आजकल बड़ा फ़ैशन बन गया है। लोग कहते हैं, ‘मैं मंदिर नहीं जाता, ये मूर्ति-पूजा वगैरह हम नहीं जानते।’ ये दंभ है, कोरा अहंकार है। मूर्ति की बड़ी उपयोगिता है। मूर्ति-पूजा बंद कर देने का अधिकार सिर्फ़ उसको है, जिसने अपने-आप को मूर्ति मानना बंद कर दिया हो। आस्तिक भी मूर्ति-पूजक है, नास्तिक भी मूर्ति-पूजक है। आवश्यक यह है कि तुम ऐसी मूर्ति चुनो, जो वास्तव में तुम्हें अमूर्त में प्रविष्ट करवा दे।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: हमने सुना है कि ये मूर्तिपूजा जो है ये प्राथमिक सीढ़ी है, प्रारम्भिक एक स्थान है। उसके के बाद हमें आगे बढ़ जाना चाहिए उसको छोड़कर के। तो अभी भी हम उसको जीवन भर ढोते रहते हैं, कोई जीवन में भी फ़र्क नहीं आ रहा है।
जब हमें बोध हो गया तो हमें तो बच्चों को उड़के आगे की चीज़ बतानी चाहिए।
आचार्य प्रशांत: क्यों बतानी चाहिए? आपने पीएचडी कर ली, तो आपका बच्चा पैदा होगा तो सीधा उसको पीएचडी कराएँगे? बच्चे को तो पूरी प्रक्रिया से गुज़रना पड़ेगा न? पहली, दूसरी, तीसरी कक्षा। मूर्तिपूजा आरम्भिक चरण हो सकता है, पर उस आरम्भिक चरण से वही आगे बढ़े न, जिसने आरम्भिक परीक्षा उत्तीर्ण कर ली हो। मूर्तिपूजा से आगे बढ़ जाने का अधिकार सबको थोड़े ही होता है, कि जिसको देखो उसको यही कहना शुरू कर दे कि हम मूर्ति में विश्वास नहीं करते।
निन्यानवे प्रतिशत लोगों के लिए साधना के निन्यानवे प्रतिशत काल तक मूर्त का ही पूजन करना आवश्यक है।




