प्रेम व्यक्त करते डरता क्यों हूँ? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

प्रश्न: सर अगर हम अपने दिल की बात किसी से जा कर कहते हैं तो डर लगता है कि कहीं उसने स्वीकार नहीं किया तो क्या होगा? तो आप ही बताइये कि हम कैसे जानें कि वो क्या सोचेगी?
वक्ता: नाम क्या है? अरे लड़की का नहीं, तुम्हारा । अरुण! अब शांत हो जाओ तो कुछ कहूँ। अरुण ने कहा कि ऐसा लगता है किसी से प्रेम है पर हिम्मत नहीं पड़ती कि कुछ कहूँ। तो बताइए क्या करना चाहिए? एहसान करो अपने आप पर और उस पर कि कुछ ना कहो क्योंकि वो प्रेम है ही नहीं जो डरता हो। ये कोई नकली सी चीज़ है, कोई वासना होगी, कोई स्वार्थ होगा, इसी कारण डर है। प्रेम का अर्थ होता है अपने स्वार्थ से ऊपर उठ कर, दूसरे की भलाई, उसमें डर तो नहीं लगेगा। डर तब ज़रूर लगता है जब किसी से चोरी करने जा रहा हूँ। निश्चित रूप से कोई चाह होगी, कुछ मांगने जा रहे होगे, तब डर लग सकता है। देने में तो डर नहीं होता, मांगने में डर होता है।
हम प्रेम नहीं जानते, प्रेम के नाम पर आकर्षण जानते हैं और आकर्षण बिल्कुल मुर्दा चीज़ है। प्रेम से ज्यादा ज़िंदा कुछ नहीं और आकर्षण से ज़्यादा मुर्दा कुछ नहीं। आकर्षण तो वैसा ही है जैसा कि दो रसायन आपस में मिल जाएँ, उनमें भी आकर्षण होता है आपस में, खूब आकर्षण होता है। लोहे और चुम्बक में आकर्षण होता है, वो प्रेम तो नहीं है, वो प्रेम तो नहीं है। एक ख़ास उम्र में आते हो, शरीर में कुछ रासायनिक क्रियाएँ शुरू हो जाती हैं, हॉर्मोन्स एक्टिव हो जाते हैं, इस कारण तुम्हारा शरीर किसी दूसरे शरीर की तरफ आकर्षित होना शुरू हो जाता है। तो ये प्रेम तो नहीं है। ये तो इधर के रसायन हैं जो उधर के रसायन से मिल जाना चाहते हैं और एक केमिकल रिएक्शन हो जाए, बस यही प्रकृति की इच्छा है। इसमें प्रेम कहाँ है ? पर तुम्हारी इसमें कोई ख़ास गलती नहीं क्योंकि तुमने बचपन से और कुछ देखा ही नहीं। एक जवान लड़का, एक जवान लड़की के पास जाता है और पीछे से गाना बजना शुरू हो जाता है, दिल-विल प्यार-व्यार और तुमने समझ लिया कि यही प्यार है। ये प्यार नहीं है, फूहड़पन है। गुलाल उड़ेगा और ढपली बजेगी और लड़का और लड़की दोनों आकर्षक होंगे। तुम्हें बड़ा आनन्द आता है, तुम्हें लगता है कि शायद इसी को प्यार कहते हैं ।



