेंगी, क्योंकि शरीर लगातार आगे बढ़ना चाहता है।

शरीर माने प्रकृति। मैं आपको कई दफ़े समझा चुका हूँ, उसका एक ही उद्देश्य है — बने रहना, समय में अपनेआप को आगे खींचते रहना, जितना हो सके अपने लिए भविष्य का निर्माण करना। और भविष्य में जब ये शरीर रुक जाये, तो उसके बाद के समय, बाद के भविष्य के लिए सन्तानें छोड़ जाना। और उन सन्तानों में भी क्या मौजूद होगा? तुम्हारा ही शरीर, तुम्हारा ही डीएनए। तो प्रकृति बस यही चाहती है कि तुम्हारा शरीर आगे बढ़ता रहे, इसीलिए साँस लगातार चलती रहती है।

प्रकृति की कोई इच्छा नहीं है कि तुम्हें मुक्ति इत्यादि मिले कि बोध हो तुमको। मुझे एक बात बताना, अज्ञानी आदमी को अगर खाना-पानी मिलता रहे, तो क्या वो ज्ञानी से कम लंबा जियेगा? बोलो! किसकी आयु होती है? देह की। तो यानी देह की आयु और देह का स्वास्थ्य बिलकुल निर्भर नहीं करता चैतन्य के विकास पर, बोध की गहराई पर। कोई महामूढ़ हो सकता है, लेकिन हो सकता है वो पूरे सौ साल जिये। क्या ऐसा होता नहीं है? ज़्यादा ऐसा ही होता है।

तुम्हारी चेतना लगातार आज़ादी चाहती है। पर क्या ऐसा होता है कि जो जेल में कैदी बंद है वो कम जी रहा है सामान्य आदमी की अपेक्षा? ऐसा होता है क्या? जेल में तुम्हें बंद भी कर दिया जाये, तो शरीर को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। शरीर को क्या चाहिए? भोजन, आराम, हवा, पानी, वासना की तृप्ति ये सब शरीर को चाहिए। तो तुम जेल में भी रहते हो तो तुम्हारी चेतना फड़फड़ाती है, खूब तड़पती है; शरीर नहीं तड़पता। या शरीर तड़पता है?

ऐसा होता है कि तुम्हें जेल में बंद कर दिया गया तो तुम्हारा हाथ सूख जाये, ऐसा होता है? हाँ, तुम्हारा मन सूख जाता है। हाथ तो नहीं सूखता। या होता है ऐसा? ऐसा होता है क्या कि तुम्हें जेल में डाला गया हो और पाया गया कि अचानक तुम्हारी पीठ पर झुर्रियाँ हैं या पैरों पर काले-नीले निशान आ गये? हाँ, पिट जाओ जेल में तो अलग बात है। अन्यथा शरीर बिलकुल बुरा नहीं मानता। यही इंसान की त्रासदी है।

शरीर बुरा मानता ही नहीं जबतक उसको किसी भी तरीक़े से खाना-पीना इत्यादि मिल रहा है। कहेगा ठीक है, बढ़िया है! साँस चलनी चाहिए।

प्रोटीन की कमी हो तुम्हारे शरीर में और तुम्हें प्रोटीन दिया जाये दाल से निकालकर, शरीर कहेगा बढ़िया! और तुम्हें प्रोटीन दिया जाये जानवर को मारकर उसके माँस से निकालकर। शरीर कहेगा बढ़िया! और तुम्हें प्रोटीन दे दिया जाये तुम्हारे ही किसी दोस्त को मारकर उसके माँस से निकालकर। शरीर तब भी कहेगा बढ़िया!

शरीर अंतर करेगा ही नहीं। हाँ, मन तुम्हारा अंतर करेगा। चेतना पर अंतर पड़ेगा; शरीर पर अंतर नहीं पड़ता है। प्रकृति किसी किस्म की नैतिकता में ही यकीन नहीं रखती, अध्यात्म तो बहुत दूर की बात है। प्रकृति के तल पर नैतिकता ही नहीं चलती, अध्यात्म तो दूर की बात है। वहाँ कोई नैतिक नियम-कायदा नहीं है।

वहाँ बस एक नियम है — जंगल का नियम — कौन खाएगा, कौन बचेगा, कौन ज़्यादा जियेगा और कौन कितनी सन्तानें पैदा करेगा। प्रकृति बस तुमसे यही चाहती है — खूब खाओ, खूब जियो और खूब सारी सन्तानें पैदा करो। यह जंगल है जो हमारे शरीर में बसा हुआ है। शरीर की और कोई इच्छा है ही नहीं।

'ध्यान' उसका शरीर से कोई सम्बन्ध नहीं। शरीर बिलकुल नहीं चाहता कि तुम ध्यानी बनो। तुम्हारी छटपटाती चेतना चाहती है कि तुम ध्यान करो। शरीर कहता है, 'छोड़ो।'

शरीर से पूछोगे कि ध्यान में और भोजन में क्या चुनें, तो शरीर तत्काल क्या बोलेगा? भोजन। शरीर से पूछोगे अध्यात्म और विश्राम में क्या चुनें, तो शरीर तत्काल क्या बोलेगा? विश्राम। शरीर से पूछोगे कि वासना में और साधना में क्या चुनें, तो शरीर तत्काल क्या बोलेगा? वासना। तो हममें से ज़्यादातर लोग चूँकि शरीर बनकर ही जीते हैं, इसीलिए शरीर की ही बात मान लेते हैं।

साधना वैकल्पिक है। वासना अनिवार्य है शरीर के लिए, अर्थात् जीव के लिए। साँस अनिवार्य है। साँस अनिवार्य है, सुमिरन वैकल्पिक है। साँस तो चलेगी, क्योंकि यह शरीर है। सुमिरन करोगे कि नहीं करोगे यह बात तुम्हारे चुनाव की है — यह वैकल्पिक है। संतों ने कहा है न "साँस-साँस सुमिरन रहे।" अब "साँस-साँस" जो उन्होंने कह दिया, वो तो तयशुदा बात है कि साँस तो चलेगी ही चलेगी। सुमिरन करोगे या नहीं करोगे यह तुम जानो। तुम जानो माने तुम्हारी चेतना जाने।

