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पशुहत्या धर्म है, तो अधर्म क्या? || आचार्य प्रशांत (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
48 min
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Tweet: Animal sacrifices were part of the ancient Vedic religion in India, and are mentioned in scriptures such as the Yajurveda…. So, it's clear that animal sacrifice is a part of Hinduism….. So… Hindus don’t dare to trend the tag #BanBakraEid.

ट्वीट: पशु बलि भारत की प्राचीन वैदिक परंपरा का हिस्सा रही है, और इसका वर्णन यजुर्वेद जैसे ग्रंथों में भी मिलता है.... तो ये स्पष्ट है कि पशु बलि हिंदू धर्म का हिस्सा है... तो हिन्दुओं, मत करो ट्रेंड #BanBakraEid

प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी। हमेशा से ही आप पशुओं के प्रति करुणा रखने की सीख देते हैं। साथ ही साथ धर्म के नाम पर जो पशुओं को मारा जाता है, उसके खिलाफ़ सख़्त विरोध भी करते हैं — चाहे वो हमारे मंदिरों में पशुबलि हो या फिर बक़रीद जैसे त्यौहारों पर पशुओं की कुर्बानी।

आजकल ट्विटर पर बहुत लोगों ने शोर मचाया है कि जब हिंदू ग्रंथों में ही पशुबलि का साफ़-साफ़ समर्थन किया गया है, तो फिर हम किस मुँह से पशुबलि के खिलाफ़ आगे विरोध करते हैं। कृपया स्पष्ट करें।

आचार्य प्रशांत: देखो, धर्म क्या है? धर्म का सम्बन्ध व्यक्ति के शरीर से नहीं है। धर्म का सम्बन्ध व्यक्ति के मन से है। मन परेशान होता है; मन को बंधन प्रतीत होते हैं; मन बेचैन रहता है। तो मन की इस परेशानी, इस बेचैनी के समाधान के लिए धर्म है। ये बिलकुल मूलभूत बात है, इसको समझना।

तो धर्म मन के लिए है, शरीर के लिए नहीं। धर्म शरीर की बात नहीं करेगा या बहुत कम करेगा। करेगा भी तो मन के ही संदर्भ में करेगा। धर्म इसलिए सूक्ष्म है और शरीर की जितनी बातें हैं, चाहे इंसान के शरीर की, चाहे पशुओं के शरीर की, चाहे पदार्थ की, मटीरियल बातें, भौतिक बातें जितनी हैं, वो सब स्थूल कहलाती हैं।

धर्म उनसे बहुत सम्बन्ध नहीं रखता है क्योंकि धर्म की निष्ठा, धर्म की एकाग्रता मन की तरफ़ है। धर्म कहता है मन जो है, वो गड़बड़ है, उसका इलाज करना है। इसीलिए पशुओं को धर्म की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि पशुओं के पास उस तरह की अस्तित्वगत बेचैनी होती ही नहीं है जैसे मनुष्य के पास होती है, ठीक है?

तो मन का इलाज करना है। अब मन का इलाज करना है तो मन के ही जो सब दोष हैं, उनको ठीक करना होगा न? उस ठीक करने की प्रक्रिया को बलि कहते हैं। भीतर जो दोष और विकार बैठे हैं, उनको हटाने को ही यज्ञ, होम या आहुति कहते हैं। उन्हीं को छोड़ना होता है, उन्हीं का त्याग करना होता है, उन्हीं को स्वाहा कहना होता है, उन्हीं की कुर्बानी देनी होती है।

तो वेदान्त से मैं शुरुआत करता हूँ, क्योंकि तुम कह रहे हो कि ट्विटर वग़ैरह पर इस तरह की बात चल रही है कि हिंदुओं के धर्मग्रंथों में ही पशुबलि का समर्थन है। हिन्दुओं के धर्म का केंद्र तो वेदान्त है। वेदान्त क्या कहता है पशुओं के बारे में, बलि के बारे में? वहाँ से शुरू करते हैं, फिर मैं वेदों की ओर जाऊँगा। फिर कुछ उदाहरण, इतिहास ग्रंथों से भी ले लेंगे, अन्य जगहों से भी ले लेंगे।

तो सबसे पहले उपनिषद् का वक्तव्य बहुत सीधा-सीधा है कि पशु कहते किसको हैं।

कामक्रोधलोभादयः पशवः । काम, क्रोध, लोभ, मद आदि यही सब पशु हैं। ~ उपनिषद्

तो देखो कैसे पशु, जिसको हम आमतौर पर एक स्थूल देह की तरह देखते हैं, उपनिषद् उसको प्रतीक बना रहे हैं एक सूक्ष्म बात का, क्योंकि जैसा मैंने कहा, धर्म का जो सम्बन्ध है वो मन से है। मन सूक्ष्म है, मन के सब विकार सूक्ष्म हैं। तो काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, यही सब पशु हैं।

ये बात उपनिषद् बिलकुल स्पष्टतया बोल रहें है, ठीक है? ये बात मैं किसी निष्कर्ष के तौर पर नहीं निकाल रहा। ये बात ठीक इन्हीं शब्दों में वर्णित है। तो पशु की जहाँ भी बात हो, तो वहाँ पर आशय हमारे भीतर की पाश्विक वृत्तियों से है।

इसी तरीक़े से पाशुपतब्रह्मोपनिषद् है, वो साफ़-साफ़ बताता है कि जिसको हम आमतौर पर बलि के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल करते हैं – मेध, अश्वमेध, अजमेध, तो उनका आशय क्या है। क्या कहता है उपनिषद् वहाँ पर?

अश्वमेधो महायज्ञकथा । तद्राज्ञा ब्रह्मचर्यमाचरन्ति । सर्वेषां पूर्वोक्तब्रह्मयज्ञक्रम मुक्तिक्रममिति ।। अश्वमेध बड़ा यज्ञ है किंतु उसके अभ्यासी वास्तव में ब्रह्मचर्य ही साधते हैं। इस ब्रह्मचर्यात्मक यज्ञ का सिलसिला ही मुक्ति का उत्तरोत्तर कारण बनता है। ~ पाशुपतब्रह्मोपनिषद्

तो क्या कह रहा है उपनिषद्? उपनिषद् कह रहा है कि अश्वमेध बहुत बड़े यज्ञ के तौर पर जाना जाता है लेकिन उसमें बात न अश्व की है वास्तव में, न मेध की है वास्तव में, वहाँ बात ब्रह्मचर्य की है, और ब्रह्मचर्य माने क्या? ऐसा जीवन जीना, ऐसी चर्या रखना जिसके केंद्र में ब्रह्म हो — ब्रह्म माने मुक्ति। इस तरह से जीना कि जीने का लक्ष्य मुक्ति रहे, यही ब्रह्मचर्य होता है। तो अगर कहीं तुम यह पढ़ भी लो, धर्मग्रंथों में कि वहाँ लिखा हुआ है अजमेध या गौमेध या अश्वमेध, कहीं नरमेध भी लिखा होता है, तो उसका अर्थ पशु की बलि नहीं है; उसका अर्थ वास्तव में ब्रह्मचर्य से ही है।

जो ये ‘मेध’ शब्द भी है, इसका अर्थ मारना ही नहीं होता। देखो, शब्दों के कई अर्थ होते हैं और आप अपने रुझान के अनुसार, वस्तुतः अपने स्वार्थ के अनुसार, उनका अर्थ कर लेते हो। ‘मेध’ के कम से कम तीन अर्थ हो सकते हैं – एक तो वही जो कि मांस के लालची लोगों ने कर दिया है कि मेध माने मारना; नहीं तो मेध का अर्थ होता है उठना भी, भीतर की चेतना, प्रज्ञा, मेधा। और मेध का अर्थ होता है इकट्ठा करना भी, संकलित करना भी, कि आदमी के भीतर चेतना की जो शक्तियाँ बिखरी पड़ी रहती हैं, उनको एकाग्र करके, मुक्ति की दिशा में प्रेषित करना, वो भी मेध का अर्थ है।

‘अश्व’ माने तो पशु है ही। तो आपकी जितनी शक्तियाँ पशुता की दिशा में बिखरी पड़ी हैं, उनको एक साथ ला करके, उनका संयुक्तिकरण करके, उनको इकट्ठा करके, ऊँचाई की दिशा में भेजना, ये अश्वमेध है; अश्वमेध से ये आशय है। और यही उसका वास्तविक अर्थ है, क्योंकि देखो वेदान्त अहिंसा को अपने बहुत केंद्र में रखता है। अहिंसा का अर्थ होता है कि जो सामने वाला है, वो मुझसे अलग नहीं है। यही वेदान्त की मूल शिक्षा है।

तो धर्म, विशेषतया सनातन धर्म, पशुबलि का समर्थक कैसे हो सकता है? किसी को मारने का समर्थक कैसे हो सकता है?

