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प्रैक्टिकल या थ्योरिटिकल? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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श्रोता: सर, मेरा प्रश्न पढ़ाई से सम्बंधित है। दरअसल मुझे किताबी भाषा और ज्ञान में बिलकुल भी रुचि नहीं है। मैं प्रैक्टिकल ज्ञान हासिल करना चाहती हूँ प्रैक्टिकल चीज़ें सीख के पर, इसके परिणाम स्वरुप मेरे अंक अच्छे नहीं आते। मुझे क्या करना चाहिए?

वक्ता: पहले ये समझते हैं कि क्या फर्क है थ्योरिटिकल और प्रैक्टिकल के बीच में। ये दो शब्द ऐसे हैं जो आप में से बहुत लोग अक्सर इस्तेमाल करते होंगे कि, यार वो बंदा मेरे को ठीक नहीं लगता बहुत थ्योरिटिकल है या फलाना अध्यापक मुझे ठीक नहीं लगता, बहुत थ्योरिटिकल बातें करते हैं, किताबी बातें करते हैं या कि कोई मिलता होगा, आपसे बोलता होगा “भाई, मैं बहुत प्रैक्टिकल आदमी हूँ। जीवन में मैं बहुत प्रैक्टिकल तरीके का रवैया रखता हूँ”। मिलते हैं ऐसे लोग?

ये थ्योरिटिकल और प्रैक्टिकल में क्या भेद है? कुछ है भी कि नहीं है? क्या अंतर है बोलो?

देखो, ये जो भेद है ये बहुत नासमझी में, हमने बनाया है। कैसे? प्रैक्टिकल शब्द का अर्थ होता है वो जिसकी प्रैक्टिस (अभ्यास) की जा सके यानी जिसको कार्यान्वित किया जा सके। ठीक है ना? जिसको यथार्थ में उतारा जा सके, वही प्रैक्टिकल है? बाक़ी सब काल्पनिक। मानते हो कि नहीं मानते? तुम्हारी थ्योरी की किताबो में क्या ऐसा कुछ भी लिखा है जो काल्पनिक है और यथार्थ में नहीं उतारा जा सकता? क्या तुम्हारी थ्योरी की किताबों में परी-कथाएँ लिखीं हैं? हातिम-ताई, अली-बाबा की कहानियाँ हैं कि जो बिलकुल काल्पनिक हैं, जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं? क्या ऐसा है?

सभी श्रोता: नहीं, सर।

वक्ता: तुम्हारी थ्योरी की किताब में एक-एक अक्षर जो लिखा है वो प्रैक्टिकल ही तो है कि नहीं है? ओम लॉ इमप्रैक्टिकल है क्या? ओम लॉ समझे बिना ही चल जाएगा? चल जाएगा? किर्चोफ़ लॉ इमप्रैक्टिकल होता है? उसके बिना ये सर्किट बन जायेगा, जो ये चल रहा है? केप्लर लॉ इमप्रैक्टिकल हैं? उसके बिना नासा के सेटेलाईट फ़ायर हो जाएँगे? नासा का सेटेलाईट प्रैक्टिकल है, है ना? प्रैक्टिकल है, क्योंकि हो रहा है, यथार्थ है। तुम्हारी अभी अग्नि-5 मिसाइल फ़ायर हुई, बिना गुरुत्वाकर्षण के नियम को समझे क्या फ़ायर की जा सकती है? की जा सकती है?

वक्ता: F=dp/dt अगर नहीं पता है, तो मिसाइल लॉन्च हो जाएगी? हो जाएगी क्या? प्रथम साल वाले हो ज़्यादातर इसीलिए, प्राथमिक विज्ञान और बल की बात कर रहा हूँ। तो ये क्या भेद आ गया थ्योरी और प्रैक्टिस में? तुम थ्योरी को अक्सर बड़े नकारात्मक रूप से देखते हो। जब भी कोई आएगा, और तुमसे कुछ बातें करेगा, तुम लोग कहोगे बड़ी थ्योरिटिकल बातें कर रहा है। अरे! उसी थ्योरी से तो दुनिया चल रही है। कार्नोट साइकिल होगा, वो तुमको लगेगा बड़ा थ्योरिटिकल है। कार्नोट साइकिल नहीं हो तो डीज़ल साइकिल बन सकता है? वो गाड़ी चल सकती है मेरी? मैकेनिकल के छात्र हैं कुछ यहाँ पर?

