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मन फ़िज़ूल चीज़ों को क्यों पकड़ता है? || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
27 min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन फ़िज़ूल चीज़ों को क्यों पकड़ता है?

आचार्य प्रशांत: मन जिन चीज़ों को पकड़ता है वो फ़िज़ूल नहीं होती हैं। वो बड़ी लाभप्रद होती हैं। मन आमतौर पर जिन चीज़ों को पकड़ता है उनको फ़िज़ूल मत बोलिए। क्योंकि उनको फ़िज़ूल बोलना एक तरह का पाखंड होगा। अगर वो फ़िज़ूल ही होतीं तो मन उनको पकड़ता क्यों। तो उनको न फ़िज़ूल बोलिए, न मूल्यहीन बोलिए। वो व्यर्थ नहीं हैं। उनमें कुछ बात ज़रूर है, तभी मन उनकी ओर बार-बार भागता है, मन उन्हें बार-बार पकड़ता है।

तो इस पूरी प्रक्रिया को थोड़ा समझेंगे, कि मन जिन चीज़ों की ओर भागता है, क्यों भागता है। बाद में आप भले ही बोल दें कि मन बेकार चीज़ों की ओर ही चलता रहता है — पर क्यों भागता है? क्योंकि उन चीज़ों की क़ीमत है। किसके लिए है? आप दो हैं। आप कम-से-कम दो हैं। हम सब एक नहीं होते। हम सब खंडित होते हैं, हम सब बहुत सारे होते हैं। तो हममें ही कोई ऐसा बैठा है, हमारे ही भीतर कोई ऐसा बैठा हुआ है, जिसके लिए उन सब व्यर्थ चीज़ों की बड़ी उपयोगिता है। तभी तो मन उधर को भागता है।

समझना। जुआरी जुए की तरफ़, कामी काम की तरफ़, शराबी शराब की तरफ़, लोभी लाभ की तरफ़, गाय घास की तरफ़, पतंगा प्रकाश की तरफ़, पुरुष स्त्री की तरफ़ यूॅं ही नहीं भागता है। कोई बात है। जल्दी से अगर यह कह दिया कि 'यह तो हरकत बेकार की है, देखो पतंगा गया और आग में जल मरा!' तो फिर तो हमने पूरी घटना को समझा ही नहीं। पतंगा कोई दुर्घटनावश थोड़े ही जल मरा है। पतंगे के भीतर कोई बैठा है जिसे जल ही मरना है।

लोभी को लाभ में कुछ तो मिल रहा होगा, क्रोधी को क्रोध में कुछ तो मिल रहा होगा, शराबी को शराब में कुछ तो मिल रहा होगा। क्या मिल रहा है? अरे ग़लत प्रश्न पूछ दिया, 'किसको' मिल रहा है? क्योंकि हम एक नहीं हैं, हम कम-से-कम दो हैं। हम बहुत सारे हैं। तो हमारे ही भीतर कोई है, जिसे शराब से कुछ मिलता है। हमारे ही भीतर कोई है, जिसे हिंसा से कुछ मिलता है। हमारे ही भीतर कोई है, जो बेचैनी में मूल्य देखता है।

कौन है? समझते हैं। एक तो आप हैं शरीर। क्या हैं? शरीर। जिसको आप अपनी पहली पहचान मानते हैं। मानते हैं न? अपनी तस्वीर कहीं देखी नहीं कि तुरन्त इशारा करके कहेंगे, 'वह मैं हूँ।' सत्य को भी पूजना है तो देखिए वहाँ पर आपने क्या रखे हैं, पीछे देखिए। तस्वीरें रखी हैं, चेहरे रख दिये (गुरुनानक साहब, कबीर साहब और शिव जी की तस्वीरों की ओर बताते हुए)। बिना चेहरे के हमारा काम ही नहीं चलता। गुरु जी इस कुर्सी पर सशरीर ना विराजे हों, तो आप मानेंगे ही नहीं कि वो आये। ठीक? इस भवन का माहौल कुछ था (स्वयं के शरीर को बताते हुए) इस देह के आने से पहले और जब इस देह ने प्रवेश किया, और इस आसन पर बैठी तो इसके बाद माहौल बदल गया, क्योंकि आप कहने लगे कि आ गये गुरु जी। आयी क्या है भीतर? आयी क्या है भीतर? देह। तो हमारे लिए देह सर्वोपरि है। बात समझ में आ रही है?

