आचार्य प्रशांत: तो जो हमारा औपचारिक नववर्ष होता है उसकी शुरुआत मैं आपसे बात करके कर पाऊँ। बाक़ी बहुत मीठा बोलना मुझे आता नहीं है लेकिन बस इतना ही कह सकता हूँ कि अच्छा लग रहा है। धन्यवाद!
हाँ, क्या कह रहे थे उदित?
प्रश्नकर्ता: सर, आज के सत्र की शुरुआत मैं एक ऐसे सवाल से करना चाहूँगा जो कल से ही मेरे मन में दौड़ रहा है। मैं देख रहा हूँ कि नये को लेकर हमारे भीतर एक बहुत अलग सी आकांक्षा है। और उसके मुझे दो पक्ष दिखाई देते हैं।
एक पक्ष तो वो है जो इस नये साल को मनाना चाहता है, जो कल से ही अलग-अलग जगहों पर पार्टीज कर रहा है, घूम रहा है, हुड़दंग मचा रहा है, सब कुछ कर रहा है। कई जगहों पर पुलिस तक को बुलाना पड़ गया हुल्लड़ को कंट्रोल करने के लिए, नियंत्रित के लिए।
दूसरी ओर एक वो पक्ष भी है जो कहता है कि ये जो ग्रेगोरियन कैलेंडर (ग्रेगोरियन पंचांग) है जिसका नव वर्ष हम अभी मना रहे हैं, वो नहीं, हम जो भारतीय संस्कृति में शक संवत या विक्रम संवत होता है उसका नया साल हम मनाएँगे। पर मैं देख रहा हूँ साझी बात यह है कि दोनों ही नया साल मनाना चाहते हैं। तो नया क्या है?
आचार्य: बहुत बढ़िया मुद्दे से शुरुआत करी है कि एक तरफ़ लोग हैं—और अधिकांश लोग हम भारत की अगर बात करें—जो कि आज नया साल मना रहे हैं और बिलकुल ठीक कह रहे हो कल काफ़ी ज़बरदस्त नज़ारा था। पुलिस बहुत सतर्क होकर घूम रही थी। उत्सव तो पता नहीं, पर हुड़दंग पूरा था।










