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मोटिवेशन: बेहोश दौड़ने का सस्ता नशा || (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: सर नमस्ते, परिवार से, दोस्तों से और मोटिवेशनल स्पीकर्स से बहुत सारी मोटिवेशनल पंक्तियाँ सुनी हैं जैसे कि थिंक बिग , बड़ा सोचो, हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती, नेवर गिव अप (कभी हार न मानो), विनर्स नेवर क्विट एंड क्विटर्स नेवर विन (जीतने वाले कभी खेल नहीं छोड़ते और भगोड़े कभी नहीं जीतते), अगर किसी चीज़ को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुम्हें दिलाने में जुट जाती है, डरो मत डर के आगे जीत है, लगे रहो। और इस तरह की कई बातें होती हैं। मैं आपको सुनता हूँ लेकिन आप मोटिवेशन के इतने खिलाफ़ क्यों प्रतीत होते हैं? कई बार तो ऐसे लगता है कि जैसे आप डिमोटिवेट (हतोत्साहित) ही कर रहे हों।

आचार्य प्रशांत: सुनिए, ज़रा ध्यान से, मोटिवेशन माने क्या होता है? आपको किसी चीज़ को पाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। है न? जब आप कहते हैं कि आपको मोटिवेट या प्रेरित किया जा रहा है तो वो किसी लक्ष्य के प्रति होता है न। किसी चीज़ को पाने के लिए आपको अभिप्रेरित, उत्साहित किया जा रहा है।

किस चीज़ को पाने के लिए, इस पर ध्यान नहीं दोगे? हर किसी को हर चीज़ पाने की कोई ज़रूरत तो नहीं होती। और अगर तुम अपने चारों ओर की दुनिया को देखो या अपने ही जीवन को देखो तो तुम्हें समझ में आएगा, साफ़ दिखाई देगा कि ज़्यादातर लोग जिन चीज़ों को चाह रहे होते हैं, वो चीज़े उनके लिए ना ज़रूरी होती हैं ना अच्छी होती हैं। और जिन चीज़ों की हमें सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है वाकई, उन चीज़ों के प्रति हम बिलकुल लापरवाह होते हैं। उन चीज़ों की सार्थकता से, उनकी अनिवार्यता से हम बिलकुल अनजान होते हैं। ऐसा बहुत दिखाई पड़ेगा न, गौर से देखना।

देखो लोग क्या-क्या खरीद रहे हैं, ये वो चाह ही रहे हैं न? उनको लग रहा है वो चीज़ उनको चाहिए तो खरीद रहे हैं और हम सब जानते हैं कि ज़्यादातर लोग जो चीज़ें खरीद रहे हैं, वो अनावश्यक ही होती हैं।

इसी तरीके से अगर तुम किसी की ज़िंदगी को देखो और अगर तुम्हें वहाँ दिखाई दे कि बहुत खालीपन है, सूनापन है, रिक्तता है कई तरह की, ज्ञान की, प्रेम की, समझ की तो तुमको दिखाई देगा कि इसको जो चाहिए था, वो तो इसने पाने की कभी कोशिश ही नहीं करी। तो फिर ये कर क्या रहा था उम्र भर? निश्चित रूप से ये कुछ ऐसी चीज़ें पाने के लिए भाग रहा था जो बहुत आवश्यक नहीं थी।

फिज़ूल चीज़ पाने के पीछे भागने के कारण ही तो असली चीज़ से आदमी वंचित रह गया होगा न। क्योंकि समय और ऊर्जा तो सीमित है। उनको या तो असली चीज़ पाने में लगा लो या व्यर्थ चीज़ पाने में लगा लो।

सबसे पहले हमें ये स्वीकार करना होगा कि अधिकांशतः हमें ये पता ही नहीं होता कि हमारे लिए सबसे ज़रूरी क्या है। इसलिए हमारे लक्ष्य भी भटके हुए होते हैं।

अब ज़्यादा ज़रूरी क्या है कि हमने जो लक्ष्य बना लिया है, किसी भी भ्रम में, किसी भी प्रभाव में आकर, हम उस लक्ष्य के पीछे अंधाधुंध दौड़ पड़ें और साथ ही कोई लगा हो जो बार-बार हमें "बक-अप बक-अप और तेज और तेज" कर रहा हो या पहले ज़रा हम ठहर कर ये समझ लें कि कौन सा लक्ष्य पाने लायक है और कौन सा नहीं?