अब देह हैं अगर हम और देह से इतना हमारा गहरा नाता है, तो देह के अपने लक्ष्य होते हैं। देह की अपनी एक संरचना है, अपने इरादे हैं। देह मानो जैसे एक स्वतन्त्र सत्ता रखती हो। एक ऐसी स्वतन्त्र सत्ता जिसका किसी और से कोई लेना ही देना नहीं। आप कह सकते हैं कि आप बहुत मूल्य देते हैं सत्संग को, सत्य को। रात ज़रा चढ़ेगी नहीं कि देह को नींद आनी शुरू हो जाएगी। देह को जैसे कोई मतलब ही ना हो कि सत्य है, कि अध्यात्म है, कि राम हैं, या कृष्ण हैं। होंगे राम, होंगे कृष्ण, देह कहेगी, 'मुझे तो सोना है।' साक्षात श्रीहरि भी उतर आयें, तो भी देह एक बिंदु पर आकर कहेगी, 'थोड़ा सो लें।' और हो सकता है देह उसी व्यक्ति की हो जो दिन-रात गाता हो, प्रार्थना करता हो कि 'एक बार, बस एक बार दर्शन दे दो राम।' क्या भजन है उसका? 'मोहे दर्शन भिक्षा दे दो राम, मोहे दर्शन भिक्षा दे दो राम।'

अब अकस्मात घटना यह घटी कि यह सज्जन दो-तीन दिन से ठीक से सोये नहीं थे और राम तो वहाँ से आते हैं जहाँ समय नहीं। तो उनको पृथ्वी के समय से प्रयोजन नहीं। वो रात के ढाई-तीन बजे उतर आये, इन महाशय के सामने जो गा रहे थे, 'मोहे दर्शन भिक्षा दे दो राम, दे दो राम।' अब यह बड़ी अड़चन हो गई। राम ने वक्त ग़लत चुन लिया उतरने का, रात में तीन बजे और महाशय सोये नहीं थे दो-तीन दिन से ठीक से। तो अब राम सामने खड़े हैं और यह जम्हाइयाँ ले रहे हैं। ऐसी तो देह है। राम भी सामने खड़े होंगे, तो देह एक सीमा से ज़्यादा असुविधा बर्दाश्त करने वाली नहीं है। थोड़ा बहुत तुम उसे खींच सकते हो, थोड़ा बहुत तुम उसे ठेलकर धक्का दे सकते हो, उसके बाद नहीं। उसके बाद दृश्य यह होगा कि राम खड़े हुए हैं तुम खर्राटे बजा रहे हो। हाँ, जब जगोगे तो फिर खूब और रोओगे कि 'अरे! बड़ा वियोग हुआ। मैं बड़ा अपात्र निकला।' वह सब बाद की बात है। सो तो लोगे ही। सोने से नहीं चूकने वाले।

तो देह किसी की नहीं सुनती। हमने कहा, उसकी एक स्वतन्त्र सत्ता है‌। वह निर्धारित करे बैठी है पहले से ही कि उसे क्या चाहिए। तुम्हारा ज्ञान देह के काम नहीं आएगा। ज्ञानी की देह को भी ऑक्सीजन चाहिए और मुर्ख की देह को भी ऑक्सीजन चाहिए। सन्यासी का हृदय भी धड़कता है और गृहस्थ का हृदय भी वैसे ही धड़कता है। सारी सामान्य शारीरिक क्रियाएँ सब में एक जैसी होती हैं। बड़े-बड़े सन्त महात्माओं को भी बीमारी लगती है और मृत्यु आती है।

तो अगर तुम किसी दिशा में भाग रहे हो, तो बहुत संभव है कि देह के कारण भाग रहे हो। ये न कहो कि फ़िज़ूल भाग रहे हो। जिधर को जा रहे हो वह जगह क़ीमती है ज़रूर, किसके लिए? देह के लिए। क्या तुमने देखा नहीं है कि मन्दिरों के प्रांगण में भी शौचालय तो होते हैं? अब देखने में यह बात कितनी विचित्र है कि किसी ने मन्दिर के प्रमुख द्वार, महाद्वार से प्रवेश किया और प्रवेश करने के उपरान्त वह मूर्ति की ओर नहीं बढ़ रहा, गर्भगृह की ओर नहीं बढ़ रहा, वह बढ़ रहा है शौचालय की ओर। ऐसा देखा है या नहीं? तुमने द्वार से प्रवेश किया, और मूर्ति सामने है, पर तुम मूर्ति की तरफ़ नहीं जा रहे। तुम किधर को मुड़ गये? शौचालय की ओर मुड़ गये। और कुछ ग़लत नहीं किया। क्योंकि तुम्हारा इरादा भले ही रहा हो मूर्ति की ओर जाने का, देह के तो अपने ही लक्ष्य होते हैं। उसको अगर शौच जाना है तो जाना है। धार्मिक अवसर हो, अधार्मिक अवसर हो, शौच माने शौच। जाएँगे तो जाएँगे। तो बहुत दफ़े जिधर को तुम भागते हो उधर को बस देह की ख़ातिर भागते हो। यह बात आयी समझ में?

