जिस चीज़ को देख रहे हो उसमें इतना भी नहीं आकर्षण है कि उसे साफ़-साफ़ देख लोगे, तब भी आकर्षण बना ही रहेगा। जिसको जानते ही नहीं हो न, उसको ही बहुत अधिक महत्व और सम्मान और इज्ज़त कीमत देते रहते हो। जिसको जानने लग जाओ, उसको फिर सम्यक स्थान देते हो कि इतनी ही इसकी कीमत है, इतनी ही इसको मैं जगह दूँगा, इससे ज़्यादा इसको जगह नहीं दे सकता। सही मुद्दे लेकर आओ ज़िन्दगी में भाई! इन चीज़ों की बात करने के लिए वक्त नहीं बचेगा।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आपके मार्गदर्शन से जीवन में कई परिवर्तन आये हैं। और सारे डाइमेंशन्स (आयाम) में प्रोग्रेस (उन्नति) हो रही है, एकेडमिकली (शैक्षणिक) और सोशली (सामाजिक) भी। आपकी जब हम सबने बुक्स पढ़ी थी, ’इज़ शी जस्ट फ़ूड टू यू’ और जो विगनिज़्म (शुद्ध शाकाहार) के बारे में आपके जो वीडियोज़ थे वो हम सबने देखे थे, तो मैं और मेरे दोस्त वो बुक एंड (खत्म) करते-करते ही वीगन हो गये थे।
और कई बार जैसे मेरे दोस्तों से भी प्रश्न आता है कि जैसे आपकी बुक पढ़ते-पढ़ते हम सब एंड (अन्त) में वीगन हो गये, लेकिन ऐसा क्यों होता है कि जैसे कुछ डिस्ट्रैक्शन्स (विकर्षण) जैसे हम सब यूथ हैं तो कुछ डिस्ट्रैक्शन्स होते हैं, जैसे अभी फिलहाल पोर्नोग्राफ़ी है, ये सब है। तो पोर्नोग्राफ़ी और इन सब से भी शरीर को सुख मिलता है। तो ऐसा क्यों है कि एक सुख को हम तुरन्त छोड़ देते हैं और एक सुख को छोड़ना काफ़ी मुश्किल हो जाता है?
आचार्य प्रशांत: वो प्रकृति की ज़्यादा गहरी माँग है न। कहती है, ‘अपना शरीर बचाकर रखो और अपने बाद बहुत सारे शरीर पैदा करके जाओ।’ अब अपना शरीर तो आप शुद्ध शाकाहारी होकर भी बचा सकते हो, तो उसमें प्रकृति बहुत हो-हल्ला नहीं करती, बहुत विरोध नहीं करती। कोई दूध और माँस वगैरह छोड़ दे, तो प्रकृति उसमें कोई विरोध नहीं करने वाली। होगा भी तो दो-चार दिन आपको ऐसा लगेगा कि अरे! दूध वाली चाय मिल जाती तो अच्छा रहता। दो-चार दिन के बाद खुद ही बढ़िया लगने लगता है कि शरीर हल्का लग रहा है। उसमें प्रकृति ज़्यादा विरोध करने नहीं आती क्योंकि वो यही तो कह रही थी कि शरीर चलाते रहो। शरीर तो चल ही रहा है। पहले माँस से चलता था, अब बिना माँस के चल रहा है, तो ठीक है। लेकिन जो दूसरी शर्त होती है प्रकृति की, वो ज़बरदस्त होती है। वो कहती है कि सिर्फ़ अपना एक शरीर नहीं चलाना है, अपने बाद कम-से-कम पाँच–दस और पैदा भी तो करने हैं। तो वो जब दूसरी शर्त पूरी नहीं होती है तो प्रकृति फिर परेशान करती है। उसी परेशानी को आप