भई जिस चीज़ के पीछे तुम्हें इतनी ऊर्जा लगानी है, अपना समय लगाना है अपनी युवावस्था के स्वर्णिम वर्ष लगाने हैं, तुम्हें पता तो होना चाहिए न कि वो लक्ष्य तुम्हारे लिए कितना उपयुक्त है।

ज़्यादातर हमारे लक्ष्य बनते कैसे हैं? किसी के प्रभाव में आकर बनते हैं, अज्ञान में बनते हैं। हमें पता भी नहीं होता हमारे लक्ष्य बन जाते हैं। हम जानते भी नहीं हैं कि हम कौन हैं, हमें चाहिए क्या। हम इधर-उधर देखते हैं, किसी ने कुछ सुना दिया, किसी ने बता दिया, कुछ मीडिया में सुन लिया, कुछ परिवार में देख लिया, कुछ समाज का चलन है, कुछ फिल्मी पर्दे से देख लिया और लो हमारा भी लक्ष्य तैयार हो गया। ऐसे ही बनते हैं न तुम्हारे लक्ष्य?

तुम्हारे लक्ष्यों में गहराई कितनी है? तुमने कितना सोच-समझ कर, जान कर, साधना करके, विचार करके अपना लक्ष्य चुना है? तुम कहोगे, "नहीं, हमारा लक्ष्य तो ठीक है।" तो मैं कहूँगा — अच्छा, चलो एक प्रयोग कर लेते हैं। ये कैसे हो जाता है कि लाखों लोगों का एक ही लक्ष्य है? जब लोग हर तरीके से कहते हैं कि, "हम तो साहब अलग हैं, अनूठे हैं, विशिष्ट हैं, यूनिक हैं", तो लक्ष्य इतने लोगों का एक ही कैसे बन जाता है?

एक बार मैं एक कॉलेज में गया था, संस्था के लिए कुछ लोगों को चुनने कि यहाँ पर जाकर मैं चयन करूँगा, हायरिंग करूँगा। वो उच्च कोटि का कोई कॉलेज था। तो वहाँ अब बात करूँ लड़कों से, लड़कियों से। करीब-करीब सबका मानना यही था कि वो अपने-आपमें एक अनोखापन, अनूठापन रखते हैं कि उनमें कुछ खास है, कुछ विशिष्ट ज़रूर है।

फिर मैं उनसे कहूँ — भविष्य के अपने सपने बताओं, फिर मैं कहूँ — अपनी ताकतें बताओं, *स्ट्रेंथ्स*। फिर मैं उनसे कहूँ — अपने बारे में कुछ बताओं, फिर उनसे मैं कहूँ — किस तरह की ज़िंदगी जीना चाहते हो, और किस तरह की नौकरी करना चाहते हो ये सब बताओ। और पाऊँ कि वो अपने भविष्य के बारे में, अपनी करियर को लेकर इच्छाओं के बारे में, जो कुछ भी बता रहे थे, वो अस्सी प्रतिशत साझा था।

तो ऐसे करते-करते मैंने चालीस-पचास से पूछा, फिर मैं हँस पड़ा। मैंने कहा — ऐसे कैसे हो सकता है कि तुम्हारा पूरा बैच एक ही इरादा रखता है, एक ही कंपनी की नौकरी को अपनी ड्रीम जॉब कह रहा है, एक ही तरह का भविष्य बनाने को आतुर है, एक ही तरह के जीवन को गुड लाइफ मानता है। और उसके बाद भी तुम लोग दावा कर रहे हो कि तुम सब अलग, अनूठे और यूनिक हो।

कहाँ? कौन सी यूनीकनेस भई? तुम सब तो एक दूसरे की नकल हो, कॉपीज हो। और इसी से पता चलता है कि तुम सभी का जो लक्ष्य है वो तुममें से एक का भी नहीं है। तुमने सबने एक दूसरे की नकल नहीं करी है शायद, तुम सब ने किन्ही बहुत बड़ी ताकतों की, इस पूरे माहौल की ही नकल उतार ली है। वहीं से तुम सबके ये साझे लक्ष्य, साझी धारणाएँ, साझी जीवनदृष्टि आ रही है। तुममें कोई मौलिकता, कोई ओरिजिनलिटी है ही नहीं।