साँस को चलाने का दारोमदार तो उठा रखा है, किसने? प्रकृति ने। तुम्हें साँस चलानी नहीं पड़ती, या चलाते हो? मेहनत कर-करके या चुनाव कर-करके साँस चलाता है कोई? साँस चलाने का ज़िम्मा किसने उठा रखा है? प्रकृति ने। तो साँस तो चलेगी। वह जो दूसरा काम है ध्यान वाला, वह तुम्हें करना है। साँस तुम्हें चलानी ही नहीं है। वह अपनेआप चलती रहेगी।

वह जो दूसरा काम है वह तुम्हें करना है, ध्यान वाला। वह तुम करो तो करो, ना करो तो ना करो। वह निर्भर इसपर करता है कि तुममें मुक्ति के लिए बेचैनी कितनी है। तुममें बोध के लिए तड़प कितनी है। होगी, तो ध्यान करोगे। नहीं होगी, तो ध्यान से क्या लेना-देना।

ध्यान से कोई बच्चे पैदा होते हैं? और प्रकृति तो यही चाहती है कि तुम बच्चे-बच्चे-बच्चे करते चलो पैदा। ध्यान से तो बल्कि यह हो सकता है कि संतानोत्पत्ति रुक जाये। इसीलिए प्रकृति बहुत पसंद नहीं करती है यह ज्ञान-ध्यान इत्यादि को। देह को रुचता ही नहीं तुम अगर अध्यात्म में बढ़ो। लोग आते हैं, कहते हैं, 'ध्यान करने बैठते हैं, तो हमारी पीठ में खुजली शुरू हो जाती है।' कहते हैं, 'और कभी हो रहा हो कुछ चाहे न हो रहा हो, ध्यान में ज़रूर होता है।'

यह प्रकृति का तरीक़ा है तुम्हें ध्यान से दूर रखने का। वो नहीं चाहती है कि तुम ध्यान में उतरो। ध्यान में उतरोगे तो जो प्रकृति के उद्देश्य हैं, उनमें बाधा पड़ती है।

लोग शिविर में आने के लिए निकलते हैं, अचानक दस्त लग जाते हैं। हर बार होता है। यहाँ से भी कुछ गायब हैं। और ऐसा नहीं है कि उनकी नीयत में खोट थी। कुछ तो ऐसे भी होते हैं जिन्होंने जगह वग़ैरा भी आरक्षित करा ली होती है, जाकर के अग्रिम राशि भी जमा कर दी होती है कि लीजिए यह जगह है, ऐसा है, ऐसा है, सब पूरा। आने की टिकट वग़ैरा भी करा ली होती हैं। और बस निकल ही रहे होते हैं कि न जाने क्या हुआ आज बुखार आ गया। कभी आता ही नहीं था। और जहाँ उन्होंने शिविर में अपनी भागेदारी छोड़ी, तहाँ बुखार लौट जाता था।

मैं नहीं कह रहा ऐसा हमेशा होगा। पर ऐसा भी होता है। ऐसा भी होता है। शांत बैठने की कोशिश करो, शरीर तरह-तरह की हरकतें शुरू कर देगा — यह प्रकृति की साज़िश है, वो नहीं चाहती तुम शांत बैठो।

और इसीलिए जो लोग तुमसे प्रकृति के तल का और देह के तल का रिश्ता रखेंगे वो तुरन्त घबरा जाएँगे जैसे ही तुम्हें अध्यात्म की ओर बढ़ते देखेंगे। जैसे ही पाओ कि कोई बुरा मानता है तुम्हारे अध्यात्म की ओर आने को, तो जान लेना कि इस आदमी का मुझसे बस देह का नाता है — यह देह का खिलाड़ी है, शोषक है।

वो जैसे ही तुमको ज़रा गम्भीर, स्थिर और शांत देखेगा, वो चौंक जाएगा। उसे दिखायी देगा ख़तरा है। वो कहेगा, 'क्या हुआ? क्या हुआ? उदास हो क्या? इतने शान्त क्यों बैठ गये? तुम तो बदल रहे हो।'

बात समझ में आ रही है?

प्रकृति बहुत-बहुत तरीक़ों से चाहती है कि तुम्हारा जीवन बस उसका उपकरण बना रहे। तुम्हारा जीवन बस उसका उपकरण बना रहे, औज़ार। उस औज़ार से वो क्या करवाना चाहती है? सन्तान। सन्तानें पैदा करो और सन्तानों की परवरिश करो। इसीलिए सन्तानों के प्रति बड़ा मातृत्व और वात्सल्य भाव होता है। यह प्रकृति करवा रही है। वो तुम्हारा इस्तेमाल कर रही है, ताकि और, और, और इंसान पैदा होती रहें।

वो ऐसा क्यों कर रही है? बस वो ऐसा कर रही है! इरादा शायद उसका यह होगा कि और नये-नये इंसान पैदा होंगे, प्रजातियाँ आगे बढ़ेंगी, तो क्या पता किसी दिन कोई अतिमानव पैदा हो जाये — सुपरमैन ! ऐसा कहा है लोगों ने कि भई, प्रजातियों का इतना विकास, इतना इवॉल्यूशन तो हुआ ही है। बंदर अगर इंसान बन सकता है, तो इंसान क्या पता किसी दिन यूँही विकसित होते-होते भगवान बन जाये।

पर जो भी है, इरादा प्रकृति का है। आपको उसमें उतरने की ज़रूरत नहीं है। अभी भी जो मैंने कहा, वह बात सिर्फ़ एक अनुमान की है।

मशीनों के इरादे होते हैं क्या? प्रकृति यंत्रवत काम करती है, मशीन की तरह काम करती है। उसपर किसी औचित्य को थोपना, यह कहना कि उसका कोई उद्देश्य है, शायद पूरी तरह सही भी नहीं है।

आप बस इतना समझ लीजिए कि आपका जो दैहिक उपकरण है, वो पूरा-का-पूरा मशीन की तरह काम करता है। और मशीनों को, यंत्रों को ध्यान की कोई ज़रूरत, भक्ति की कोई ज़रूरत, बोध की कोई ज़रूरत, मुक्ति की कोई ज़रूरत? उन्हें तो नहीं होती न!

