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मृत्यु का भय कैसे हटे? सही कर्म क्या? || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
18 min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी कुछ समय से क्षणिक डर, शायद एक क्षण का भी बहुत छोटा-सा हिस्सा होता है लेकिन वो डर इतना भयानक होता है कि पूरा अन्दर तक काँप जाती हूँ। सिर्फ़ एक क्षण, उसके बाद उस चीज़ से कभी डर ही नहीं लगता। लेकिन वो क्षण ऐसा होता है कि बस अब मरे कि तब मरे। वो मतलब, कुछ भी ऐसी चीज़ उठ जाती है। कुछ भी, घर में बैठ-बैठे, कुछ करते हुए, पीते हुए?

आचार्य प्रशांत: क्षणभर को आ रहा है तो यही मान लीजिए कि पुरानी शारीरिक वृत्तियों का ज़ोर है। क्षणिक है तो कोई बात नहीं, हटते-हटते हट जाएगा। पर क्षणभर को जब वो उबाल मारे, तो आप उसको समर्थन मत दे दीजिएगा। क्षणभर को आ गया, इसमें आपका कोई चुनाव नहीं है। ये तो पुरानी वृत्तियाँ हैं जो शरीर में बैठी हुई हैं, वो अपना रूप कभी-कभी दिखा देती हैं।

प्र: नहीं, उसको बढ़ावा कैसे दूँ? वो क्षण तो ऐसा क्षण होता है कि बस, अब तो…?

आचार्य: उसको झेल जाइए। उसको झेल जाइए, उसको किसी तरह का सातत्य मत दे दीजिए, उसको खींच मत दीजिए। जैसे कई दफ़े होता है न कि शरीर में एक दर्द की लहर उठी ज़बरदस्त, और वो बिलकुल प्राण चूस लेती है उस वक़्त जब वो होती है। पर वो होती पाँच से दस सेकंड को ही है। उस वक़्त आपको क्या करना है, आप शोर मचाएँगे, दौड़ लगाएँगे? नहीं, कुछ नहीं करना। उस वक़्त आप बस चुपचाप स्थिर हो जाइए, उसको गुज़र जाने दीजिए।

प्र: आचार्य जी, कंठ सूख जाता है, आवाज ही नहीं निकलती, ज़ोर खूब लगा लेती हूँ फिर भी?

श्रोता: सबसे अच्छा! जैसे जब कहीं चल रहे हों और अचानक से ठंड में अँगूठा कहीं लग जाये, तो वो वाली जो चोट होती है, दर्द चढ़ता है फिर पाँच सेकंड में उतर जाता है। लेकिन इसमें, वो जैसे कह रही हैं कि इसमें तो पता होता है कि ये चला जाएगा क्योंकि ये फिज़िकल पेन (शारीरिक दर्द) है, चोट है। उसमें पता नहीं, वो हर बार शक के साथ आता है। वो ओपन-एंडेड (खुला) होता है, नहीं गया तो?

आचार्य: मेरे साथ अब कई दफ़े होने लगा है। सत्र ले रहा होता हूँ, बैठा हूँ आपके सामने, बहुत देर निरंतर बैठा हूँ तीन-घंटे चार-घंटे; क्रैम्प (ऐंठन) आ जाएगा। तो मैं क्या करूँ? मैं बोलता जाता हूँ। या अधिक-से-अधिक थोड़ी देर को ऐसे बैठ जाऊँगा और ऐसे (नज़र टिकाकर) देखूँगा। जिसको देख रहा हूँ उसको लगता है कुछ दृष्टिपात इत्यादि कर रहे हैं (सब हँसते हैं)। उनको पता भी नहीं चलता कि कुछ नहीं है, अभी...।

प्र: हमको तो ऐसा लगता है कि आप स्नेहवश देख रहे हैं।

आचार्य: स्नेहवश देख रहे हैं!

