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पुरानी आदतें छूटती क्यों नहीं? || आचार्य प्रशांत (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
27 min
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। अगर हम बौद्धिक रूप से सच्चाई जानते हुए भी अपनी आदतों को नहीं बदल पाते तो क्या करें?

आचार्य प्रशान्त: देखो, मैंने बहुत बार कहा है कि कोई खाली जगह होती है, उसी खाली जगह में आकर आदतें बैठ जाती हैं। हमने जीवन में एक रिक्तता खड़ी कर रखी होती है, जिसको वह आदतें वग़ैरा आ करके भर देती हैं। आदतों की बार-बार बात करना भी उस रिक्तता को समर्थन देना ही है।

हम यह नहीं चर्चा कर रहे हैं कि ज़िन्दगी क्यों खाली है, केंद्रहीन है, लक्ष्यहीन है, जीवन में यह रिक्तता है क्यों? हम इस पर सवाल ही नहीं उठा रहे। उस मुद्दे को ही हमने दबा दिया।

हम तो यह कह रहे हैं, बस इतना ही कह रहे हैं कि आदतें क्यों लग गयी हैं। आदतें किसको लग गयी हैं भाई, इसकी बात नहीं करना चाहोगे। आदतें उसको लग गयी हैं जिसके पास आदतों से बेहतर कुछ है नहीं, एक खालीपन है। और तुमने उस खालीपन को बरकरार रखते हुए, आदतों को किसी तरक़ीब से हटा भी दिया, तो तुमने कौन सा तीर मार लिया? और आती हैं विधियाँ, युक्तियाँ, जिनसे आदतें हटायी जा सकती हैं। हटा दो आदतें; आदतों की जगह कुछ और आ जाएगा पर जीवन का जो सूनापन है, जो खोखलापन है, वह कायम रहेगा।

आदतें, आदतों पर ध्यान देने से और आदतों के ही बारे में विचार करने से नहीं टूट जातीं। बार-बार आदत का ही ख़्याल कर रहे हो, इससे बस इतना हो पाएगा कि तुम एक आदत छोड़ करके किसी दूसरी आदत की तरफ़ चले जाओगे क्योंकि तुमको एक आदत बुरी लग रही है, उसका विचार करे जा रहे हो।

कह रहे हो, ‘मुझे एक बहुत बुरी आदत है।’ क्या? ‘सिगरेट पीता हूँ।’

‘मुझे एक बहुत बुरी आदत है।’ क्या? ‘देर तक सोता हूँ।’

‘एक बहुत बुरी आदत है।’ क्या? कुछ भी — ‘चटोरा हूँ’ या ‘ज़्यादा बात करने की आदत है’ जो सामान्यतः हम कहते हैं कि बुरी आदतें हैं। इन पर बहुत ज़ोर लगाओगे तो ये आदतें हट जाएँगी। लेकिन उससे तुम्हें कुछ मिल नहीं जाना है। उससे बस यही होगा कि कुछ समय बाद तुम पाओगे कि चोरी-छुपे तुम्हारी ज़िन्दगी में कोई दूसरी आदत प्रवेश कर गयी। एक हटायी, दूसरी आयी।

जीवन को देखो, वहाँ आदतें-ही-आदतें दिखायी देंगी। और जब आदतें ही आदतें दिखायी पड़ जाएँ, तो उन्हें देखते मत रह जाओ; फिर समझो कि जीवन में कोई केंद्रीय प्रेम नहीं है। जीवन में कुछ ऐसा नहीं है जो जीवन को पूरे तरीक़े से सोख ले; जो तुम्हारे पूरे जीवन की ही क़ीमत माँग ले, कुर्बानी माँग ले। तभी तो आदतें छुपी और बची रह जा रही है।

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आदतों की ओर देखो ही मत। पर आदतों को एक बार देख लिया, पता चल गया कि ठीक है, जीवन की यह हालत है; उसके बाद जीवन में सार्थकता का उद्यम करो न। आदत वग़ैरा किनारे रखो। फिर वह काम करो जो तुम्हें करना ही चाहिए। और वो काम तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम्हारी आदतों को तोड़ डालेगा। ग़ौर करना; मैंने कहा तुम्हें पता भी नहीं चलेगा, तुम्हारी आदतें छूट जाएँगी। यह सही तरीक़ा है आदतों को छोड़ने का कि हमें पता भी नहीं चला आदत कब छूट गयी।

और एक तरीक़ा होता है आदत को छोड़ने का कि मैं दिन-रात आदत-ही-आदत के बारे में सोचता रहा, कोई जुगत करता रहा, तरक़ीब लगाता रहा और इस तरह मैंने आदत को परास्त कर दिया। यह जो तरीक़ा है न, आदत के ही बारे में सोच-सोच कर आदत को परास्त करने का, यह मैं समझा रहा हूँ ठीक तरीक़ा नहीं है।