हमने कहा, एक तो देह हो तुम‌। और अनेक हो तुम, कम से कम दो हो तुम। अब दूसरे पर आते हैं। दूसरे तुम हो मन, अहंता। जैसे एक शारीरिक देह है न तुम्हारी, वैसे ही एक सूक्ष्म देह भी है। जैसे शारीरिक देह पोषण माँगती है और उसके अपने इरादे होते हैं वैसे ही सूक्ष्म देह भी पोषण माँगती है और उसके अपने इरादे होते हैं। यह जो सूक्ष्म देह है, यह माँगती है पद, प्रतिष्ठा, जानकारी, सम्मान, ताक़त, बल। यह इनकी ओर आकृष्ट होती है। स्थूल देह, शरीर किधर को आकर्षित होता है? भोजन की ओर; गाय को चारा चाहिए। आराम की ओर; जल्दी से कोई जगह खोजो जहाँ बैठकर के आराम कर सकें, सो ही जाएँ। कामवासना की ओर; जिस लिंग में पैदा हुए हो, उसके अनुसार किसी दिशा को आकर्षित होते रहते हो। इसी तरह से जो दूसरा बैठा है भीतर, जिसको मन का नाम दे सकते हो, वह आकर्षित होता रहता है सम्मान की ओर, ताक़त की ओर, जानकारी की ओर, सुरक्षा की ओर।

तो किसी दिशा को अगर बढ़ रहे हो, तो देख लेना कि उधर को बढ़ने वाला कहीं भीतर का सूक्ष्म शरीर तो नहीं है? उसके भी अपने इरादे होते हैं। जैसे अभी कहा न कि हो सकता है कि तुम मन्दिर में प्रवेश कर रहे हो, और प्रवेश करते वक़्त नजारा कुछ यूँ हुआ कि तुम सीधे देवमूर्ति की ओर जाने की जगह शौचालय की ओर मुड़ गये, वैसे ही यह भी हो सकता है कि तुम मन्दिर में आये तो हो पूजा, अर्चना और भक्ति के लिए लेकिन मन्दिर में भी यह ख़्याल रख रहे हो कि किसी गरीब के बगल में न खड़ा होना पड़े, कि मन्दिर भी जाएँ तो ऊँचे वाले मन्दिर जाएँ। या मन्दिर भी जाएँ तो कतार में न लगना पड़े। और कई मन्दिरों में तो महत्वपूर्ण लोगों के लिए अलग दरवाज़े होते हैं और अलग कतारें भी होती हैं।

अब कहने को तो लक्ष्य था भक्ति का और समर्पण का, पर देखो भीतर जो मन बैठा है, उसका लक्ष्य कुछ और है। उसका लक्ष्य है अपने गर्व को बचाये रखना। उसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि तुम्हें देवता के दर्शन हुए या नहीं। उसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि तुमको बोध मिला, शान्ति मिली कि नहीं। उसको तो बस इस बात से मतलब है कि मैं मन्दिर भी गया हूँ तो मेरा ओहदा, मेरी पदवी, मेरा ग़ुरूर क़ायम रहना चाहिए। दर्शन हुए तो ठीक, दर्शन नहीं हुए तो भी ठीक। मन्दिर में भी शरीर को इस बात से मतलब है कि ज़रा छाँव मिल जाए तो कहीं छाँव में खड़े हो जाएँ। कतार में खड़े हैं, धूप लग रही है, तो शरीर के इरादे देख रहे हो? और इसी तरीक़े से तुम जो भीतरी शरीर है, जो सूक्ष्म शरीर है उसके भी इरादे देख रहे हो? उसका इरादा है कि मन्दिर भी आये हैं तो अहंकार कायम रहे, ग़ुरूर बचा रहे।

जब भी कभी तुम किसी व्यर्थ की चीज़ की ओर आकर्षित होते हो, समझ लेना कि इन्हीं दोनों को हो रहा है वह आकर्षण। वास्तव में वह चीज़ व्यर्थ नहीं है, जो उस चीज़ की ओर आकर्षित हो रहे हैं वो व्यर्थ हैं। हमारे भीतर दो ऐसे बैठे हैं जिन्हें न मुक्ति चाहिए, न प्रेम चाहिए, न बोध चाहिए। वह ऐसे मूरख हैं कि उन्हें तो बस भोजन चाहिए और भोग चाहिए। शरीर को चाहिए भोजन और मन को चाहिए भोगने की भावना, कि मैंने भोगा।