कुछ श्रोता: जी सर।

वक्ता: कार्नोट साइकिल के बिना डीज़ल साइकिल बन जाएगा?

कुछ श्रोता: नहीं, सर।

वक्ता: और कार्नोट साइकिल थ्योरिटिकल है कि नहीं?

कुछ श्रोता: है, सर।

वक्ता: हम सब जानते हैं कि वो एक आइडियल साइकिल है, जिसको पाया नहीं जा सकता। कार्नोट साइकिल पूरा काल्पनिक होता है जो सिर्फ कागज़ पर बनाया जा सकता है, वास्तविकता में कभी आएगा नहीं। पर उसके बिना कार्नोट साइकिल के बिना वो कोई भी गाड़ी नहीं चलेगी जो खड़ी हुई है, डीज़ल गाड़ी। फिर ओटो साइकिल भी नहीं बनेगा। उस थ्योरी की बुनियाद पर ही तो ये दुनिया खड़ी है। एक मैकेनिक और एक इंजीनियर में क्या फ़र्क होता है? तुम्हारे नज़रों में मैकेनिक बहुत प्रैक्टिकल है। तुम जाते हो वो फटाफट कर देता है। पर इंजीनियर डिज़ाइन कर सकता है, मैकेनिक डिज़ाइन नहीं कर सकता। मैकेनिक को बस पता है कि कौन सी चीज़ कहाँ जुड़ी हुई है, स्पार्क प्लग साफ़ कर दूँगा तो इग्निशन आसानी से हो जायेगा। मिसिंग कर रही है तो समय आ गया है रिंग बदलने का। मैकेनिक इतना ही कर सकता है। पर इंजीनियर उस रिंग को डिज़ाइन कर सकता है। और उस रिंग को डिज़ाइन करना थ्योरी पर ही निर्भर करता है, भाई। बिना थ्योरी के तुम प्रैक्टिस कर कैसे लोगे? मुझे ये बता दो। बिना थ्योरी के तुम प्रैक्टिस कर कैसे लोगे? और जो बिना थ्योरी के प्रैक्टिस करे उसको इंजीनियर नहीं मैकेनिक बोलते हैं।

इंजीनियर और मैकेनिक का मूलभूत अंतर यही है। कोई मैकेनिक तुम्हें कैलकुलेट करके ये नहीं बता सकता कि ये जो फ्रिज जो तुम इस्तेमाल कर रहे हो इसकी दक्षता कितनी है। हाँ, फ्रिज बिगड़ जायेगा तो मैकेनिक आके उसे ठीक कर देगा। पर उस मैकेनिक से पूछो कि क्या तुम कैलकुलेट कर सकते हो कि इस फ्रिज की दक्षता क्या है? 38 प्रतिशत है या 58 प्रतिशत है? कितनी प्रतिशत दक्षता पर काम कर रहा है ये? वो नहीं बता सकता। या बता सकता है?

वक्ता: थ्योरी और प्रैक्टिकल एक ही चीज़ हैं। हर थ्योरी प्रैक्टिस में ही तो तब्दील होती है न और हर प्रैक्टिस शुरुआत में थ्योरी ही होती है। इन दोनों के बीच में कोई अंतर नहीं है पर आपके मन में ये भेद आता क्यों है इसको समझिये। वो भेद इसलिए आता है क्योंकि आपकी शिक्षा ऐसी हुई है, जहाँ पर आपने जो भी थ्योरी पढ़ी है, उस थ्योरी का प्रैक्टिस से कोई सम्बन्ध आपको बताया नहीं गया। तो आप थ्योरी पढ़ लेते हो किताबों में, पर उसका प्रयोगशाला में वास्त्विकरण क्या है वो आप नहीं देख पाते। तो आपको लगता है ये सिर्फ थ्योरी ही तो है।

अब मैक्सवेल की इक्वेशन हैं, बड़ी एब्सट्रैक्ट हैं, या डाईवरजेन्स का कर्व होगा, प्रथम साल में पढ़ा होगा जब इलेक्ट्रो मैगनेटिज्मज़ का कोर्स अगर आपका हो।