जान लो कि आदत है। मैं आदत के तथ्य से अवगत होने को मना नहीं कर रहा हूँ। पता तो होना ही चाहिए कि मुझमें दस तरह के ऐब हैं या आदतें हैं या विकार हैं या वृत्तियाँ हैं, ये सब बातें पता तो होनी ही चाहिए। और एक बार वह बातें पता लग गयीं तो इससे यह संदेश मिलना चाहिए कि जीवन सच्चाई से और रोशनी से रिक्त है। कुछ ऐसा नहीं है जीवन में जो आदतों पर भारी पड़ जाए, कुछ ऐसा नहीं है जीवन में जिसके आगे आदतें हथियार डाल दें। फिर जीवन में वह लेकर के आओ न, जिसके आगे सब आदतें छूट जाती हैं।

अभी कोई पूछ रहा था कि सुबह, समय पर नहीं उठ पाते, तो सुबह समय पर उठने की आदत कैसे डालें? मैंने कहा, ‘मुझसे पूछ रहे हो कि समय पर कैसे सोएँ, समय पर कैसे उठें?’ मैं बहुत अनुपयुक्त व्यक्ति हूँ इस तरह का सवाल पूछने के लिए। पर फिर भी पूछ रहे हो तो कुछ कह देता हूँ। ज़िन्दगी में ऐसा मक़सद होना चाहिए जो बिस्तर से उठने पर मजबूर कर दे; सोने की आदत अपनेआप हवा हो जाएगी।

छोड़ो ये बातें कि आदमी को आठ घंटे की रोज़ गहरी नींद लेनी चाहिए, इससे स्वास्थ्य अच्छा रहता है। अरे, गहरी नींद उसको शोभा देती है जो मंज़िल पर पहुँच कर चैन की नींद सो रहा हो। तुम सौ तरह के बॅंधनों में हो, सौ तरह के दुखों में हो, तुम जीवन के संघर्षों के बीचों-बीच हो; तुम्हें वाकई लगता है कि तुम्हें शोभा देता है या तुम्हें अधिकार है, गधे-घोड़े बेचकर चैन की नींद, खर्राटे मारने का? यह शोभा देता है तुमको? तुम्हें तो नींद में भी मंज़िल और मक़सद याद रहना चाहिए।

हटाओ ये सब बातें; बहुत होती हैं आजकल अध्यात्म के नाम पर भी कि इतने घंटे आप ज़रूरी गहरी नींद लें, यह करें, वह करें। अरे क्या इतने घंटे गहरी नींद लें? अभी कुछ और सालों की तुम्हारी ज़िन्दगी होगी, चलो कुछ और दशकों की तुम्हारी ज़िन्दगी होगी; दो दशक, चार दशक। अगर मुझे सुन रहे हो तो निन्यानवे प्रतिशत संभावन यही है कि चार दशकों से ज़्यादा तो नहीं जीओगे, कम-से-कम बीस-पच्चीस साल के तो होओगे। उसके बाद तो ख़ूब लम्बा सोना-ही-सोना है न। कुछ साल मिले हैं जगने के लिए, उसके बाद तो ख़ूब सोना है।

तो यह तुम कैसे आदत अभी पाले हुए हो कि ज़रा और सो लें एक घंटा, दो घंटा? भीतर एक चेतना होनी चाहिए, लगातार एक गूँज होनी चाहिए कि लंबे पाँव पसार कर के अनंत समय के लिए सो जाने की घड़ी कभी भी आ सकती है, उससे पहले थोड़ा जग लें भाई। कि ऐसा है कि अभी मान लो जीने के लिए तुम्हें अधिक-से-अधिक तीस-चालीस साल और हैं, उसमें भी तुमने एक तिहाई समय, माने दस-पंद्रह वर्ष सो कर गुज़ार दिये। जब भीतर यह नगाड़ा बजता रहता है न, समय का डंका, घड़ी की चोट, तो अपनेआप फिर खड़े हो जाओगे उठकर।

सोने की आदत कहाँ गयी? हैं! कहाँ गयी? हमें नहीं पता। थी, याद भी नहीं कब छूट गयी, कैसे छूट गयी। सच्चाई के सामने कोई विराट दृश्य खड़ा हो, विराट चेतना उपस्थित हो, विराट उद्देश्य उपस्थित हो, उसके सामने सब आदतें हवा हो जाती हैं। तुम्हारा पूरा व्यक्तित्व, तुम्हारा पूरा जीवन दर्शन, वहीं छूमंतर हो जाता है।

तो आदतों से अगर आप परेशान हैं, तो यह मौका है आदतों का समूल उपचार करने का। या तो ऊपरी उपचार कर लीजिए; ऊपरी उपचार यह होता है कि साहब, सुबह उठना है, तो आप हल्का भोजन करिए; हल्का भोजन करने से बहुत गहरी नींद नहीं आएगी। मैं नहीं कह रहा हूँ कि कोई गरिष्ठ भोजन करें और भारी भोजन करें, पर यह हल्का भोजन करना और यह सब, ये बड़ी सतही विधियाँ हैं।