और फिर एक हो तुम, मूल अहम् वृत्ति। जिसको राम चाहिए, जिसको शान्ति चाहिए। पर तुम्हारे इरादों को हरा देते हैं तुम्हारे ये दो दुश्मन जो तुम्हारे भीतर बैठे हैं। और ये तुम्हें हरा इसलिए देते हैं क्योंकि तुम भूल जाते हो कि तुम कौन हो। तुम इन दो दुश्मनों के साथ मिल जाते हो। कितनी अजीब बात है, तुम अपने ही दुश्मनों के साथ हो जाते हो। तुम अपने ही दुश्मनों से साझा कर लेते हो, तादात्म्य कर लेते हो। तुम खुद ही कहना शुरू कर देते हो, 'मैं तो शरीर हूँ।' अब जैसे ही तुमने कहा 'मैं तो शरीर हूँ', वैसे ही तुम वही सबकुछ करोगे जो शरीर तुमसे करवाना चाह रहा है। तुम भूल ही गये कि शरीर के इरादे दूसरे हैं और तुम्हारी मौलिक माँग बिलकुल दूसरी है। अब तुम जुट जाओगे शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में, जैसे तुम शरीर ही हो।

इसी तरीक़े से तादात्म्य कर लेते हो मन के साथ। तुम भूल ही गये कि तुम्हारे इरादे कुछ और हैं और मन की चाल कुछ और है। क्यों अपने दुश्मन का ही समर्थन करते हो? अब मन जिधर को जाएगा तुम भी उधर के चले जाओगे और बाद में पछताओगे और कहोगे, 'अरे अरे अरे अरे, व्यर्थ दिशा चले गये, व्यर्थ जगह समय बर्बाद कर दिया, व्यर्थ काम कर दिये, ज़िन्दगी ख़राब कर ली।' बात समझ में आ रही है?

जब भी किधर को भी खींचो, जब भी कुछ आकर्षक लगे, अपनेआप से पूछ लेना, 'मेरे भीतर कौन है जिसको यह सब आकर्षक लग रहा है? शरीर को ही आकर्षक लग रहा है यह सब कुछ, तो मुझे इस पचड़े में पड़ना नहीं है। क्योंकि शरीर की माँगों की पूर्ति अगर हो भी गयी, तो उससे मुझे क्या मिला? मैंने तो साफ़-साफ़ समझ लिया है कि शरीर की माँगें और मेरी माँगें अलग-अलग हैं।'

प्यासे ये (सामने के श्रोता) हों और पानी इनको (बाएँ वाले श्रोता को) पिलाया जाए — प्यासे आप हैं और पानी पिलाया जाए आपके पड़ोसी को तो आपकी प्यास बुझेगी क्या? शरीर को अपना पड़ोसी ही समझो, वह भी मूरख पड़ोसी। पहली बात तो शरीर भिन्न है आपसे। पास है पर एक नहीं है। चूँकि पास है तो मैं कह रहा हूँ पड़ोसी। पहली बात तो वह पड़ोसी मात्र है, दूसरी बात वह मूरख पड़ोसी है। कुछ उसको समझ आता नहीं, यन्त्रवत काम करता है। प्रकृति ने उसको बिलकुल संस्कारित कर दिया है, एक मशीन की तरह। खाओ, पियो, सोओ, अपनी सुरक्षा की परवाह करो, भोजन जैसे मिलता हो खा लो।

निएंडरथल एक प्रकार के आदिमानव थे। अभी खुदाई में अवशेष मिले हैं जिनसे पता चलता है कि वो अपनी ही प्रजाति के दूसरे लोगों को खा भी जाया करते थे। जब किन्ही कारणों से भोजन की कमी हो, तो वो अपने ही कुनबे-कबीले, परिवार के लोगों को खा जाते थे। शरीर ऐसा है। न वह प्रेम जानता है, न बोध जानता है, न करुणा जानता है, न विनम्रता जानता है; वह भूख जानता है। भूख बहुत लगी हो तो जो मिले खा लो। स्वादिष्ट लगता हो तो खा लो मांस, कर डालो हत्या। देखते नहीं हो, कितने लोग मांसाहार करते हैं।

क्योंकि शरीर आध्यात्मिकता तो छोड़ दो, नैतिकता भी नहीं जानता। शरीर के लिए कुछ नैतिक-अनैतिक, पाप-पुण्य नहीं है। शरीर के लिए तो बस शरीर है। 'भोजन कहाँ मिलेगा भाई? और सो कहा सकते हैं? और कामवासना मिटाने के लिए स्त्री कहाँ मिलेगी और पुरुष कहाँ मिलेगा?' अब स्त्री कौन है इससे कोई लेना-देना नहीं, स्त्री की देह चाहिए। और पुरुष कौन है इससे भी कोई लेना-देना नहीं। प्रकृति ने शरीर को सिखा भेजा है कि जितनी स्त्रियों के साथ रिश्ते बना सकते हो बनाओ। अलग-अलग जगह जाकर के सन्तानें पैदा करो। तभी तो प्रजाति आगे बढ़ेगी। प्रकृति का एक ही लक्ष्य है, कि जितनी प्रजातियाँ हैं वह बढ़ती रहें आगे, बढ़ती रहें आगे। और उनको आगे बढ़ाना ज़रूरी है, क्योंकि हर प्रजाति लगातार मिटने के ख़तरे में रहती है। जानते हो न, प्रजातियाँ मिटती भी रहती हैं? न मिटें इसके लिए ज़रूरी है कि जमकर सन्तानोत्पत्ति होती रहे। और बच्चे ज़्यादा-से-ज़्यादा पैदा करने की सम्भावना तभी बढ़ेगी जब एक पुरुष अनेक स्त्रियों के साथ सहवास करे। और एक स्त्री भी एक पुरुष के साथ क्यों रहे? जितने पुरुषों से सम्बन्ध बनाना हो बनाओ। ऐसी सीख प्रकृति ने शरीर को दी हुई है।

