हम न पूजा-पाठ जानते हैं, न भजन-कीर्तन जानते हैं। बस करते जाते हैं, निभाते जाते हैं। आप जो कुछ भी करते हो, पूजा-पाठ, तप, यज्ञ इत्यादि, पूछिए कि इससे आपकी परेशानी कैसे मिट रही है? बिना जाने-समझे पूजा-पाठ करते-करते यह स्थिति आ गई है कि अब एक पीढ़ी खड़ी हो गई है, जो किसी भी तरह की पूजा, पाठ या जप करना ही नहीं चाहती। मंदिर बहुत लाभ की जगह हो सकता है, अगर उसे रूढ़िवादी स्थान न बना दिया जाए।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या पूजा-पाठ, यज्ञ आदि नित्य कर्मों से मुक्ति की तरफ़ बढ़ने में कुछ मदद मिलती है?
आचार्य प्रशांत: नहीं देखिए, भूलना नहीं है कि आपकी परेशानी आपकी सब गतिविधियों के केंद्र में होनी चाहिए। ठीक है? मैं अगर परेशान हूँ तो मुझे हक़ ही नहीं है कुछ भी इधर-उधर का करने का। मेरा पहला दायित्व है — मैं पूछूँ कि मैं जो कुछ भी करने जा रहा हूँ, उससे मेरी परेशानी मिटेगी या नहीं मिटेगी? क्यों? क्योंकि मेरा पहला कर्तव्य है स्वधर्म में जीना। मेरा पहला कर्तव्य है स्वभाव में जीना। ठीक है।
कर्तव्य माने वो चीज़ जो करने लायक है। तो अगर मैं परेशान हूँ तो मेरे लिए करने लायक पहली चीज़ यही है कि अपनी परेशानी दूर करूँ। मैं कुछ भी और करने लग गया अपनी परेशानी साथ में लिए-लिए तो ये ग़लत होगा। ये अर्धम है, ये अकर्तव्य है।
समझ में आ रही बात?
तो आप जो भी कुछ करते हो, पूजा-पाठ, तप, यज्ञ इत्यादि, आप पूछ लीजिए इससे आपकी परेशानी कैसे मिट रही है? और साफ़ सवाल, ठीक है? मैं ये नहीं कह रहा कि आप कुछ मानें, न ये कह रहा हूँ कि कुछ न मानें। पर पूछिए ज़रूर कि ये मुझे जो कुछ भी करने को कह रहे हो, इसका मेरी जो सीधी-सीधी समस्याएँ हैं, उनसे ताल्लुक़ क्या है?