तो आप दो हैं। जहाँ तक देह की बात है, आप सिर्फ़ एक प्राकृतिक मशीन हैं। जहाँ तक देह की बात है, हम बस एक प्राकृतिक यंत्र हैं — इतने ही हैं हम। और वह यंत्र अपना काम कर रहा है। उसका काम है खाना, साँस लेना इत्यादि-इत्यादि — वही जो दिनभर करता है शरीर। पर आप एक ख़ास मशीन हैं। आप एक ऐसी मशीन हैं जो मशीन होने से संतुष्ट नहीं है।

इंसान अद्भुत है! इंसान में और एक टेलिविज़न में या हवाईजहाज़ में या इस एयरकंडीशनर में क्या अंतर है? यह जैसे हैं इन्हें अपने होने से, अपनी हस्ती से, अपने अस्तित्व से कोई आपत्ति नहीं है। कोई टेलिविज़न बिलख-बिलख कर रोता नहीं है कि मेरी ज़िंदगी में क्या हो रहा है। इंसान भी मशीन है। जिस्म के तल पर इंसान भी मशीन है। पर इंसान को दुख बहुत महसूस होता है। एयरकंडीशनर को नहीं महसूस होता, कि होता है?

तो आप एक ख़ास मशीन हैं। आप एक ऐसी मशीन हैं जो अनुभव करती है। और किसी भी अनुभव से संतुष्ट नहीं होती। वो अनुभवों के पार जाना चाहती है। तो आदमी की जो चेतना है, वह भी फिर समझ लो, दो तलों पर रहती है। एक तरफ़ हमारी चेतना बिलकुल शरीर से जुड़ी हुई है, मस्तिष्क पर आधारित है। मस्तिष्क भी शरीर है, न?

तो हमारी चेतना बिलकुल मस्तिष्क पर अवलंबित है। तो मस्तिष्क का जो हाल-चाल होता है वही चेतना का हाल-चाल हो जाता है। मस्तिष्क में कोई इंजेक्शन लगा दो, कोई रसायन डाल दो, कोई सर्जरी कर दो, चेतना बदल जाती है।

बदलती है कि नहीं? मस्तिष्क में चोट लग जाये, चेतना बदल जाती है। तो हमारी चेतना की जो सामग्री है पूरी, वो कहाँ से आती है? मस्तिष्क से आती है।

और दूसरी ओर हमारी चेतना का एक दूसरा तल भी है जो मस्तिष्क पर बिलकुल भी आधारित नहीं है। चेतना मस्तिष्क में बँधे-बँधे छटपटाती है, वो उस दूसरे तल पर पहुँचना चाहती है — उसी को मुक्ति कहते हैं। चेतना कहती है, 'मुझे इस छोटे से मस्तिष्क में या इस छोटे से शरीर में क्यों क़ैद कर लिया है।' उसे बाहर जाना है। चेतना की इसी छटपटाहट को कहा गया 'मुमुक्षा' और चेतना की ही मुक्ति को कहा गया 'मोक्ष'।

समझ में आ रही है बात?

अब आप या तो अपनेआप को शरीर जान लीजिए — अगर शरीर जान लेंगे तो खाना-पीना, कपड़े पहनना, घर बनवाना, जीवन में यही सब काफ़ी है — या फिर आप जानिए कि आप शरीर तो हैं, शरीर के साथ-साथ शरीर से आगे भी कुछ हैं।

और शरीर से आगे जो आप हैं वो बिलकुल संतुष्ट नहीं हैं शरीर में बँधे रह करके। उसे कुछ और चाहिए। उसे आगे का कुछ चाहिए। यह जो आगे का पाने की बात है, इसी को अध्यात्म कहते हैं।

पर आगे का तो कोई तब पाएगा न जब पहले उसको पीछे का पता होगा। तो अध्यात्म शुरुआत में ही आगे की नहीं बात करता। वो पहले यहाँ की बात करता है — तुम हो कौन? तुम्हारा हाल-चाल क्या है? ये आँखें क्या हैं? ये मन क्या है? ये इंद्रियाँ क्या हैं? ये शरीर क्या है? ये दुनिया क्या है? ये सब चल क्या रहा है? अध्यात्म सबसे पहले इन प्रश्नों को संबोधित करता है कि ये सब खेल है क्या।

और जब ये समझ में आने लगता है कि ये सब खेल क्या है, तो फिर अध्यात्म कहता है, 'इसी खेल में फँसे-फँसे कौनसी तृप्ति मिलनी है तुमको! चलो ज़रा आकाश की सैर करके आते हैं।' पर आकाश की बात अध्यात्म बाद में करता है। पहले वो ज़मीन, मिट्टी, प्रकृति और देह की बात करता है। जो इसको (शरीर को) समझ गया वो आगे का समझने लग जाएगा। जो अभी अपने शरीर को ही नहीं समझ रहा, उसके लिए आगे का कुछ भी समझना बहुत मुश्किल है।

तो ध्यान, मैंने कहा, वैकल्पिक है। करना हो तो करो, नहीं करना तो मत करो। अगर देह मात्र हो तो ध्यान करने की कोई ज़रूरत है ही नहीं। और अगर बेचैनी अनुभव करते हो, तो फिर सच्चाई की खोज करो, बोध की साधना करो।

यह बेचैनी बड़ी विचित्र चीज़ है। कहते तो हो कि तुम देह हो, और साथ ही यह भी कहते हो बेचैन हूँ। ज़रा बताना देह का कौनसा हिस्सा बेचैन है — हथेली, कान, किडनी (गुर्दा), खाल? यह बेचैनी क्या चीज़ होती है? सब बेचैन रहते हैं, न? यह बेचैनी क्या होती है? कहाँ होती है? दाढ़ी में होती है? कहाँ होती है बेचैनी? यह जो आदमी लगातार बेचैन है, यह बेचैनी कहाँ है शरीर में? यहाँ है? (छाती को इंगित करते हुए) यहाँ कुछ कर दें, तो बेचैनी कम होगी? कहाँ है?