तो जब तुम पाओ अपने चंचल चित्त को, दसों पुरुषों और दसों स्त्रियों की ओर जाते हुए, तो जान लेना कि यह तो शरीर का खेल है। प्रकृति ने तो शरीर को ऐसा सिखा कर ही भेजा है। देख लो न पशुओं को। पशुओं को देख लोगे तो समझ जाओगे कि प्रकृति ने शरीर को क्या सीख दे रखी है। पशु को दो ही तीन तरह की प्रेरणा होती हैं। भोजन मिल रहा होगा, चल देगा। जहाँ शारीरिक सुरक्षा मिल रही होगी, उधर को चल देगा। या फिर रति का मौका मिल रहा होगा तो चल देगा। ऐसा है शरीर। मूल रूप से, प्राकृतिक रूप से, पशु का और मनुष्य का शरीर एक ही है।

तो शरीर की तो इतनी ही माँगे हैं। और तुम्हारी क्या माँग है? तुम क्या चाहते हो? यहाँ किसलिए बैठे हो? क्यों आये हो? तुम चाहते हो शान्ति। शरीर शान्ति चाहता है क्या? शरीर कहता है, 'उपद्रव होता हो तो हो, खाना लाओ खाना। हत्या करके भी अगर भोजन मिलता है तो भोजन चाहिए।' तुम कहते हो, 'नहीं, शान्ति चाहिए', शरीर कहता है, 'भोजन चाहिए।' देख रहे हो न दोनों के मंसुबे कितने अलग अलग हैं?

तो शरीर पड़ोसी है। और ऐसा पड़ोसी जो बस इन्हीं दो-तीन चीज़ों के पीछे पड़ा रहेगा उम्र भर। यह याद रखोगे? शरीर तुम्हारा मूरख पड़ोसी है, जिसे न बोध चाहिए, न प्रेम चाहिए। उसको तो बस भोजन चाहिए। अब वह कुछ चिल्ला रहा हो, 'यह दो और वह दो।' तो तुम जल्दी से पहुँच जाओगे उसकी माँग पूरी करने पूरी? न! वह मूरख है, तुम तो समझदार हो न? तुम्हें अच्छे से पता है उसकी कौनसी माँग पूरी करनी है और कौनसी नहीं। तुम्हें अच्छे से पता है उसकी माँग पूरी करनी भी है तो कब करनी है। वह तो दिन भर चिल्लाएगा, 'भोजन भोजन भोजन!' उसको तो मेहनत भी प्रिय नहीं है। शरीर को तो लिटा दो, वह प्रसन्न रहता है। और उसको तो जब देखो तब रति चाहिए। क्या तुम उसकी सारी माँगे पूरी करोगे? यह मूर्ख पड़ोसी है, जो बगल में है और खूब शोर मचाता है। और कहता है, 'मुझे यह दिलावाओ, मुझे वह दिलवाओ।' तुम दिलवाने लग जाओगे क्या? तो नहीं करना है। यह नहीं करना है।

और तुम्हारे दूसरी ओर एक और पड़ोसी रहता है। वह बहुत चतुर-चालाक है। क्या नाम है इस चतुर पड़ोसी का?

श्रोतागण: मन।

आचार्य: उसको भी शान्ति इत्यादि नहीं चाहिए। मन को कभी शान्त देखा है? उसको क्या चाहिए? पैसा मिल जाए। शरीर पैसा नहीं माँगता है। शरीर को कभी देखा है कि पैसा चाहिए? मन पैसा माँगता है। पैसा मिल जाए, समाज में नाम हो जाए, बड़े आदमी कहलाएँ, संसद में पहुँच जाएँ, दुश्मनों को धूल चटा दें, चक्रवर्ती सम्राट हो जाएँ, यह सब मंसूबे होते हैं। तुम्हें क्या चाहिए? शान्ति। और मन को क्या चाहिए? गौरव, फुलना, हम कुछ हैं। वह (शरीर) उधर से शोर मचाता है। वह उधर से शोर मचाता है कि मुझे जो चाहिए मुझे कब मिलेगा। क्या उसकी सारी माँगों की पूर्ति करोगे? करोगे? मैं पूछ किससे रहा हूँ, इधर वाले पड़ोसी से, उधर वाले पड़ोसी से, या बीच वाले से?