श्रोता: आचार्य जी, एक बार तो आपके कुर्ते में ही मतलब — आपने हमें नहीं बताया था — देखा था कि सेशन (सत्र) के दौरान ही कीड़ा चला गया था। पूरे सेशन के दौरान काटता रहा। बाद में जब खोला तो देखा, पूरा लाल-लाल हो गया था।

आचार्य: ऐसी चीज़ों पर ध्यान दिया, ऐसी चीज़ों का ज़िक्र किया तो उनको प्रोत्साहन मिल जाता है, उद्दीपन मिल जाता है।

जैसे कोई छोटा बच्चा हो, तुम्हारे सामने आकर 'अं-अं-अं-अं' कर रहा है; तुम बैठे अख़बार पढ़ रहे हो, क्या उलझना! तुम्हें पता है वो दो-चार बार पाँव पटकेगा फिर स्वयं ही चला जाएगा। तुम उससे उलझ गये, बातचीत करने लगे, 'हाँ, क्या है, क्यों है? नहीं, ये तो तुम ग़लत कर रहे हो। देखो, ये इस तरह से हमें परेशान करना, तुम्हें दिख नहीं रहा है कि हम अख़बार पढ़ रहे हैं? इस वक़्त तुम्हें इस तरह से नहीं करना चाहिए।'

वो इतने में तो और ...। बात को तूल मिल गया। जो चीज़ ख़ुद ही आधे मिनट में समाप्त हो जानी थी, अब वो आधा घंटा चलेगी।

प्र२: आचार्य जी, डर को कैसे हटाएँ?

आचार्य: सारी रामायण पूरी हो गयी, 'सीता कौन थी'? जितना रिश्ते ग़लत बना रहे हो, मौत से उतना डर रहे हो। तो ग़लत रिश्तों से हटो।

प्र: हाँ, रिश्तों से तो हट गये हैं।

आचार्य: बस यही है। हट नहीं गये, अगर हट गये तो फिर प्रश्न भी हट गया।

प्र: उसके बाद डर नहीं है?

आचार्य: पहले हटोगे या अभी से सवाल दागोगे?

प्र: नहीं, बस पूछ रहा हूँ आपसे।

आचार्य: जो बताया, वो करो।

प्र३: जैसे आपने बताया कि आकाश से सम्बन्ध नहीं होता है हमारा। तो ये इस तरह से है जैसे मैं एक बार कमरे में बैठा हुआ था, स्पीकर के साथ सम्बन्ध था, मोबाइल के साथ, दीवारों के साथ या रिश्तों के साथ। और परेशान होकर जैसे ही मैं बाहर निकला, आँखें बन्द की ऊपर की तरफ़ मुँह उठाकर। दो मिनट के बाद आँखें खोली तो देखा कि दस-बारह पेड़ों को अच्छे से देख रहा हूँ, कैसे वो झूल रहे हैं हवा के साथ। उससे दुविधा जो थी, साथ चली गयी। प्रकाश कई अलग-अलग मात्राओं के अन्दर है। या किसी अलग प्रकार का सम्बन्ध होता है? कैसे सम्बन्ध बना सकते हैं वैसा?

आचार्य: बेटा, इतना कैसे याद रह जाता है तुमको? ये इस बात का लक्षण है कि जीवन में जो करना चाहिए, वो नहीं कर रहे। तुम्हें इस तरह की बातें याद बहुत रह जाती हैं। अपनेआप को तुम कहते हो साधारण मानव, और तुम्हें इस तरह के विलक्षण अनुभव इतने ज़्यादा होते हैं कि 'मैं बैठा था तभी बाहर रोशनियाँ कौंधने लगी, हवाएँ चलने लगी, पेड़ हिलने लगे और पौधों की हरीतिमा अचानक सघन हो गयी।'

अपनेआप को साधारण कहते हो, तुम्हें ऐसे अनुभव होते हैं; तो मुझे तो तुम गुरु बताते हो, मुझे तो लगातार ऐसे ही अनुभव होते रहते होंगे कि मुझे अभी दिख रहा है कि सब देवी-देवता यहाँ नाच रहे हैं। मैं कभी बात करता हूँ इन चीज़ों की? मुझे फ़ुर्सत नहीं है ये बातें करने की। तुम्हें इतनी फ़ुर्सत क्यों है? फ़ुर्सत इसलिए है क्योंकि ख़ाली हो। तो इतनी बातें कर रहे हो, इतनी बातें — रोशनियाँ नाच रही थी, पेड़ और पशु आपस में बात कर रहे थे।

