प्रश्नकर्ता आचार्य जी, मुझे मरने से बहुत डर लगता है, निजात कैसे पाऊँ?'
आचार्य प्रशांत: मर जाइए। और कोई तरीका नहीं है। जिसको आप जीवन कहती हैं, वो मृत्यु का डर है। तो मृत्यु का डर तभी हटेगा, जब जीवन हटेगा। समझिए बात को! जीवन की आपकी परिभाषा में ही मृत्यु का डर शामिल है। जीवन की परिभाषा ही मृत्यु के डर को सम्मिलित किए हुए है। इस परिभाषा को ही हटा दीजिए, जीवन को ही हटा दीजिए!
मृत्यु कुछ नहीं है, ग़लत जीवन की छाया है। सही जीवन की मौत होती नहीं और ग़लत जीवन में जीवन नहीं है, मृत्यु मात्र है। जिसे मरने से डर लगता हो वो समझ ले कि वो जी ही ग़लत रहा है।
जीवन की अपनी परिभाषा को ही ग़ौर से देखिए और रगड़कर साफ़ कर दीजिए; जीवन भी चला जाएगा और जीवन के साथ-साथ मृत्यु का डर भी चला जाएगा।
मृत्यु का डर किसको है? मरे हुए को? मुर्दे डर रहे हैं क्या मौत से? कौन डर रहा है? जो अपनेआप को जीवित बोलता है। तो यानि मृत्यु के डर का सीधा सम्बन्ध किस से है? जीवन से है; मृत्यु से तो नहीं। मृत्यु के डर का सम्बन्ध अगर मृत्यु से होता तो मुर्दों को डरना चाहिए था। पर सब कौन डर रहे हैं? जीवित लोग। मतलब जीवन कुछ ऐसा है कि उसमे मौत का, मिटने का, खोने का, छोटे हो जाने का, अपमानित हो जाने का डर समाया हुआ है।
जीवन के इस ढर्रे को तोड़ना होगा। जीवन की परिभाषा को ही स्वास्थ्य देना होगा। सुबह से शाम तक कैसे जी रही हैं? उसमें जितना मोह होगा, उसमें मान-अपमान की जितनी धारणाएँ होंगी, उसमें सूचना, जानकारी, ज्ञान से जितना जुड़ाव होगा, जितने कड़े, सख्त, दृढ़, आपके अभिमत, विचारे होंगे, उतना ज़्यादा आप मौत से डरी हुई रहेंगी।