वक्ता: अब एक चीज़ को आप दो बार पार्शिअली डिफेरेंशिएट कर रहे हो और फिर डाईवरजेन्स निकाल रहे हो, कर्व निकाल रहे हो, आपको लगता है ये तो बड़ी थ्योरिटिकल बात है। इसका वास्तविकता से क्या ताल्लुक? ऐसे ही हैं ना? पर देखो अगर वो नहीं होगा, अगर उसको नहीं समझ रहे हो तो कोई लेज़र बीम कभी संचालित नहीं कर सकती। कभी संचालित नहीं कर सकती फिर। तुम प्रैक्टिस कर-कर के लेज़र बीम तक थोड़ी पहुँच जाओगे। पहले उसकी थ्योरी समझना पड़ेगा ना। या प्रैक्टिस कर-कर के तुम लेज़र बीम तक पहुँच जाओगे? कि बैठे हुए हो कहीं पर और कह रहे हो मुझे कुछ प्रैक्टिकल चीज़ करनी है, क्या? हम लेज़र बना रहें हैं। अरे! लेज़र जाने बिना लेज़र बना कैसे दोगे?

जब अगली बार तुम कुछ थ्योरी पढ़ो और तुम ये जानना चाहो कि तुम सच में समझ गए हो या नहीं, कि तुम सच में समझ रहे हो कि नहीं, तो अपने से पूछो, ये इस दुनिया में कारगर कैसे है? इक्वेशन और सिम्बल्स और थ्योरम्स से परे, ये थ्योरी इस दुनिया में कारगर कैसे है? जब तुम ये देख लोगे तब तुम्हारे मन से ये दुविधा हट जायएगी कि क्या थ्योरिटिकल है, क्या प्रैक्टिकल है। तुम पाओगे कि एक ही है। ठीक है? दिक्कत क्या होती है कि तुम लोग परीक्षा वगैरह में उत्तीर्ण होने के लिए थ्योरी रट के चले जाते हो। बिना ये जाने कि ये दुनिया में संचालित कैसे करती है। तुम सिर्फ थ्योरी रट के चले जाते हो। तुमने कभी उस थ्योरी को समझा नहीं है। जब तुम उस थ्योरी को समझोगे ना, वाकई समझोगे, तुम पाओगे कि ये तो पूरी तरह प्रैक्टिकल है। मुझे समझ में नहीं आई थी इसलिए मुझे दिख नहीं रहा था कि इसकी प्रैक्टिकैलिटी कहाँ पर है।

तो समझो उसे। जब तुम समझते हो उसे तो तुम्हें उसकी अनगिनत प्रैक्टिकल उपयोग दिखेंगी। क्या आप समझ रहें हैं? नहीं समझ में आ रहा? थ्योरी को समझो, रटो नहीं। कोई थ्योरम दे रखा है उसका प्रूफ़ जल्दी से रट के मत पहुँच जाओ। समझो कि इसके अर्थ क्या हुए? बेर्नौल्ली थ्योरम है, कर लिया प्रथम साल में?

सभी श्रोता: नहीं सर।

वक्ता: दूसरे साल साल में हैं? अब रट के पहुँच जाओ, अब तुमको लगेगा बड़ी थ्योरिटिकल सी बात है। “मैं ये नहीं कर रही, मुझे तो जी खिलौने वाले हवाई-जहाज़ बनाना पसंद है। मैं बहुत प्रैक्टिकल हूँ और मुझे खिलौने वाले हवाई-जहाज़ बनाने पसंद हैं। जिसमे छोटी सी मैं मोटर लगा देती हूँ और वो उड़ना शुरू कर देते हैं।” अब क्या खिलौने वाले हवाई-जहाज़ भी, साफ़-साफ़ विंग स्पैन के कैलकुलेशन के बिना उड़ सकते हैं? विंग स्पैन कितना होना चाहिए? और अगर आपको ‘ बेर्नौल्ली थ्योरम नहीं समझ में आया है तो आप कैसे पता लगाओगे कि ये जो जहाज़ बनाया मैंने छोटा सा, खिलौने वाला जहाज़, इसके पंख कितने लम्बे हों और उनका सरफेस एरिया कितना हो? बिना पंख के सरफेस एरिया का कैलकुलेशन करे क्या आपका जहाज़ उड़ पाएगा? और उड़ गया भी तो तुक्का ही होगा, जैसे आप कागज़ के जहाज़ बनाते हो ना। और उसमें आप कोई कैलकुलेशन नहीं करते वो फिर भी उड़ता है थोड़ी दूर तक। तो बिना थ्योरी के इसी तरह जहाज बन सकते हैं, कागज़ वाले।