प्र: आचार्य जी, यह एहसास हुआ था।

आचार्य: तुम्हें ये एहसास याद क्यों है? सुरति का क्या मतलब है? सिर्फ़ वो याद रहेगा जो बेशकीमती है, बाक़ी सबकुछ स्मृति में रखना ही नहीं है। और यही तुम्हारी ज़िन्दगी की परेशानी है। जो याद रखने लायक चीज़ें नहीं हैं, वो सब तुमने पकड़कर रखी हुई हैं। क्यों पकड़कर रखी हुई हैं? क्योंकि जो चीज़ तुम्हें याद रखनी चाहिए, उसके साथ तुम बेईमानी कर रहे हो। जो करने लायक़ काम है, जब वो नहीं करोगे तो सब फ़िज़ूल काम मन पर छाये रहेंगे।

अगर आप एक बेईमान जीवन जी रहे हैं तो उसकी पहली और सबसे बड़ी निशानी यह है कि अतीत की फ़िज़ूल स्मृतियाँ आपके लिए बड़ी कीमती रहेंगी। आप बार-बार उनका ज़िक्र करेंगे। आप बार-बार उन्हें पुनर्जीवित करेंगे। छोटी-सी ज़िन्दगी है और करने को काम बहुत बड़ा है। बहुत-बहुत बड़ा काम सामने है। तो फिर तुम मुझे बताओ, तुम्हें अवकाश कैसे मिल जाता है, फ़ुर्सत कैसे मिल जाती है व्यर्थ की चीज़ें याद रखने को?

मैं तो बड़ी हैरत में रहता हूँ, मुझे कई बार लगता है परमात्मा मुझसे ही ख़फ़ा है। जिसको देखो उसे ही पारलौकिक अनुभव होते रहते हैं, मुझे ही नहीं होते। बिलकुल साफ़-सच बता रहा हूँ — मुझे आज तक कोई पारलौकिक अनुभव नहीं हुआ। कि मैं रूह बन गया और मुझे पता नहीं चला कि मैं, मैं हूँ कि मैं पत्थर हूँ, और मैं अपने ही शरीर से बाहर निकलकर कूदने लगा। कभी होता ही नहीं! ज़रूर मैं कुछ पापी किस्म का हूँ!

जितने भी इस तरह के दैवीय अनुभव होते हैं, वो सब तुम्हीं लोगों को होते हैं। और दिन के दर्जन के हिसाब से होते हैं। कोई कहेगा, 'मेरे जिगर में घंटियाँ बजती हैं।' किसी को ध्यान में इंद्रधनुष दिखाई दे रहा है। कोई कह रहा है, 'सुषुप्ति में चला जाता हूँ तो झींगुरों की आवाज़ सुनायी देती है। फ़लाने गुरुजी ने बताया है कि यही तो है — अनहद।'

मज़दूर बनकर जियो, अय्याशी की ज़िन्दगी छोड़ दो बिलकुल। पत्थर पर सिर रखकर सो जाया करो। दिन ऐसा बीता हो कि लेटने से पहले नींद आ जाये। मज़दूर को नहीं फ़ुर्सत होती कि वो इधर-उधर की बात पेलता-ठेलता फिरे। दिनभर मेहनत करो।

प्र: आचार्य जी, ऐसा अनुभव नहीं हुआ था, बस एक विचार आया था कि इनके साथ ही हूँ मैं...।