वो बेचैनी शरीर की है ही नहीं, इसलिए बिलकुल बता नहीं पाओगे शरीर में कहाँ है। वो शरीर में है ही नहीं। वो बेचैनी चेतना की है। शरीर की खुजली थोड़े ही है बेचैनी कि बता दो अभी, यहाँ, कंधे पर हो रही है। आप और हम जिस बेचैनी से लगातार ग्रस्त रहते हैं, वो कंधों और कूल्हों की नहीं है, वो कहीं और की है।

तो ये विकल्प है आपके पास कि या तो अपनेआप को कंधा और कूल्हा ही मानते रहिए और कंधे और कूल्हे की ही सेवा में जीवन बिता दीजिए — अच्छा खाओ, अच्छा पहनो, सुख-सुविधा का समान इकट्ठा कर लो, घर इत्यादि बना लो — या तो ये कह लीजिए कि मैं क्या हूँ, कंधा और कूल्हा।

या फिर जो आप हैं वास्तव में कुछ उसका ख़्याल कर लीजिए, थोड़ी उसकी सेवा कर लीजिए। अपनेआप कभी नहीं चलेगा ध्यान; तुम चलाओगे तो चलेगा। तुम्हें एक चैतन्य निर्णय करना पड़ेगा, तब चलेगा। साँस अपनेआप चलेगी; ध्यान अपनेआप नहीं चलेगा। वो तभी चलेगा जब तुम ध्यान के समर्थन में खड़े हो जाओगे।

इसी बात को अब मैं दूसरे तरीक़े से कहता हूँ — झूठ हमेशा अपनेआप चलेगा दुनिया में, सच नहीं चलेगा, सच तभी चलेगा जब उसे तुम चलाओगे। यह बात सुनने में अजीब लगेगी। क्योंकि हमें तो बताया गया कि सच हमें चलाता है। मैं कह रहा हूँ, वो बात बहुत दूर की है, बहुत आगे की है कि सच आपको चलाता है। इस दुनिया का तथ्य यह है कि इस दुनिया में तो सच को आप चलाएँगे; नहीं तो सच नहीं चलेगा।

उस दुनिया की बात यह है कि सच तुम्हारा बाप है — जो ऊपर वाली दुनिया है — उसकी बात यह है कि सच हमारा बाप है। और ज़मीनी दुनिया की हक़ीक़त यह है कि सच हमारा बच्चा है; उसको हम पैदा करेंगे तो होगा, नहीं तो नहीं होगा। उसकी हम रक्षा करेंगे तो बचेगा; नहीं तो नहीं बचेगा।

ज़मीन की हक़ीक़त यही है कि यहाँ पर झूठ बहुत ताक़तवर होता है और सच बड़ा दुर्बल। तो सच को तो बल तुम्हें ही देना है। तुम दोगे तो सच में बल आएगा, नहीं तो सच में कोई बल नहीं है।

यह जो बात है 'सत्यमेव जयते', यह ज़मीन के लिए ठीक नहीं है। ज़मीन पर तो झूठ ही व्याप्त है, आज नहीं हमेशा से ही। यह मत कह देना कि कलियुग है इसलिए झूठ आ गया है। हमेशा से सच की तो स्थापना करनी पड़ती है।

"धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।"

तो कृष्ण कह रहे हैं, धर्म की संस्थापना के लिए आऊँगा मैं। अच्छा, धर्म की संस्थापना के लिए तो कृष्ण को आना पड़ता है, झूठ कैसे स्थापित चल रहा है भाई? धर्म बचाने के लिए तो कृष्ण को अवतरित होना पड़ता है, तो ये झूठ को कौन चला रहा है?

धर्म के लिए तो बात तब बनती है जब कोई श्रीराम, कोई श्रीकृष्ण, कोई अवतार, कोई पैगम्बर आएँ। तब बात बनती है न धर्म की! ये झूठ को चलाने के लिए तो कोई गुरु, कोई ऋषि, कोई अवतार, कोई पैगम्बर कभी आता नहीं। झूठ तब भी चलता ही जा रहा है!

आशय साफ़ है। झूठ ही इस दुनिया का राजा है। वो अपनेआप चलता है और वो जीता हुआ ही है। सच तो यदा-कदा जीतता है। सच तब जीतता है जब तुम चाहते हो। जब तुम्हारी पुकार से सच्चाई ज़मीन पर अवतरित होती है, तब सच जीतता है। नहीं तो झूठ का ही राज है।

इसका मतलब यह भी समझना कि झूठ को तुम्हारे समर्थन की कोई ज़रूरत नहीं है। वो डिफॉल्ट (भूल) है। उसको तो तुमने समर्थन दे ही रखा है। जीव हुए नहीं, शरीर धारण किया नहीं कि तुमने झूठ को समर्थन दे दिया। झूठ को तुम्हारे समर्थन की कोई ज़रूरत नहीं है। सच को तुम्हारे समर्थन की बहुत ज़रूरत है।