पर अगर आप वाकई ईमानदार हो और रुचि रखते हो तो आपको खिलौने वाला जहाज़ बनाने के लिए भी बेर्नौल्ली थ्योरम की समझ होनी चाहिए। और अगर आपने बेर्नौल्ली थ्योरम समझ लिया तो आप पाओगे कि आपको सब जगह उसकी प्रैक्टिकल उपयोगिता दिखने लगेगी। अब ये पंखा है। मुझे बताओ कि इसके जो ये पंख है ये मुड़े हुए क्यों हैं? ये जो पंखा बंद है उसको देखो। ये मुड़े हुए हैं, दिख रहा है, थोड़े कर्व्ड हैं।

सभी श्रोता: जी, सर।

वक्ता: ये कर्वेचर दिख रहा है? वो कर्वेचर क्यों है वहाँ पर?

श्रोता: सर आगे की, नीचे की तरफ हवा देने के लिए।

वक्ता: नीचे की तरफ हवा क्यों आएगी, वैसे करने से?

श्रोता: सर अगर वो कर्व होगा तो नीचे की तरफ…

वक्ता: कर्व होगा तो नीचे की तरफ आएगी, ये तो मैकेनिक की भाषा है। इंजीनियरिंग की समझ से बताओ कि वो कर्व्ड क्यों है? क्यों है?

श्रोता: सर वो ऐसे ही होगा…

वक्ता: अरे क्यों होगा ऐसा? अगर फासला बढ़ेगा और दूरी उतने ही समय में तय करनी है तो गति क्या होगी? गति क्या होगी? फासला बढ़ गया और दूरी उतने ही समय में तय करनी है, वो फासला? समय उतना ही लेना है पर फासला बढ़ गया, तो गति क्या होगी?

सभी श्रोता: बढ़ेगी।

वक्ता: बढ़ेगी। गति और दबाव का जोड़ अनवरत है। गति बढ़ेगी तो दबाव क्या होगा? यदि गति और दबाव अनवरत हैं। वेलोसिटी कर्व और दबाव अनवरत हैं, उनका जोड़, गति बढ़ेगी तो दबाव क्या होगा? तो अगर गति बढ़ेगी तो ‘ पी ’ का क्या होगा? ‘ पी ’ क्या होगा?

कुछ श्रोता: घटेगा।

वक्ता: घटेगा? एक तरफ ‘पी’ ज़्यादा है और दूसरी तरफ ‘पी’ कम है तो हवा किधर को आएगी? जिधर को ‘ पी ’ क्या है? कम है। तो बस इसीलिये उसको मोड़ा जाता है। ताकि नीचे कम दबाव का क्षेत्र बने ऊपर ज़्यादा दबाव का क्षेत्र बने, हवा हमेशा ज़्यादा दबाव के क्षेत्र से कम दबाव के क्षेत्र में जाएगी। अब अगर तुमने उस बेर्नौल्ली थ्योरम को समझा होता, तो जैसे ही इस पंखे को देखोगे और सिर्फ देखोगे तो सब समझ जाओगे कि इसके पंख ऐसे क्यों मोड़े गएँ हैं।

पर तुमने उसको सिर्फ रटा है। तुम उसको रट के जाओगे परीक्षा में लिखके चले आओगे, पर तुमने उसको समझा नहीं। क्योंकि समझा नहीं तो उसमें प्रैक्टिकल कुछ नहीं दिखाई दे रहा। तुम्हारे यहाँ पे एक प्रदर्शनी लगे और तुम्ही में से कोई कहे कि मैं अपना एक पंखा बना के दिखाऊँगा और तुमने उसमें पंखा बना दिया, और वो पंखा तुमने चपटे पंखो का बना दिया, चपटे, तो वो हवा देगा? देगा पर डिसटर्ब्ङ सी, केऔटिक। उसमें कुछ ऐसा नहीं होगा कि एक तरफ को बह रहा है। तुम तो बड़े प्रैक्टिकल थे तुमने तो पंखा बना दिया, पर तुमने ये समझा ही नहीं कि सरफेस एरिया बढ़ाना क्यों है?