आचार्य: तुम्हें इस विचार के लिए समय कहाँ से मिला? कहाँ से चुराया समय? जब तुम्हारा एक-एक पल समर्पित होना चाहिए तुम्हारी मुक्ति के अभियान को, तो तुमने समय कहाँ से चुराया इधर-उधर के विचारों के लिए? देखो, मेरे पास आओगे तो मैं तुम्हें फ़ुर्सत वाला अध्यात्म नहीं दूँगा, कि कुछ करो-धरो नहीं, खाली बैठकर के हातिम-ताई के किस्से गढ़ो — उड़नखटोला और जादुई तलवार! ऐसा वाला मेरा अध्यात्म नहीं है।

मेरे पास आओगे तो मैं तो तुम्हें मेहनत-मशक़्क़त बताऊँगा। और वो तुम्हें करनी नहीं है। तुम तो सीधे बताते हो कि 'अरे, पुराने लोग इतनी पूँजी किसके लिए छोड़ गये हैं!' और ये बात ही अधार्मिक है। जो मेहनत नहीं कर सकता, वो साधना क्या करेगा? उसके लिए कौन-सी मुक्ति?

इतनी मज़बूत तुम्हारी ज़ंजीरें हैं, अपनी बेड़ियों को देखो, कितनी मोटी हैं। तुम्हें क्या लग रहा है, वो बिना मेहनत के टूट जाएँगी?

बहुतों को धोखा हो जाता है। आश्रम आते हैं, छोटा-सा आश्रम है। वो सोचकर आते हैं 'अब हम आश्रमवासी हुए, विश्राम रहेगा।' कहते हैं, 'गुरुजी विश्रांति की बहुत बातें करते हैं, तो विश्राम भी रहेगा, शांति भी रहेगी।' यहाँ पहुँचे तो पता चला कि काम कराते हैं, दस-घंटे बारह-घंटे काम ही काम चल रहा है। खाने-पीने, सोने-उठने का कोई ठिकाना ही नहीं।

भाई, ऐसे ही है। मेरे देखे तो जीवन धर्मयुद्ध है, मखमल का बिछौना नहीं मिलना यहाँ।

प्र३: ये युद्ध हमारे अन्दर ही चल रहा है न? अन्दर ही दुर्योधन है, अन्दर ही…?

आचार्य: नहीं, अन्दर नहीं चल रहा है, बाहर चल रहा है। तुम्हारे अन्दर जो चल रहा है, वो तो विलासिता है। युद्ध का मतलब होता है कि ये जिसको तुम ‘अन्दर’ बोलते हो, इसको तोड़ देना है।

तुम ऐसे कह रहे हो कि टीवी के अन्दर चल तो रहा है युद्ध। उस युद्ध में तुम्हारा कहाँ ख़ून गिर रहा है? टीवी में चल रही है महाभारत, बताया तो कि हमारे अंदर ही ...। तुम्हारा वैसे ही है कि टीवी में देख रहे हो, महाभारत चल रही है, दुर्योधन है, उधर कर्ण है, अर्जुन है, भीम है। चल रहा होगा युद्ध, तुम्हारे तो मज़े ही आ रहे हैं न।

मैं उस युद्ध की बात नहीं कर रहा जो टीवी में चलता है; मैं कह रहा हूँ, तुम्हें मैदान में उतरना पड़ेगा। टीवी पर दूसरे का युद्ध देखकर अपना मनोरंजन नहीं करना है; ख़ुद अपना व्यक्तिगत युद्ध लड़ना है। यही स्वधर्म है।

वर्चुअल (काल्पनिक) युद्ध नहीं करना है कि बैठे-बैठे लड़ाई करवा दी। आँख बंद करी और करवा दी लड़ाई। असली लड़ाई लड़नी है जिसमें हड्डियाँ टूटती हैं, ख़ून बहता है, नुक़सान झेलना पड़ता है। अरे, ख़ून नहीं बहा सकते तो कम-से-कम पसीना तो बहाओ, बेटा! तुम तो बस पेट्रोल बहाते हो।

प्र४: आचार्य जी, कल रात हमने कर्म के बारे में बात की। अभी तक तो यही समझ में नहीं आ रहा कि सम्यक कर्म क्या करें?