अगर अभी दूसरा अलग ही दिख रहा है, अगर अभी दूसरे को मार करके अपने स्वार्थों की पूर्ति ही हो रही है, तो फिर आप अभी धार्मिक हुए कहाँ? इसी में अगर हम आगे बढ़ें थोड़ा, वेदान्त से विस्तार ले करके वेदों में आएँ, तो देखिए यजुर्वेद क्या बोलता हैं। मैं पढ़ता हूँ:

अग्निः पशुरासीकत्तेनायजन्त ।। अग्नि पशु था, इसी के द्वारा यज्ञ किया। ~ यजुर्वेद

वायु पशु था, सूर्य पशु था। अभी अग्नि, वायु, सूर्य ये सब क्या हैं? ये भौतिक तत्वों के नाम हैं। इनको ही पशु बोला जा रहा है। माने आपके भीतर जो भौतिकता है, वही आपकी पशुता है। आपके भीतर जो भौतिकता है, वही आपकी पशुता है और उसी का यज्ञ करना होता है, माने उसी की आहुति देनी होती है, माने उसी की बलि देनी होती है।

बलि का मतलब स्थूल नहीं हो सकता। बलि का मतलब देह से सम्बन्धित नहीं हो सकता, कि किसी की देह आपने काट दी और आप कह रहे हो कि मैंने बलि दे दी। और बलि का अर्थ मारना भी नहीं होता। जिन्हें भाषा की थोड़ी भी समझ है, वो जानते हैं कि बलि का अर्थ त्याग होता है।

बलि का अर्थ होता है किसी निचली चीज़ को छोड़ना किसी ऊँचे उद्देश्य के लिए।

जानवर को काटने का नाम बलि तो ऐसे ही लोगों ने रखा होगा जिनमें करुणा भी नहीं है और जिनमें स्वाद की, मांस की, ज़बान की लोलुपता इतनी ज़्यादा थी कि वो वेदमंत्रों तक का उल्टा-पुल्टा अर्थ करने को, विकृत करने को, तोड़ने को तैयार हो गये, सिर्फ़ इसलिए ताकि उनके स्वार्थ की और स्वाद की पूर्ति होती रहे।

इन्हीं सब बातों से क्षुब्ध हो करके, एक चार्वाक पंथ हुआ करता था, नास्तिक पंथ था। उनके ग्रंथ लगभग पूरी तरह खो गये हैं, बस उनके कुछ श्लोक इधर-उधर छितराए मिलते हैं। तो उन्होंने बड़ा तीखा व्यंग्य करा था उन लोगों पर जो कि पशु-बलि वग़ैरह दिया करते थे। ऐसे लोगों की कभी कमी नहीं रही।

देखो, धर्म जो बात कहता है, वो अपनी जगह है और इंसान अपने स्वार्थ के लिए धर्म की बात को भी तोड़-मरोड़ लेता है, और फिर कहता है कि नहीं मुझे तो धर्म ने ही हिंसा सिखाई है। या मुझे धर्म ने ही पचास तरह की मक्कारियाँ सिखाई है। अब ये विचित्र बात है क्योंकि धर्म आपको स्वार्थ से मुक्त होना सिखाता है, लेकिन आप अपने स्वार्थ के लिए धर्म का ही दुरुपयोग करना शुरू कर देते हो। तो ऐसे लोगों पर कटाक्ष करते हुए, चार्वाकों ने कहा था कि:

पशुश्चेन्निहतः स्वर्गं ज्योतिष्टोमे गमीश्यति । स्वपिता यज्ञमानेन तत्र कस्मान्न हन्यते ।। यदि धर्म कार्य में मारा गया पशु स्वर्ग को जाता है, तो भाई तुम अपने पिता को ही यज्ञ में क्यों नहीं मार देते, ताकि तुम्हारे पिता को सीधे ही स्वर्ग मिल जाए? ~ चार्वाक सम्प्रदाय के ग्रंथ से

क्योंकि जो लोग यज्ञ वग़ैरह में पशुओं को मारते थे, उनका बहुधा यही तर्क रहता था कि यज्ञ में हम जिस पशु को मारते हैं, वो सीधे स्वर्ग पहुँच जाता है। तो चार्वाक दर्शन को मानने वालों ने उन पर व्यंग्य करा कि "अगर यहाँ यज्ञ में मारने से पशु स्वर्ग पहुँच जाता है तो अपने पिता को ही मार दो न, वही सीधा स्वर्ग पहुँच जाए। या पिता के प्रति तुम्हारा इतना भी दायित्व नहीं कि पिता को स्वर्ग पहुँचाओ?"

फिर अब ऋग्वेद पर आते हैं और उसके बाद हम यजुर्वेद, सामवेद से भी उद्धरण लेंगे समझने के लिए कि क्या वास्तव में हिन्दुओं के धर्मग्रंथ पशु बलि का समर्थन करते हैं।

अब ऋग्वेद में श्लोक हैं और बहुत जगह दोहराया गया है, जो कहते हैं कि:

मा नो गोषु मा नो अश्वेष रीरिषः । हमारी गायों और घोड़ों को मत मार । ~ ऋग्वेद १/११४/८

रक्षा कर, रक्षा कर। प्रार्थना भी यही है कि पशुओं की रक्षा की जाए। प्रार्थना ये नहीं है कि पशु मारे जाएँ, पशु का मांस मिले, पशुओं से हमारी स्वार्थ सिद्धि हो। यजुर्वेद में इसी बात को और विस्तार देकर कहा गया है, नाम ले करके पशुओं का, कि "बकरी को, ऊँट को, तमाम चौपायों को, पक्षियों को, जो दो पाँव वाले हैं, पक्षी, चार पाँव वाले पशु —इनमें से किसी को भी मत मारो, बिलकुल मत मारो।" ये यजुर्वेद ने कह दिया है।

इममूर्णायुं वरुणस्य नाभिं त्वचं पशूनां द्विपदां चतुष्पदाम् । त्वष्टुः प्रजानां प्रथमं जनित्रमग्ने मा हिंसीः परमे व्योमन् ।। बकरी, ऊँट आदि चौपायों और पक्षियों आदि दो पगों वालों को मत मार। ~ यजुर्वेद १३/५०

अब ये श्रुति है। ये हिंदुओं के सबसे मान्य मंत्र हैं, यहाँ स्पष्ट रूप से वर्जित किया जा रहा है जीव हत्या को। और जीव हत्या में भी और ज़्यादा विस्तार दे करके, नाम ले करके बताया जा रहा है कि देखो मत मारो, इसको भी मत मारो, उसको भी, उसको भी, उसको भी मत मारो। सामवेद में, जो साधक है, जो पूजक है, जो यज्ञ करता है, वो देवताओं को सीधे ही संबोधित करके क्या कहता है? कहता है:

न कि देवा इनीमसि न क्या योपयामसि । मंत्रश्रुत्यं चरामसि ।। हे देवों! हम हिंसा नहीं करते और न ही हम हिंसा वाला कोई धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। ~ सामवेद २/७/२

जैसे कि ये बात बिलकुल स्पष्ट है मंत्र कहने वाले को या करने वाले को कि देवता कुपित हो जाएँगे यदि पशुओं पर हिंसा की गयी या पशुओं की बलि दी गयी। तो देवता के सामने स्पष्टीकरण दिया जा रहा है। देवता के सामने अपनी सफ़ाई की दलील दी जा रही है। क्या कह करके? कि ‘हे देवों, हम हिंसा नहीं करते और न ही हम हिंसा वाला कोई धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। हम कोई धर्म के नाम पर ऐसा काम नहीं करते जिसमें पशुबलि दी जाती है’, ठीक है? ये सामवेद है।

अब आओ यजुर्वेद में, जहाँ बात और विस्तार में चली गयी है। यजुर्वेद क्या कह रहे हैं, गिना-गिना करके:

घोड़े की हिंसा मत कर, भेड़ की हिंसा मत कर—इसी क्रम में नाम आ गये सारे—घोड़े की हिंसा मत कर, भेड़ की हिंसा मत कर, दो पैर वाले जीवों की हिंसा मत कर—जिसमें पक्षी वग़ैरह आ गए—गाय की हिंसा मत कर, बकरे की हिंसा मत कर। अपितु, बल्कि, रक्षा कर, रक्षा कर।

(आगे क्या कहता है श्लोक?) किसी की हिंसा मत करो, हिंसा को बिलकुल छोड़ दो। ~ यजुर्वेद

ये यजुर्वेद है। अब मुझे नहीं मालूम कि जो लोग कह रहे हैं कि हिंदुओं के धर्म ग्रंथों में तो बलि को मान्यता दी गयी है, वो कौनसे वेद पढ़कर के इस प्रकार की दलीलें दे रहे हैं?