इसीलिए तुम सब एक तरह का जीवन जीना चाहते हो। तुमसे पूछ रहा होता हूँ अगले दस साल में क्या करोगे। जो बात तुममें से एक नौजवान बता रहा होता है, करीब-करीब वही बात अगले से भी सुनने को मिल जाती है। तो तुममें कहाँ कोई मौलिकता है, कोई अनूठपान है। तुम्हारा निजी तो कुछ है भी नहीं। तुम्हारा जो कुछ है वो बिलकुल सामाजिक है, सार्वजनिक है, सबके साथ साझा है। जैसे कि तुम्हारे पास अपना कोई मन ही न हो। अध्यात्म की भाषा में इसे कहते हैं जैसे तुम्हारे पास आत्मा न हो।

अब ये तो तुम्हारे लक्ष्य हैं, ऐसे तो तुम्हारे लक्ष्य बनते हैं। कि जो पड़ोस के भैया जी ने करा, वही तुमको भी करना है। जो फिल्मी पर्दे के स्क्रीन का नायक कर रहा है, वही तुम्हारा भी लक्ष्य बन गया। जैसे कपड़े कोई तारिका या अभिनेत्री या मॉडल पहन रही है उससे मिलते-जुलते कपड़े पहनने की तुम्हारी भी इच्छा जग गई।

ऐसे तो तुम्हारे लक्ष्य बनते हैं। या घर की, परिवार की जो प्रथा रही है या तुम्हारे आस-पास के लोगों ने तुमसे जो अपेक्षाएँ-उम्मीदें कर लीं, वो तुम्हारे लक्ष्य बन गए। इसमें तुम कहाँ हो?

अब ज़रा विचार करो — एक युवक है, उसने अपना लक्ष्य ही बिलकुल अनुचित बना रखा है। ऐसा लक्ष्य बना रखा है जो होना ही नहीं चाहिए और फिर वो जाता है और किसी मोटिवेशनल स्पीकर के सामने बैठ जाता है या उसका कोई वीडीओ देख लेता है। और वो उसको बोल रहा है, "अपने लक्ष्य को पाने के लिए जी-जान लगा दो, रुकना नहीं, थमना नहीं, आगे बढ़ते जाना, डर के आगे जीत है। और हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती।"

अरे बाबा, कोई ऊँचा लक्ष्य हो, तो मैं सबसे पहले तुमसे कहूँगा कि इसमें जी-जान लगा दो, मौत भी आ जाए तो भी इसे छोड़ना मत, बिलकुल लगे रहो। पर तुम्हारा लक्ष्य ही गलत है। जब लक्ष्य ही गलत हो तो उसमें तुम्हें मोटिवेट करने से तुम्हारा फायदा होगा या और नुकसान ही होगा?

मोटिवेशन ऐसे समझ लो जैसे ईंधन है, फ्यूल , ठीक है? और लक्ष्य क्या है? तुम्हारी गाड़ी की मंज़िल। अगर तुम्हारी मंज़िल ही तुमने ग़लत चुन ली है क्योंकि तुम्हारा दिमाग शुद्ध नहीं है, चैतन्य नहीं है, तुम पूरे होश में नहीं हो, गाड़ी ने अगर मंज़िल ही ग़लत चुन ली हो, लक्ष्य ही ग़लत चुन लिया हो तो मैं अगर उसमें मोटिवेशन का ईंधन डाल दूँ तो मैं तुम्हारे साथ अच्छा कर रहा हूँ या बुरा कर रहा हूँ?

तुम बढ़े जा रहे हो खाई की ओर और मैंने तुम्हारी गाड़ी में और मोटिवेशन का डीज़ल डाल दिया कि तुम दुगुनी ताकत से बढ़ो खाई की ओर, ये मैंने तुम्हारे साथ अच्छा करा या बुरा किया, बोलो?

कि जैसे कोई शराबी तुमसे आकर पूछे कि, "भाई साहब बताइएगा नदी कहाँ है, या समुद्र किधर है, या कुआँ किधर है?" और कहे कि, "जाना है नदी की तरफ, समुद्र की तरफ, लेकिन गला सूख रहा है, कुछ खाने-पीने को दे दीजिए, कुछ पानी दे दीजिए, कुछ पिला ही दीजिए थोड़ी बहुत।" और तुम उसको खाना भी दे दो और कुछ पिला भी दो और उसको रास्ता भी बता दो कि उधर है कुआँ, बढ़ जा। ये तुमने उसके साथ अच्छा किया या बुरा किया?