बिना थ्योरी के तुम प्रैक्टिस कर कैसे लोगे ये बताओ? तो थ्योरी जानना ज़रूरी है, पर जिस भी थ्योरी को पढ़ो, उसको ये समझ के पढ़ो कि ये, वास्तविकता में, जीवन में कैसे संचालित करती है। उसको सिर्फ सिंबल और इक्वेशन , ऐसे मत रट लो कि रट लिया, सिम्बल्स और इक्वेशंस रट लिए।

थ्योरी जीवंत चीज़ है, थ्योरी जीवन है। थ्योरी का परिचालन होता है, थ्योरी जीवित है।.

उसके उस जीवन को समझो, कि ये थ्योरी कैसे काम करती है, क्यों काम करती है। फिर देखो उसमें कितना मज़ा आता है। नहीं आ रहा समझ में? हर चीज़ का जीवन से सम्बन्ध देखो। अब इसमें कितना पानी भरा है (हाथ में एक पानी की बोतल को उठाते हुए), और मैं इसे कितने कोण तक मोड़ सकता हूँ, जब तक ये स्टेबल है, गिर ना जाए? इसमें कोई सम्बन्ध है कि नहीं है? इस पानी के कॉलम की ऊँचाई, वो ऊँचाई इतनी भी हो सकती है और इतनी भी हो सकती है (बोतल में पानी की दो अलग-अलग ऊँचाई की तरफ़ इशारा करते हुए)। पानी के कॉलम की ऊँचाई और वो अधिकतम कोण जिसपे इसको मोड़ा जा सकता है। देखो, इतना मोड़ता हूँ तो ये गिर जाएगी (बोतल को मोड़ कर दिखाते हुए), इतना मोड़ दूँगा तो वापिस आ जाएगी। तो अधिकतम कोण क्या है, जिसपे ये अपने संतुलन पर वापिस आ जाए? इस ऊँचाई में और उस कोण में सम्बन्ध है की नहीं है? है की नहीं है?

सभी श्रोता: है, सर।

वक्ता: बेशख़ है। अगर ये पूरा खाली कर दूँ, थोड़ा सा ही मोडूँगा तो ये गिर पड़ेगी। ठीक है ना? ये सम्बन्ध क्या मैं नहीं निकालूँगा, जिस दिन मैं गुरुत्वाकर्षण पढूँगा? जिस दिन मैं टार्क पढूँगा? क्या ये सम्बन्ध मैं नहीं निकालूँगा? मुझे क्या समझ में नहीं आएगा कि बेस के एरिया और सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी की जो लाइन होती है उसमें क्या सम्बन्ध है? क्या मुझे ये भी समझ नहीं आएगा कि इसी बोतल का अगर एरिया छोटा कर दूँ, बेस का तो ये बहुत जल्दी गिर जाएगी और इसी का बेस एरिया अगर बहुत बढ़ा दूँ, तो ये नहीं गिरेगी इतनी आसानी से?

आई.आई.टी का एंट्रेंस इम्तिहान जब होता था हमारे समय में, जो हमने दिया था, उसमें एक सवाल थ्योरी का नहीं पूछा जाता था, सिर्फ न्यूमेरिकल आते थे। अब तो शायद स्थिति बदल गयी है। पर वो न्यूमेरिकल करने के लिए, जिसे तुम प्रैक्टिकल समस्या बोलोगे, वो न्यूमेरिकल करने के लिए थ्योरी पर बहुत अच्छी पकड़ होनी चाहिए। उसी थ्योरी से प्रैक्टिस निकलती है। उसी थ्योरी से प्रैक्टिकल निकलता है। आ रही है बात समझ में?

इसमें मुझे एंगुलर मोमेंटम की समझ होनी चाहिए (बोतल को फिर से हाथ में उठाकर)। है ना? इसमें मुझे ग्रुत्वाकर्षण की समझ होनी चाहिए। जब इतनी चीजों की समझ होगी तब मैं ये प्रैक्टिकल बात पता कर पाऊँगा कि ये कितने कोण तक मुड़े तब भी नहीं गिरेगी। आ रही है बात समझ में?

‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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