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मन की वृद्धि ही मन की अशुद्धि || आचार्य प्रशांत, यीशु मसीह पर (2015)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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ऐसी तो कोई वस्तु नहीं जो मनुष्य में बाहर से समाकर अशुद्ध करें; परन्तु जो वस्तुऍं मनुष्य में से निकलती हैं, वे ही जो उसे अशुद्ध करती हैं।

बाइबल मरकुस (अध्याय ७ सूत्र १५)

आचार्य प्रशांत: तो सवाल पूछा है कि जो कुछ बाहर से आया है वही तो अशुद्ध करता है, पर यहाँ जीसस क्या कहना चाह रहे हैं? यहाँ कहा गया है, ‘ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो मनुष्य में बाहर से समाकर उसे अशुद्ध करती है; परन्तु जो वस्तुएँ मनुष्य से बाहर निकलती हैं, वो ही हैं जो उसे अशुद्ध करती हैं।’

तो सवाल में कहा कि जो कुछ बाहर से आता है वही तो अशुद्ध करता है। तो बाहर से आ जाता है, किसको आ जाता है? तो क्या बता रहे हो फिर यहाँ पर कि सर जो कुछ बाहर से आता है वही अशुद्ध करता है। जो कोई कह रहा है कि बाहर से कुछ आता है, वो क्या कह रहा है?

प्रश्नकर्ता: शरीर को बाहर से आता है।

आचार्य: तो तुम क्या हो? तुम तो कह रहे हो, ‘मुझे बाहर से आता है और मुझे अशुद्ध कर जाता है।’ तुम कह रहे हो, ‘कुछ बाहर से आता है और मुझे अशुद्ध कर जाता है।’ बाहर और भीतर को अलग करने वाली एक सीमा तो होगी न कि इस सीमा के उस पार बाहर है और इस पार भीतर है, वो सीमा क्या है तुम्हारी?

प्र: इसका मतलब मेरा अपने आप से बहुत शारीरिक तादात्म्य में है।

आचार्य: बहुत ज़्यादा या बहुत कम की बात नहीं होती है। देह ही मानते हो अपनेआप को, तभी ये बताते हो कि कुछ बाहर से आ गया और लग गया और ये सब हो गया। तुमसे बाहर कुछ होगा तो न आएगा भीतर! बाहर कुछ होने के लिए कुछ फैलाव, कोई विस्तार तो होना चाहिए न जिसे तुम कह सको कि बाहरी है।

सत्य मात्र बिन्दु है। गन्दगी किसी बाहरी फैलाव से आती नहीं है, बाहरी फैलाव का नाम ही गन्दगी है। और जब बाहरी फैलाव होता है तो हज़ार विभाजनों के साथ होता है। उसमें तुम दस तरह की सीमाऍं भी खींचते हो कि ये मैं हूँ, ये तुम हो, ये संसार है, ये ऐसी चीज़ है। दुनियाभर का उसमें पूरा जाल रच लेते हो ख़ुद ही, वो जाल ही गन्दगी है।

जीसस कह रहे हैं, 'जो कुछ भीतर से निकलता है वही अशुद्ध करता है‌।' ये पूरा विस्तार निकलता है और इसी विस्तार का नाम अशुद्धि है।

अशुद्धि ये नहीं है कि तुम जो कि देह है और उसकी सीमा हो, वो बैठे हों और बाहर से आकर कुछ गन्दा कर गया। अशुद्धि ये है कि तुम बैठे हो और तुमको ये जो पूरा बाहर-बाहर है वो असली लग रहा है।

याद रखना, इतना ही कहने से नहीं होता है कि जो बाहरी है वो असली नहीं है, क्योंकि जब तक भीतरी असली लग रहा है, तो बाहर भी असली लगेगा ही। संसार तुम्हें इसलिए असली लगता है, क्योंकि सबसे पहले तुम्हें तुम असली लगते हो।

तो जहाँ कुछ है ही नहीं, शून्य है, बिन्दु मात्र है वहाँ तुम एक बड़ा विस्तार खड़ा करते हो। उस विस्तार के तुम दो टुकड़े करते हो, एक को कहते हो, ‘ये मैं हूँ और दूसरे को कहते हो, ये संसार है।’ और अब तुम्हारा भ्रम ये है कि उस विस्तार में एक टुकड़े से दूसरे टुकड़े में जो आ रहा है वो उसे गन्दा कर रहा है; नहीं, इस विस्तार का खड़ा होना ही अशुद्धि है।