मोटिवेशन ईंधन है। किसी का उत्साह बढ़ाने से पहले ये तो देख लो कि किस चीज़ के लिए उसका उत्साह बढ़ा रहे हो। जिधर को वो जाना चाहता है, उधर उसका भला होगा या दुर्गति होगी। जो वो अपने लिए सोच रहा है उसने ठीक से सोचा भी है क्या? तो पहला काम है कि उसको प्रेरित करो लक्ष्य के पीछे भागने के लिए नहीं, बल्कि लक्ष्य पर ही बार-बार विचार करने के लिए।

जब लक्ष्य पर ही बार-बार विचार किया जाता है, तो उससे लक्ष्य के प्रति एक साफ़ दृष्टि उभरती है। यदि लक्ष्य वाकई महत्वपूर्ण है तो आपको पता चल जाता है कि ये कितनी ज़्यादा हैसियत रखता है। क्योंकि आपने लक्ष्य को बार-बार ठोका, परखा, बजाया और जितना ज़्यादा तुम सही चीज़ को परखोगे, परीक्षण करोगे उतना ज़्यादा उस सही चीज़ की सच्चाई उभरकर सामने आएगी।

लक्ष्य अगर तुम्हारा सही है तो जितना तुम उसके बारे में जानोगे, जितनी गहराई से उसकी जाँच-पड़ताल करोगे, उतना ज़्यादा वो लक्ष्य तुम्हारे लिए आकर्षक होता जाएगा। और लक्ष्य जब तुम्हारे लिए आकर्षक हो जाएगा तो तुम्हें फिर किसी बाहरी उत्साह या प्रेरणा की या मोटिवेशन की ज़रूरत क्यों पड़ेगी, बताओ?

मोटिवेशन की ज़रूरत तो पड़ती ही इसलिए है न क्योंकि तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य से प्यार ही नहीं है। प्यार क्यों नहीं है? क्योंकि तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य पता ही नहीं है। पता क्यों नहीं है? क्योंकि तुम्हारा लक्ष्य तुम्हारा है ही नहीं, वो तो कहीं बाहर से आया है। किसी और ने तुम्हारे मन में चुपचाप किसी बाहरी लक्ष्य को प्रविष्ट कर दिया है।

तुम्हें पता भी नहीं चला, कब वो बाहरी चीज़ तुम्हारे मन में बैठा दी गई। बैठा तो दी गई है भीतर, पर तुम उसके बारे में कुछ जानते तो हो नहीं। ठीक वैसे ही जैसे कोई बाहरी वायरस तुमको लग जाए। वो है तो अब तुम्हारे शरीर के भीतर पर तुम्हें उसका कुछ पता है क्या? पता कुछ नहीं है। लेकिन पता हो, चाहे न पता हो, वायरस अगर पीछे अंदर पहुँच गया है तो वो तुमको नुकसान तो पहुँचा ही देगा न।

ग़लत लक्ष्य भी एक वायरस की तरह होता है। वो एक बार तुम्हारे भीतर पहुँच गया तो वो तुम्हारे भीतर के स्वास्थ्य को, तुम्हारे प्रतिरक्षा को नष्ट करके अपने लिए बड़े-से-बड़ा स्थान बना लेता है। वो तुम्हारे पूरे शरीर को, तुम्हारी पूरी व्यवस्था को एक भोग्य पदार्थ के रूप में देखता है, एक होस्ट के रूप में देखता है। वो तुम्हारा शोषण करता है तुम्हारे ही भीतर पहुँच कर, ऐसे होता है गलत लक्ष्य।