आदतों से इसलिए नहीं बचना हमको क्योंकि वह हमको छोटे-मोटे कष्ट देती हैं। जिसके जीवन में आदतें और ढर्रे राज कर रहे हैं, उसको यह समझना चाहिए कि उसका जीवन ही बर्बाद हो रहा है। ज़्यादातर लोग जो आदतों से परेशान होते हैं, वो बस इसलिए परेशान होते हैं, कि अरे सुबह उठ नहीं पाया, तो उसके कारण मैं टहलने नहीं जा पाया, या खेलने नहीं जा पाया, या पढ़ने नहीं बैठ पाया; तो उनको आदतों को लेकर परेशानी होती भी है, तो ज़रा सी।

आदतें आपकी ज़रा सी परेशानी नहीं है। आदतें आपकी पूरी ज़िन्दगी खा रही हैं। और जब आपको यह समझ में आता है कि ज़िन्दगी ही बर्बाद हो रही है, तो झटका लगता है। चेतना बिलकुल चौंक जाती है; मन को जैसे किसी ने आ करके पीछे से डंडा धुन दिया हो; एकदम उसका ऊँघना बंद हो जाता है; उचक कर खड़ा हो जाता है, सजग। ध्यान तो दीजिए।

आदतें तो रहेंगी। प्रश्न यह है कि आदतों के अलावा और कुछ है ज़िन्दगी में या नहीं है?

जो लोग आदतों वग़ैरा से मुक्ति की बात करते हैं, मैं उनसे निवेदन करूँगा कि जीव की पहली आदत तो शरीर ही है। शरीर और क्या है एक आदत के सिवा?

आदत माने समझते हो? एक पुराना ढर्रा जो एक तरीक़े से काम कर रहा है और उसके काम करने में किसी सोच की, किसी विचार की, किसी चेतना की ज़रूरत नहीं है। वह स्वचालित है, ऑटोमैटिक है। वह अपनेआप एक तरीक़े से काम करता रहता है; इसी को आदत बोलते हो न?

किसी को मान लो नाक खुजाने की आदत है, तो उसे सोचना नहीं पड़ता। उसको पता भी नहीं चलता, बस उसका हाथ आएगा, ऐसे-ऐसे नाक खुजाता रहेगा; इसी को आदत कहते हो न? तो शरीर में भी तो जो कुछ हो रहा है, वह स्वचालित ही है, अपनेआप हो रहा है। तुम्हें विचार थोड़ी न करना पड़ता है? पहली आदत तो शरीर ही है। आदतों से कहाँ तक मुक्ति पाओगे?

प्रश्न यह नहीं है कि आदतों से मुक्ति पायी कि नहीं। प्रश्न यह है कि यह शरीर, जो आदतों का घर है, इसको तुमने किसी बड़े लक्ष्य को समर्पित कर दिया कि नहीं, आदतों के साथ ही?

आदतें भी तेरी हैं। हाँ, इस शरीर में हज़ार आदतें घर करके बैठी हुई हैं; मैं उन आदतों के साथ ही आगे बढ़ जाऊँगा। और जब आदतों के साथ आगे बढ़ने लगते हो किसी बड़े काम में और आदतें उस काम में अनुकूल नहीं हो सकतीं, तो आदतें अपनेआप पीछे छूटने लगती हैं।

ऐसे समझो कि कोई मोटा आदमी है; उसका जो वज़नी शरीर है, वह आदत का नतीजा है न? और इस मोटे आदमी को किसी कारणवश रोज़ दौड़ना पड़ जाए, कुछ उसकी ज़िन्दगी में आ गया है ऐसा महत्वपूर्ण जो उसको दौड़ा रहा है, दौड़ा रहा है। दौड़ वह इसलिए नहीं रहा है कि वज़न कम करना है। दौड़ वह इसलिए रहा है क्योंकि कुछ है जो बहुत-बहुत आवश्यक है, जिसको करना बहुत ज़रूरी है, तो वह कर रहा है। अपने थुलथुल शरीर के साथ ही वह रोज़ दौड़ रहा है। वह अपने थुलथुल शरीर के साथ रोज़ दौड़ेगा, उसकी चर्बी समझ जाएगी कि अब हमारा कोई काम नहीं बचा, चर्बी अपनेआप पीछे छूटने लगेगी। शरीर ख़ुद ही अपनेआप को समायोजित करने लगेगा, बदलने लगेगा, इस तरीक़े से कि दौड़ने का काम आसान हो जाए।

एक बार शरीर को पता चल गया कि यह भाई तो ज़िद्दी है, यह दौड़ेगा; तो शरीर फिर कहता है जब रोज़ दौड़ना ही है तो इतनी चर्बी काहे को रखें। फिर चर्बी अपनेआप छँटेगी — ऐसे छूटती है आदतें। तुम दौड़ना तो शुरू करो; चर्बी, तुम्हें पता भी नहीं चलेगा, छॅंट जाएगी।

