आचार्य प्रशांत: विशाल कालरा है। कह रहे हैं, कुंडलिनी योग में जो सात चक्र होते हैं, उसमें सबसे नीचे, सबसे पहला मूलाधार चक्र होता है। तो मुझे बताएँ ये मूलाधार चक्र क्या है और मैं अपना मूलाधार चक्र मज़बूत कैसे करूँ? क्या ये स्त्री-पुरुष दोनों में पाया जाता है?
मूलाधार चक्र कोई भौतिक या शारीरिक चक्र नहीं है। हालांकि कुंडलिनी योग से संबंधित आपको जितने भी चित्र या मानव शरीर की छवियाँ मिलेंगी, उनमें सबमें नाभी से नीचे और जननांगों से थोड़ा ऊपर आपको मूलाधार चक्र बनाया हुआ मिलेगा। उसको ऐसे मत समझ लीजिएगा कि शरीर में, उस स्थान पर, कोई वास्तव में चक्र इत्यादि होता है। मूलाधार चक्र हमारी प्राकृतिक और पाशविक वास्तविकता का प्रतीक है। वो पहला है, क्योंकि जन्म तो सबका प्रकृति से ही होता है, प्रकृति में ही होता है, वही मूल आधार है हमारी भौतिक, शारीरिक, पार्थिव हस्ती का। इसलिए वो मूल आधार है। अगर उठे नहीं हैं आप जीवन में, तो वो जो मूल आधार है, वही आपके जीवन का केंद्र बनकर रहेगा। अधिकांश लोगों में, समझने के लिए कह देते हैं 99.99% लोगों में जीवन मूलाधार से ही संचालित होता है।
माने अधिकांश लोग जो कुछ भी करते हैं, वो अपनी पाशविक और प्राकृतिक वृत्तियों से संचालित होकर ही करते हैं।
काम वो हो सकता है जो कर रहे हों, वो दिखने में ऊँचा भी लगे। उदाहरण के लिए कोई किसी बड़े व्यापार का मालिक हो सकता है, कोई राजनीति में ऊँचा नेता हो सकता है, कोई कुछ और ऐसा काम कर रहा हो सकता है जो लगे कि “वाह! क्या ऊँचाई पाई है या क्या विस्तार पाया है।“ लेकिन फिर भी ज़्यादा से ज़्यादा संभावना यही है कि वो जो काम है, वो हो किसी प्राकृतिक केंद्र से ही रहा है और इसीलिए वो काम मूलाधार से हो रहा है। प्रकृति को मूलाधार के बराबर मानो, ठीक है।
क्या आशय है मेरा जब मैं कहता हूँ कि कोई काम प्रकृति के केंद्र से हो रहा है? जितने भी गुण हैं, वो सब प्राकृतिक होते हैं। और गुण का अर्थ ही होता है अध्यात्म की भाषा में — अवगुण। हम बोल देते हैं कि सदगुण और अवगुण। लेकिन प्रकृति के गुणों को ही अध्यात्म में दोष या विकार कहते हैं, ठीक है। तो प्रकृति के गुणों में क्या सम्मिलित है? मद, मोह, मात्सर्य, काम, क्रोध, भय, समुचि माया।