महाभारत का नाम तो सबने सुना होगा। थोड़ी बहुत कहानी भी उसकी जानते होंगे। वो लोग भी महाभारत के विषय में जानते होंगे जो कह रहें हैं कि हिंदुओं के यहाँ तो जीव हत्या चलती है। अब सुनो कि महाभारत में, विशेषतया शांतिपर्व में, जीव हत्या के बारे में क्या कहा गया है।

तो महाभारत के शांतिपर्व का ये वक्तव्य है; अगर इसको ध्यान से सुन लिया तो उसके बाद ये कभी नहीं कह पाओगे कि सनातन धर्म में पशुहत्या या पशुबलि मान्य है। सुनो —

सुरा-मत्स्या-मधु-मांस मासवं कृसरौदनम् । धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ।।९।। मानान्मोहाच्च लोभाच्च लौल्यमेतत्प्रकल्पितम् । विष्णुमेवा भिजानन्ति सर्वयज्ञेषु ब्राह्मणा: ।।१०।। पायसै: सुमनोभिश्च तस्यापि यजनम् स्मृतम् । यज्ञयाश्चैव ये वृक्षा वेदेषु परिकल्पिता: ।।११।। सुरा, मछली, मदिरा, मांस आदि यह सारा व्यवहार धूर्तों का चलाया हुआ है। ऐसे व्यवहार का वेदों में कोई प्रमाण नहीं है। मान, मोह, लोभ और जिह्वा लोलुपता से यह माँस, मदिरा, मछली का व्यापार चल रहा है। इस व्यापार का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। ~ महाभारत, शांतिपर्व, अध्याय २६५

महाभारत स्पष्ट कर रही है कि वेद कहीं नहीं कह रहे हैं माँस, मछली, सुरा आदि के लिए, धर्म के क्षेत्र में। न धर्म के क्षेत्र में, ना तुम्हारे सामान्य सांसारिक क्षेत्र में। वेद इसकी अनुमति दे ही नहीं रहे; ये तो छोड़ दो कि वेद आज्ञा दे रहे हैं इसकी, वेद इसको अनुमति नहीं दे रहे हैं, मान्यता ही नहीं दे रहे हैं कि ये सब करना है, बिलकुल नहीं।

मान, मोह, लोभ और जिह्वा लोलुपता से यह मांस, मदिरा, मछली का व्यापार चल रहा है। इस व्यापार का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। महाभारत कह रही है कि मांस खाने का, पशुबलि करने का या देवताओं को सुरा, शराब आदि अर्पित करने का, धार्मिक जगहों पर जाकर जानवरों को काटने का, ये सारा जो व्यापार चल रहा है, माने काम-धंधा जो चल रहा है पूरा, इसका धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है, न ही इस तरह के व्यवहार का, आचरण का वेदों में कोई प्रमाण है।

ये सब कौन लोग कर रहे हैं? इसमें महाभारत बहुत स्पष्टतया कहती है कि ये सबकुछ वो लोग कर रहे हैं जो स्वार्थी हैं, धूर्त हैं, कपटी हैं और जिह्वालोलुप हैं। जिह्वालोलुप माने ज़बान के मारे हुए हैं, इंद्रियों के ग़ुलाम हैं, जिनका अपनी स्वाद वासना पर कोई वश नहीं है। ये वो लोग हैं जो धर्म के नाम पर ये सब कुछ करते हैं, कि जानवर को ले जाओ, काट दो और फिर उसे खा जाओ। वास्तव में इनका उद्देश्य बस जानवर को खाना है। इसी शांतिपर्व में ही एक जगह फिर आगे भीष्म, युधिष्ठिर से क्या कह रहे हैं? कह रहें हैं कि:

उच्छृंखल, मर्यादाशून्य, नास्तिक, मूढ़ तथा संशयात्मक लोगों ने ही यज्ञ में हिंसा का विधान बना दिया है। यज्ञ में हिंसा नहीं होनी चाहिए। मनु ने भी अहिंसा की प्रशंसा करी है। ब्राह्मणों का कर्तव्य है कि अहिंसा के अनुसार सूक्ष्म धर्मानुष्ठान करें। सभी धर्मों में अहिंसा ही श्रेष्ठ धर्म है। जो मनुष्य धार्मिक उद्देश्यों से पशुहत्या करके मांस खाते हैं, उनका धर्म किसी भी तरह प्रशंसनीय नहीं है। ~ महाभारत, शांतिपर्व, अध्याय २६५

उच्छृंखल — उच्छृंखल माने कौन? जो लोग अपनी सीमा में नहीं रहते हैं, जिनका अहंकार किसी तरीक़े की वर्जना, सीमा जानता ही नहीं है — उच्छृंखल, मर्यादाशून्य, नास्तिक, मूढ़ तथा संशयात्मक लोगों ने ही यज्ञ में हिंसा का विधान बना दिया है। ये विधान वेदों ने नहीं बनाया है, ये विधान लोगों ने बना दिया है। लोग किसी चीज़ को कर रहे हैं, यह कह कर के कि ये वेदों में लिखी हुई है, इसका मतलब यह नहीं है कि वो चीज़ वेदों में लिखी हुई है। ज़्यादा संभावना यह है कि लोगों को उस तरह का कोई काम करना है और उस तरह का काम करने के लिए वो वेदों को प्रमाण बना लेते हैं, वेदों की दलील देने लग जाते हैं ताकि ऐसा लगे कि वो जो काम कर रहे हैं, वो धर्म सम्मत है, है न?

“उच्छृंखल, मर्यादाशून्य, नास्तिक, मूढ़, तथा संख्यात्मक लोगों ने यज्ञ में हिंसा का विधान बना लिया है। यज्ञ में हिंसा नहीं होनी चाहिए।“ स्पष्ट, कोई आगे-पीछे की बात नहीं है; यज्ञ में हिंसा नहीं होनी चाहिए। इससे यह भी पता चलता है कि यज्ञ में हिंसा बहुधा हुआ करती थी।

देखो, हिंसा अगर नहीं हुआ करती तो फिर महात्मा बुद्ध हुए, महावीर हुए, तो इन लोगों को फिर समाज सुधार की इतनी ज़रूरत क्यों पड़ती? और बुद्ध और महावीर दोनों के ही दर्शन में अहिंसा बहुत प्रमुख था, एकदम केंद्र में था। इससे यही पता चलता है कि उस समय समाज में हिंसा बहुत बढ़ गयी थी और बहुत सारी जो हिंसा तब होती थी, वो धर्म के नाम पर ही होती थी; कि यज्ञ में दनादन बलि दी जा रही है, एक के बाद एक जानवर कट रहे हैं, लेकिन वो सब जो बलि वग़ैरह दी जा रही थी, वो सब जो बर्बरता, क्रूरता हो रही थी, धर्म के नाम पर, उसकी अनुमति कहीं पर भी वेदों ने नहीं दे रखी थी।

वो तो इंसान को अपना स्वार्थ पूरा करना होता है; सामने कमज़ोर जानवर मिल गया, लगा इसको खाया जाए मार कर के, तो उसको मार कर खाने के लिए धर्म का सहारा ले लेता है। लेकिन अगर तुम धर्म ग्रंथों के पास जाओगे, तो धर्मग्रंथ कहीं भी नहीं कह रहे थे कि तुम इस तरह के काम करो, लेकिन ये काम चल रहे थे। तो फिर इसलिए बौद्ध धर्म में और जैन धर्म में अहिंसा को केंद्र में रखा गया। और एक पूरी क्रांति ही करनी पड़ी धार्मिक। वैदिक धर्म से अलग हटकर एक नई धारा ही निकालनी पड़ी।

तो इंसान का स्वार्थ उससे कुछ भी करवा सकता और इसलिए समय-समय पर नये क्रांतिकारियों की, समाज सुधारकों की और धर्मदृष्टाओं की ज़रूरत पड़ती रही है।

तो आगे क्या कह रहे हैं भीष्म युधिष्ठिर से? "यज्ञ में हिंसा नहीं होनी चाहिए। मनु ने भी अहिंसा की प्रशंसा करी है। ब्राह्मणों का कर्तव्य है कि अहिंसा के अनुसार सूक्ष्म धर्मानुष्ठान करें।"

सूक्ष्म धर्मानुष्ठान माने? धर्म के अनुष्ठान में मन को महत्त्व दो; मन माने सूक्ष्म। स्थूल को इतना क्या महत्त्व दे रहे हो कि पदार्थ लेकर आओ, ये पदार्थ लेकर आओ; अब लकड़ी यहाँ रखो, और फल यहाँ रखो, अन्न यहाँ रखो, अब पचास तरह की और चीज़ हैं — ये सब स्थूल अनुष्ठान हो गये।

तो भीष्म कह रहें हैं — ब्राह्मणों को चाहिए कि अहिंसा को केंद्र में रखते हुए सूक्ष्म धर्मानुष्ठान करें, ठीक है?