दौड़ने, दौड़ने में अंतर है। चर्बी घटाने के लिए मत दौड़ना। जो चर्बी घटाने के लिए दौड़ते हैं, वह अभी बस इतना ही परेशान हैं कि उन्हें चर्बी बुरी लग रही है; उन्हें जीवन का व्यर्थ जाना बुरा नहीं लग रहा है। उन्हें चर्बी भर बुरी लग रही है। तो जीवन का व्यर्थ जाना जब तुम्हें बुरा ही नहीं लग रहा; जीवन में वह जो पाने योग्य था, वह उतनी ही दूर है; तुम उसकी ओर नहीं दौड़ रहे हो और यह बात तुम्हें बुरी नहीं लग रही है; तुम्हें अधिक-से-अधिक क्या बुरी लग रही है? अपनी चर्बी। तो तुम अधिक-से-अधिक जीवन में क्या कमाओगे? यही कमाओगे — एक चर्बीहीन शरीर। यह तुम्हारी ऊँची-से-ऊँची प्राप्ति हो पाएगी।

तुमसे कोई पूछेगा, जीवन भर में उपलब्धि क्या रही? कहोगे, ‘हमारे शरीर में चर्बी नहीं थी’। अरे शरीर में चर्बी तो नहीं थी; पर वह जो बिना चर्बी का शरीर था, उससे पाया क्या? कौन सी मंज़िल तक पहुँचे? तुम्हारी दौड़, तुम्हें कहाँ तक ले गयी? उसका तुम्हारे पास कोई उत्तर नहीं होगा।

दूसरा तरीक़ा यह है कि तुम कहो, ‘चर्बी से मुझे समस्या नहीं, मुझे बस वह पाना है और वह पाने के रास्ते में अगर चर्बी बाधा बनती है तो चर्बी ख़ुद हटेगी। मुझे तो वह पाना है, ज़िद है मेरी।’ यह ज़िद चाहिए, धृति कहते हैं इसको।

धृति बहुत आवश्यक होती है। अध्यात्म की भाषा में इसे धृति कहते हैं। धृति भी एक तरह का हठ होता है — पाना है, तो पाना है। और जब आप वह पाने निकल पड़ते हैं, तो आप ख़्याल नहीं करते कि आपके पाँव में छाले पड़े और वज़न घटा कि नहीं घटा, कि क्या हुआ। वह तो आप फिर अनायास एक दिन पाते हैं — अरे, वज़न इतना कम हो गया। आप वज़न कम करने के लिए दौड़ ही नहीं रहे थे। आपको तो मंज़िल से प्यार हो गया था इसलिए दौड़ रहे थे। वज़न यूँही कम हो गया। ऐसे जाती हैं आदतें।

यह सब कि जीवन में अच्छी आदतें ले कर आओ, यह करो, वह करो, ऐसा, वैसा; अरे यह ज़्यादातर अच्छी आदतें या तो शरीर को स्वस्थ रखने के लिए होती हैं या मन को ऊपरी तौर पर शान्त रखने के लिए। करोगे क्या शरीर को स्वस्थ रखकर?

कहेंगे, ‘मेरी हमेशा से आदत रही है, मैं रात में ठीक दस बजे सो जाता हूँ और प्रातः ठीक पाँच बजे उठ जाता हूँ।’ अच्छा! भला किया आपने, तो? दस बजे सो जाते हैं, पाँच बजे उठ जाते हैं, तो? आपके जीवन का कुल निष्कर्ष क्या रहा? यह जो आपने ज़िन्दगी जी, इसकी कुल प्राप्ति क्या रही? यही प्राप्त रही कि दस बजे सो जाते थे, सुबह पाँच बजे उठ जाते थे? ऐसे बहुत हैं। और इन लोगों को अपने ऊपर अक्सर बड़ा गर्व होता है। ये कहते हैं, ‘हमें देखो! हम कितना अनुशासित जीवन जीते हैं’।

आध्यात्मिक लोगों में भी इस तरह की प्रवृत्ति ख़ूब पायी जाती है। वह कहते हैं — देखो, हम आध्यात्मिक आदमी हैं, हमारी सात्विक जीवन शैली है। हम ऐसे सोते हैं, ऐसे उठते हैं, ऐसे नहाते हैं; इस लोटे से पहले बाएँ हाथ से अपने सिर पर पानी डालते हैं, फिर यह करते हैं, फिर वह करते हैं; इस करवट सोते हैं, इस दिशा को पैर नहीं करते हैं। आहार बिलकुल नपा-तुला लेते हैं, हम तो साहब तीन रोटी लेते हैं और हमारी एक खास कटोरी है जिसका आकार बिलकुल तयशुदा है, पिछले तीस साल से उसी आकार की कटोरी चल रही है, उसमें हम दाल लेते हैं और सब्ज़ी लेते हैं, उतना ही हम खाते हैं। और उनको बड़ा इस बात पर गर्व रहता है। नहीं तो संतुष्टि तो रहती ही है कि हम ऐसे जी रहे हैं।

