नीयत साफ़ रखो, जितना हो सके आगे बढ़ो || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: शत-शत नमन, आचार्य जी। आचार्य जी, मुझे इतना समझ आना शुरू हुआ है कि गीता ज़िन्दगी में उतरनी चाहिए। इसके लिए जीवन गीता के अनुरूप होना चाहिए, तभी गीता समझ आती है। आप मुझे पिछले दो-तीन माह से मार्गदर्शन कर रहे हैं।
अपने रिश्तों को सुधारने की कोशिश की, ख़ास तौर पर अपनी पत्नी के साथ रिश्तों को। उसमें आपने बहुत मार्गदर्शन किया मेरा। काफ़ी हद तक दिखना शुरू हुआ है कि जीवन में कैसे हो रही हैं चीज़ें। आपने समझाया कि जीवन का रोल (भूमिका) सही चुनना है।
आपने कहा था मुझे कि 'सर्वपति' नहीं, 'गुरुपति' बनना है। और मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि रिश्तों में मैं बहुत संभल गया हूँ। और जो ज्ञान मैंने आपसे लिया है, वो अपने व्यवसाय, अपनी नौकरी और सबमें ले जाना चाहता हूँ।
उस समय चुनाव था कि पत्नी आए, बच्चे आएँ; अब उनकी ज़िम्मेदारी है। नौकरी करनी है क्योंकि बच्चों के स्कूल की फ़ीस है, हर महीने की पत्नी की ज़रूरतें हैं। तो लगता है कि नौकरी करना तो ज़रूरी है। एकदम से मैं उसको छोड़कर कोई और काम नहीं शुरू कर सकता। तो क्या जो मैं अपने लिए सोच रहा हूँ वो सही है?
क्योंकि मैं वो एकदम से नहीं कर सकता तो उसकी मुझे तैयारी धीरे-धीरे करनी है। क्योंकि सही रोल चुनना ज़रूरी है। इतना समझ आ गया है कि ज्ञान तभी जीवन में उतरेगा। उसकी शुरुआत करने का तरीक़ा तत्काल तो मुझे नहीं दिख रहा है। तो उसमें आपका मार्गदर्शन चाहिए कि कैसे जाया जाए।
क्योंकि मुक्ति व्यक्तिगत नहीं है, आपने ही समझाया है कई बार। और वो इस चीज़ को इतना नहीं समझते कि मेरे इस निर्णय का समर्थन करें। और हमने अपने घर के ख़र्चे और सब कुछ इतना बढ़ा रखा है कि मुझे एक