"सभी धर्मों में अहिंसा ही श्रेष्ठ धर्म है।" ये बात आप बुद्ध या महावीर से नहीं सुन रहे। ये उनसे बहुत पहले महाभारत में कह रहे हैं भीष्म युधिष्ठिर से। इससे ये भी पता चलता है कि तब भी, महाभारत काल में भी, धर्म में हिंसा कितनी ज़्यादा घुस आयी थी। क्योंकि यदि धर्म में इतनी हिंसा नहीं घुसी होती तो भीष्म को कोई आवश्यकता नहीं थी युधिष्ठिर को समझाने की कि अहिंसा ही सब धर्मों में श्रेष्ठतम धर्म है।

"जो मनुष्य धार्मिक उद्देश्यों से पशुहत्या करके मांस खाते हैं, उनका धर्म किसी भी तरह प्रशंसनीय नहीं है।"

अब इसके बाद भी कोई संदेह बचा रह जाता है तो बताओ। "जो मनुष्य धार्मिक उद्देश्यों से, धार्मिक कार्यो में पशुहत्या करके पशुओं का मांस खाते हैं, उनका धर्म किसी भी तरह प्रशंसनीय नहीं है।" ऐसे धर्म की बिलकुल भी प्रशंसा नहीं की जा सकती, जिसमें कि पशुहत्या हो, वो भी धार्मिक उद्देश्यों से, कि आज धार्मिक त्यौहार है, तो जानवर को काट दो, उसका मांस खा लो; ऐसा धर्म बिलकुल भी तारीफ़ के लायक नहीं है, प्रशंसनीय नहीं है। भीष्म युधिष्ठिर से कह रहें हैं।

शांतिपर्व से ही आगे कुछ उद्धरण:

जो उद्धरण लेने जा रहा हूँ, इसमें यह भी समझना होगा — देखो, थोड़ी देर पहले मैंने मेध का उदाहरण देकर कहा था न कि शब्दों के कई अर्थ होते हैं, बलि का भी उदाहरण देकर बताया कि कई अर्थ होते हैं। वो अर्थ लेना चाहिए जो धर्म सम्मत अर्थ हो, ठीक है?

स्वार्थ सम्मत अर्थ नहीं लेना चाहिए। अब जैसे अज है, तो हम कहते हैं कई बार कि अज की बलि के लिए लिखा हुआ है वेदों में; अजमेध लिखा होता है, तो अर्पण करो लिखा होता है। पर अज का वास्तविक अर्थ क्या है, ये जानने के लिए यही शान्तिपर्व का एक सूत्र है, बड़ा उपयोगी है।

‘अज’ का धर्म के क्षेत्र में अर्थ है बस बीज। ये सूत्र कह रहा है कि यज्ञ में बीज अर्पित करो बस, बकरा नहीं अर्पित करो। बीज, और बीज भी कौनसा? बहुत पुराना बीज, उसी को अर्पित करना होता है।

बीज भी अर्पित करना, ये बात भी और अहिंसा की है। समझना, फल गिरता है, फल में बीज होता है और बिना किसी तरह से पेड़ या पौधे को क्षति पहुँचाए आपको बीज मिल जाता है। क्योंकि वो जो वृक्ष है, या जो पौधा है, वह स्वयं ही चाहता है कि उसका बीज बहुत जगहों पर पहुँचे। तो वो स्वयं ही अपने बीज का दान करता रहता है। तभी तो उसकी प्रजाति आगे बढ़ेगी। तो अज माने, धर्म में — जब धर्म का संदर्भ हो, धार्मिक संदर्भ में — अज का अर्थ बकरा नहीं है। धार्मिक संदर्भ में अज का अर्थ बीज है, ठीक है? तो शान्तिपर्व में कह रहे हैं:

यज्ञ में अज (बीजों) से ही हवन करना चाहिए, यह वेदों का कहना है। ‘अज’ शब्द का अर्थ बीज होता है। अतः बकरे की हत्या नहीं करनी चाहिए। जिस धर्म में पशुओं की हत्या होती हो, वह श्रेष्ठ पुरुषों का धर्म नहीं है। ~ महाभारत, शांतिपर्व, अध्याय ३३७/४–५

यज्ञ में अज से ही हवन करना चाहिए, माने बीजों से ही हवन करना चाहिए। ये वेदों का कहना है। अज शब्द का अर्थ बीज होता है, अतः बकरे की हत्या नहीं करनी चाहिए। स्पष्ट लिखा है, अब इससे और क्या पता चल रहा है? अगर ये समझाना पड़ रहा है कि अज का अर्थ बीज है बकरा नहीं, तो इसका मतलब क्या है, कि उस समय भी क्या हो रहा था? उस समय भी यही हो रहा था कि अज का अर्थ बकरा करके बकरे को काटा जा रहा था। बकरे को चूँकि काटा जा रहा था, इसीलिए महाभारत में समझाने की आवश्यकता पड़ी कि अज का अर्थ तो बीज होता है पागल, तुम बकरे को क्यों काट रहे हो? यज्ञ में बकरे को काटकर के तुम्हें कौनसा पुण्य मिलना है?

एक कवि ने कहा है — ये नाम मुझे इस समय याद नहीं आ रहा है, जहाँ पर उन्होंने अपनी बात को बकरे के मुँह से कहलवाया। बकरे का कहना है कि ‘भैय्या, मैं तो घास वग़ैरह खा करके तृप्त था। मुझे तो किसी स्वर्ग वग़ैरह की कोई कामना भी नहीं थी और तुमने मुझे ले जाकर के स्वर्ग के नाम पर काट दिया। मुझे तो स्वर्ग जाना भी नहीं था, मुझे क्यों काट दिया? मैं तो घास खाकर के खुश था। और अगर स्वर्ग तुम्हें किसी को भेजना ही है तो अपने लोगों को भेजो न। आसपास घूमो, पूछो, किसको-किसको जाना है स्वर्ग और जिन-जिन को स्वर्ग जाना है उनको काटो, मुझे क्यों काट रहे हो? मुझे स्वर्ग नहीं चाहिए, मुझे तो घास चाहिए। मैं घास में प्रसन्न हूँ।‘

तो इससे पता ये चल रहा है कि बकरे के मांस के लिए धर्म में हमेशा से इस तरह की कुरीतियाँ चलती थीं। अब धर्म की कुरीति को आप धर्म नहीं कह सकते हैं। आप ये नहीं कह सकते हैं कि इस बात को धर्म ने मान्यता दे रखी है। धर्म में कोई कुरीति आ जाए, इसका मतलब ये थोड़ी है कि वो कुरीति ही धर्म बन गयी। तो अज शब्द का अर्थ बीज होता है, अतः बकरे की हत्या नहीं करनी चाहिए।

"जिस धर्म में पशुओं की हत्या होती हो, वह श्रेष्ठ पुरुषों का धर्म नहीं है।" महाभारत का श्लोक है — जिस धर्म में पशुओं की हत्या होती हो, वो श्रेष्ठ पुरुषों का धर्म नहीं है।

प्राणियों की हत्या से स्वर्ग मिलता हो, तो फिर नर्क कैसे मिलेगा युधिष्ठिर? निश्चित रूप से धर्म में प्राणी हिंसा नहीं होती। धर्म हिंसा रहित होता है, और यज्ञ भी हिंसा रहित होने चाहिए। ~ महाभारत, शांतिपर्व

भीष्म युधिष्ठिर से कह रहे हैं, महाभारत में ही है। तुम्हें ये रोचक लगेगा, कि "प्राणियों की हत्या से स्वर्ग मिलता हो तो फिर नर्क कैसे मिलेगा युधिष्ठिर?" भीष्म कह रहें हैं युधिष्ठिर से कि ये जो सब पशु-पक्षी हैं, अगर इनकी हत्या करके स्वर्ग मिलता है, तो ये तो बता दो फिर नर्क कैसे मिलता है।

जो लोग कह रहें है न कि — और इस तरह के कई तरीक़े के विचार अब बहुत फैलने लग गए हैं कि, ‘अरे! सनातन धर्म में तो हमेशा से मांस खाया जाता रहा है; हर तरह का मांस, बल्कि गौमांस भी खाया जाता रहा है’, तो मैं उनको संबोधित कर के कह रहा हूँ कि ये देख लीजिए, हिंदुओं का महाकाव्य है महाभारत, उससे उद्धृत कर रहा हूँ — भीष्म युधिष्ठिर से कह रहे हैं कि यदि पशुओं की हत्या करके स्वर्ग मिलता है तो फिर नर्क कैसे मिलेगा युधिष्ठिर?