सही लक्ष्य, मैं कह रहा हूँ, सही होता ही इसलिए है क्योंकि उसके बारे में तुम्हें पूर्ण स्पष्टता होती है। वो पूर्ण स्पष्टता अपने-आपमें बहुत बड़ा मोटिवेशन होती है। उसके बाद तुम्हें किसी और मोटिवेशन की ज़रूरत ही नहीं रह जाती है। हाँ, ये ज़रूर हो सकता है कि तुमने बहुत अच्छा लक्ष्य बनाया लेकिन फिर भी जो तुम्हारी वृत्तियाँ हैं और कुछ जो तुम्हारे ऊपर प्रभाव हैं या बुरी संगति हैं उनके चलते तुम अपने सही लक्ष्य को भी भूलने लग गए। तब तुमको पुनः स्मरण कराना पड़ता है कि देखो तुम्हारा लक्ष्य बहुत महत्वपूर्ण है, उसे भूल मत जाना। लेकिन वो जो पुनः स्मरण कराया जाता है उसमें तुमसे ये नहीं कहा जाता कि, "उठो उठो आगे बढ़ो, जगो और रुकना नहीं जब तक कि मंज़िल हासिल न कर लो!" नहीं, ये नहीं कहा जाता। तब तुमसे कहा जाता है — कर्तव्य याद करो अपना, कर्तव्य याद करो, ये धर्म है तुम्हारा कि तुम उस लक्ष्य की ओर बढ़ो।

जानते हो मोटिवेशन का ऊँचे-से-ऊँचा ग्रंथ आज तक कौन-सा हुआ है? किसी का उत्साह बढ़ाने के लिए, किसी को सही लक्ष्य की ओर प्रेरित करने के लिए जो आज तक सबसे बड़ा ग्रंथ रचा गया, वो कौन सा है? श्रीमद्भगवद्गीता। देख रहे हो, वहाँ क्या हो रहा है? अर्जुन के सामने एक स्थिति है और वो भीतर से कमज़ोर अनुभव कर रहा है, उसे कोई उत्साह नहीं आ रहा। वो निरुपाय हो रहा है। वो अशक्त हो रहा है। कह रहा है, "मेरी टांग काँप रही है, मेरा सर घूम रहा है, मैं नहीं लड़ूँगा, मुझे चाहिए ही नहीं जीत वगैरह।"

तब कृष्ण उसको समझाते हैं। ये असली मोटिवेशन है। कृष्ण उसको ऐसे थोड़े ही बोलते हैं कि, "चल जल्दी लड़, लड़, जब तक तू जीत न जाए!" इस तरह का कोई श्लोक है क्या गीता में? कृष्ण अर्जुन को क्या याद दिलाते हैं? कृष्ण अर्जुन को धर्म याद दिलाते हैं।

तो जब लक्ष्य सही होता है और लक्ष्य के सही होने पर भी तुम लक्ष्य को भूलने लगते हो — होता है एक-दो बार ऐसा — तब तुम्हें मोटिवेशन की नहीं, क्लैरिटी की, स्पष्टता की, ज्ञान की ज़रूरत होती है। गीता तुम्हें क्या देती है? ज्ञान देती है। उत्साह थोड़े ही बढ़ाती है कि वीर तुम बढ़े चलो, रुकना नहीं, इस प्रयास में तो तोड़ ही देना, सफल हो ही जाना इस बार। ऐसा कुछ कहते हैं क्या अर्जुन से कृष्ण?

इसलिए नहीं कहते क्योंकि सही लक्ष्य तुम्हारा उत्साहवर्धन करके नहीं पाया जाता, सही लक्ष्य तुम्हारा ज्ञानवर्धन करके पाया जाता है। इन दोनों में बहुत अंतर है, किसी का उत्साहवर्धन करना और किसी का ज्ञानवर्धन करना। अर्जुन का एक बार भी उत्साहवर्धन नहीं करते कृष्ण। हाँ, लगातार उसका ज्ञानवर्धन करते है। ये होता है असली मोटिवेशन, किसी का ज्ञान बढ़ाना।

ज्ञान बढ़ाओ तो मन में स्पष्टता आती है, *क्लैरिटी*। अगर उसमें स्पष्टता आ गई, तब अब वो खुद ही लड़ेगा और जीतकर दिखाएगा। पूरी ताक़त से लड़ेगा, डट कर लड़ेगा, पीछे नहीं हटेगा। क्योंकि उसको क्या मिल गया है? उत्साह नहीं, ज्ञान, स्पष्टता, *क्लैरिटी*। अब वो लड़ेगा। तो ये असली मोटिवेशन होता है।

