आचार्य प्रशांत: तुम अभी ये समझ ही नहीं पा रहे हो कि काल, समय, स्थान, परिस्थिति इनके लिए नहीं जी रहे हो तुम। ये सब देह के साथ भस्म हो जानी हैं, ये बड़ी चीज़ नहीं होती हैं। जो कीमती चीज़ है वो क्या है? कारण ये है कि जिस क्षेत्र से तुम आ रहे हो न, उसमें सारा ज़ोर इन्हीं बातों पर है कि क्या खाना है, क्या पीना है, कितने बजे उठना है, कितनी दूरी तक हाथ जाएगा, कितनी ऊँचाई तक पाँव जाएगा, सारा ज़ोर इन्हीं बातों पर है। भीतर का वहाँ कुछ है नहीं, तो आदत बन गई है इन्हीं बाहरी बातों पर बार-बार गौर करने की। ये बाहरी बातें कीमती तो हैं, इसमें कोई शक नहीं, पश्चिम पूरा इन्हीं बातों पर चलता है। इन्हीं बातों से बहुत सारी तरक्की भी मिली है उसको। वो (बाहरी तरक्की) जिसको चाहिए हो, उसको वो मुबारक।
वहाँ पर ट्रेन बिलकुल समय से चलती है, और मैं कहता हूँ, ‘ट्रेन समय से चलनी भी चाहिए अगर ट्रेन ही तुम्हारे जीवन का केन्द्र बिन्दु है तो।’ पहले पूछो कि यही बात मन में क्यों आ रही है। ये बात मन में इसीलिए आ रही है क्योंकि जो क्षेत्र तुमने चुना है उसमें इन्हीं बातों के लिए ही जगह है। वहाँ पर यही प्रश्न बार-बार पूछा जाएगा कि वस्त्र सूखा है या गीला है। यहाँ खेल दूसरा चल रहा है, यहाँ दिल भीग रहे हैं। और जैसे ही मैंने कहा कि ज़रा कुछ गीले प्रश्न सामने लाइएगा, तो तुम समझ ही नहीं पाये कि मैं किस गीलेपन की बात कर रहा हूँ। तुमने पूछ लिया, ‘यहाँ हम क्यों आए हैं, यहाँ तो बारिश हो रही है?’ इससे तुम्हें तुम्हारे मन की अवस्था के बारे में पता चलेगा? मैं कहाँ की बात कर रहा हूँ और तुम कहाँ से सुन रहे हो? जब मैं कह रहा हूँ, ‘कोई गीला सवाल पूछो', तो मैं तुम्हारे शर्ट के गीलेपन की बात कर रहा हूँ? तो छूटते ही सवाल पूछा कि हम आए क्यों, चार बजे सत्र शुरू होना था, साढ़े चार बजे शुरू हुआ, फिर बारिश हो गई।
कैसे याद है तुम्हें ये सबकुछ? ये सबकुछ याद भी कैसे है? क्योंकि दृष्टि को तुमने अभ्यास दे दिया है इन्हीं बातों पर टिके रहने का। 'चलिए! अब ये करिए, अब ये करिए, अब ये करिए, अब ये करिए', हो गया! गलत जीवन जीने से और गलत पेशे में रहने से ये नतीजा निकलता है, अभ्यास ही वही लग जाता है।
जाकर पूछना किसी सूफ़ी फ़कीर से, ‘तू रात भर क्यों जगता है, रात तो सोने के लिए होती है?’ जब ऋषिकेश आया था तो वहाँ एक सज्जन हैं जो कहीं विदेश से आये हैं, पश्चिम से आये हैं और उनके बारे में ये प्रसिद्ध है कि वो शाम को छः बजे या सात बजे बोलना शुरू करते हैं और ठीक एक घंटे बोलकर रुक जाते हैं। मुझे एक बात बताइए, छः-सात बजे बोलते हैं और ठीक एक घंटे में रुक जाते हैं, मैंने कहा, 'कर कैसे लेते हैं?' निश्चित रूप से पश्चिम बहुत गहरे तक घुसा हुआ है उनमें कि ट्रेन को अगर चार बजकर छः मिनट पर पहुँचना है तो वो चार बजकर छ: मिनट पर पहुँचकर रुक ही जाएगी।