प्र: करते तो दोनों ही बेवकूफ़ी हैं।

आचार्य: तो आप उत्तर क्या दोगे यह इस पर निर्भर करता है न कि उत्तर देने वाला कौन है। कोई बड़ी बात नहीं कि बहुत सारे यहाँ शरीर ही बैठे हों। अब मैं उनसे पूछ रहा हूँ, 'क्या शरीर की माँगों की पूर्ति करोगे?' तो बहुत ज़ोर से कहना चाहते हैं, 'हाँ।' (श्रोतागण हँसते हैं)

अब शरीर से ही पूछोगे कि क्या तुझे भोजन चाहिए, तो वह क्या बोलेगा? 'हाँ।' इसी तरह से अगर यहाँ बहुत सारे लोग बैठे हों, जो मन से ही तादात्म्य रखते हों, और मैं उनसे कहूँ कि क्या मन की माँगें पूरी करोगे? तो वो तुरन्त बोलेंगे, 'हाँ।' क्योंकि मन से ही तो पूछा।

तो सबसे पहले ज़रूरी है कि तुम जानो कि ये पड़ोसी हैं, तुम अपने घर में रहो। क्यों इधर-उधर इतना डोलते हो? तुम्हें इतना सुन्दर घर मिला हुआ है, अपने घर में रहो न। घर में ही रहने को कहा जाता है, आत्मस्थ रहना। अपने घर में रहना, आत्मस्थ रहना। न देहस्थ हैं, न मनस्थ हैं, हम आत्मस्थ हैं। हम अपने घर में हैं। जब हम अपने घर में हैं, तो अब हम पर कोई बाध्यता नहीं है कि देह की माँगे पूरी करते रहें और मन की माँग पूरी करते रहें। हम अपने घर में हैं, हमारा घर है बोध का। वहाँ दिया जलता है ज्ञान का। वह हमें बताता है कैसे जीना है।

और सुनो भाई देह, और सुनो भाई मन, तुम्हारे पास तो बड़ी-बड़ी माँगे हैं। तुम कह रहे हो, 'हमारा काम करो।' पर हमें अपना काम भी तो करना है। यह (शरीर) कह रहे हैं, 'भूख मिटाओ', वह (मन) कह रहे हैं, 'पैसा कमाओ।' एक पड़ोसी कह रहा है, 'भूख मिटाओ।' कौन सा पड़ोसी? देह। और दूसरा कह रहा है, 'पैसा कमाओ।' कौन सा पड़ोसी? मन। अब हम तुम्हारी ही माँगें पूरी करते रहेंगे, तो अपना काम कब करेंगे? हमारा क्या काम है? हमारा काम है अपने घर में बने रहना। हमारा काम है, शान्ति पाना और शान्ति में ही स्थापित रहना। तुम्हारे काम अगर मैं करूँगा, तो मेरा काम कौन करेगा? अगर मैं बिलकुल ही खाली बैठा होता, तो मैं तुम्हारे काम कर देता। पर सुनो अड़ोसी और सुनो पड़ोसी, मेरे पास अपने काम भी तो हैं। मेरा काम कौन करेगा?

तुम अपना काम करो। फिर तुम सही दिशा को ही जाओगे। (व्यंग्य करते हुए) पर नहीं, पड़ोस में झाँकने में तो जो मज़ा है वो और कहाँ! (श्रोतागण हँसते हैं)

(एक श्रोता को इंगित करते हुए) अरे आपको कैसे पता कि आप से ही कह रहा हूँ?

अपने घर में बैठे-बैठे बड़ी ऊब होती है, तो चलो ज़रा इधर झाँक आयें। उधर गये नहीं कि फँसे। अपना घर सुन्दर है। अपने घर में जो रहता है उसको ही कहते हैं, 'आत्माराम'। क्या? 'आत्माराम'। अपने घर में हैं। इधर वाला घर देह का है। यह जलेगा, जैसे देह जलनी है। और उधर वाला घर उसका है जो बड़ा क्षणभंगुर है, जो पल-पल बदलता है। देह का बदलना तो फिर भी पता नहीं चलता, है न? लगता है कि देह है, जैसे कल थी वैसे आज है। मन तो पल-पल बदलता है। ऐसा उसका घर है कि वहाँ कुछ अभी ऐसा और कुछ अभी वैसा।

क्या जाना इन दोनों के घरों में! हमारा अपना घर कितना सुन्दर है। ईट-पत्थर के घर की बात नहीं कर रहा हूँ। किस घर की बात कर रहा हूँ? आत्मा की। अपने में रहो। शरीर को कुलबुलाहट उठे, तुम पर कोई अनिवार्यता, कोई मजबूरी नहीं है कि तुम शरीर की कुलबुलाहट शान्त करने के लिए निकल पड़े। मन की लहर उठी, तुम पर कोई अनिवार्यता नहीं है कि तुम लहर के साथ बह गये। मन की लहर है, मन जाने, हमें क्या करना! भई मामला किसके घर का है? उसके घर का। उसके घर में जो कुछ हो रहा हो, वह जाने, मुझे क्या करना है! तेरे घर की बात तू सम्भाल। हम नहीं आएँगे शामिल होने। शामिल ना होने के इस व्रत को, इस साधना को ही साक्षित्व कहते हैं।