संसार ‘मैं’ को अशुद्ध नहीं करता। मैं और संसार तो साथ-साथ चलते हैं। संसार तुम्हें क्या गन्दा करेगा, तुम्हारा होना ही गन्दगी है! पर ये बड़ा अनुकूल दावा है अहंकार के लिए — ‘मुझे संसार ने गन्दा कर दिया।' मूर्खता की बात है। संसार ने तुम्हें नहीं गन्दा कर दिया, संसार तो तुम्हीं ने रचा है — जैसे तुम हो वैसे तुम संसार रच देते हो — अब संसार कैसे तुम्हें गन्दा कर देगा?

ये वैसी ही बात है कि कोई चित्र बनाये फिर उस चित्र को देखकर डर जाए और कहे, 'मुझे इस चित्र ने डरा दिया।' तुम्हीं ने तो बनाया है। कोई हफ़्तेभर तक कपड़े न बदले और जब कपड़ों से बदबू उठे तो कहे, ‘कपड़ों ने मुझे गन्दा कर दिया।’ कपड़े भी तुम्हारे, बदबू भी तुम्हारी और दावा तुम्हारा ये है कि कपड़े तुम्हें गन्दा कर रहें हैं।

ये जिसे तुम बाहरी संसार कहते हो, ये है क्या? तुम ही तो हो। इसीलिए हर व्यक्ति का संसार अलग-अलग होता है। लेकिन तुमने खूब तरीक़ा निकाला है अपनेआप को साफ़-सुथरा घोषित करने का। तुम कहते हो ‘न, न, न! मैं तो निर्मल हूँ, स्वच्छ; संसार आकर मलिन कर गया मुझको।' जो मलिनता संसार ने तुम्हें दी, वो संसार को किसने दी? तुमने।

पर खूब भाता है न ये कहना कि हम तो भोले-भाले कुॅंआरे, संसार आकर डोरे डाल जाता है। अरे! हम तो सत्य के साधक, माया आकर डिगा जाती है। माया कुछ है क्या? माया कुछ है क्या, जो तुम्हें आकर डिगा जाती हैं?

“या मा सा माया” — जो है नहीं उसको ही माया कहते हैं। ये माया रची किसने जो तुम्हें आकर के डिगा जाती है? और जिसकी तुम दुहाई देते फिरते हो कि बड़ी भ्रष्ट माया है, ऐसे-ऐसे इसके पैंतरे हैं, ये हमें परेशान कर जाती है, ये माया आयी कहाँ से? माया तो होती ही नहीं। ये आ कहाँ से गयी?

तुम्हारी ही माया है। माया और किसी ने नहीं रची है, तुम्हीं ने रची है। और मायावी तुम ऐसे हो कि दावा करते हो कि माया तुम्हें भ्रष्ट कर रही है। मुक़दमा तो माया को तुम पर करना चाहिए कि ये ऐसे चतुर खिलाड़ी हैं कि पहले तो मुझे कल्पित करते हैं कि मैं हूँ और फिर मुझे बदनाम करते हैं कि मैं इन्हें भ्रष्ट कर रही हूँ।

माया है कहाँ? है तो सिर्फ़ सत्य। माया कहाँ है, (दोहराते हुए) माया कहाँ है? तुम हो माया। तुम्हारी अपनी सृष्टि माया है। तुम अपने को रचते हो और अपने साथ-साथ संसार को रचते हो। ये दोनों एक साथ अस्तित्व में आते हैं, तुम और संसार, संसार तुम्हें आकर नहीं गन्दा करता।

याद रखना, तुम्हारी गुणवत्ता और तुम्हारे संसार की गुणवत्ता बिलकुल एक बराबर होती है; उनमें ज़रा भी अन्तर नहीं होता। बड़ा उपहासपूर्ण दावा रहता है तुम्हारा कि तुम्हारी परिस्थितियाँ आकर के तुम्हें गन्दा कर जाती हैं। तुम और तुम्हारी परिस्थितियाँ बिलकुल एक जैसे होते हो। जो कोई कहे कि मेरी परिस्थितियाँ मुझ पर हावी हो जाती हैं, उनसे पूछ रहा हूँ, तुम्हारी परिस्थितियाँ रची किसने?