अच्छा ठीक है तुम ऐसे जी रहे हो, तो? मरोगे नहीं? मरोगे नहीं यह सब कर रहे हो तो? मरने से पहले तुम्हारे इस अनुशासित जीवन का कुल निष्कर्ष क्या रहा? निष्पत्ति बताओ। तुमने जी लिया बड़ा सधा हुआ जीवन; बड़ा सात्विक जीवन जीते थे, तो?

देखिए, मैं नहीं कह रहा हूँ कि आप सात्विक जीवन न जिए। सात्विक जीवन बहुत अच्छी बात है। कुतर्क मत करने लग जाइएगा। लेकिन पाया क्या उससे? गाड़ी रोज़ चमकाई, रोज़ चमकाई, तो? पहुँचे कहाँ उससे? यह जीवन इसीलिए था कि गाड़ी अपनी चमकाते रहो?

और इतना ही नहीं होता। ऐसे जो लोग होते हैं, जो अनुशासित क़िस्म का जीवन जीते हैं, इनमें दूसरों के प्रति हेय दृष्टि भी आ जाती है। हेय दृष्टि समझते हैं? जो अनुशासित जीवन न जी रहा हो, जिसके पास तथाकथित अच्छी आदतें न हों, ये उनको थोड़ा ऐसे देखते हैं कि — अरे! यह देखो, यह कुछ भी खा लेता है, कभी भी खा लेता है, ठीक से आसन लगा कर नहीं खाता; अरे! खड़े-खड़े पानी पी रहा है। अरे भैया, अच्छी बात है अगर यह सब जो तथाकथित अच्छी आदतें हैं, खानपान की, आचरण की, उठने-बैठने की, अगर ये संभव हो पाएँ तो।

पर कोई है क्रांतिकारी, आज से चले जाओ समय में सौ वर्ष पीछे, और वह एक ज़बरदस्त योजना बना रहा है, अपने दल के साथ जी रहा है, अंडर ग्राउंड जी रहा है, कभी यहाँ रहता है, कभी वहाँ रहता है। न उसके उठने का ठिकाना, न बैठने का ठिकाना। उसको जहाँ जो मिल गया उसने खा लिया, वह आगे बढ़ा। उससे तुम यह सवाल पूछोगे कि आपकी आदतें कैसी हैं? या उससे यह पूछोगे, आपका मिशन कैसा है, आपका काम कैसा है? इस पूरे प्रकरण में मैं यह दूसरी-तीसरी बार कह रहा हूँ, कृपा करके कोई यह न समझे कि मैं जो अच्छी आदतें होती हैं उनके विरोध में बोल रहा हूँ।

मैं उनके विरोध में हूँ जिन्हें अच्छी और बुरी आदतों के आगे जीवन का यथार्थ दिखायी ही नहीं देता क्योंकि बहुत बड़ी संख्या में मैं ऐसे लोगों से मिला हूँ और मिलता हूँ जिनकी जीवनशैली सात्विक है, जो सब अच्छे-अच्छे क़िस्म के काम करते हैं और जिनकी अच्छी तरह की आदतें हैं, लेकिन जो भीतर से महा-खोखले लोग हैं। क्या करोगे यह सब रख कर कि — बिलकुल साहब इनकी आदत है कि सुबह साढ़े-पाँच बजे नहा ही लेते हैं। फिर नहाने के बाद क्या करते हो शरीर का? वह जो नहाया हुआ शरीर है, उससे क्या करते हो? अच्छी आदत है सुबह साढ़े-पाँच बजे नहाना, पर वहाँ रुक मत जाओ न। आगे पूछो, ‘नहा लिया, शरीर स्वच्छ हो गया, अब इस शरीर का किया क्या?’ बोले, ‘नहीं नहाने के बाद फिर साढ़े छः बजे मंदिर पहुँच जाते है रोज़।’ अच्छा, बहुत अच्छा काम किया मंदिर चले गये। मैं समर्थन में हूँ, बिलकुल जाइए, सुबह मंदिर से शुरुआत करिए। ठीक है मंदिर हो आए। मंदिर से भी हो आए, अब यह जो शरीर है, जो नहा चुका है और मंदिर से भी आ चुका है, इसका करा क्या दिन भर?