आचार्य: कल क्यों नहीं पूछा? मुझे नहीं वास्तव में याद रहता कि मैं किस सन्दर्भ में क्या बता रहा था।

प्र: मैंने आपसे पहले प्रश्न किया था कि कर्मफल की इच्छा के बिना तो अब हम से कर्म ही नहीं होता।

आचार्य: ठीक है, याद आ गया! मैंने कहा था कि अभी तुम निष्काम कर्म को छोड़ो, तुम सम्यक कर्म की बात करो। तो क्या नहीं समझ में आ रहा?

प्र: कि सम्यक कर्म हैं कौनसे?

आचार्य: सम्यक कर्म क्या है, ये तुम्हारे मर्ज़ पर निर्भर करता है। मेरे दाएँ हाथ में चोट है और मैं वर्ज़िश करूँ बाएँ हाथ की, तो ये सम्यक कर्म हुआ क्या? जहाँ तकलीफ़ है, जहाँ मर्ज़ है, वहीं उसका उपचार करना पड़ेगा न। तो मुझे फ़िज़ियोथैरेपिस्ट ने बताया कि ऐसा करा करिए, फिर ऐसे करा करिए, फिर ऐसे करा करिए (हाथ को अलग-अलग तरीक़े से मोड़ते हुए) तो ये सम्यक कर्म हुआ। तो सम्यक कर्म क्या है मेरे लिए, ये किस चीज़ पर निर्भर करता है?

श्रोता: जहाँ ज़रूरत है।

आचार्य: कि मुझे तकलीफ़ कहाँ पर है। जहाँ तकलीफ़ है, वहाँ ही तकलीफ़ को हटाने के लिए जो कर्म किया जाए, वो सम्यक कर्म है। तो अब तुम बताओ, तुम्हारी ज़िन्दगी में तकलीफ़ कहाँ है?

प्र: अभी तो... नहीं है।

आचार्य: तकलीफ़ नहीं पता तो फिर कुछ भी करो।

प्र: यही, बस। क्या करें, यही समझ में नहीं आ रहा है।

आचार्य: बेटा, तुम बहुत बड़ी तकलीफ़ में हो। तुम्हें ये ही नहीं पता कि तुम्हारी तकलीफ़ क्या है, इससे बड़ी तकलीफ़ क्या होगी? छोटे बच्चे होते हैं छह महीने के, और वो रो रहे हैं, रो रहे हैं, गला फाड़कर रो रहे हैं और बता नहीं पा रहे कि तकलीफ़ क्या है। तुम्हारी हालत ऐसी है। रो तो रहे ही हो, वो तो चेहरे पर लिखा है। ये नहीं बता रहे, तकलीफ़ कहाँ है।

सबसे पहले ये पता करो कि जीवन में तकलीफ़ कहाँ है। और उसके लिये जितने तरीक़े लगा सकते हो, लगाओ। अपने आसपास वालों से पूछ लो कि 'तुम बताओ, तुम्हें क्या लगता है, मेरी ज़िंदगी में क्या कमी है?' जिनको तुम श्रेष्ठ मानते हो, आदर्श मानते हो, उनसे अपने जीवन की तुलना करके देख लो कि कहाँ पर मुझमें कमी है। कमी तो है ही। बच्चा रो रहा है, इसका मतलब?

प्र: तकलीफ़ है।

आचार्य: तकलीफ़ तो है ही। कहाँ तकलीफ़ है, इसका ज़रा निदान करो, डायग्नोसिस (मूल्यांकन) करो।

प्र: भौतिक चीज़ों से तुलना करें?

आचार्य: भौतिक से भी कर लो, उसमें क्या हुआ! जितने भी तरीक़ों से तुम अपनेआप को परख सकते हो, परखो न। जीवन में उमंग है? जीवन में जोश है? प्रेमपूर्ण हो? निर्भय हो? ये सारे प्रश्न अपनेआप से पूछो। यही सब तो तुमको बताएँगे न कि मन में कहाँ रोग लगा हुआ है। स्वास्थ्य के सूचकों को जानते तो हो, कि नहीं जानते हो?