लोग मुझसे पूछते हैं, कहते हैं कि फाउन्डेशन (संस्था) को भी प्रचार क्यों करना पड़ता है। 'क्या सच को भी विज्ञापन की ज़रूरत है?' उन पगलों को समझ में नहीं आता कि सच को ही विज्ञापन की ज़रूरत है। झूठ को विज्ञापन की कोई ज़रूरत है क्या? झूठ तो अपनेआप में बहुत आकर्षक है। झूठ तो चल ही रहा है। सच बेचारे की कोई सुनने वाला नहीं है। तो झूठ के ख़िलाफ़ सच का प्रचार करना पड़ता है। नहीं तो झूठ, मैं फिर कह रहा हूँ, हमारी डिफॉल्ट अवस्था है।

बच्चा पैदा ही झूठ में होता है। झूठ में पैदा होता है, सच तक उसको खींचकर ले जाना पड़ता है। सच तक झूठ को खींचकर ले जाने की जो प्रक्रिया है उसी का नाम है 'अध्यात्म'।

कोई ये न सोचे कि सच तो हमारे भीतर निवास करता ही है, हमें सच की साधना की क्या ज़रूरत है। बिलकुल झूठ! हमारे भीतर-बाहर, नख से लेकर शिख तक झूठ-ही-झूठ निवास करता है। कोई इस ग़लत-फ़हमी में न रहे कि सच तो हमारे भीतर ही है न।

अजी कहाँ!

अपनी ज़िंदगी को देखिए, अपने चहरे को देखिए। आपको वाक़ई लगता है सच आपके भीतर है? अपने कर्मों को देखिए! सुबह से शाम तक आपके जो विचार चलते रहते हैं, उनको देखिए। आपको वाक़ई लगता है सच आपके भीतर है?

और अगर सच आपके भीतर है भी तो बीज रूप में है, सोया पड़ा है। बड़ी मेहनत करके उसको जगाना पड़ता है। झूठ को जगाना नहीं पड़ता, वो लगातार जगा ही हुआ है, उपद्रव कर रहा है। कूद रहा है, फाँद रहा है — एकदम क्रियाशील है।

सच सोया रहता है, बिंदु मात्र है, बीज मात्र है। उसको जगाने के लिए बड़ी साधना करनी पड़ती है। बच्चे की तरह उस सच का पोषण करना पड़ता है। तब वो पौधा बड़ा होता है। तो यह न हो कि आप ग़फ़लत में ही रह जायें कि बताने वाले तो बता गये हैं कि हमारे ही भीतर सच है। वो भीतर ही रह जायेगा, उससे आपको कुछ मिलेगा नहीं।

जैसे किसी की जेब में बीज पड़ा हो। या जैसे किसी ने एक पिटारी में बीज बंद करके रख दिया हो। उस बीज से कुछ मिलेगा? आम के पेड़ का है। कुछ पा जाओगे, मीठे-मीठे आम? बीज से आम के फल तक की यात्रा बड़ी सेवा और साधना की यात्रा है।

आज बच्चा जो पैदा हुआ है, उसमें झूठ विकसित है और सत्य प्रसुप्त। जो बच्चा पैदा होता है, उसमें झूठ पहले ही विकसित होता है और सच होता है सोया हुआ। झूठ विकसित पहले ही होता है और जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है, उसका झूठ ही विस्तार लेता जाता है। सच तो जन्म से ही बस कितना होता है, इतना सा, (उँगली के माध्यम से इंगित करते हुए) बिन्दु मात्र, बीज जैसा।

उसको तुम न जगाओ तो वो तुम्हारी सौ साल की ज़िंदगी में कभी न जगे। ये इतने बुज़ुर्ग, बूढ़े लोग हैं सत्तर-अस्सी-सौ साल के उम्र बढ़ने से क्या इनका बोध बढ़ जाता है? अनुभव तो इन्होंने बहुत ले लिए, बोध इन्होंने क्या लिया? उम्र बढ़ जाती है, बढ़ती उम्र से सीख की गहराई थोड़े ही आती है? बीज, बीज ही रह जाता है। और प्रकृति की यही इच्छा है, यही उसका षड्यंत्र है कि तुम्हारे भीतर मुक्ति का जो बीज है, वो बीज ही रह जाये।

शरीर फैल जाये और मुक्ति का जो भीतर बीज है वो पेड़ न बनने पाए। हाँ, शरीर का विकास हो जाये, बीज का विकास कभी न हो। शरीर का विकास तो अपनेआप ही हो जाता है, हो जाता है कि नहीं? खाओ-पियो, शरीर बन जाता है। लेकिन मुक्ति का बीज जो भीतर बैठा है, उसका विकास स्वत: नहीं होता। उसके लिए डट करके प्रयास, प्रयत्न, साधना करनी पड़ती है।

जो लोग साधना नहीं कर रहे, वो कृपया इस ग़लत-फ़हमी में न रहें कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ेगी, जीवन आगे बढ़ेगा, अनुभव होंगे जीवन के वैसे-वैसे हम ख़ुद ही सीख लेंगे जीवन के बारे में — तुम जीवन के बारे में कुछ नहीं जान पाओगे।

हाँ, उम्र बढ़ने के साथ-साथ तुम प्रकृति के और ज़्यादा उपयोगी औज़ार बन जाओगे। और उस औज़ार की उपयोगिता किसके लिए होगी? सिर्फ़ प्रकृति के लिए ही।

हँस रही है प्रकृति तुमको देखकर के कि बढ़िया है, एक और मेरा ग़ुलाम, एक और मेरा औज़ार-उपकरण, बिलकुल वही कर रहा है जो मैं इससे करवाना चाहती हूँ और जो इसका असली काम था, उसको ये बिलकुल भूला बैठा है। सीने में इसके आज़ादी का बीज दबा हुआ है, छुपा हुआ है। वो बीज जड़ ले ही नहीं रहा, मिट्टी पानी पा ही नहीं रहा। वो फलित कभी होगा ही नहीं।

बात आ रही है समझ में?