शरीर के घर में जो हो रहा हो, शरीर जाने, हम दख़ल नहीं देंगे। मन के घर में जो हो रहा हो, मन जाने, हम उलझेंगे नहीं। हम अपने घर में बैठकर बस देखते रहेंगे कि इधर क्या हो रहा है, उधर क्या हो रहा है। और देखते ऐसे नहीं रहेंगे कि बड़ा मज़ा आ रहा है तो दूरबीन लगाकर झाँक रहे हैं, कि अच्छा इधर क्या चल रहा है। देखते ऐसे रहेंगे कि हम प्रस्तुत हैं, उपस्थित हैं, तो पता चल रहा है। बस पता चल रहा है। जानने की कोई इच्छा नहीं है, बस हमें यूँही पता चल रहा है। अगर इच्छा आ गई तो फिर साक्षित्व नहीं है। समझ में आ रही है बात?

किसको समझ में आ रही है? तीन हैं आप कम-से-कम। तीन में से किसको? समझने का काम ही बस बीच वाले का है। न इधर वाले (शरीर) को कुछ समझ में आता है कभी, न उधर वाले (मन) को कुछ समझ में आता है कभी। उन्हें बोध से, समझ से कोई लेना-देना नहीं। यह कहता है, 'भोजन चाहिए' और वह कहता है, 'पैसा चाहिए, ताक़त चाहिए, संचय चाहिए।' यह कहता है, 'अभी भोगना है।' वह कहता है, 'भविष्य के लिए भी तो जमा करो, भविष्य में भी तो भोगना है।' समझदारी से दोनों का कोई लेना ही देना नहीं। न इधर का न उधर का।

अब यह तो बड़ी गड़बड़ हो गई। कहाँ फँस गये हो? कहा घर बना लिया? अड़ोस-पड़ोस देखे बिना ही बस गये थे क्या? तो हमारे कबीर साहब बोले, "कबीरा तेरी झोपड़ी, गलकटियन के पास।" तो वह जो उनका प्रचलित दोहा है, उसका असली मतलब समझो। कि तुम जहाँ बसे हो, वहाँ एक तरफ़ यह (शरीर) बैठा है गलकटिया और दूसरी तरफ़ वह (मन) बैठा है, गलकटिया। गलकटिया माने जो गला काट दे।

"कबीरा तेरी झोपड़ी, गलकटियन के पास।" और फिर कहते हैं, "जैसी करनी, वैसी भरनी" या "जिसकी करनी, उसकी भरनी। तू क्यों भया उदास?" उसको अपनी करनी खुद भुगतने दो, और उसको भी अपनी करनी खुद भुगतने दो। तू उलझेगा, तो ग़लत होगा। उनकी उदासी को अपनी उदासी मत बना। उनकी उदासी को अपनी उदासी मत बना। शरीर परेशान है, तो शरीर परेशान है। हम नहीं परेशान हैं। भूख पेट को लगी है, उससे हमारी शान्ति में विघ्न क्यों पड़े? तो भूख लगी होगी तो भी हम शान्त रहेंगे। क्योंकि भूख लगी किसको है? हमें नहीं लगी है, किसको लगी है? अरे पड़ोसी को लगी है। पड़ोसी को भूख लगी है, मैं क्यों परेशान होऊँ? किसको भूख लगी है? पड़ोसी को लगी है। और उधर से मन शोर मचा रहा है। क्या शोर मचा रहा है? दस-बीस लाख और चाहिए। अरे उधर वाला पड़ोसी पागल है। हम क्यों परेशान हों? हम तो मौज में सोएँगे। हमारा घर वह थोड़ी ही है, हमारा घर तो यह है। उसकी (शरीर को) उसको भुगतने दो, इसको (मन को) इसकी देखने दो। तुम अपनी झोपड़ी में राम का दिया जला कर चैन से रहो।

अब जब भी कभी कहिए कि, मुझे तो यह चीज़ बड़ी पसन्द आयी, तो तुरंत यह सवाल पूछिए, 'किसको?' क्योंकि कितने हो तुम?

