मन की वृद्धि ही मन की अशुद्धि || आचार्य प्रशांत, यीशु मसीह पर (2015)

ऐसी तो कोई वस्तु नहीं जो मनुष्य में बाहर से समाकर अशुद्ध करें; परन्तु जो वस्तुऍं मनुष्य में से निकलती हैं, वे ही जो उसे अशुद्ध करती हैं।
बाइबल मरकुस (अध्याय ७ सूत्र १५)
आचार्य प्रशांत: तो सवाल पूछा है कि जो कुछ बाहर से आया है वही तो अशुद्ध करता है, पर यहाँ जीसस क्या कहना चाह रहे हैं? यहाँ कहा गया है, ‘ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो मनुष्य में बाहर से समाकर उसे अशुद्ध करती है; परन्तु जो वस्तुएँ मनुष्य से बाहर निकलती हैं, वो ही हैं जो उसे अशुद्ध करती हैं।’
तो सवाल में कहा कि जो कुछ बाहर से आता है वही तो अशुद्ध करता है। तो बाहर से आ जाता है, किसको आ जाता है? तो क्या बता रहे हो फिर यहाँ पर कि सर जो कुछ बाहर से आता है वही अशुद्ध करता है। जो कोई कह रहा है कि बाहर से कुछ आता है, वो क्या कह रहा है?
प्रश्नकर्ता: शरीर को बाहर से आता है।
आचार्य: तो तुम क्या हो? तुम तो कह रहे हो, ‘मुझे बाहर से आता है और मुझे अशुद्ध कर जाता है।’ तुम कह रहे हो, ‘कुछ बाहर से आता है और मुझे अशुद्ध कर जाता है।’ बाहर और भीतर को अलग करने वाली एक सीमा तो होगी न कि इस सीमा के उस पार बाहर है और इस पार भीतर है, वो सीमा क्या है तुम्हारी?
प्र: इसका मतलब मेरा अपने आप से बहुत शारीरिक तादात्म्य में है।