तुम्हारा दावा कुछ ऐसा ही है कि जैसे मक्खी कहे कि गुड़ बड़ा दुष्ट है, आकर चिपक जाता है पाॅंव से। या कि सूअर कहे कि नाला आकर के गन्दा कर जाता है, बड़ा षड्यन्त्रकारी नाला है, हमें गन्दा करने की साज़िशें रचता है। घुसा कौन नाले में? बार-बार जाकर के उसी में घुसता कौन है?

वैसे ही तुम्हें कितना आनन्द आता है कहने में परिस्थितियाँ हावी हो जाती हैं। तुममें और परिस्थितियों में कोई अन्तर है? और तुम लेशमात्र भी बदल जाओ, तो परिस्थितियाँ क्या वही रह जाऍंगी? तुम परिस्थितियों का आधार हो, तुम हट जाओ, परिस्थितियाँ तत्क्षण ख़त्म हो जाऍंगी। तुम बदल जाओ, संसार तत्क्षण बदल जाएगा।

और तुम दुहाई देते रहते हो कि नहीं, संसार बड़ा शोषक है — उफ़्! ये परिवार, उफ़्! ये जगत का व्यापार — ये दुष्ट हमें परेशान करे रहते हैं। अच्छा! तुम्हीं जैसों के लिए कहा गया है कि नशा शराब में होता तो नाचती बोतल। दुष्टाई अगर परिवार में होती, माँ-बाप में होती तो क्या बात थी; वो तुममें है।

पर बड़ा अच्छा लगता है कहने में, 'हम तो लैज़ारस हैं, मार्था हावी हुई जा रही है हम पर। सर, हम क्या करें?' यही मार्था है कि तुम जानते भी नहीं कि तुम मार्था हो। तुम्हें स्वयं का पता भी नहीं, तुम अपने अहंकार से इतने अपरिचित हो, तुम अपने स्वरूप से क्या परिचित होओगे। कितने भोलेपन के साथ दावा कर दिया, 'सर, बाहर की चीज़ें आकर के हमें अशुद्ध कर जातीं हैं।'

अच्छा! कीचड़ उड़-उड़कर आता है और सूअर को गन्दा करता है — पीछा कर-करके, उसके दरवाज़े पर दस्तक दे-देकर उसको गन्दा करता है। बेचारा भोला सूअर, वो चुपचाप अपने शुभ्र, धवल, निर्मल गद्दे पर सो रहा होता है नहा-धोकर, आरती करके, पूजा-पाठ करके — गंगाजल से नहाकर भाई, रगड़-रगड़कर नहाकर — अपने सफेद बिस्तरे पर सूअर सो रहा है और ये षड्यन्त्रकारी कीचड़ उड़ता हुआ आया, मायावी तरीक़ों से दीवाल को छेदा और सूअर से आकर लिपट गया। बेचारा सूअर क्या करे!

सेशन में आएगा और सवाल लिखेगा, 'सर, मैं अपनी पत्नी से बड़ा हैरान हूँ। सर, कैम्प जाने से बस एक दिन पहले बहुत सारा कीचड़ उड़कर आया और हमारी अनभिज्ञता में आकर के हमारे मुँह पर चिपक गया, अब हम जा नहीं पाऍंगे।' अच्छा!

आइन्दा कभी ये दावा मत कर देना कि संसार तुम्हें अशुद्ध करता है या माया तुम्हें पछिया रही है। माया कुछ होती नहीं है, दोहरा रहा हूँ, जो है ही नहीं उसका नाम माया है। माया कुछ होती ही नहीं, तुम हो माया।

वही तुमको बाइबल समझा रही है कि जो तुमसे निकलता है, वही अशुद्धि है। तुम्हारे जीवन में जो कुछ भी घटिया है, दुर्गन्ध देता है वो तुमसे निकला है। वो बाहरी नहीं है कि बाहर से आया और तुम्हें दागदार कर गया। बाहर कुछ होता ही नहीं। समस्त विस्तार तुम ही हो, ये अन्दर-बाहर का विभाजन ही भ्रामक है। बाहर क्या है? किसके बाहर? तुम-ही-तुम हो, ये जितना तुमने पूरा ब्रह्मांड अपना फैला रखा है ये तुम हो।