ये थोड़े ही कि शकुनि जैसा मोटीवेशन हो। शकुनि भी बहुत बड़ा मोटिवेटर था। आज-कल के ज़्यादातर मोटिवेशनल स्पीकर शकुनि जैसे ही हैं। कि दुर्योधन से पूछा भी नहीं जा रहा है कि, "दुर्योधन तू ये सब जो करना चाहता है, पाना चाहता है, क्यों पाना चाहता है?" शकुनि भी दुर्योधन को यही बोलता होगा कि, "लगे रहो भांजे, इस बार तो पा कर छोड़ेंगे, डर के आगे जीत है, तुम भी जीत सकते हो, *यू टू कैन विन*।"

कृष्ण ऐसा कुछ नहीं बोलते हैं। हाँ, शकुनि ज़रूर बोलता रहा होगा। इसीलिए शकुनि ने जो बोला उसका कोई नामो-निशान नहीं बचा है। कोई शकुनि गीता भी है क्या? कहीं पढ़ते हो कि ये अद्वितीय ग्रंथ महात्मा शकुनि द्वारा भक्त दुर्योधन को दी गई अभिप्रेरणा से अभीभूत श्लोकों का दैवीय संग्रह है? ऐसी कोई गीता पढ़ी है, शकुनि गीता?

अगर शकुनि गीता होती तो उसमें तुम्हें वही सब कुछ मिलता जो तुमने यहाँ लिख कर भेजा है — नेवर गिव अप , हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती। ये सब शकुनि गीता के श्लोक हैं, कृष्ण की गीता दूसरी है। मोटिवेट वो भी कर रहे हैं, पर वो हायर मोटिवेशन है, उच्च अभिप्रेरणा है।

जब लक्ष्य ग़लत होता है, तब क्या होता है उसकी एक-दो निशानियाँ बता दे रहा हूँ। पहली बात — जब लक्ष्य ग़लत होगा तो तुम्हें जो उस ग़लत लक्ष्य को पाने के लिए तुममें हवा भर रहा होगा, वो तुमसे कभी ये नहीं कहेगा कि, "पूछो अपने-आपसे कि तुम ये कर क्या रहे हो, जो कर रहे हो उसके पीछे वृत्ति क्या है, इरादा क्या है?" वो कभी नहीं कहेगा। वो कभी नहीं कहेगा कि, "आँखें थोड़ी देर के लिए लक्ष्य से हटाकर भीतर की ओर कर लो।" कभी नहीं।

वो तुमसे बस कहेगा — तुम्हें जो भी पाना है, उसकी ओर बस दौड़ लगा दो, पूरी ताक़त से। और रास्ते की हर बाधा को लांघ जाओ। वो तुमसे कभी नहीं कहेगा कि, "पाना क्यों चाहते हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम डरे हुए हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम भ्रमित हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम बेहोश हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम अपनी सुरक्षा को लेकर आशंकित हो? इस कारण से तुमने ये लक्ष्य बनाया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम भीड़ चाल और भेड़ चाल का हिस्सा हो? इसलिए तुमने ये लक्ष्य बनाया है।" वो कभी तुमसे ये सवाल करने को पूछेंगे ही नहीं। ये पहली निशानी है ग़लत लक्ष्य वालों की और ग़लत लक्ष्य की ओर भेजने वालों की।

और दूसरी निशानी ये है कि तुम्हें ग़लत लक्ष्य की ओर भेजने के लिए तुम्हारे भीतर लालच और भय उत्तेजित किए जाएँगे। तुम्हें ललचाया जाएगा। तुमसे कहा जाएगा कि, "आँखें बन्द कर लो और कल्पना करो कि तुम्हें तुम्हारा लक्ष्य मिल गया है। कैसा लग रहा है?" और जैसे ही तुम कल्पना करोगे कि तुम्हें तुम्हारा लक्ष्य मिल गया है, तुम्हारे भीतर ज़बरदस्त पुलक उठेगी, उत्तेजना उठेगी।

शराबी से कहो कि आँख बन्द कर और सोच कि तुझे छः ड्रम भरकर शराब मिल गई है। उसको यूँ ही चढ़ जाएगा नशा, एकदम गोते खाने लग जाएगा खड़े-खड़े। ये तुम्हारे भीतर लालच जगाया जा रहा है, ये तुम्हारे भीतर डर उद्दीप्त किया जा रहा है। और क्या यही तरीका नहीं है ज़्यादातर मोटिवेटर्स का?