इससे दो बातें पता चल रही हैं—अब ये दोहरा तिहरा रहा हूँ मैं—पहला, धर्म ने कभी स्वीकृत नहीं किया पशु हत्या को; दूसरा, धर्म स्वीकृत करता हो, नहीं करता हो, समाज में पशुहत्या खूब चलती थी। ये बात लगभग जाति प्रथा की तरह हो गयी। आप वेदान्त के पास जाएँ, वहाँ जाति प्रथा की कोई स्वीकृति नहीं है। बल्कि ऋषि से जब पूछते हैं शिष्य कि जाति प्रथा क्या है, तो ऋषि हँस पड़ते हैं, बोलते है, ‘तुम्हारी कल्पना, तुम्हारी मूर्खता है जाति। कुछ नहीं है जाति। आत्मा एकमात्र सत्य है, आत्मा की कौनसी जाति होती है?’

अब ऋषि कुछ भी कहते रहें, समाज में जाति प्रथा तो तब भी चल रही थी। लेकिन समाज में जो चल रहा है, समाज के जो दोष हैं, आप उनको धर्म के मत्थे क्यों चढ़ा रहे हो? आप तो ऐसे मान रहें हो जैसे समाज बिलकुल धर्म के कहने पर ही चल रहा था। भाई, समाज अपने स्वार्थ के कहने पर चल रहा था। धर्म तो समाज को सुधारने की कोशिश करता है, पर समाज सुधरता नहीं।

ये लगभग ऐसी सी बात है कि एक शराबी है, वो शराबी का नाम है समाज। उसको नशे में ही बड़ा आनंद है। वो नशा ही किए जा रहा है। अब एक चिकित्सक है, वो उसकी शराब छुड़ाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन चिकित्सक के भरपूर प्रयत्न के बाद भी ये जो शराबी है, दवाई खाता ही नहीं। अब चिकित्सक ठूस तो देगा नहीं दवाई। दवाई नहीं खाता, परहेज़ नहीं करता, चिकित्सक की बात नहीं मानता और शराब पी-पी करके इसकी मौत हो जाती है। मौत नहीं भी होती तो बड़ी दुर्गति हो जाती है। जब इतनी दुर्गति हो जाती है तो आप कहते हैं, ‘देखो इस चिकित्सक ने इसकी बुरी दशा कर दी है, इसको मार डाला।‘

या कि जैसे एक बिलकुल ही ज़िद्दी और बिगड़ा हुआ लड़का हो, वो पढ़ने को ही तैयार नहीं है। शिक्षक पूरी जान लगा दे कि ये पढ़ ले। और पढ़ने के तमाम शिक्षक के प्रयत्नों के बाद भी वो लड़का फेल हो जाए। तो आप कहें कि ‘ये जो किताबें हैं न, इनको आग लगा दो। इन किताबों के कारण ही तो ये लड़का फेल हुआ है। और जो शिक्षक हैं, इसका बहिष्कार कर दो। इसको बाहर निकाल दो स्कूल से।‘ अरे, शिक्षक ने तो पूरी जान लगा दी थी कि वो लड़का कुछ समझे। पर वो समझने को राज़ी हो तब न।

वो जो लड़का है वो समाज है। धर्म ने समझाने की बहुत कोशिश करी है, पर समाज तब भी भ्रष्ट था, समाज आज भी भ्रष्ट है। हाँ, कुछ लोग थे जो धर्म की सुनते रहे, वो ठीक निकल गये।

देखो, ये संघर्ष जो है न, आदमी के भीतर के राक्षस का और देवता का है। हमारे भीतर दोनों ताकतें हैं — अच्छी और बुरी। उनमें हमेशा संघर्ष चलता रहता है, और खेद की बात ये है कि जो बुरी ताक़त है वही ज़्यादा जीतती है। तो आप कहेंगे कि ‘फिर धर्म का औचित्य क्या हुआ अगर बुरी ताक़त ही ज़्यादा जीतती है?’ धर्म अगर नहीं होता तो बुरी ताक़त और ज़्यादा जीतती, और ज़्यादा जीतती। आज अगर हम फिर भी थोड़े-बहुत उन पशुओं से ऊपर का व्यवहार कर लेते हैं तो उसकी वजह धार्मिकता ही है। अगर धार्मिकता भी न होती, तो हम एकदम ही राक्षस होते, एकदम ही जंगल के हैवान होते हम।

तो हम अगर बुरे हैं, उसकी वजह हमारा शरीर है। पशुता हमारे शरीर में बैठी हुई है। पशुता हम माँ के गर्भ से लेकर के पैदा होते हैं। धर्म उस पशुता को हटाने की कोशिश करता है। लेकिन धर्म कितना भी प्रयास कर लेता है, वो पशुता को बस थोड़ा कम कर पाता है, पशुता पूरी तरह जाती नहीं। पशुता पूरी तरह बस उन गिने-चुने लोगों की जाती है जो स्वयं ही यह संकल्प कर लेते हैं कि हम धर्म को आदर देंगे, महत्व देंगे और हम अपनी पशुता से निजात पाना चाहते हैं। वो तो बच जाते हैं, धर्म उनके तो काम आ जाता है लेकिन जो लोग खुद ही नहीं चाहते सुधरना, धर्म उनके क्या काम आएगा? ये तो छोड़ दो कि धर्म उनके क्या काम आएगा, वो धर्म को भी बिगाड़ देते हैं। और धर्म को बिगाड़ने के बाद वो कहते हैं धर्म ने हमें बिगाड़ दिया।

तो भीष्म युधिष्ठिर से कह रहें हैं: "प्राणियों की हत्या से यदि स्वर्ग मिलता है युधिष्ठिर, तो बताओ फिर नर्क कैसे मिलता है? निश्चित रूप से धर्म में प्राणी हिंसा नहीं होती। धर्म हिंसा रहित होता है और यज्ञ भी हिंसा रहित होनी चाहिए।" कह रहे हैं यज्ञ हिंसा रहित होनी चाहिए, मतलब कि उस समय भी यज्ञों में हिंसा होने लग गयी थी और एक स्थल पर तो भीष्म ब्राह्मणों को उनका कर्तव्य याद दिला रहे हैं। माने वो जो हिंसा हो रही थी, उसमें ब्राह्मणों का भी पूरा हाथ था।

अब ब्राह्मण हो, कोई हो, नाम से क्या होता है? मनुष्य तो मनुष्य है, वासनाओं का पुतला; भीतर से जानवर। उसको यदि लग रहा है कि धर्म के नाम पर जानवर को काट करके, उसका मांस खाने को मिलने वाला है, तो कहेगा कि धर्म में ऐसा ही लिखा है कि जानवर काट लो, उसका मांस खा लो। अब अश्वमेध यज्ञ है। अश्वमेध से हम यही मतलब समझते है कि घोड़ा हमने छोड़ दिया था, घोड़ा जितनी दूर तक गया तो गया और फिर अंततः घोड़े की कुर्बानी होती है। तो महाराजा वसु का अश्वमेध वर्णित है, महाभारत में शांति पर्व में ही और उसमें स्पष्ट कहा गया है कि,

संभूताः सर्वसम्भारास्तस्मिन् राजन्महाक्रतौ। न तत्र पशुघातोऽभूत् स राजैवं स्थितोऽभवत् ।।१०।। उस यज्ञ में सामग्री तो विपुल थी, वहाँ पर किसी तरह की पशु हत्या नहीं हुई। ~ महाभारत शांतिपर्व

वहाँ पर किसी तरह का पशुघात, पशुहत्या नहीं हुई और यही असली अश्वमेध है, क्योंकि अश्वमेध का मतलब है जो तुम्हारे भीतर भौतिक वासना की शक्तियाँ बैठी हुई हैं, उनकी कुर्बानी करना, उनकी आहुति दे देना, उनकी बलि दे देना। और ऐसे अश्वमेध, बड़े-से-बड़े अश्वमेध हुए हैं जिसमें कि घोड़ा क्या चींटी तक नहीं मारी गयी। और उनका साफ़ उल्लेख हमें अपने धर्मग्रंथों में मिलता है।

अश्वमेध-पर्व में देखो क्या आता है। तुम्हें लगेगा कि आज कोई ये बात बोल रहा है।

पशुओं को मारकर, खून-खच्चर मचाकर यदि कोई स्वर्ग जाएगा, तो फिर नर्क कौन जाएगा? ~ अश्वमेध-पर्व

लगभग वही बात जो भीष्म युधिष्ठिर से कह रहे थे, क्या? पशुओं को मारकर, खून-खच्चर करके यदि कोई स्वर्ग जाएगा तो फिर नर्क कौन जाएगा?