इन्हीं सब बातों की ओर इशारा करने के लिए इस तरह के मिथ (मिथक) प्रचलित किये ग‌ए कि चन्दन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग। अब ये कोई तथ्य हो ये ज़रूरी नहीं है, पर इशारा यही है कि जो गन्दा होता है उसे ही गन्दा किया जा सकता है। जो अशुद्ध है उसे ही अशुद्ध किया जा सकता है।

गन्दगी बाहर से आकर के तुम्हें गन्दा नहीं कर पाएगी, यदि तुम पहले ही गन्दे नहीं हो। पहली बात तो ये कि बाहर से गन्दा नहीं कर पाएगी और उससे भी ऊपर की बात ये कि बाहर कुछ है ही नहीं, तो न साफ़ करने की बात हो सकती है न गन्दा करने की।

एक बार तुमसे कहा था मैंने कि गुरु और माया साथ बैठकर के चाय पीते हैं। माया तुम्हें वो सब दिखा देती है जो है ही नहीं, माया तुम्हें उस बीमारी का भ्रम देती है जो तुम्हें लगी ही नहीं। और गुरु तुम्हें उस बीमारी से मुक्ति देता है जो तुम्हें है ही नहीं। वो दोनों एक समान हैं। भई! गुरु कौन? जो तुम्हें अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाए। 'गु — रु'। (गु और रु को विभाजित कर बोलते हैं)

अब अन्धकार नहीं रहा तो गुरु कहाँ बचेगा, 'रु' बचेगा। गुरु का होना भी तो अन्धकार पर निर्भर करता है न! इसीलिए आख़िरी बात ये होती है कि सत्य में न गुरु होता है न शिष्य। माया तो नहीं ही होती, गुरु भी नहीं होता। (दोहराते हुए) सत्य में माया तो नहीं ही होती, गुरु भी नहीं होता।

और ध्यान से देख लेना जब कहते हो कि गुरु महान है, तो उसमें से किसको महान कह रहे हो, 'गु' को कि 'रु' को? तुम्हारा भरोसा नहीं, तुम्हारा ध्यान किधर हो, एक-से-एक भाषाविद् हैं वो कहेंगे, 'रु' साइलेंट है, 'गु' महान है। 'रु' माने तो सत्य, प्रकाश और प्रकाश मौन होता है तो 'रु' साइलेंट है; हम बोलेंगे ही नहीं, तो 'गु' महान है।

तर्क में कोई कमी नहीं है, बिलकुल ठीक तर्क दिया है। सत्य तो मौन होता ही है। भोले आदमी को लगा कि शायद जीसस से कोई भूल हो गयी है। हमें तो यही बताया गया था कि दुनिया आकर के हमें कलुषित कर जाती है, ज़ालिम ज़माना हमारा दुश्मन है।

जिसको दुनिया से बहुत दुख मिलता हो वो साफ़ समझ ले उसे अपनेआप से ही दुख मिल रहा है। आप अपने दुख का कारण ख़ुद हैं। तुम्हारी दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके ज़िम्मेदार तुम नहीं हो। और इसका प्रमाण ये है कि तुम्हारी दुनिया में जो कुछ भी है तुम उससे तत्क्षण मुक्त हो सकते हो; अभी, तत्काल। उससे चिपके रहने का निर्णय तुम्हारा है तो कृपा करके ये बेईमानी मत किया करो कि जैसे तुम्हारे साथ संसार ज़बरदस्ती कर रहा हो।

संसार यदि वाकई तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती कर रहा होता तो तुम अभी उस ज़बरदस्ती से मुक्त हो जाते‌; अभी हो जाते, कोई ज़बरदस्ती नहीं है। संसार तुम्हारा दास है, संसार तुम्हारा गुलाम है। संसार तुम्हारे साथ ठीक वही कर रहा है जो तुम चाहते हो कि वो तुम्हारे साथ करे। तुम्हारी इच्छा रहती है कि तुम लड़ो-भिड़ो, गाली-गलौज करो। तुम्हारे भीतर काँटे-ही-काँटे उगे हुए हैं और वो लगातार आकुल रहते हैं उलझने के लिए किसी से, तो तुम गाड़ी जानबूझकर के इस तरीक़े से चलाओगे कि किसी-न-किसी को जाकर‌ के रगड़ दे।

