मैं मिलाप करवाने नहीं, तलवार चलाने आया हूँ || आचार्य प्रशांत, जीसस क्राइस्ट पर (2020)

प्रश्नकर्ता: जीसस का कथन है, “यह न समझो कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने आया हूँ, मैं मिलाप कराने नहीं, तलवार चलाने आया हूँ, मैं तो आया हूँ कि मनुष्य को उसके पिता से और बेटी को उसकी माँ से और बहू को उसकी सास से अलग कर दूँ।“ तो जीसस का ऐसा कहने का क्या अर्थ है?
आचार्य प्रशांत: ये जितने भी यहाँ नाम लिये गये, बाप और बेटा, माँ और बेटी, सास और बहू, ये सब समाज द्वारा बनाये गये रिश्तों के नाम हैं। इनमें से कोई भी नाम व्यक्ति का नहीं है। इनमें से कोई भी नाम मौलिक नहीं है। इनमें से कोई भी नाम ऐसा नहीं है जिसको पकड़ लेने से, ग्रहण कर लेने से आदमी की चेतना साफ़ हो जाती हो, बेहतर हो जाती हो या ऊँचाइयों की तरफ़ बढ़ जाती हो। ये सब नाम आदमी द्वारा बनायी गयी सामाजिक व्यवस्था में कुछ व्यावहारिक सुविधा के लिए हैं।
तो यह समझना होगा कि जीसस इंसान को इंसान से लड़वाने की बात नहीं कर रहे हैं। व्यक्ति को तो व्यक्ति के निकट लाना है। उससे भी पहले व्यक्ति को व्यक्ति के ही माने स्वयं के ही निकट लाना है। पहली बात यह कि इंसान अपने ही क़रीब आये। और दूसरी बात यह कि इंसान दूसरे इंसान के क़रीब आये। अब इंसान की चाहे ख़ुद से दूरी हो, चाहे इंसान की दूसरे इंसान से दूरी हो, इसमें बहुत बड़ा कारण वो नाम ही है जो इंसान ने अपने ऊपर डाल रखे हैं।
इंसान का इंसान से शायद कम बैर होगा, लेकिन हिन्दू का मुसलमान से हो जाता है, मुसलमान का हिन्दू से हो जाता है। एक जात का दूसरी जात से हो जाता है। दो लोग साथ जा रहे हों, आपस में सरल, सहज हँसकर बातें कर रहे हों और तभी एक-दूसरे का नाम पूछ लें। पहली बार उन्हें एक-दूसरे का नाम पता चले, अभी-अभी मिले थे। हो सकता है नाम पता चलते ही उनमें दूरी आ जाए। यह भी हो सकता है कि नाम पता चलते ही वो एक-दूसरे से और निकटता अनुभव करने लगें। चाहे दूरी आ जाए, चाहे निकटता आ जाए, वो आध्यात्मिक तो नहीं ही है, प्राकृतिक भी नहीं है। वो पूरे तरीक़े से एक सामाजिक बात है कि आपके दिमाग में दूसरे को देखने के लिए एक स्वतन्त्र चेतना छोड़ी ही नहीं गयी है।