अब जीवन जीने के दो तरीक़े हो गये। या तो प्रकृति के ग़ुलाम बनकर जी लो और प्रकृति की आज्ञाएँ मानने में ही जीवन बिता दो — उसने आज्ञा दी कि चलो, अब कुछ और साधन जुटाओ शरीर के सुख के। तुमने कहा ठीक, अगले पाँच साल, मैं थोड़े और साधन जुटाने में लगाऊँगा — यह तुम क्या कर रहे हो? यह तुम प्रकृति की चाकरी कर रहे हो। या तो यह करने में ज़िंदगी लगा लो या फिर वो कर लो जिसमें तुम्हारा हित है।

अतृप्त चेतना हो तुम। तुम्हारा हित प्रकृति की माँगें मानते रहने में नहीं है; तुम्हारा हित है तुम्हारी मुक्ति में, तुम्हारे बोध में। देख लो अपना समय, अपनी ऊर्जा कहाँ लगा रहे हो — देह की ग़ुलामी में, या चेतना की आज़ादी में?

प्र: प्रणाम आचार्य जी। तो फिर ख़ुद को जानना ही ध्यान हुआ?

आचार्य: ख़ुद माने किसको जानना?

प्र: अपनेआप को।

आचार्य: अपने माने किसको?

प्र: मेरे को, अपने को।

आचार्य: बार-बार यहाँ मार रही हैं। (कंधे की ओर इंगित करते हुए) कन्धे को जानना?

प्र: (हँसते हुए) नहीं-नहीं।

आचार्य: हाँ?

प्र: अंजू हो गयी जैसे मैं। अंजू को जानना। या फिर ऐसे ध्यान में बैठ गये, वो ध्यान हो गया?

आचार्य: अभी हमने बात करी न, दो हैं आप! एक शरीर, दूसरी?

प्र२: चेतना।

आचार्य: किसको जानना चाहती है?

प्र२: चेतना को।

आचार्य: तो चेतना को बैठ कर क्या जानेंगी? चेतना अपने होने का प्रदर्शन क्या तभी करती है जब बैठ जाते हो पालथी मार कर? बल्कि चेतना में क्या चल रहा है, तुम्हारी अतृप्तियाँ और बेचैनियाँ कैसी हैं इसका पता तो तुम्हें दिन भर की दौड़-धूप में चलता है न? जब ऐसे बैठ गए पालथी मारकर के, तब तो बेचैनी अपनेआप शांत हो जाती है, छुप जाती है बल्कि — पता ही नहीं चलेगी।

तो ये तो ध्यान करने का कोई अच्छा तरीक़ा हुआ ही नहीं। कि सब काम-धंधे छोड़कर, पालथी मार कर बैठ गये और कह रहे हैं, 'ध्यान कर रहे हैं चोर पकड़ना है।' तो चोर को बता कर पकड़ोगे कि आ रहे हैं? बोलो! तुम्हारा जो चोर है वो सबसे ज़्यादा कहाँ प्रकट होता है? तुम्हारी चोरियाँ कब चलती हैं? जब तुम पूजा कक्ष में ध्यान करने बैठ जाते हो तब या जब तुम बाज़ार में रहते हो, दफ़्तर में रहते हो तब? बोलो!

सारी चालाकियाँ, सारी चोरियाँ कब करते हो? पूजा घर में, या बाज़ार में?

श्रोतागण: बाज़ार में।

आचार्य: तो ध्यान की ज़रूरत कहाँ है?

श्रोतागण: बाज़ार में।

आचार्य: लेकिन बाज़ार में तो ध्यान को पीछे छोड़ आते हो। तुम कहते हो ध्यान तो आधे घंटे करना है पूजा घर में पालथी मार कर। तो इसीलिए यह जो तुम पालथी मार कर ध्यान करते रहते हो, इससे कभी कोई लाभ भी नहीं होता। होता भी है लाभ तो थोड़ा-बहुत, सतही लाभ। असली लाभ होने ही नहीं पाता।

असली लाभ तब होगा जब तुम देखो तुम्हारा हाल-चाल क्या है दिन भर। पर वो ख़तरनाक हो जाएगा, क्योंकि उससे सुख-सुविधाओं पर चोट पड़ेगी। दिन भर तो देह के लिए ही जीते हो, दिन भर तो देह के ही रिश्ते निभाते हो। अगर उनको ध्यान से देखने लग गये, बड़ी गड़बड़ हो जाएगी।

तो इसलिए अच्छा यह है कि वो सब अलग करो और पालथी वाला काम अलग करो। अब पालथी मारकर बैठ जाओ और बोलो ध्यान हो गया (व्यंग करते हुए)।

प्रकृति चाहती है 'तुम बस करो'। चेतना चाहती है 'तुम जानो कि तुम क्या कर रहे हो।'

अंतर समझ में आया दोनों का? प्रकृति चाहती है कि तुम बस करो। तुम्हारी साँस सोते समय भी चलती रहती है न? तुम जान तो नहीं रहे कि साँस चल रही है, लेकिन इससे फेफड़ों को कोई तकलीफ़ होती है? तो प्रकृति में ज्ञान का कोई महत्व नहीं है। तुम्हें नहीं भी पता है कि साँस चल रही है, तो भी फेफड़े प्रसन्न हैं। ठीक? ऐसा है न?