तुमसे पूछा जाए कि आंतरिक रूप से एक स्वस्थ व्यक्ति कैसा होता है, तो बता दोगे कि नहीं बता दोगे? आंतरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति के कुछ लक्षण बताइए, एक-एक करके बताइएगा। आपसे शुरू करते हैं, पहला लक्षण..? कुछ भी?

श्रोता१: काम के प्रति निर्भय होगा।

आचार्य: निर्भय होगा।

श्रोता२: सेल्फ़-सैटिस्फैक्शन (आत्मसंतुष्टि) होगा उसको।

आचार्य: तृप्त होगा।

श्रोता३: शांत होगा।

आचार्य: शांत होगा।

श्रोता४: क्रोध से दूर रहेगा।

आचार्य: अक्रोध में रहेगा।

श्रोता५: संतुष्ट होगा।

आचार्य: संतुष्ट होगा — तृप्त होगा, उन्होंने बोला ही।

श्रोता६: अत्यंत विचार नहीं करेगा, बहुत विचार।

आचार्य: भीतर उसके विचारों की चक्की नहीं चलेगी।

श्रोता७: निर्भय होगा, डर नहीं लगेगा।

आचार्य: उन्होंने बता दिया।

श्रोता८: प्रेमपूर्ण होगा।

आचार्य: प्रेमपूर्ण रहेगा।

श्रोता९: लोभी नहीं होगा।

आचार्य: लोभी नहीं होगा। ऐसे ही तुम कम-से-कम दस-बीस और सूचक निकाल सकते हो कि नहीं? तो ये सब लिख लो और उनके आगे अपनेआप को तोल लो। तो तुम्हें पता चल जाएगा कि तुम्हारा मर्ज़ कहाँ पर है।

प्र४: वो कमियाँ तो हैं सारी (हमारे भीतर)।

आचार्य: अभी तो बोल रहे थे, तकलीफ़ कुछ है ही नहीं; अब कह रहे हो, कमियाँ सारी हैं। अरे! कम-से-कम अपने दुराग्रहों पर ही कुछ देर डँटा तो करो, तुम तो डँटते ही नहीं। तुम झूठ पर भी नहीं डँटते, तुम सत्य पर क्या डँटोगे! झूठ भी बोलो तो कम-से-कम थोड़ी देर तो डँटो उस पर। कहीं तो निष्ठा सीखो।

जब झूठ भी बोलो तो उसके प्रति थोड़ी वफ़ा तो रखो। वफ़ा जानते ही नहीं! अभी बोला — कोई कमी नहीं, अभी बोला — सारी कमियाँ हैं।

थोड़ी देर झूठी बहस करते, कुछ अच्छा लगता! अपनी बेकार की बातों पर अड़े रहते, कुछ मज़ा आता! निष्ठा नहीं है। अडिग रहना नहीं जानते। लो, एक कमज़ोरी और निकल आयी।

प्र: सारी कमियाँ हैं।

आचार्य: अब सारी कमियाँ हैं, थोड़ी देर पहले कोई नहीं थी।

प्र: पता नहीं चल पाती हैं।

आचार्य: इतनी आसानी से तो पता चल गयी, मैंने बताई एक भी? सारे सूचक किसने बताये?

प्र: सबने बताये।

आचार्य: सबने बताये। और सबके साथ तीन दिन से हो, पहले ही दिन पूछ लिए होते कि मुझमें क्या कमी है, बता दीजिए? तो सब बता देते।

प्र: कभी तो लगता है ऐसे, जैसे सारी नहीं हैं। संतुष्ट भी हैं, यह नहीं है, यह भी नहीं है, पर फिर वो ...।

आचार्य: बेटा, ऐसा भी बुख़ार होता है न जो सिर्फ़ शाम को चढ़ता है? तो डॉक्टर से ये थोड़े ही बोलोगे, 'कभी-कभी ही बुख़ार चढ़ता है, इसका मतलब हम स्वस्थ हैं।' कई तरीक़े के बुख़ार देखे हैं? दिनभर नहीं रहते, साँझ ढली नहीं कि बुख़ार चढ़ जाता है। तो बीमारी तो वो भी है, गहरी वाली है। अगर कभी-कभार भी तुम्हें बुख़ार होता है, तो?