अक्सर पता चलता है कि दिनभर उससे जो काम करा, वह किसी गुणवत्ता का नहीं था। बहुत ही, या तो सामान्य, साधारण काम था जो हर आदमी कर रहा है, जिसमें कुछ अंश में चोरी, झूठ, चालाकी, बेईमानी, धोखाधड़ी भी शामिल है। या कई बार तो ऐसा भी होता है कि यह जो तथाकथित सात्विक लोग हैं, ये सामान्य लोगों से भी गये-गुज़रे काम कर रहें होते हैं और इस अहम, इस अकड़ के साथ कर रहे होते हैं कि हम तो अच्छे लोग हैं, बेहतर लोग हैं।

बार-बार कुछ केंद्रीय बातों को याद रखिए। यह शरीर इसलिए नहीं है कि आप इसी को चमकाते रह जाएँ। क्यों भूलते हैं बार-बार कि आप लाश हैं, जिसको समय ने धोखा दे रखा है जीवंत होने का? कोई आपके पास अगर सुविधा होती बस जीवन को फ़ास्ट फॉरवर्ड कर देने की, तो अपनी ही मृत-देह देखते आप।

अभी दो-तीन दिन पहले, मेरे दो खरगोश थे, दोनों की ही दुखद हालत में मौत हो गयी; तो उनको दफ़नाया। उनमें से एक तो मुझे ख़ासकर प्रिय था। फिर मैं उसकी तस्वीरें देखूँ पुरानी; उसमें उसको देखूँ, अपनेआप को देखूँ। काफ़ी देर तक तो भीतर मातम रहा। फिर चीजें उलझने लगी।

मैंने अपनेआप से पूछा, ‘यह, यह है या यह मैं हूँ? मरा कौन है? जिंदा कौन है? वह भी वह नहीं है जो आया था, मैं भी वह नहीं हूँ जिसने पाया था। सात-आठ वर्ष की आयु होती है खरगोशों की। पाँच साल का था वह जब चला गया। तो अगर मनुष्यों के पैमाने पर देखें तो करीब साठ साल का था वह। वह तो साठ का हो करके गया है। मुझे तो यह भी निश्चित नहीं कि मैं साठ तक चलूँगा।

तो मैं यह देखूँ कि मेरे सामने मौत खड़ी है और बहुत काम बाक़ी है, या उसका दुख मनाऊँ? उसको तो कहीं जाना नहीं था, कहीं पहुँचना नहीं था। मस्त था, प्रकृति था, जी रहा था। मुझे तो कहीं जाना है, कहीं पहुँचना है, और साथ लोग हैं; उन्हें भी पहुँचाना हैं। मेरे लिए तो जीवन का अर्थ प्राकृतिक जीवन नहीं है, कुछ और है; मैं कितना ज़िंदा हूँ, मैं कितना जी लिया? बातें फिर उलटपलट होने लगीं, उलझने लगीं।

यह चीज़ लगातार गूँजनी चाहिए, अच्छा जीवन जीने के लिए आप नहीं आए हैं कि ‘देखो यह कितने बढ़िया तरीक़े से जीता है। अहा! शर्मा जी के क्या कहने! क्या साफ़, स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं, कितने सुन्दर तरीक़े से व्यवहार करते हैं, क्या उनका शब्दों का चयन होता है।’

इसलिए थोड़ी पैदा हुए हो? मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि तुम गंदे कपड़े पहनने के लिए पैदा हुए हो या दुर्व्यवहार करने के लिए पैदा हुए हो। पर जिन्होंने एक ख़ास तरह के आचरण को ही जीवन मान लिया, भले ही वह अच्छे-से-अच्छा आचरण हो, भले ही वो सात्विक-से-सात्विक आचरण हो; जिन्होंने एक ख़ास तरह के आचरण को ही जीवन मान लिया, वह भी बस यही कर रहे हैं कि वह कुछ अच्छी आदतों में जी रहे हैं।

तो दो तरह के लोग हुए — एक वह बुरी आदतों वाले लोग और एक यह अच्छी आदतों वाले लोग। मुक्ति कहाँ है इसमें?

आदतों से ही तो मुक्ति चाहिए होती है। वृत्ति माने आदत। जिसको हम बोलचाल में आदत बोल देते हैं, सही मानिए, अध्यात्म में उसी को वृत्ति बोला जाता है।

तो आपने बहुत अच्छी जीवनचर्या, जीवनशैली भी पकड़ रखी है तो वह एक तरह की वृत्ति ही है। उससे आगे तो कुछ नहीं मिला आपको। यह बहुत अच्छा जीवन जी कर के भी कहाँ चले जाओगे? क्या मिलेगा? जब तक जी रहे हो कुछ कमाई करनी है भाई।