अब जिसको जाकर के रगड़ेगी वो हो सकता है उतरकर के तुम्हें पीट दे। फिर तुम कहोगे, 'ज़ालिम ज़माना पीट गया, कोई आकर हमसे जीत गया।' तुम ये नहीं देख रहे कि ये तुम्हारी ही तो गहरी इच्छा थी कि तुम पीटे जाओ। आज कोई पहली बार है कि तुमने गाड़ी इतने भद्दे तरीक़े से चलायी। तुम रोज़ चला रहे थे और मन्नत माँग रहे थे कि तुम पिटो। तुम चाहते ही यही थे कि तुम रगड़ खाओ। क्योंकि काँटे उगे हुए हैं तुम्हारे मन में और वो काँटे बेचैन रहते हैं किसी से उलझ जाने को।

पर तुम ये नहीं कहोगे कि मेरी हार्दिक अभिलाषा पूरी हुई, आज मैं पिटा। तुम ये आकर के अनुग्रह नहीं व्यक्त करोगे कि आज का दिन इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में लिखा जाना चाहिए। 'जिसका मुझे था इन्तज़ार वो घड़ी आ गयी।' ऐसा धमाधम पीटा कि बिलकुल देह तर हो गयी, मालिश ही हो गयी है।

तुम आकर के कहोगे, ‘देखो कितना बुरा हो गया मेरे साथ, उफ़्!’ तुम्हारी साँस-साँस पिटने की मनौती माँगती है। जब पिट जाते हो तो कहते हो ज़माना आकर पीट गया, बाहर से कोई आकर पीट गया। ज़माना तुम्हारा गुलाम है वो वही करता है जो तुम उससे चाहते हो।

तुम कुर्सी पर गोन्द फैलाओ और फिर बैठ जाओ। और फिर कहो, ‘चिपक गयी, दुष्ट गोन्द।' फैलायी किसने? अब तुम फैलाते और बैठते और गोन्द न चिपकती तो दिल नहीं टूटता तुम्हारा? तो धन्यवाद नहीं दोगे गोन्द का कि भला किया जो चिपकी, नहीं तो हमारा पूरा प्रयत्न व्यर्थ जाता।

फिर पुकारते हो, ‘हे भगवान! जय गुरुदेव! आकर छुड़ाओ!’ तो गुरुदेव आरा लेकर आते हैं और तुम्हें गोन्द से मुक्त कराते हैं। काहे के लिए? ताकि तुम जल्दी से भागकर जाओ और गोन्द का और बड़ा कनस्तर लेकर आओ और फिर फैलाओ और फिर बैठ जाओ।

फिर कहते हो कि गोन्द आकर के हमें अशुद्ध कर गयी। फैलायी किसने? और एक बार फैलायी? तुमने फैलायी और तुम चाहते हो फैलाना, इसका प्रमाण ये है कि अगर तुम्हारी ज़िन्दगी से गोन्द हटा दी जाए तो तुम तड़प जाओगे। तुम्हें निषेध कर दिया जाए कि अब नहीं बैठना है उसी कुर्सी पर; तुम विद्रोह कर दोगे।

‘कहाँ का सत्य और कहाँ का गुरु! मेरे घर की बात है मैं जानता हूँ। हमारी गोन्द है, हमारा पिछवाड़ा और हमारी कुर्सी है, हम बैठेंगे, तुम होते कौन हो हमें रोकने वाले? और जब चिपक जाऍंगे तो बुला लेंगे, आना हो तो आना, नहीं तो बहुत देवी-देवता हैं।’

जिस संसार को कह रहे हो कि तुम्हें अशुद्ध कर गया, वो संसार ज़रा सा हट जाए, तो देखा है कैसे व्याकुल हो जाते हो? जिस संसार से तुम्हें इतनी आपत्ति है, वो संसार ज़रा सा हिल जाए, तो देखा है हालत क्या होती है तुम्हारी? हालत देखी है अपनी? पत्नी प्राण लिये ले रही है, पिशाचिनी है, रक्त-पिपासु है और दो घंटे को गायब हो जाए वही पत्नी, तो अपनी हालत देखना, कलपते फिरोगे।