अब डॉक्टर के पास जाओ और बोलो, 'कभी-कभार दस्त लगते हैं'। वो तो कभी-कभार ही लगेंगे, लगातार थोड़े ही लगेंगे।

असली बात समझो, असली बात ये है कि हम अपनी कमज़ोरियाँ, कमियाँ, जीवन की नाकामियाँ, स्वीकार करने से कतराते हैं। क्यों? दो बात! पहला — हमारे गौरव को बड़ी चोट लगती है। और दूसरी बात — एक बार मान लिया कि कमी है तो अब ज़िम्मेदारी उठानी पड़ेगी कमी दूर करने की। हम न तो चाहते हैं कि हमारा अहंकार आहत हो और न हम चाहते हैं ज़िम्मेदारी उठाना।

प्र: नहीं, ऐसे कभी तो लगता है कि अहंकार नहीं है और कभी-कभी बहुत अहंकार आ जाता है।

आचार्य: 'कभी-कभी तो, डॉक्टर साहब, बुख़ार बिलकुल रहता नहीं और कभी-कभी एक-सौ-चार आ जाता है।' बेटा, एक-सौ-चार तो किसी को भी लगातार नहीं रह सकता, दो ही तीन दिन में साफ़ हो जाएगा। बीमारी लम्बी खिंचेगी ही तभी जब तुम उसके साथ समझौता कर लो, जब तुम उसके साथ सह-अस्तित्व सीख लो।

बहुत ही अगर तीव्र हो बीमारी तो लम्बी नहीं चलेगी, फिर या तो बीमारी रहेगी या तुम रहोगे। एक-सौ-चार डिग्री बुख़ार बहुत लम्बा नहीं चल सकता। फिर या तो बुख़ार, या फिर...।

हाँ, सौ डिग्री वाला बुख़ार तुम्हें हो सकता है सालों चल जाये, क्योंकि तुमने उसके साथ को-एग्जिस्ट करना (एकसाथ अस्तित्व में रहना) सीख लिया है। सह-अस्तित्व आ गया तुमको।

बीमारी के साथ जिसने सह-अस्तित्व सीख लिया, अब वो सदा बीमार रहेगा। क्योंकि अब वो बोलेगा, 'हमेशा थोड़े ही रहता है बुख़ार और ज़्यादा थोड़े ही रहता है बुख़ार। शाम को चढ़ता है, सौ, एक-सौ-एक जाता है, बस इतना ही। तो चल रही है गाड़ी, चलने दो।'

मुझे एक बार एक मैकेनिक ने बोला था, बोला, 'पंक्चर टायर से कहीं ज़्यादा जानलेवा होता है घिसा टायर।'

मैंने कहा, 'तूने ग़ज़ब बात बोल दी!'

उसने बोला, 'पंक्चर टायर से ज़्यादा जानलेवा होता है घिसा टायर।' क्योंकि टायर अगर पंक्चर ही हो गया तो तुम्हें रुकना पड़ेगा। पीछे स्टेपनी (अतिरिक्त टायर) है, रुकना पड़ेगा; जान तो नहीं जाएगी। देर हो जाएगी, दिक़्क़त हो जाएगी लेकिन जान तो नहीं जाएगी। लेकिन टायर अगर घिसा हुआ है तो तुम्हें उसे बदलने की ज़रूरत महसूस नहीं होगी, तुम चलते रहोगे। तुम कहोगे, 'अभी एक महीना और खींच लो।' और घिसा टायर क्या कर देगा?

श्रोता: फट जाएगा।

आचार्य: फट भी सकता है, फ़िसल भी सकता है, कुछ भी हो सकता है। तो बड़ी बीमारी से ज़्यादा घातक होती है, छोटी और छुपी बीमारी। बड़ी बीमारी तुम्हें विवश कर देती है इलाज़ कराने को। छोटी बीमारी के साथ तुम सुविधापूर्वक सह-अस्तित्व सीख लेते हो।

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