मैं बार-बार उदाहरण दिया करता हूँ, परीक्षा कक्ष का। तीन घंटे का समय मिलता है। वहाँ पर तुम मज़े मारने नहीं बैठे हो, वहाँ तुम्हें सारे सवालों के सही जवाब देने हैं, सारे सवालों के सही जवाब देने हैं। जो मेरी होमवर्क (गृहकार्य) की कॉपी हुआ करती थी या जो सामान्य भी कॉपी हुआ करती थी, उसको मैं बहुत सजा-वजा कर रखता था। मेरा स्कूल था सिटी मांटेसरी’ लखनऊ, उसमें उस समय पर इस बात पर बड़ा ज़ोर था — दो तरह के पेन रखते थे, मैं सातवीं, आठवीं, नौवीं की बात कर रहा हूँ। हर कॉपी में इंडेक्स (अनुक्रमणिका) बनाया जाता था, बाकायदा मार्जिंस खींचनी होती थीं, हर नए पाठ के ऊपर एक उक्ति, एक क्वोटेशन लिखनी होती थी, सवाल एक रंग के पेन से लिखिए, उत्तर दूसरे रंग की स्याही में होना चाहिए, हर सवाल के बाद आप एक लाइन खींचिए।

तो मैं यह सब ख़ूब करता था। और देखने लायक होती थी जो मेरी कॉपी होती थी। लेकिन जब मैं परीक्षा में बैठता था तो यह सब थोड़े ही करता था। वहाँ यह हरकत करने का कोई औचित्य ही नहीं था कि दो तरह के पेन से लिख रहे हो और मार्जिन की लाइन खींच रहे हो और यह कर रहे हो, वह कर रहे हो; वहाँ तो मुझे पता है कि आप यहाँ पर स्वच्छ, सुंदर आचरण दिखाने के लिए नहीं बैठे हो। यहाँ इस पर्चे को हल करना है, समय सीमित है, एक-एक सवाल का जवाब देना है भाई।

जीवन ऐसा है, परीक्षा भवन जैसा है। वहाँ बैठ करके तुम क्या दिखा रहे हो कि इतने बजे ऐसा, इतना ऐसा? उसमें तो बहुत बार बिलकुल घसीटा लिपि में भी लिखना पड़ता था। शिक्षिका मेरी हैरान हो जाएँ। बोले, ‘वैसे तो इतनी सुन्दर तेरी हैंड-राइटिंग ,हस्तलिपि और यहाँ कैसे लिखा?’ मैंने कहा, ‘मैं यहाँ पर आपको सुंदर हैंड-राइटिंग बनाकर दिखाऊँ तो मेरा काम फिर चल चुका।’

ज़्यादातर लोग ऐसे होते हैं या बहुत सारे लोग ऐसे होते हैं जो परीक्षा भवन में भी हैंड-राइटिंग ही दिखाते रह जाते हैं। उसके नंबर (अंक) नहीं मिलने के, एकदम नहीं मिलने के। तुम यही करते रह जाओ। समय परीक्षक है, वो तुम्हारे सुंदर गढ़े हुए शब्दों के तुमको एक भी अतिरिक्त अंक नहीं देने वाला। वह तो बस यह पूछेगा, ‘तुमने हल कर दिया कि नहीं कर दिया?’ हल कर दिया तो ठीक है, नहीं तो तुम अपनी नैतिकता, अपनी अच्छी आदतें, अपना सुंदर आचरण लेकर बैठे रहो अपने पास।

हमें नहीं समझ में आता किस चीज़ का कितना महत्व कहाँ पर है। एकदम भूल सा जाते हैं, एकदम भूल जाते हैं। कि जैसे उपलब्धि का कोई गहन क्षण हो, आप किसी बहुत महत्वपूर्ण उपक्रम में काम कर रहे हों, बहुत इंपोर्टेंट प्रोजेक्ट है आपका, और आप कहें, ‘अरे-अरे, साढ़े दस बज गये, मुझे तो सोना होता है।’

अरे! तुम पागल हो? तुम देखो, तुम क्या कर रहे हो? तुम यहाँ पर अपना आचरण बताओगे कि मैं तो बहुत सुनियोजित आचरण पर चलता हूँ, अब साढ़े दस बज गये, मैं तो सो जाऊँगा।

‘कैसे आदमी हो? तुम अपने काम की महत्ता को समझते हो?’

इसी तरीक़े से गहन प्रेम का क्षण हो और तुम कहो ‘साढ़े-दस बज गये, मैं जा रहा हूँ, मुझे सोना है।’

‘तुम आदमी भी हो?’

तो आप तुरंत तर्क देंगे। कहेंगे, ‘पर ऐसी चीजें तो पाँच-दस साल में किसी एक दिन होती हैं न। बाक़ी दिन तो दस बजे का अगर हमने बाँध रखा है, तो दस ही बजे सो जाना चाहिए।’

तो मैं तुमसे पूछूँगा कि तुम्हारी ज़िन्दगी इतनी वीरान क्यों है कि पाँच-दस साल में एक ही दिन तुम्हारे जीवन में प्रेम आता है या कोई बड़ा उपक्रम आता है? रोज़ क्यों नहीं आ सकता? हर रात महत्वपूर्ण क्यों नहीं हो सकती? हर क्षण तुम्हारे जीवन में किसी विराट संघर्ष का क्षण क्यों नहीं हो सकता?