अब पुराणों पर आते हैं। पुराणों को भी यदि वेदान्त की दृष्टि में पढ़ा जाए, उनके प्रतीकों को यदि सही तरीक़े से समझा जाए, तो वहाँ बहुत कुछ है सीखने को। कुछ उदाहरण पुराण से लेंगे।

ये ममार्चनमित्युक्त्वा प्राणिहिंसनतत्पराः । तत्पूजनं ममामेध्यं यद्योषातदधोगतिः ।। मदर्थे शिव! कुर्वन्ति तामसा जीवघातनम् । आकल्पकोटि निरये तेषां वासो न संशयः ।। यस्तु यज्ञे पशून्हत्वा कुर्याच्छोणितकर्दमान्। श्वपचन्नरके तावद्यावल्लोमानि तस्य वै ।। जानाति को वेद पुराण तत्वं ये कर्मठाः पण्डितमानयुक्ताः । लोकाधमास्ते नरकं पतन्ति कुर्वन्ति मूर्खाः पशुघातनं चेत् ।। शक्ति शिव से: जो लोग मेरी पूजा में प्राणियों का वध करते हैं, उनकी पूजा अपवित्र है। ऐसी हिंसा से पतन ही होगा। हे शिव! तामसिक लोग ही ऐसा करते हैं। पशु हत्या करने वालों का करोड़ों कल्पों तक नर्क में वास होता है। वास्तव में अभिमान युक्त कर्मकांडी वेद के मर्म को नहीं समझते। पशुओं की हत्या करने वाले पापी और मूर्ख हैं, और अवश्य नर्क जाते हैं। ~ पद्म पुराण, पद्म उत्तरखंड

पद्मपुराण से लेते है जहाँ शक्ति शिव को संबोधित करके कह रही हैं, पार्वती शिव से कह रही हैं कि जो लोग मेरी पूजा में प्राणियों का वध करते हैं, उनकी पूजा अपवित्र है; जो लोग पूजा में प्राणियों का वध करते हैं उनकी पूजा अपवित्र है। ये बात पार्वती शिव से कह रही हैं, माने शक्ति शिव से कह रही है, ठीक है? और कितने खेद की बात है कि सबसे ज़्यादा पशुबलि, देवी शक्ति के ही नाम पर ही दी जाती है।

प्र: यहाँ पर वो खुला ही कह रही हैं कि जो भी तुम पूजा कर रहे हो…

आचार्य: पूज रहे हो मुझे और बलि दे रहे हो मेरे नाम पर, ये बिलकुल अपवित्र काम तुम कर रहे हो।

आज भी देश में देखो — बंगाल में, उड़ीसा में, उत्तरांचल में, हिमाचल में और झारखण्ड और छत्तीसगढ़ के कुछ क्षेत्रों में, राजस्थान में कहीं-कहीं, यहाँ अभी भी बहुत अंधविश्वास है। विशेषकर बंगाल और असम में तो यह खूब चलता है कि देवी के सामने बलि दी जा रही है। कहीं-कहीं तो साल भर दी जाती है, प्रतिदिन दी जाती है। तुम उन मंदिरों में जाओ तो तुमको लगेगा, ‘ये मंदिर है या कसाईखाना है; ये क्या चल रहा है ये!’

और उस बात को पुराणों में स्वयं देवी शक्ति के मुख से संबोधित किया जा चुका है, उसकी निंदा की जा चुकी है। देखो, क्या कह रही हैं देवी। देवी शिव से कह रही हैं — जो लोग मेरी पूजा में प्राणियों का वध करते हैं, उनकी पूजा अपवित्र है। ऐसी हिंसा से तो पतन ही होगा। जो ऐसी हिंसा कर रहा है, वो उठेगा नहीं, गिरेगा ही। हे शिव! तामसिक लोग ही ऐसा करते हैं। पशुहत्या करने वालों का करोड़ों कल्पों तक नर्क में वास होता है।

यह स्वयं शक्ति कह रही हैं कि पशुहत्या करने वालों का करोड़ों कल्पों तक नर्क में वास होता है। "वास्तव में, अभिमानयुक्त कर्मकांडी, वेद के मर्म को नहीं समझते।" ये जो लोग हैं जो बस कर्मकांड को पकड़े रहते हैं, वेद के मर्म को नहीं समझते। वेद का मर्म क्या है? वेदान्त। वही वेद का मूल दर्शन है। "वास्तव में अभिमानयुक्त कर्मकांडी, वेद के मर्म को नहीं समझते। पशुओं की हत्या करने वाले पापी और मूर्ख हैं और अवश्य नर्क जाते हैं।" ये हिंदुओं के पुराण कह रहे हैं। आप बताओ हिन्दुओं के धर्मग्रंथ क्या पशुओं की हत्या का समर्थन करते हैं? "पशुओं की हत्या करने वाले, पापी और मूर्ख हैं और अवश्य नर्क जाते हैं।" ठीक है?

भागवत उद्धृत कर रहा हूँ:

हे राजा! तेरे यज्ञ में इतने पशु निर्दयतापूर्वक मारे गये। वे तेरी क्रूरता को याद करते, क्रोध में भरे, तुझे काटने को तैयार बैठे हैं।

इससे दो बातें पता चल रही हैं। ऋषि संबोधित कर रहे हैं राजा को, तो ऋषि तो राजा को बता रहे हैं कि तूने जो ये यज्ञ किया है, तूने बहुत पशु काट दिए और वो सारे पशु तैयार बैठे हैं बदला लेने को; लेकिन इससे भी पता चल रहा है कि राजा ऐसा किया करते थे कि यज्ञ में पशु वग़ैरह खूब काट देते थे। अब राजा यहाँ समाज के प्रतीक हैं। राजा प्रतीक हैं कि समाज में क्या चल रहा था और शक्तिशाली लोग क्या कर रहे थे। जिस किसी की ताक़त थी कि जानवर इकट्ठा करूँगा, जानवर खरीद लूँगा और जानवर खरीद के काट दूँगा, वो ऐसा कर रहे थे।

लेकिन ऋषि क्या कह रहे हैं उनको? कि राजा, तूने ये जो किया है इसका तू भुगतान करेगा, खामियाजा भुगतेगा। जितनो को तूने काटा है, वो सब तैयार बैठे हैं, वो तेरा काटेंगे।

अब इसमें तुम्हें, कबीर साहब की वो बात याद आ रही होगी: ‘जाका गला तुम काटिहो, सो फिर काटै तुम्हार।‘ ये जो तुम जिनका गला काट रहे हो न, उनका नहीं, अपना ही गला काट रहे हो। और ये बात भी बहुत सूक्ष्म है, क्योंकि जब तुम हिंसा करने लग जाते हो न जानवरों के लिए, तो तुम भीतर से कठोर हो जाते हो; तुम्हारी मनुष्यता मर जाती है। देवत्व तो छोड़ दो, तुममें मनुष्यता भी नहीं बचती साधारण। और फिर जैसे तुम कठोर हो पशुओं को ले करके, वैसे ही तुम कठोर हो जाते हो सबको ले करके; अपने बच्चे को ले करके, अपने परिवार को लेकर के, पूरे समाज को ले करके और अपने प्रति भी तुम बड़े ही कठोर हो जाते हो। तुममें कोई आत्मप्रेम नहीं बचता, तुम अपनी ही फिर भलाई नहीं कर पाते, तुम बहुत निर्ममता से फिर अपने ही हित का दमन कर देते हो।

तं यज्ञपशवोऽनेन संज्ञता येऽदयालुना । कुठारैश्चिच्छिदुः क्रुद्धाः स्मरन्तोऽमीवमस्य तत् ।। इस दयाहीन ने जो यज्ञ में पशुवध किया था, वही पशु क्रोध में आकर अपनी हत्या को याद करते हुए, उसको कुलहाड़ो से छिन्न-भिन्न करने लगे। ~ भागवत ४/२८/२६

ये आगे कहा गया है। राजा ने ये जो पशुओं की हत्या की थी, बाद में वही पशु — अब ये काल्पनिक बात है, ऐसा नहीं कि पशु आएँगे और करेंगे। ये प्रतीक के तौर पर कहा गया है। लेकिन समझाया यही गया है कि जिसको तुमने काटा है न, वो तुम्हें काटने आएगा। ये कर्मफल की बात है। ये बात इसकी है कि तुम जो कुछ कर रहे हो, वो तुम्हें भीतर से बदल देता है। तो तुम्हें फल तो मिल ही गया न? जिस कुल्हाड़ी से तुमने पशु को काटा है, उसी कुल्हाड़ी से तुमने अपने भीतर की सारी कोमलता को काट दिया, सारी संवेदनशीलता अपनी तुमने काट डाली।

जो मनुष्य यज्ञ, श्राद्ध और धर्म के नाम पर पशुवध करते हैं, वे वास्तव में बस मांस के लोभ से ऐसा करते हैं, और वे निश्चय ही छली-कपटी हैं। ~ भागवत ११/२१/३०