तो प्रकृति में ज्ञान का कोई महत्व है नहीं। प्रकृति कहती है कि ज्ञान भी उतना ही इकट्ठा करो जितने में भोजन मिल जाए। बंदर भी ज्ञान रखना चाहता है, क्या? अमरूद कहाँ है? उसको ज्ञान इतना ही चाहिए कि पेट चलता रहे। या यह पता चल जाए कि बंदरिया कहाँ है। यह भी ज्ञान की बात है। तो या तो पेट चलता रहे या फिर वंश चलता रहे।

प्रकृति कहती है कि इतना ही ज्ञान इकट्ठा करो कि पेट चले और वंश चले। ये काम हमारे स्कूल और कॉलेज कर रहे हैं। वो हमें ठीक वही ज्ञान देते हैं जिससे पेट चलेगा और वंश चलेगा। हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था, ख़ास तौर पर जो प्रोफैश्नल शिक्षा व्यवस्था है, व्यवसायिक शिक्षा जो है हमारी, वो बिलकुल वही ज्ञान दे रही है जो प्रकृति चाहती है कि हमें मिले।

वो हमें दो तरह का ज्ञान दे रही है। पहला, अमरूद कहाँ है। और दूसरा, बंदरिया कहाँ है। चाहे वो इन्जीनियरिंग कॉलेज हो, मैनेजमैंट कॉलेज हो, व्यवसायिक शिक्षा का कोई केन्द्र हो वहाँ यही दो चीज़ें बतायी जा रही हैं कि अमरूद जल्दी-से-जल्दी और बड़े-से-बड़ा और रसीले-से-रसीला, आसान-से-आसान कैसे पाना है। कौनसी विधियाँ लगायी जाए? अमरूद समझ रहे हो न? भोग की वस्तुएँ। उनका नाम मैंने रखा अमरूद। तो हमारी सारी शिक्षा हमें बस यह बता रही है कि कैसे आसानी से, बड़े-से-बड़ा, मीठे-से-मीठा अमरूद मिल जाए। भोग और कैसे बढ़ाया जा सके? और भोग में फिर बंदरिया भी आती है। बंदर जो काम अमरूद का करता है वही बंदरिया का करता है। भोगता ही तो है दोनों को!

समझ में आ रही है बात?

प्रकृति बिलकुल नहीं चाहती ज्ञान। वो ज्ञान तुम्हें अगर देना भी चाहेगी, तो वही ज्ञान जो हमारे इंजीनियरिंग और मैनेजमैन्ट कॉलेजों में दिया जा रहा है। वो प्राकृतिक ज्ञान, वो जंगल का ज्ञान है। जंगल का ज्ञान क्या होता है? ज्ञान इकट्ठा करो, ताकि पेट चल सके। जंगल का ज्ञान कहता है, 'ज्ञान इकट्ठा करो ताकि पेट चल सके, रुपये-पैसे कमा सको।' यह जंगल का ज्ञान है।

चेतना दूसरे ज्ञान की माँग करती है। चेतना कहती है, 'तुम यह जो कुछ भी कर रहे हो, यह कर क्या रहे हो ज़रा बताना।' चेतना कहती है, 'जो कुछ कर रहे हो, थोड़ा उससे पीछे हटना, थोड़ा निरपेक्षता के साथ देखना कि तुम कर क्या रहे हो' — यह चेतना का ज्ञान है — इसी को ध्यान कहते हैं। तुम दिन भर क्या कर रहे हो, इसी को ग़ौर से देखने को कहते हैं 'ध्यान'।

समझे?

दिन भर लगातार मन में क्या चल रहा है, दिन भर हाथ-पाँव, सारी इंद्रियाँ किधर को बढ़ रहे हैं — इसी को कहते हैं 'ध्यान'। मन किस चीज़ को मूल्य दे रहा है, मन किस चीज़ से डर रहा है, किधर को आकर्षित हो रहा है — इसी को जानने को कहते हैं 'ध्यान'। कुछ हुआ, अचानक हँस पड़े, यह कौन हँसा और क्यों हँसा — ये बात क्या थी! किसी ने कुछ कह दिया, अचानक क्रोध आ गया, ये बात क्या थी — ये क्या हो रहा है!

प्रकृति कहती है, 'जानो नहीं, बस करे जाओ, लिप्त रहो।' चेतना कहती है, 'मुझे जानना है।' और किसको जानेगी, प्रकृति को ही जानेगी। चेतना कहती है, 'मुझे जानना है।'

समझ में आ रही है बात?

प्रकृति में विषय और विषयेता, दोनों प्रकृति के भीतर के ही हैं। बंदर अमरूद को देख रहा है। इसमें विषय क्या है? अमरूद। और विषयेता, विषयी कौन है? बंदर। और ये दोनों ही किसके भीतर के हैं? प्रकृति के। तो प्रकृति में जब भी सब्जेक्ट (विषयेता), ऑब्जेक्ट (विषय) होते हैं, दोनों प्रकृति के भीतर के होते हैं।

चेतना का हिसाब दूसरा है। चेतना कहती है कि जो पूरी प्रकृति है, यही मेरा विषय है, मैं इसको जानूँगी। अब मैं प्रकृति से फिर अलग हो गयी न। अगर मुझे प्रकृति को जानना है, तो प्रकृति के भीतर की नहीं हो सकती। मैं प्रकृति से फिर अलग हो गयी हूँ। चेतना कहती है, 'मैं प्रकृति की दृष्टा हो गयी' — यह जीवन जीने का दूसरा तरीक़ा है।

प्रकृति अपना काम कर रही है, मैं उसकी दृष्टा हूँ। मैं देखूँ तो, यह शरीर करना क्या चाहता है! यह जो भीतर शरीर के बैठे हुए हैं — काम, क्रोध, मद, मात्सर्य, इनका इरादा क्या है! ये क्यों दौड़ाते रहते हैं मुझे दिन भर! पता तो चले यह खेल क्या है! यह जीवन जीने का तरीक़ा है — चेतना होकर। प्रकृति के दृष्टा हो गए। प्रकृति के भीतर बैठकर नहीं दृष्टा हो पाओगे। बंदर अमरूद का दृष्टा नहीं हो सकता। बंदर सदा अमरूद का भोक्ता होगा।

तो प्रकृति के भीतर बैठकर तुम प्रकृति के दृष्टा नहीं हो सकते, इसीलिए हटना पड़ता है। उस हटने को ही 'निरपेक्षता' कहते हैं। उसी को 'साक्षित्व' भी कहते हैं। कि प्रकृति को अगर जानना है भाई, तो प्रकृति से थोड़ा हटना पड़ेगा। उसी को फिर कह दिया गया 'दृष्टाभाव'। प्रकृति से थोड़ा हटो, ताकि जान सको कि वहाँ चल क्या रहा है। देह ही बने रहोगे, तो देह को कभी नहीं जान पाओगे। हाँ, देह बने रहोगे, तो देह को भोगोगे।

