प्रश्न: सर, मेहनत तो गधे भी करते हैं। मैं क्या करूँ जिससे जीवन जीने योग्य बने?
वक्ता: बात तो ठीक है, पर बचपन से तो तुमने सिखा यही है कि श्रम सफलता की कुंजी है। यही बताया गया है अब तक। तो अब तुम क्या करोगे ? गधा कम गधा है। जिस गधे की तुम बात कर रहे हो, उसमें गधापन बहुत कम है क्योंकि कम से कम वो गधा पैदा हुआ था, उसको गधा बनाया नहीं गया है। हमें तो गधा बनाया गया है, गधा होना हमारा स्वभाव नहीं था, हमें गधा बनाया गया है, ये बता-बता कर की श्रम करके सफलता मिलती है। किसी ने तुम्हें ये नहीं बताया कि आनंद सफलता की कुंजी है। सब ने कहा कि जितना श्रम करोगे, उतना पाओगे। क्या पाओगे ये नहीं बताया। वही पाओगे जो पा रहे हो और देखो पा-पा कर कैसे हो गए हो!
तुम्हें किसी ने नहीं बताया कि जब तक तुम्हें कुछ करने में आनंद अनुभव नहीं हो रहा, तब तक तुम उसमें श्रेष्ठता भी नहीं पा सकते। क्या तुम ऐसी किसी चीज़ में श्रेष्ठ हो सकते हो, जिसमें तुम आनंद महसूस नहीं करते? क्या ये संभव है? अरे! ये तो कभी बताया नहीं गया। वही गधे वाला हिसाब-किताब बता दिया गया और ये नहीं बताया गया कि वो बात पत्थरों पर लागू होती है, जीवित मनुष्यों पर नहीं। बाहरी प्रभाव पत्थरों पर काम करते हैं, और पत्थरों पर ही उन्हें काम करना चाहिए। मनुष्य की अपनी समझ है, उसे घिसने की ज़रुरत नहीं है, उसे समझने की ज़रूरत है।
न्यूटन का दूसरा नियम है की एक चीज़ लुढ़कती ही रहेगी जब तक बाहर से उसको रोक न दो या ठोकर न मार दो। तुमने सोचा की ये नियम तुम पर भी लागू होता है कि कोई बाहरी ताकत आए और हमको हिला दे, और सिर्फ बाहरी प्रभाव से हम जीवन में कुछ पा लेंगे, नहीं पा पाओगे। तुम्हारी सबसे बड़ी शक्ति है तुम्हारी चेतना, तुम्हारी जान पाने की काबिलियत और इसके बारे में कभी बात ही नहीं हुई हैं। मेहनत करने की चीज़ नहीं होती है, जब तुम मेहनत में डूबते हो, तो बहुत मेहनत हो जाती है, और तुम्हें पता भी नहीं चलता, तब वो मेहनत खेल बन जाती है। जब श्रम करना पड़े तो समझ लो गलत हो रहा है। जब श्रम करने की बहुत कोशिश करोगे, श्रम हो भी नहीं पायेगा और थकान बहुत हो जाएगी।