पौराणिक उत्तर। जो मनुष्य यज्ञ में, चाहे श्राद्ध में, चाहे धर्म के नाम पर, त्योहार उत्सव के नाम पर पशुहत्या करते हैं, वो वास्तव में बस मांस के लोभी हैं, स्वाद के लोभी हैं और झूठे इतने है कि मानेंगे नहीं कि ये सब कुछ या तो वो अज्ञान के कारण कर रहे हैं, या स्वाद के कारण कर रहे हैं या दोनों के कारण; ज्ञान भी है और स्वाद का लोभ भी है। तो वो छली हैं, कपटी हैं और वो इस बात का फिर पाप भी भुगतते हैं आगे चलकर के।

अब ये वक्तव्य सुनना तुम। इसकी सहजता देखो, सरलता देखो, सिधाई देखो और इसमें कितना संतत्व है, इस बात में देखना।

सारे वेद, सारे यज्ञ, सारा तप, सारा दान, उस इंसान के सामने कुछ भी नहीं है, जो जीवों को अभय प्रदान करके जीवों की रक्षा करता है। ~ भागवत पुराण ३/३/७

वेद भी उस व्यक्ति के सामने कुछ नहीं है; दान भी उसके सामने कुछ नहीं है; यज्ञ उसके सामने कुछ नहीं है, तप उसके सामने कुछ नहीं। किस इंसान के सामने कुछ नहीं? जो जीवों को अभय देता।

अभय माने? तुम्हें छोड़ा, तुम्हें नहीं मारूँगा। जो इंसान जीवों पर दया करता है, उसके सारे यज्ञ, तप, दान, ज्ञान सब सफ़ल हो गए। उसने कुछ ऐसा कर दिया जो हर तरह के तप, यज्ञ, ध्यान, ज्ञान साधना इन सबसे ऊपर की बात है। उसने अभयदान दे दिया पशुओं को, उस व्यक्ति से ऊपर कोई नहीं होता।

अब बताओ कौन लोग हैं जो इस तरह की बातें फैला रहे हैं कि हिंदुओं के धर्म ग्रंथों में पशुओं की हत्या स्वीकृत है?

जो कभी भी किसी पशु का मांस नहीं खाता, उसे स्वर्ग में उत्तम स्थान मिलता है। पर यदि वह मांस खाता है, तो उसके सारे जप होम, साधना, तीर्थ, ज्ञान व्यर्थ हैं। ~ विष्णु पुराण

"जो व्यक्ति किसी भी पशु का मांस खाता है, उसका ज्ञान, तीर्थ, जप, साधना, होम, तप सब व्यर्थ है।"

सब कुछ व्यर्थ हो जाता है, बस एक बात से — अगर तुमने किसी पशु को हिंसा कर दी, क्रूरता कर दी, उसका मांस खाने लग गये तो।

नारद हैं, विष्णु पुराण में, कह रहे हैं:

जिस धर्म में मांस और मदिरा का विधान है, वह धर्म केवल नर्क है। ~ विष्णु पुराण

ऐसा धर्म जिसमें मांस और मदिरा, स्वीकृत है, विधि की तरह इस्तेमाल होते हैं, ऐसा धर्म सिर्फ़ नर्क है।

श्रुति (वेद-वेदान्त) माँ की तरह सब प्राणियों की भलाई का उपदेश करती हैं, वह किसी जाति या प्राणी के वध की आज्ञा नहीं देती। ~ नारद पंचरात्र

वेद-वेदान्त माँ की तरह हैं; वो सबकी भलाई का उपदेश करते हैं; वो किसी भी जीव के वध की आज्ञा बिलकुल भी नहीं दे सकते।

बलि का अर्थ समझना साफ़-साफ़। बलि का अर्थ है अर्पण करना। बलि लगभग ऐसा ही है जैसे त्याग, ठीक है? बलि ऐसा है जैसे भेंट; बलि को ऐसे भी कह सकते हो जैसे प्रेम का उपहार। लेकिन बलि का अर्थ किसी की हत्या नहीं है कभी भी। धर्म के क्षेत्र में बलि का अर्थ हत्या नहीं हो सकता है। धर्मग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि श्राद्ध कर्म में, गो बलि करनी है, कुक्कुट बलि करनी है, काकबली, पिपीलिका बलि। इससे बलि का तुम्हें एक और बड़ा सुंदर अर्थ पता चलेगा — पिपीलिका माने जानते हो क्या होता है? चींटी।

तो क्या धर्म ये कह रहा है कि श्राद्ध में चींटी की बलि दो? यहाँ पर बलि का अर्थ है भेंट। इसका अर्थ है, ये सारे प्राणी हैं न, इन सबको आहार दो। चींटियों को कोई ऐसी चीज़ डाल दो, आटा डाल दो, कुछ डाल दो जिसको वो खा लें। चींटी की बलि नहीं देनी है। पिपीलिका माने चींटी की बलि नहीं हो गया।

तो इसी तरीक़े से गोबलि माने गो की बलि नहीं हो गया; गाय को कुछ खिला दो। कुक्कुट बलि माने मुर्गे की बलि नहीं हो गया, मुर्गे को कुछ खिला दो। अजबलि माने बकरे की बलि नहीं हो गया, उससे बकरे को कुछ खिला दो; बकरे को खा नहीं लो। बकरी को कुछ खिला दो, ये है बलि।

और भी बहुत-बहुत सारे उदाहरण हैं। मैं तो समय के अभाव में कुछ ही बातें कह पाया, जो मुझे याद आयीं और जो मैं लिख पाया था। अगर इसमें और रुचि रखते हैं और जानना है तो गायत्री शक्तिपीठ के आचार्य श्रीराम शर्मा की बहुत छोटी सी पुस्तक है, 'पशुबलि' नाम की। मैं आग्रह करूँगा कि उसको आप लोग पढ़ें। उसमें और विस्तार में और बहुत उदाहरणों के साथ उन्होंने समझाया है और सिद्ध किया है कि सनातन धर्म में पशु बलि के लिए कोई स्थान नहीं है। बल्कि अपने देवी-देवताओं के सामने पशुबलि अगर आप दे रहे हो तो ये देवी-देवताओं का अपमान है, देवत्व के नाम पर कलंक है।

प्र: आचार्य जी, एक मित्र हैं हमारे। उनसे बात हो रही थी बकरा ईद को लेकर कि पशुओं की बलि चढ़ाई जाती है। उनका कहना था कि जैसे अल्लाह ने परीक्षा ली थी कि उनके जो पैगंबर हैं, वो अल्लाह को सबसे ज़्यादा चाहते हैं या नहीं चाहते हैं। तो उनके जो बेटे थे, उनके पुत्र थे, उनकी आहुति माँग ली थी। तो उस चीज़ के लिए वो मान गए थे। उन्होंने बोला था कि अल्लाह से ऊपर मेरे लिए कुछ नहीं, अल्लाह के ही प्रेम के लिए मैं…

आचार्य: वो बहुत सुन्दर कहानी है, मैं जानता हूँ।

प्र: तो इसी बात को, इसी त्यौहार को मनाने के लिए कहते हैं कि ये पशुओं की बलि चढ़ाते हैं।

आचार्य: नहीं तो। वो जो घटना घटी थी, जिसमें बहुत ऊँचे मूल्य प्रस्तुत किए जा रहे थे, कि अल्लाह से ऊपर कोई नहीं है और अल्लाह के लिए, माने जो सत्य है, जो एक असली मालिक है, उसके लिए मैं देह के रिश्तों की आहुति देने को तैयार हूँ। तो उन्होंने कहा, ठीक है, मैं अपने बेटे की कुर्बानी दे देता हूँ।

प्र: इसी बात को वो सेलिब्रेट करते हैं, कहते हैं कि…

आचार्य: तो इसमें, बकरा कहाँ से आ गया?