श्रोतागण: तीन।

आचार्य: इन तीनों में से किसको वह चीज़ पसन्द आयी है? जल्दी से यह मत कह दीजिए 'मैं'। 'मैं' माने एक नहीं होता, 'मैं' माने बहुत सारे। अब अभी बातचीत चल रही है, इतने लोग बैठे हैं, आप में से कोई पूछे, 'ज़रा उठकर बाहर टहल आयें?' तो मुझे क्या सवाल पूछना चाहिए? 'किसको जाना है बाहर? किसको?' क्योंकि दिख एक रहे हो, हो तीन। तो तीन में से कौन है जो बाहर जाना चाहता है? बीच वाला (बोधस्वरूप) जाना चाहता है बाहर, तो ज़रूर जाइए। यह दोनों (शरीर और मन) जाना चाहते हैं, तो पागल हो क्या? पड़ोसी तुम्हारा टहल रहा है, तुम भी टहलने निकल पड़ोगे? तुम अपने घर में हो, पड़ोसी चिल्ला रहा है, 'टहलो, टहलो।' तो तुम टहलने चले जाओगे क्या? तुम कहोगे, 'टहलना है तो तू टहल, मुझे क्यों लेकर जा रहा है? मैं यहीं रहूँगा। मुझे यहाँ छोड़कर तू जा, अगर जा सकता है तो जा जहाँ जाना है। मुझे मत हिलाना। मुझे तो पता है अपना काम न? मैं अपना धर्म जानता हूँ। और मेरा धर्म यह नहीं है कि मैं शरीर की माँगों की पूर्ति करता रहूँ। मेरा धर्म यह नहीं है कि मन जहाँ को बहकाये, मैं उधर को चल दूँ। मैं न शरीर हूँ, न मैं मन हूँ। मैं कोई और हूँ।'

प्र२: आत्माराम के बारे में कुछ बताइए, उसका घर कैसा है?

आचार्य: "जहाँ फिर आना और जाना नहीं।" भजन सुनिएगा। उस जगह के बारे में हमारे कबीर साहब ने इतना गाया है, इतना गाया है, बिलकुल आनंद आ जाएगा। वह घर ऐसा है जहाँ पहुँच गये तो फिर न आना न जाना। घर का नाम क्या है?

प्र२: आत्माराम।

आचार्य: अरे आत्माराम तो उसका नाम है जो रहता है। घर का क्या नाम है? घर में बाहर क्या लिखा हुआ है? 'अमरपुर'। घर का नाम है अमरपुर और उसमें रहता है, आत्माराम। अब इनसे (स्वयंसेवक से) पूछिएगा अमरपुर के बारे में, कुछ बताएँ तो, कल।

(एक श्रोता से पूछते हुए) रहना है अमरपुर में? (श्रोता अवाक् हो जाते हैं तो आचार्य जी चुटकी लेते हुए) मैं पूछ किससे रहा हूँ? आत्माराम से पूछूँ तो वह तुरन्त कहेगा, 'हाँ।' अब अगर मैं पूछ ही पड़ोसी से रहा हूँ, तो वह कह रहा है, 'दाल कहाँ है, सब्जी कहाँ है, ढोकला बताओ ढोकला। यह अमरपुर क्या होता है?' तो देखो न, मैं पूछ रहा हूँ 'अमरपुर जाना है?' ये कह रहा हैं 'ढोकला।' (श्रोतागण हँसते हैं)

जाना है अमरपुर?

श्रोतागण: हाँ।

आचार्य: देखो, उत्तर ही दूसरी दिशा से आया। सही उत्तर जो सही है वही दे सकता है। शरीर से सही उत्तर?

श्रोतागण: नहीं आएगा।

आचार्य: मन से भी सही उत्तर?

श्रोतागण: नहीं आएगा।

आचार्य: तो सही उत्तर चाहिए, तो जो सही है उससे सवाल पूछो। ग़लत इकाई से सवाल पूछोगे तो जवाब भी?

श्रोतागण: ग़लत मिलेगा।

आचार्य: जिन्हें सही जवाब चाहिए, वह सबसे पहले यह पक्का करें कि वह सवाल सही से ही पूछ रहे हैं। अब तुम पेट से पूछो, सत्संग करना है? तो जवाब में क्या देगा? डकार। अब पेट से पूछ रहे हो, सत्संग जाना है कि नहीं जाना है, यह कोई बात हुई।

तो सत्संग जाना है या नहीं जाना है, यह पूछना है तो किससे पूछोगे? दिल से पूछो। पेट से नहीं पूछते यह सब बातें। ना इससे (सिर) पूछते हैं, यहाँ कौन बैठा है?

श्रोतागण: मन।

आचार्य: अब उससे पूछोगे, जाना है? वह कहेगा, 'उतनी देर में कहीं कुछ मुनाफ़ा कमा लेंगे। तीन-चार दिन बैठे-बैठे सुन रहे हैं। उसमें क्या मिलेगा?' तो अगर पेट से पूछा, तो भी ग़लत इकाई से सवाल पूछा। और खोपड़े से पूछा तो भी ग़लत इकाई से सवाल पूछा। सही जवाब चाहिए तो सही इकाई से सवाल पूछो। इससे पूछो (दिल से), यह बताइएगा कि सही जवाब क्या है।

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