वह नहीं है इसीलिए तो तुम्हारी ज़िन्दगी में आदतों ने घेरा डाल रखा है। ज़िन्दगी सुनसान है, वीरान है, इसीलिए फिर आदतें घुसी हुई हैं। और जब देखते हो कि हानिप्रद आदतें आ गयीं हैं तो उनको हटा करके तुम कुछ अच्छी आदतें ले आते हो जीवन में।

पर अच्छी आदत हो या बुरी आदत हो, दोनों एक ही बात बताते हैं कि — जो असली है वह नहीं है जीवन में।

अच्छी आदत, बुरी आदत से बेहतर होती है लेकिन असली की तुलना में तो न अच्छी आदत कहीं ठहरती है, न बुरी आदत कहीं ठहरती है। वह असली है ही नहीं ज़िन्दगी में। जब असली ज़िन्दगी में होता है न तो फिर वह तय करता है — कब सोओगे, कब जगोगे, कब उठोगे, कब बैठोगे। वह फिर मुर्दे को भी चला देता है। वह फिर तुमको मरने की भी छूट नहीं देगा। फिर तुम मरोगे भी उससे अनुमति माँग करके।

वह सब कहानियाँ सुनी हैं न कि फ़लाना योद्धा था या फ़लाना धर्मयुद्ध हो रहा था, तो उसको दस गोलियाँ लग गई, वो तब भी लड़ता रहा। यह सिख पंथ में कथा है कि एक परम योद्धा थे, उनका सिर कट गया, तो वो अपना कटा हुआ सिर हाथ में लेकर लड़ते रहें। यह कैसे होता है?

यह ऐसे ही होता है कि तुमने अपनेआप को, अपने महत्त अभियान को इतना समर्पित कर दिया है कि तुम कहते हो कि अब मरेंगे भी हम तुम्हारी इजाज़त लेकर के। हम अपनेआप को इतनी भी अनुमति, इतनी भी छूट नहीं देंगे, कि ख़ुद मर सकें। अब तो मौत भी हमारी तब होगी, जब तुम हाँ कह दोगे। तो सिर हमारा भले कट गया है, पर हम चलते रहेंगे। हमें हक़ ही नहीं है रुक जाने का। ऐसे छूटती हैं आदतें, जानते हो!

मौत बड़ी-से-बड़ी आदत है! वह आदत हर आदमी को लगी हुई है। है कोई जो नहीं मरता हो? मौत से बड़ी आदत कोई होती है? वह आदत भी छूट जाती है। मरने की आदत भी छूट जाती है अगर जीवन में जीने की माकूल वजह हो तो। अब तुम मर भी नहीं पाओगे। तुम कहोगे, ‘आँख कैसे बंद कर लूँ, काम तो अभी पूरा हुआ नहीं?’

तो उसको, जिसको फिर तुम सत्य भी बोल सकते हो, परमात्मा भी बोल सकते हो, उसको मौका दो कि वह तुम्हारे शरीर की एक-एक गतिविधि को संचालित करे। वही तुम्हारे मन पर चढ़ कर बैठ जाए, तुम पर राज करे। वह तुम्हें सब बता देगा। फिर तुम्हें अच्छी-बुरी आदत नहीं सोचना पड़ेगा। वह तुम्हें सब बता देगा — क्या खाना, क्या पहनना, कब उठना, कब बैठना, कहाँ जाना — जितनी चीज़ें तुम सोच-सोच करके अपना दिमाग़ ख़राब करते रहते हो, वह सब चीजें तुम्हें सोचनी ही नहीं पड़ेंगी। उन सब चीजों का फ़ैसला तुम्हारे लिए कोई और कर देगा।

कब सोना है? जब भई, काम से थोड़ी छुट्टी मिल जाएगी, तो सो लेंगे।

कब उठना है? जब काम आवाज़ देगा तो उठ जाएँगे।

अब हमारे हाथ में है ही नहीं चीज़, किसी और के हाथ में सौंप दी। काम हमारे हिसाब से नहीं चलेगा कि साहब, हम तो देखिए इतने बजे उठते हैं, तो उतने बजे उठकर काम करेंगे।

हम काम के हिसाब से चलेंगे। और मैं सामान्य रोज़ी-रोटी वाले काम की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं आम आदमी जो नौकरियाँ करता है, मैं उन नौकरियों को काम नहीं कह रहा हूँ। जब आध्यात्मिक अर्थ में ‘काम’ कहा जाता है तो उसका अर्थ होता है, ‘मुक्ति का अभियान’। एक ही चीज़ काम है।

वर्क का मतलब होता है, वर्किंग टुवर्ड्स लिबरेशन (मुक्ति के लिए काम)। यह रुपया-पैसा कमाने को वर्क नहीं बोलते। आदमी अपनी आज़ादी के लिए कुछ कर रहा है, सिर्फ़ उसको बोला जाता है — काम, कर्म।

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