वो क्या नहीं करते, वो भी मैंने बता दिया। वो क्या नहीं करते? वो कभी तुमसे नहीं कहते कि, "पूछ अपने-आपसे कि जो तू माँग रहा है, वो तुझे चाहिए भी है क्या। जो तू माँग रहा है उसे पाने की इच्छा तेरे भीतर आ कहाँ से गई?"

वो कभी नहीं कहेंगे कि, "अंतरगमन करो, अपने-आपसे भी तो कुछ सवाल करो, आँखें ज़रा भीतर की ओर भी तो मोड़ो", वो कभी नहीं कहेंगे। और वो क्या निश्चित रूप से कहेंगे? वो कहेंगे कि, "देखो वो जो लक्ष्य है तुम्हारा वो कितना आकर्षक है और उसे पा करके क्या मज़ेदार अनुभव होंगे, क्या सुख की प्राप्ति होगी, उन सुखों का स्मरण करो और आगे बढ़ते रहो, आगे बढ़ते रहो, आगे बढ़ते रहो।"

तो मैंने ग़लत लक्ष्य और गलत तरह के मोटिवेशन की दो निशानियाँ बता दी। और सही लक्ष्य की भी निशानी बता दी। सही लक्ष्य की पहली निशानी — वो तुम्हारी स्पष्टता, क्लैरिटी से आता है। वो तुम पर पड़े हुए बाहरी प्रभावों से नहीं आता। ये पहली निशानी है सही लक्ष्य की और चूँकि वो तुम पर पड़े प्रभावों की बजाय तुम्हारी स्पष्टता से आता है, इसीलिए वो तुम्हारे लिए बड़ा आकर्षक हो जाता है। तुम्हें प्रेम हो जाता है उस लक्ष्य से, तुम जान गँवाने को तैयार हो जाते हो और तुम कहते हो — ये चीज़ तो ऐसी है कि पाए बिना जीने से लाभ क्या। तो तुम स्वतः ही उस लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहते हो। ये पहली बात सही लक्ष्य के बारे में।

और दूसरी बात मैंने कही कि अगर तुम किसी वजह से सही लक्ष्य को भूल भी जाओ तो तुम्हें सही लक्ष्य की ओर प्रेरित करने का तरीका ये नहीं होता कि तुम्हें ललचाया और उकसाया जाए। सही लक्ष्य की ओर प्रेरित करने का तरीका होता है कि तुममें ज्ञान जागृत किया जाए, जैसे कि श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन का ज्ञान जागृत किया था।

अंधाधुंध मोटिवेशन सिर्फ़ अंधी कामना, भोग पूरा करने का व्यापार है। भारत में इस तरह की कभी कोई प्रथा या मिसाल देखने को भी नहीं मिलती। ये तो बाज़ारवाद, भोगवाद, औद्योगिकीकरण इन सब का नतीजा है कि मोटिवेशन अपने-आपमें एक बड़ा क्षेत्र बन गया है और मोटिवेशनल स्पीकर्स की बड़ी माँग रहती है। क्योंकि भाई जब इतने तुमने दुनिया में वस्तुएँ तैयार कर दिए, सामान तैयार कर दिए, भोगने के लिए तो लोगों में उन वस्तुओं को भोगने की इच्छा भी तो तैयार करनी पड़ेगी न। तुम और भोगो, तुम और भोगो, तुम्हारे भीतर इसी इच्छा की आग को भड़काने का नाम मोटिवेशन है। "चलो पाओ, अपनी कामनाओं की पूर्ति करो, चलो आगे बढ़ो, रुको मत और पाओ, कामनाओं की पूर्ति करो!" इसी बेवजह, फ़िज़ूल और अति घातक अग्नि को जो प्रज्वलित करते रहे हैं अधिकांशतः वहीं हैं सब *मोटिवेशनल स्पीकर्स*।

इनकी निशानी बता दी, पहली बात — ये नहीं पूछते कि तुम कौन हो, और तुम्हारे अस्तित्व के लिए, तुम्हारे जीवन के लिए कौन सी चीज़ वाकई आवश्यक या अनिवार्य है। और दूसरी बात — ये जिन उपायों का प्रयोग करते हैं उनमें लालच और भय प्रमुख हैं। इसलिए मैं इस व्यर्थ मोटिवेशन के विरुद्ध काफ़ी बातें बोलता हूँ।