प्र: उनका कहना है कि बकरा को पाल पोसकर बड़ा करते हैं, उनके साथ जो समय बीतता है, तो उससे उन्हें थोड़ा लगाव हो जाता है, अटैचमेंट हो जाता है। तब उन्हें उस अटैचमेंट को पीछे रखकर अल्लाह को बलि देनी होती है। तो वो भी वही चीज़ रिपीट कर रहे हैं।

आचार्य: कैसे? मैं बिलकुल समझ रहा हूँ ये बहुत ऊँची बात है, अटैचमेंट , माने मोह। मोह के पार जाना आध्यात्मिक साधना में बहुत ज़रूरी होता है और बहुत अच्छी बात है, सहमत हूँ मैं। पर अगर आपको मोह ही त्यागना है, तो उसके लिए बाज़ार से खरीद करके एक बकरा लाओ, फिर कुछ दिनों तक उसको रखो और फिर उसको काट दो; इससे मोह का त्याग कहाँ हो पा रहा है? भई, आपका मोह तो पहले से ही सौ चीज़ों से लगा हुआ है, उनको त्यागिए न।

आप बकरीद से दस-बीस दिन पहले एक बकरा बाज़ार से ले आते हैं, उससे आपका कितना मोह बन जाएगा? ईमानदारी से पूछ रहा हूँ, ठीक है न? ये कहना कि नहीं, उसे बहुत लाड़-प्यार से रखते हैं, प्रेम से रखते हैं, खिलाते-पिलाते हैं, तो हमारा उससे मोह या अटैचमेंट हो जाता है, फिर उसे काट देते हैं।

ये देखिए कोई बहुत ये सही बात हुई नहीं, ईमानदारी की, है न? क्योंकि मोह तो हर इंसान का सबसे होता ही है। अपने बच्चों से मोह होता है, अपनी संपत्ति से मोह होता है, अपनी प्रतिष्ठा से मोह होता है, अपने अतीत से मोह होता है, अपने सपनों से मोह होता है, अपनी इच्छाओं, अपनी कामनाओं से मोह होता है। तो अगर बात यही है कि जिससे आपका मोह है, आपको उसको त्यागना, उसकी कुर्बानी देनी है, तो इन सब चीज़ों से जिससे आपका मोह है, उनकी कुर्बानी दीजिए न।

इनकी कुर्बानी देनी चाहिए। अब बकरे को ला करके ये कहना कि नहीं, बकरे की तो कुर्बानी से अटैचमेंट या मोह कम होता है, यह बात कोई बहुत सुलझी हुई नहीं लग रही है। इस बात में तो यही लग रहा है कि शायद जो असली मकसद है, वो बस एक रूढ़ी का पालन करना है। इसमें चैतन्य दर्शन, इसमें बोध के साथ एक आध्यात्मिक दृष्टि का अभाव दिख रहा है मुझे।

प्र: साथ ही साथ, उनका ये भी कहना है कि जिन बकरों की बलि चढ़ती है, उससे गरीबों का पेट पाला जाता है। उनके साथ उनका मांस बाँटा जाता है।

आचार्य: यहाँ फिर मानता हूँ कि गरीबों का पेट भरना यदि मकसद हो तो ये बहुत अच्छा मकसद है। पर गरीबों का यदि पेट ही भरना है तो वो तो सौ चीज़ों से भर सकता है। उसके लिए एक बेज़ुबान, निहत्थे, कमज़ोर जानवर की बलि देने की क्या ज़रूरत है?

जितने में आप बकरा लेकर के आए, जितना आपने उसे खिलाया पिलाया — काफ़ी पैसा लगता है, मांस सस्ता नहीं आता है — उतने में तो आप बहुत सारी शाक-सब्जियों, फल, गरीबों में बाँट सकते थे। गरीबों में बहुत कुछ बँट जाता है। उसके बाद, गरीबों में वो पूरा नहीं बाँटा जाता; उसका एक हिस्सा बाँटा जाता है, लगभग एक तिहाई होता है जो गरीबों को दे दिया जाता है। बाकी तो स्वयं ही खाया जाता है न? इसमें कौनसा ऊँचा मूल्य है? मैं आग्रह करूँगा कि हम सब इस पर विचार करें कि आप एक जानवर को लेकर के आये हैं और फिर आप कह रहें है आपका उससे मोह हो गया है, फिर आप उसका मांस खा रहें हैं, इसमें मुझे कोई ऊँचा मूल्य दिखाई नहीं दे रहा है।

ईद का त्यौहार किसी बहुत ऊँचे दर्शन, किसी बहुत ऊँचे मूल्य की स्मृति में है। वो बात बहुत ऊँची थी कि एक व्यक्ति कह रहा है कि मैं अल्लाह के लिए अपने बेटे तक को त्यागने को तैयार हो गया। हमें वो बात याद रखनी चाहिए न, कि सच्चाई के लिए मैं किसी से मोह नहीं रखूँगा, चाहे मेरा घर हो, चाहे मेरा परिवार हो, मेरा बेटा हो, मेरी बेटी हो, मेरी पत्नी हो, मेरा पति हो, मेरी प्रतिष्ठा हो, मेरी मान्यताएँ हो, जो भी चीज़ मैं कीमती समझता हूँ, वो चीज़ अल्लाह के सामने छोटी है।

अगर यह मान्यता रखी जाए तब तो ईद सफ़ल हुई; पर अगर ईद कुल इतनी सी हो गयी है कि आप एक पशु का वध कर रहे हैं, तो मेरी दृष्टि में तो इसमें कोई धार्मिक आयाम, कोई आध्यात्मिक कोण हुआ ही नहीं।

देखिए, धर्म वो ताक़त है जो हमें ऊँचे से ऊँचा उठा सकती है। और जब मैं धर्म की बात कर रहा हूँ तो मेरा मतलब हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई आदि से नहीं है। मेरा मतलब मूल धार्मिकता, एसेंशियल रीलीजियोसिटी से है। कृपा करके धर्म को विकृत मत करिए। धर्म के नाम पर पशुहत्या, जानवरों की कुर्बानी, इस तरह पशु बलि देना, चाहे मंदिर हो, चाहे मस्जिद हो, चाहे कुछ भी हो; कोई ऊपरी शक्ति, कोई देवी-देवता नहीं प्रसन्न होने वाला अगर उसके बेज़ुबान, नन्हें प्राणियों को आप क़त्ल कर देते हैं तो।

ये सब बहुत पुरानी दकियानूसी मान्यताएँ हैं। धर्म आपको मान्यताओं के साथ चलना नहीं सिखाता, धर्म आपको सच के साथ, हक के साथ चलना सिखाता है न? तो ये मत कहिए कि ये तो हमारी पुरानी रवायत है, ये तो हमारी पुरानी परंपरा है, इसको तो हम कैसे छोड़ देंगे? परंपरा का धर्म में बहुत महत्व नहीं होता। धर्म में सत्य का महत्व होता है। धर्म में अनासक्ति का महत्त्व होता है। सच्चाई जहाँ दिखे उधर को जाइए, यही धार्मिकता है, बस।

प्र: आपको अभी मैं सुन रहा था, तो मुझे तो इसी बात की बहुत हैरानी हो रही थी कि हर जगह एक ही बात, बार-बार, बार-बार, बार-बार बताने के बावजूद भी यह वृत्ति जो आदमी की है, जो पाशविक वृत्ति है माँस खाने की, वो जैसे हाथ में नहीं आ रही।

आचार्य: हम भी जानवर हैं न। और हम ऐसे जानवर हैं जिसको जानवर का मांस कुछ-कुछ करके पच भी जाता है। फिर उसमें खूब मसाला-वसाला मिलाकर खाओ तो स्वाद आता है। और किसी की हत्या करने में जो एक राक्षसी सुख मिलता है, उसकी तो बात ही क्या कहनी!

तो इसीलिए, आज से नहीं हज़ारों साल से धर्म के नाम पर पशुओं की हत्या चलती रही है — कभी यज्ञ के नाम पर, कभी चढ़ावा बोल करके, कभी इस देवी को खुश करने के लिए, कभी उस देवताओं को खुश करने के लिए। तुम सोचो कितनी ज़्यादा थी। हमने कहा था न कि बौद्ध और जैन, दो नई धाराओं को ही प्रकट होना पड़ा अहिंसा को केंद्र में रख करके।

तो इंसान हमेशा से ऐसा ही रहा है, उपद्रवी। और धर्म ने बहुत कोशिश की है समझाने की, कि अहिंसा, अहिंसा, अहिंसा। लेकिन इंसान के भीतर का राक्षस मानता ही नहीं है। तब नहीं मानता था, तो कोई बात नहीं, लेकिन अब हम महाविनाश के बहुत निकट पहुँच चुके हैं। अगर हम आज भी नहीं सुधरे, तो जानवरों का तो जो हश्र हो रहा है वो हो ही रहा है, इंसान के लिए अब कोई भविष्य नहीं बचा है। असल में इंसान की आज जो दुर्दशा है, उस दुर्दशा की बड़ी से बड़ी ज़िम्मेदारी, उस क्रूरता की है जो हमने प्रकृति के साथ करी है।

प्रकृति में सब पशु आ जाते हैं। और पशुओं के साथ हमने जो बर्बरता करी है, वही आज हमें महाविनाश तक ले आयी है। और प्रकृति के साथ सही सम्बन्ध रख के, करुणा और सम्मान का सम्बन्ध रखकर ही हम महाविनाश से बच सकते हैं। इसके अलावा कोई रास्ता भी नहीं है। अगर आज भी हम पशुओं के लिए क्रूरता, बर्बरता ही रखते हैं, तो हमें फिर महाविनाश से कोई नहीं बचा सकता। और बहुत दूर नहीं है, हममें से ज़्यादातर लोग अपने जीवनकाल में ही ऐसी आपदाएँ देखेंगे जिनके बारे में कल्पना भी करो तो भयानक है।

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