जैसे रावण हर ले गया था, 'हे खग, मृग, हे मधुकर श्रेणी तुम देखी सीता मृगनयनी।' कहाँ गयी मेरी मृगनयनी? दो ही घंटे को न मिले तुम्हारी मृगनयनी फिर अपनी हालत देखना। और यहाँ आकर के समय बर्बाद करोगे और झूठ बोलोगे और बेईमानी करोगे कि क्या बतायें, हड्डी चबाती है।

एक बार एक आया, मैंने पूछा कि तुझे कहा था दोहों के अर्थ लिखना, काहे नहीं लिखता? तो बोलता है, ‘वो इसमें हिन्दी नहीं लिख सकते इस मोबाइल में, बड़ा घटिया मोबाइल है। और आपने वर्जित किया हुआ है कि हिन्दी को रोमन में मत लिखना, देवनागरी में ही लिखना।' मैंने कहा, ‘बात तो ठीक है, मोबाइल की ग़लती।’

बोला, ‘सर, ये बड़ा बेकार मोबाइल है।' मैंने कहा, ‘चल ठीक कोई बात नहीं।’ मैंने कहा, ‘ पोस्टर काहे नहीं बनाता?’ बोलता है, ‘कुछ इसमें वो वाली ऐप ही नहीं आ पाती है, पता नहीं चलता कुछ, तो इसलिए पोस्टर नहीं बनते, मोबाइल की ग़लती।’ मैंने कहा, ‘ये बात भी ठीक है।'

मैंने कहा, ‘तू ये सब काम नहीं करता था तो तुझे यहाँ से इतने सन्देशे गये, तूने जवाब काहे नहीं दिया?’ बोलता है, ‘वो ठीक से हमें दिखायी नहीं दिया, इसकी स्क्रीन टूटी हुई है, बड़ा दुष्ट मोबाइल है।’ मैंने देखा, सही में स्क्रीन टूटी हुई थी, बड़ा दो कौड़ी का मोबाइल है।

मैंने कहा, ‘ऐसा कर इसको यहीं छोड़ जा। ये जो है न, यही तेरी सारी मुसीबतों की जड़ है, तू अब इस दुरात्मा मोबाइल को लेकर ही न जा, ये राक्षस योनि का है, इसको यहीं रख दे! एक ड्राइवर है वो बहुत दिन से मोबाइल-मोबाइल कर रहा है, नया आया है, मैं दे दूँगा उसको।’

अब काटो तो खून नहीं। कह रहा है, ‘नहीं-नहीं, ठीक है, ये होता है, वो होता है।' मैंने कहा, ‘इसमें तू क्या कर लेता है? मैसेज तू नहीं कर सकता, लिख तू नहीं सकता, पोस्टर तेरे नहीं बनते, ऐप इसमें नहीं आती, तू इसे रखकर करेगा क्या?' बोला, ‘नहीं सर, ठीक है, बहुत बढ़िया है, छोड़ दीजिए।’

मैंने कहा, ‘बढ़िया नहीं है बेकार है, छोड़कर जा।’ कहा, ‘नहीं-नहीं, छोड़ेंगे नहीं।’ काहे को मानूँ मैं, मैंने रखवा लिया — तू निकलवा सकता है तो निकाल। सोने गया, वहाँ दस्तक दे रहा है ससुरा। ‘सर, वो दे दीजिएगा ज़रा सा, एक कॉल कर लें फिर रख लीजिएगा।’

दिल ही नहीं मान रहा, वो जब तक चूम-ऊम न ले मोबइल को उसे नींद ही नहीं आती थी। मोबाइल से उसका बड़ा स्नेह था। उस मोबाइल के कारण इतने सारे उसके काम बच जाते थे। वो मोबाइल इतना टूटा-टाटा और घटिया न होता तो सोचो कितने काम करने पड़ते। जीवन में सत्य आ जाता। तो मोबाइल तो बड़े लाभ की चीज़ था। उस मोबाइल के कारण ही उनकी सारी भ्रान्तियाँ और सारे झूठ बचे हुए थे — बिलकुल व्यग्र हो गये।

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