जंगलों की कटाई, पेड़-पशुओं की प्रजातियों का विलुप्त होना, प्लास्टिक से सागर भर जाना—ये सब हमारे भीतर की हिंसा और बर्बादी का प्रतिबिंब हैं। जब तक इंसान के भीतर की सफ़ाई नहीं होगी, पर्यावरण की तबाही नहीं रुकेगी। बाहरी स्वच्छता, आंतरिक स्वच्छता की छाया है। अगर 1% लोग जागरूक हो जाएँ, तो ये 99% अपने आप ठीक हो जाएँगे क्योंकि ये जिधर हवा बहेगी, उधर ही बह निकलेंगे। इसलिए बस 1% जागरूक लोग चाहिए जो दिशा तय करें।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम आपको। मेरा पहला शिविर है और देहरादून से आया हूं मैं। चार महीने से सुन रहा हूं आपके वीडियो—काफी अच्छा लग रहा है। एक प्रश्न चल रहा है मन में कि मानसिक पर्यावरण पे तो आपने बहुत कुछ बोला है—मन खराब होता है, कुछ भी खराब होता है। लेकिन जो बाकी दूसरे पर्यावरण से काफी नुकसान हो रहा है, जैसे सपोज प्लास्टिक हो गया, पानी की बहुत मिसयूज होती है, पेड़ों की बहुत कटाई होती है… और आपके इतने फॉलोवर्स हैं। तो मैसेज थोड़ा आप इस बारे में भी थोड़ा बहुत अगर कह दें…
आचार्य प्रशांत: इसमें भी बोला है। खूब बोला है।
प्रश्नकर्ता: मैंने शायद सुना नहीं होगा।
आचार्य प्रशांत: हाँ हाँ, खूब बोला है! मैं फिर बोले देता हूं। अच्छा हुआ आपने प्रश्न उठाया। देखिए, हम बाहर जो कर रहे हैं ना, वो भीतरी माहौल का ही एक प्रतिबिंब होता है। भीतर जो है, वह छुपा रह जाता है। हम कह देते हैं, "हम बड़े साफ लोग हैं।" क्यों? मुंह साफ है, हाथ साफ है, कपड़े साफ हैं, तो हम कह देते हैं "हम साफ लोग हैं।"