मैं बिलकुल ये नहीं चाहता हूँ कि सही लक्ष्य के प्रति भी तुममें उमंग, उत्साह, ऊर्जा, प्रेरणा न हो। मेरा तो सारा काम ही यही है कि हर व्यक्ति अपने-आपको जाने, अपने लक्ष्य को जाने और सही लक्ष्य को जानने के बाद अपना सर्वस्व उसी लक्ष्य की प्राप्ति और सेवा में न्योछावर कर दे।

तो एक तरह से मैं भी दिन-रात मोटिवेट ही करता हूँ। मगर मेरा तरीका ज़रा गीता वाला है। मुझे मालूम है कि लक्ष्य अगर सही है तो तुम्हें उत्साह नहीं ज्ञान चाहिए। और ज्ञान तुम्हारे भीतर जितनी ताक़त का संचार कर सकता है, उत्साह उतनी ताक़त का संचार कभी नहीं कर सकता है। ये बात तुम भलीभाँति जानते हो। क्योंकि ज्ञान भीतर जा करके पूरी तरह से तुम्हारा हो जाता है और बाहर से तुम्हें किसी ने उत्साह दिया है वो तो ऐसा ही है जैसे बाहर से किसी गाड़ी को धक्का दे दिया गया हो। कितनी देर तक और कितनी दूर तक चलेगी बाहर के धक्के से तुम्हारी गाड़ी?

ज्ञान ऐसा है जैसे गाड़ी के इंजन की सफाई करके उसे स्टार्ट कर दिया गया हो। ये गाड़ी के अंदर की बात है, अब गाड़ी दूर तक जाएगी।

क्या तुम गौर नहीं करते कि जब तुमको मोटिवेट किया जाता है उसके कुछ दिनों तक तो तुम बड़ी ऊर्जा में रहते हो, बड़े तने हुए रहते हो और कुछ दिन बीते नहीं कि फिर से लुंज-पुंज और शिथिल पड़ जाते हो। ये देखा नहीं क्या तुमने?

बाहर से तुम्हें जो चाभी लगाई जाती है उससे तुम्हारा खिलौना कितने दिनों तक चल लेता है, बोलो? बस जितनी चाभी भरी गई उतनी देर तक चल लेते हो और उसके बाद फिर तुम पाते हो कि फिर तुम निरुत्साह हो गए और जब तुम निरुत्साह हो जाते हो तो तुम्हें फिर से किसी मोटिवेशनल डोज़ की ज़रूरत पड़ती है। फिर तुम पहुँच जाते हो कि, "अब भीतर से कोई उमंग, उत्साह नहीं आ रहा, चलिए हमसे कुछ ऊँची बातें बोलिए जिससे हमें ज़रा जोश आए, हमें चाबी भरिए, हमें किक लगाइए, जिससे हमारा स्कूटर स्टार्ट हो जाए।" फिर ढाक के तीन पात। पंद्रह दिन बीते नहीं कि तुम्हारा जितना जोश आया था, वो ठंडा पड़ गया।

अर्जुन का जोश थोड़े ही ठंडा पड़ जाना है। जिस गाड़ी को बाहर से धक्का मारा गया है, वो थोड़ी दूर जाकर रुकेगी ही। उसको फिर धक्के की ज़रूरत पड़ेगी। पर इंजन ही अगर जग बैठा, तो गाड़ी अब बहुत दूर तक जानी है।

जिन्हें ये दिखाई देता हो कि उनके जीवन में उत्साह की, जोश की, उमंग की कमी रहती है, वो मोटिवेशनल किताबें पढ़ना छोड़ें, श्रीमद्भगद्गीता की तरफ़आएँ। तुम्हारा भला चाहता हूँ, इसीलिए तुमको वेदांत की ओर और गीता की ओर ले जाता हूँ। जो एक बार उपनिषदों और गीताओं की तरफ़ पहुँच गया, उसको फिर किसी मोटिवेशन की या मोटिवेशनल स्पीकर्स की ज़रूरत नहीं पड़ती। उसको फिर इस तरह की मोटिवेशन की बातें बड़ी हास्यास्पद, बड़ी बचकानी लगती हैं। तो ग्रंथों की तरफ़ आओ, गीता की तरफ़ आओ, जीवन में जोश की, उमंग की, सत्य की, सात्विक उत्साह की कोई कमी नहीं रहेगी।

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