बंदर बने रहोगे तो बंदरिया को कभी नहीं जान पाओगे। हाँ, बंदर बने रहोगे तो बंदरिया को भोगोगे। जिसे यह बंदर-बंदरिया का खेल समझना हो, उसे देह से तादात्म्य छोड़ना होगा। अपने और देह के बीच में थोड़ी दूरी बनानी होगी और इस पूरी प्रक्रिया को बाहर से समझना होगा। कहाँ से? बाहर से। यह सब कुछ चल रहा है प्रकृति के क्षेत्र में। तुम्हें इस क्षेत्र से बाहर जाना होगा। गीता के शब्दों में कहें तो तुम्हें इस क्षेत्र का क्षेत्रज्ञ बनना होगा।

बात आ रही है समझ में?

यह ध्यान है। क्या ध्यान है, फिर बताइए? पूरे क्षेत्र का क्षेत्रज्ञ बनना। ज़िंदगी में चल क्या रहा है, यह लगातार जानना। और जो ज़िंदगी में चल रहा है, वो चौबीस घंटे चलता है। जब पालथी मार देते हो, तो वो बल्कि रुक जाता है। कृत्रिम तरीक़े से तुम उसे रोक देते हो। बक-बक बक-बक दिन-रात करते हो, लेकिन जब ध्यान में बैठना है, तो एक कृत्रिम चुप्पी लगा लेते हो। लगा लेते हो कि नहीं? जब चुप्पी लगा ली, तो बक-बक के दृष्टा कैसे बनोगे, बोलो?

ध्यान तो तब चाहिए न जब बक-बक चल रही हो, तब चोर रंगे-हाथों पकड़ा जाएगा। ध्यान तो तब चाहिए न जब बेईमानी पर उतारू हो और बेईमानियाँ तुम पूजा घर में तो नहीं करते। बेईमानियाँ कहाँ करते हो? दुकान में करते हो, दफ़्तर में करते हो। वहाँ ध्यान चाहिए। दफ़्तर में तुम्हें ध्यानस्थ होना पड़ेगा। और दफ़्तर में तुम ध्यानस्थ हो नहीं सकते आँख बंद करके या हो सकते हो? गड़बड़ हो जाएगी कि पालथी मारकर आँख बंद करके दफ़्तर में ध्यान कर रहे हैं। तो इसीलिए हमें खुली आँखों वाला ध्यान चाहिए।

देखा है, गाड़ी चलाते रहते हो, कितने भाव आते-जाते रहते हैं। रोड रेज (सड़क हिंसा) जानते हो न क्या है? वो गाड़ी चलाते वक़्त होता है। हॉर्न दे रहे हो, हॉर्न दे रहे हो, कोई हट नहीं रहा है। धड़धड़ा के उतरे अपनी गाड़ी से दरवाज़ा खोल करके और जाकर के उसके शीशे पर धब-धब-धब! 'आगे क्यों नहीं बढ़ा रहा है?' उस वक़्त चाहिए न ध्यान कि पता चले कि मेरे भीतर कितना क्रोध बैठा हुआ है। उस वक़्त ध्यान चाहिए न! पर तुम तो कहते हो कि ध्यान आँखें बंद करके करना है। अब गाड़ी चलाते वक़्त ध्यान आँखें बंद करके करोगे तो?

कहे, 'हुआ क्या! दुर्घटना कैसे हुई!'

बोले, 'बस ऐसे हुई कि ग़लत तरफ़ को गाड़ी बढ़ा दी और ब्रेक मारा नहीं।'

पूछा, 'अच्छा, ग़लत तरफ़ को क्यों गाड़ी बढ़ा दी?'

'ध्यान में थे। आँख बंद थी।'

'अच्छा। ब्रेक क्यों नहीं मारा?

'पालथी मारकर बैठे थे न। सीट पर पालथी मारकर बैठ गए थे और ध्यान कर रहे थे न। आचार्य जी ने कहा है, 'ध्यान बहुत ज़रूरी है चौबीस घंटे।' (श्रोतागण हँसते हैं)

यह जो चौबीस घंटे वाला ध्यान है यह पालथी मारकर, आँख बंद करके ध्यान नहीं हो सकता। इसीलिए मैं दस साल से बार-बार यही समझा रहा हूँ कि दिवस पर्यन्त ध्यान करो। दिन भर का, चौबीस घंटे का ध्यान करो। यह आधे घंटे वाला आरम्भ के लिए ठीक है। जिन लोगों को ध्यान का कुछ न पता हो, उन्हें थोड़ा स्वाद देने के लिए महीने दो महीने यह ठीक है। बस, महीने दो महीने ही ठीक है। उसके बाद तुमको प्रवेश कर जाना चाहिए दिन भर के ध्यान में।

लेकिन यहाँ लोग हैं जो दसों सालों से, बीसों, पचासों सालों से वही आधे घंटे वाला ध्यान कर रहे हैं आँख बंद करके। उसकी भी उन्होंने नयी-नयी मुद्राएँ सीख ली हैं, क्रियाएँ सीख ली हैं। बाज़ार में खूब है। और वही कर रहे हैं।

समझ गयीं ध्यान क्या है?

गाड़ी चलाते वक़्त ध्यान करिए, तैरते वक़्त ध्यान करिए या रसोई में ध्यान करिए। जब ध्यान की सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो, तब ध्यान करिए न। जब कामवासना सिर पर चढ़ कर बोल रही हो, तब चाहिए ध्यान। जब ईर्ष्या ने आपको बिलकुल चपेट में लेकर लाल कर दिया हो, तब चाहिए ध्यान। यह पूजाघर वाले ध्यान से क्या होगा!

दिवस पर्यन्त ध्यान! खुली आँखों वाला ध्यान!

बात समझ में आ रही है?

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